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DAC में 52,000 करोड़ के मेगा प्रोजेक्टस को मंजूरी, पहली बार सेनाओं को एक साथ मिलेंगे 10 हाईटेक हथियार, पढ़ें पूरी लिस्ट

इस बार स्वीकृत प्रस्तावों में सबसे अधिक जोर एंटी-ड्रोन सिक्योरिटी, एयर डिफेंस, टैंक सेफ्टी, लॉइटरिंग म्यूनिशन, नेवल सर्विलांस और हाई एल्टीट्यूड सर्विलांस प्लेटफॉर्म पर दिया गया...

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📍नई दिल्ली | 3 Jul, 2026, 7:05 PM

DAC Rs 52000 Crore Defence Approval: भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना को आधुनिक बनाने के लिए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में शुक्रवार को हुई डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) की बैठक में करीब 52,000 करोड़ रुपये के कैपिटल प्रोक्योरमेंट प्रपोजल्स को एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी (एओएन) यानी सैद्धांतिक मंजूरी दी गई। यह मंजूरी ऐसे समय दी गई है, जब ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, नेटवर्क बेस्ड ऑपरेशन और लंबी दूरी की सर्विलांस जैसी क्षमताएं किसी भी सैन्य अभियान का अहम हिस्सा बन चुकी हैं।

इस बार स्वीकृत प्रस्तावों में सबसे अधिक जोर एंटी-ड्रोन सिक्योरिटी, एयर डिफेंस, टैंक सेफ्टी, लॉइटरिंग म्यूनिशन, नेवल सर्विलांस और हाई एल्टीट्यूड सर्विलांस प्लेटफॉर्म पर दिया गया है।

DAC Rs 52000 Crore Defence Approval: भारतीय सेना के लिए सबसे बड़ा फोकस एंटी-ड्रोन और एयर डिफेंस

सूत्रों के मुताबिक डीएसी ने भारतीय सेना के लिए छह प्रमुख सिस्टम्स को मंजूरी दी है। इन सभी का उद्देश्य आधुनिक युद्ध में सैनिकों की सुरक्षा बढ़ाना और दुश्मन के ड्रोन, टैंक, हेलीकॉप्टर तथा मिसाइलों का मुकाबला करना है।

इसमें सबसे महत्वपूर्ण सिस्टम आकाश तरंग एंटी-यूएवी इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम है। पिछले कुछ वर्षों में रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया के संघर्ष और भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में ड्रोन गतिविधियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल पारंपरिक एयर डिफेंस काफी नहीं हैं। छोटे और मध्यम आकार के ड्रोन अब निगरानी, हथियार गिराने और आत्मघाती हमलों में इस्तेमाल हो रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार आकाश तरंग दुश्मन के ड्रोन का पता लगाने, उन्हें ट्रैक करने और जरूरत पड़ने पर उनके कम्युनिकेशन नेटवर्क तथा नेविगेशन सिग्नल को जाम करने में इस्तेमाल होगा। इससे सेना की फॉरवर्ड डिप्लॉयमेंट फॉर्मेशन को एंटी-ड्रोन सुरक्षा मिलेगी। (DAC Rs 52000 Crore Defence Approval)

एमपीएटीजीएम से बढ़ेगी इन्फैंट्री की मारक क्षमता

डीएसी ने मैन पोर्टेबल एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल (एमपीएटीजीएम) सिस्टम को भी मंजूरी दी है। यह डीआरडीओ द्वारा विकसित स्वदेशी मिसाइल है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार इसे सैनिक कंधे पर या ट्राइपॉड के जरिए दाग सकते हैं। इसका उद्देश्य दुश्मन के टैंक और आर्मर्ड व्हीकल्स को कम दूरी से सटीक तरीके से नष्ट करना है। इसमें आधुनिक गाइडेंस तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिससे टारगेट पर अधिक सटीकता के साथ हमला किया जा सकता है।

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एमआरएसएएम देगा मध्यम दूरी की हवाई सुरक्षा

भारतीय सेना को मीडियम रेंज सरफेस टू एयर मिसाइल (एमआरएसएएम) सिस्टम भी मिलेगा। यह डीआरडीओ और इजरायल के सहयोग से बनाया बराक-8 फैमिली के मिसाइल सिस्टम पर बेस्ड है।

सूत्रों का कहना है कि यह सिस्टम मध्यम दूरी से आने वाले लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, क्रूज मिसाइल और बड़े ड्रोन जैसे हवाई खतरों को रोकने में सक्षम होगा। इसमें आधुनिक रडार, कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम और इंटरसेप्टर मिसाइल लगे होते हैं। (DAC Rs 52000 Crore Defence Approval)

V-SHORADS बनेगा अंतिम सुरक्षा कवच

भारतीय सेना के लिए वी-शोराड्स (V-SHORADS) चौथी पीढ़ी के मैन पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम को भी मंजूरी दी गई है।

इसमें मल्टी-स्पेक्ट्रल सीकर तकनीक का उपयोग किया गया है। इससे दुश्मन द्वारा छोड़े गए फ्लेयर्स या अन्य इलेक्ट्रॉनिक काउंटर मेजर्स का असर कम हो जाता है। यह कम ऊंचाई पर उड़ रहे हेलीकॉप्टर, ड्रोन और लड़ाकू विमान के खिलाफ लास्ट लाइन ऑफ डिफेंस के तौर पर काम करेगा। (DAC Rs 52000 Crore Defence Approval)

टैंकों की सुरक्षा के लिए एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम

डीएसी ने पहली बार टैंकों के लिए एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम को भी मंजूरी दी है। आधुनिक युद्ध में टैंक केवल मोटे कवच के भरोसे सुरक्षित नहीं रह सकते। आज एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल और रॉकेट बहुत तेजी से हमला करते हैं। एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम ऐसे हथियारों का पता लगाकर उन्हें टैंक तक पहुंचने से पहले हवा में ही नष्ट करता है। इससे टैंक और उसमें मौजूद क्रू को सुरक्षा मिलती है।

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जेट बेस्ड कामिकाजे ड्रोन भी होंगे शामिल

डीएसी में भारतीय सेना को जेट बेस्ड कामिकाजे ड्रोन सिस्टम की भी मंजूरी मिली है। यह पारंपरिक प्रोपेलर आधारित लॉइटरिंग म्यूनिशन से अलग होगा। जेट इंजन की वजह से इसकी रफ्तार ज्यादा होगी। यह पहले टारगेट एरिया में मंडराएगा और फिर पहचान होने पर सीधे टारगेट से टकराकर हमला करेगा। इसे इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर क्षमता और कम ऑपरेशन कॉस्ट को ध्यान में रखकर डेवलप किया जा रहा है। (DAC Rs 52000 Crore Defence Approval)

नौसेना को मिलेगी नई समुद्री सुरक्षा क्षमता

भारतीय नौसेना के लिए डीएसी ने तीन प्रमुख प्रस्तावों को मंजूरी दी है। इनमें सबसे पहले मल्टी इन्फ्लुएंस ग्राउंड माइन (एमआईजीएम) शामिल है। यह सामान्य समुद्री माइंस से अलग है। इसमें चुंबकीय, ध्वनि और दबाव जैसे कई सेंसर लगे होते हैं। किसी दुश्मन जहाज या पनडुब्बी की गतिविधि के आधार पर यह एक्टिव हो सकती है। इसका उद्देश्य दुश्मन की समुद्री आवाजाही को सीमित करना है।

दूसरा महत्वपूर्ण सिस्टम नेवल शिपबोर्न अनमैन्ड एरियल सिस्टम (NSUAS) है। यह जहाज से उड़ान भरने वाला ड्रोन सिस्टम होगा। इसमें लगे आधुनिक सेंसर समुद्र में काफी दूर तक निगरानी कर सकेंगे। इससे नौसेना की सिचुएशनल अवेयरनेस यानी आसपास की गतिविधियों की जानकारी बेहतर होगी।

तीसरा प्रस्ताव इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन सिस्टम के लिए लैंड बेस्ड टेस्टिंग फैसिलिटी का है। यह कोई हथियार सिस्टम नहीं बल्कि टेस्टिंग सेंटर होगा। यहां भविष्य के नौसैनिक जहाजों और अन्य प्लेटफॉर्म में इस्तेमाल होने वाले इलेक्ट्रिक मोटर तथा प्रोपल्शन सिस्टम का ट्रायल किया जाएगा। (DAC Rs 52000 Crore Defence Approval)

वायुसेना को मिलेगा हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट

भारतीय वायुसेना के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्वीकृति फिक्स्ड विंग हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट (FW-HAPS) की है।

यह सामान्य ड्रोन और सैटेलाइट के बीच की तकनीक मानी जाती है। यह लगभग 18 से 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ सकता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह एक से दो माह तक लगातार एक ही इलाके की निगरानी कर सकता है। खास बात यह है कि यह सौर ऊर्जा पर चलता है।

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सूत्रों के अनुसार इस प्लेटफॉर्म का उपयोग इंटेलिजेंस, सर्विलांस एंड रिकॉनिसेंस (आईएसआर), दूरसंचार और रिमोट सेंसिंग जैसे कार्यों के लिए किया जाएगा। सैटेलाइट की तुलना में इसकी लागत कम होती है और जरूरत के अनुसार इसे किसी विशेष क्षेत्र में तैनात किया जा सकता है। (DAC Rs 52000 Crore Defence Approval)

बदलते युद्ध के अनुसार तैयार हो रही हैं तीनों सेनाएं

रक्षा सूत्रों का कहना है कि इस बार जिन सिस्टम्स को मंजूरी दी गई है, वे पारंपरिक हथियारों से अलग नई पीढ़ी की सैन्य तकनीकों पर आधारित हैं। इनमें एंटी-ड्रोन सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, मल्टी-लेयर एयर डिफेंस, एक्टिव टैंक सुरक्षा, लॉइटरिंग म्यूनिशन, समुद्री ड्रोन, स्मार्ट माइंस और हाई एल्टीट्यूड सर्विलांस प्लेटफॉर्म जैसी क्षमताएं शामिल हैं।

सूत्रों के अनुसार इन सिस्टम्स का उद्देश्य तीनों सेनाओं की नेटवर्क आधारित युद्ध क्षमता, स्थिति की वास्तविक समय में जानकारी, सैनिकों की सुरक्षा और तेजी से निर्णय लेने की क्षमता को मजबूत करना है। सरकार का जोर स्वदेशी रक्षा उत्पादन और आत्मनिर्भर भारत अभियान के अनुरूप अधिकतम घरेलू तकनीक और उद्योग को बढ़ावा देने पर भी बना हुआ है।

हालांकि यह केवल एओएन है। यानी अभी खरीद की आवश्यकता को मंजूरी मिली है। अंतिम संख्या, लागत और सप्लायर का चयन टेंडर, तकनीकी मूल्यांकन और कीमत तय होने के बाद किया जाएगा। (DAC Rs 52000 Crore Defence Approval)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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