HomeIndian Air ForceAMCA प्रोजेक्ट के लिए ATV मॉडल को क्यों माना जा रहा है...

AMCA प्रोजेक्ट के लिए ATV मॉडल को क्यों माना जा रहा है गेम चेंजर? INS अरिहंत की सफलता से क्या सीखेगा भारत का स्टेल्थ फाइटर प्रोग्राम?

एटीवी यानी एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वेसल प्रोजेक्ट भारत के सबसे गोपनीय और सबसे सफल डिफेंस प्रोजेक्ट्स में से एक माना जाता है। इसकी शुरुआत 1980 के दशक में हुई थी, जब भारत ने पहली बार स्वदेशी परमाणु शक्ति चालित पनडुब्बी विकसित करने का फैसला किया...

रक्षा समाचार WhatsApp Channel Follow US

📍नई दिल्ली | 3 Jul, 2026, 12:54 PM

AMCA ATV Model: भारत के सबसे महत्वाकांक्षी पांचवी पीढ़ी के फाइटर जेट प्रोग्राम एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) के प्रोटोटाइप डेवलपमेंट में निजी उद्योग की अहम भूमिका होगी। इसमें टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, एलएंडटी, भारत फोर्ज, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल), डायनामेटिक टेक्नोलॉजीज और डेटा पैटर्न्स जैसी कंपनियां इस प्रोजेक्ट में शामिल होने की दौड़ में हैं। लेकिन प्रोजेक्ट जितना बड़ा है, चुनौतियां भी उतनी ही बड़ी हैं। इंजन, स्टेल्थ टेक्नोलॉजी, एवियोनिक्स, अलग-अलग एजेंसियों के बीच तालमेल और समय सीमा जैसी कई ऐसी चुनौतियां हैं, जिनका समाधान केवल तकनीक से नहीं बल्कि बेहतर प्रोजेक्ट मैनेजमेंट से भी जुड़ा हुआ है।

लेकिन जिस तरह से AMCA के लिए जीई-414 इंजन की कीमतों में तीन गुना बढ़ोतरी (इस खबर को रक्षा समाचार ने ही सबसे पहले ब्रेक किया था) जैसी खबरें सामने आ रही हैं, उससे सरकार के अंदर चिंता बढ़ गई है। इस पर सरकार के अंदर बैठे लोगों का कहना है कि ऐसे समय में देश की सबसे सफल रक्षा प्रोजेक्टओं में गिने जाने वाले एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वेसल (ATV) मॉडल से काफी कुछ सीखा जा सकता है। इसी प्रोजेक्ट के तहत भारत ने अपनी पहली स्वदेशी न्यूक्लियर पावर्ड बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन आईएनएस अरिहंत डेवलप की थी।

यह प्रोजेक्ट कई दशक चला, लेकिन इसके बावजूद तय लक्ष्य तक पहुंची और आज इसे मिशन मोड में पूरी की गई सबसे सफल डिफेंस प्रोजेक्टओं में गिना जाता है।

AMCA ATV Model: एटीवी मॉडल इतना सफल क्यों माना जाता है

एटीवी यानी एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वेसल प्रोजेक्ट भारत के सबसे गोपनीय और सबसे सफल डिफेंस प्रोजेक्ट्स में से एक माना जाता है। इसकी शुरुआत 1980 के दशक में हुई थी, जब भारत ने पहली बार स्वदेशी परमाणु शक्ति चालित पनडुब्बी विकसित करने का फैसला किया।

उस समय भारत के पास परमाणु रिएक्टर आधारित पनडुब्बी बनाने का अनुभव नहीं था। परमाणु रिएक्टर, विशेष स्टील, सोनार, हथियार, पनडुब्बी डिजाइन और निर्माण जैसी लगभग हर तकनीक चुनौती थी। इसके बावजूद प्रोजेक्ट को राष्ट्रीय सुरक्षा की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में रखा गया। इसके लिए सरकार ने अलग प्रोजेक्ट मैनेजमेंट सिस्टम तैयार किया।

सरकार ने इस प्रोजेक्ट को सामान्य सरकारी प्रक्रिया की तरह नहीं चलाया। इसे राष्ट्रीय मिशन का दर्जा दिया गया। प्रोजेक्ट के लिए अलग नेतृत्व बनाया गया और उसे सीधे शीर्ष स्तर तक पहुंच दी गई। डीआरडीओ, परमाणु ऊर्जा विभाग, बार्क, भारतीय नौसेना और उद्योग जगत को एक जॉइंट स्ट्रक्चर में काम कराया गया। यही वजह रही कि अलग-अलग विभाग होने के बावजूद सभी का लक्ष्य एक ही रहा और फैसले लेने में बेवजह देरी नहीं हुई।

एक मिशन, एक नेतृत्व और एक जवाबदेही

सरकार के सूत्रों का कहना है कि एटीवी प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी ताकत उसका मिशन मोड मैनेजमेंट था। प्रोजेक्ट के लिए एक ऐसी लीडरशिप तैयार की गई, जिसे फैसले लेने की पर्याप्त स्वतंत्रता दी गई।

इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि किसी तकनीकी या प्रशासनिक समस्या के आने पर अलग-अलग मंत्रालयों और विभागों के बीच फाइलें महीनों तक नहीं घूमती थीं। समस्याओं का समाधान सीधे प्रोजेक्ट स्तर पर किया जाता था।

यह भी पढ़ें:  F-35 Stealth Fighter Jets: आसान नहीं है भारतीय वायुसेना में अमेरिकी फाइटर जेट्स शामिल करने की डगर! पहले इन चुनौतियों से पाना होगा पार?

यही कारण था कि अत्यंत जटिल तकनीकों, परमाणु रिएक्टर, प्रोपल्शन सिस्टम, सोनार, हथियार और पनडुब्बी डिजाइन जैसे क्षेत्रों में काम करने वाली कई एजेंसियां एक साथ आगे बढ़ सकीं।

सूत्रों का मानना है कि एएमसीए प्रोजेक्ट की मुश्किलें भी अब लगभग इसी स्तर की हो चुकी है। इसलिए केवल तकनीकी क्षमता ही नहीं, बल्कि उसी तरह के प्रोजेक्ट मैनेजमेंट मॉडल की भी जरूरत महसूस की जा रही है।

एएमसीए प्रोजेक्ट क्यों है भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण?

एएमसीए केवल एक नया लड़ाकू विमान नहीं है। यह भारतीय वायुसेना की भविष्य की लड़ाकू क्षमता की रीढ़ माना जा रहा है। यह विमान पांचवीं पीढ़ी की स्टेल्थ तकनीक, कम रडार पहचान, सुपरक्रूज क्षमता, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित मिशन सिस्टम, अत्याधुनिक सेंसर फ्यूजन और नेटवर्क बेस्ड कॉम्बैट सिस्टम से लैस होगा।

वर्तमान में भारतीय वायुसेना सुखोई-30 एमकेआई, राफेल, तेजस और मिराज-2000 जैसे विमानों को ऑपरेट कर रही है। आने वाले वर्षों में पुराने मिग-29 और जगुआर जैसे विमानों की जगह लेने के लिए एएमसीए को सबसे महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म माना जा रहा है।

वहीं, यह विमान पूरी एयरोस्पेस इंडस्ट्री को नई दिशा भी देगा। क्य़ोंकि इसमें हजारों छोटे और बड़े उपकरण, अत्याधुनिक कंप्यूटर सिस्टम, रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, सेंसर और हथियार इंटीग्रेट किए जाएंगे। (AMCA ATV Model)

सभी एजेंसियों को एक मंच पर लाने की जरूरत

सूत्रों का कहना है कि आधुनिक लड़ाकू विमान डेवलप करना केवल एयरफ्रेम तैयार करने तक सीमित नहीं होता। असली चुनौती दर्जनों एजेंसियों, वैज्ञानिक संस्थानों और उद्योगों को एक साथ जोड़कर तय समय पर काम पूरा कराना होती है।

एएमसीए प्रोजेक्ट में एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (एडीए) डिजाइन की जिम्मेदारी संभाल रही है, जबकि डीआरडीओ विभिन्न तकनीकों का डेवलपमेंट कर रहा है। भारतीय वायुसेना ऑपरेशनल जरूरतें तय कर रही है। दूसरी ओर निजी कंपनियां प्रोटोटाइप तैयार करेंगी। इंजन के लिए विदेशी कंपनी से बातचीत चल रही है। भविष्य में एचएएल भी उत्पादन प्रक्रिया का हिस्सा बन सकता है। इसके अलावा एवियोनिक्स, फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम, स्टेल्थ मैटेरियल और वेपन इंटीग्रेशन के लिए कई अलग-अलग संस्थानों की भूमिका होगी।

सूत्रों का कहना है कि यदि ये सभी संस्थाएं अलग-अलग काम करेंगी तो फैसले लेने में समय लगेगा। इसलिए एटीवी की तरह एक इंटीग्रेटेड प्रोजेक्ट ऑफिस बनाया जा सकता है, जहां सभी एजेंसियों के अधिकारी एक साथ बैठकर काम करें। इस व्यवस्था से डिजाइन, निर्माण, परीक्षण और उत्पादन के बीच तालमेल बेहतर बना रहेगा।

सूत्रों का कहना है कि अगर इन सभी एजेंसियों के बीच समय पर तालमेल नहीं बन पाया तो प्रोजेक्ट की समय सीमा प्रभावित हो सकती है। (AMCA ATV Model)

सबसे पहले बने एक मिशन डायरेक्टर

सूत्रों के मुताबिक एटीवी प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी सफलता उसका स्पष्ट नेतृत्व था। पूरे कार्यक्रम के लिए एक केंद्रीय नेतृत्व मौजूद था, जिसके पास फैसले लेने की पर्याप्त शक्ति थी।

यह भी पढ़ें:  भारतीय सेना की 105 मिमी गन अब हुई ‘स्मार्ट’, अब नहीं मिलेगा दुश्मन को संभलने का मौका

वहीं, एएमसीए के लिए भी इसी तरह एक मिशन डायरेक्टर नियुक्त किया जा सकता है। यह अधिकारी केवल प्रशासनिक भूमिका तक सीमित न रहकर पूरे कार्यक्रम पर नजर रखे। उसका काम एडीए, डीआरडीओ, भारतीय वायुसेना, निजी उद्योग, एचएएल और इंजन से जुड़े सभी भागीदारों के बीच तालमेल बनाए रखना हो।

सूत्रों का कहना है कि यदि हर एजेंसी अलग-अलग प्राथमिकताओं के साथ काम करेगी तो निर्णय लेने में समय लगेगा। लेकिन एक केंद्रीय नेतृत्व होने पर तकनीकी और प्रशासनिक फैसले तेजी से लिए जा सकेंगे। (AMCA ATV Model)

इंटीग्रेटेड प्रोजेक्ट ऑफिस क्यों जरूरी?

एएमसीए जैसे कार्यक्रम में सबसे बड़ी जरूरत एक इंटीग्रेटेड प्रोजेक्ट ऑफिस की है। इस कार्यालय में एडीए के डिजाइन विशेषज्ञ, डीआरडीओ के वैज्ञानिक, भारतीय वायुसेना के ऑपरेशनल अधिकारी, एचएएल के उत्पादन विशेषज्ञ, निजी उद्योग के इंजीनियर और इंजन विकास से जुड़े विशेषज्ञ एक साथ काम करें।

सूत्रों के अनुसार वर्तमान व्यवस्था में अलग-अलग एजेंसियां अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभाती हैं, लेकिन एटीवी मॉडल की तरह यदि सभी एक ही कमांड स्ट्रक्चर के तहत काम करें तो डिजाइन में बदलाव, परीक्षण और उत्पादन से जुड़े निर्णय तेजी से लिए जा सकते हैं। (AMCA ATV Model)

इंजन कार्यक्रम पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत

सूत्रों के मुताबिक एएमसीए की सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती इंजन मानी जा रही है। शुरुआती विमानों में जीई एफ-414 इंजन लगाए जाने की योजना है। दूसरी ओर भविष्य के लिए पूरी तरह स्वदेशी इंजन विकसित करने पर भी काम चल रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि एटीवी परियोजना में भी विदेशी तकनीकी सहयोग लिया गया था, लेकिन साथ ही भारत ने अपनी क्षमता भी विकसित की। यही मॉडल एएमसीए में भी अपनाया जा सकता है।

इसका मतलब यह होगा कि विदेशी इंजन के साथ परियोजना आगे बढ़ती रहे और समानांतर रूप से स्वदेशी इंजन पर भी लगातार काम चलता रहे।

इस तरह विमान कार्यक्रम और इंजन कार्यक्रम एक-दूसरे पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहेंगे। (AMCA ATV Model)

समय सीमा की निगरानी भी एटीवी मॉडल जैसी हो

एएमसीए परियोजना के लिए पहली उड़ान और बाद के परीक्षणों की समयसीमा पहले से तय है। लेकिन डिफेंस प्रोजेक्ट्स में अक्सर समय बढ़ता जाता है और लागत भी बढ़ जाती है।

एटीवी मॉडल में हर स्टेज की नियमित समीक्षा होती थी। यदि कहीं देरी होती थी तो तुरंत वजहों का पता किया जाता था और समाधान निकाला जाता था।

सूत्रों का कहना है कि एएमसीए में भी हर तीन या छह महीने पर उच्चस्तरीय समीक्षा होनी चाहिए ताकि छोटी समस्या आगे चलकर बड़ी बाधा न बन जाए। (AMCA ATV Model)

निजी क्षेत्र और सरकारी संस्थानों का बेहतर तालमेल

पहली बार एएमसीए जैसे बड़े लड़ाकू विमान कार्यक्रम में निजी उद्योग को इतनी बड़ी भूमिका मिली है। यह भारतीय रक्षा उद्योग के लिए महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है।

यह भी पढ़ें:  TAIWS: LoC पर भारत पहली बार लगाने जा रहा है यह घातक हथियार, खोज-खोज कर आतंकियों को करेगा ढेर, इजरायल भी होगा फेल!

लेकिन निजी कंपनियों के पास लड़ाकू विमान विकसित करने का प्रत्यक्ष अनुभव सीमित है। वहीं डीआरडीओ, एडीए और एचएएल के पास वर्षों का तकनीकी अनुभव मौजूद है।

सूत्रों का मानना है कि एटीवी मॉडल की तरह यहां भी अनुभव और नई क्षमता का मेल होना चाहिए। सरकारी संस्थानों का तकनीकी अनुभव और निजी क्षेत्र की उत्पादन क्षमता साथ आए तो परियोजना तेजी से आगे बढ़ सकती है।

फंडिंग में नहीं आए रुकावट

एटीवी प्रोजेक्ट कई दशकों तक चला, लेकिन उसकी फंडिंग बीच में नहीं रुकी। इससे वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को लगातार काम करने का अवसर मिला।

रक्षा सूत्रों का कहना है कि एएमसीए भी लंबी अवधि का प्रोजेक्ट है। इसमें डिजाइन, टेस्टिंग, प्रोडक्शन और अपग्रेडेशन के लिए लगातार निवेश की जरूरत होगी। यदि बजट या प्रशासनिक कारणों से बीच-बीच में रुकावट आती है तो पूरी समयसीमा प्रभावित हो सकती है। (AMCA ATV Model)

गोपनीयता भी होगी बड़ी चुनौती

एएमसीए में स्टेल्थ तकनीक, मिशन कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और भविष्य का स्वदेशी इंजन जैसी कई संवेदनशील तकनीक शामिल हैं।

एटीवी प्रोजेक्ट की तरह ही इस कार्यक्रम में भी जानकारी की सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण होगी। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि डिजाइन डेटा, सॉफ्टवेयर और उत्पादन प्रक्रिया को सुरक्षित रखने के लिए अलग सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत होगी। (AMCA ATV Model)

एटीवी मॉडल से क्या मिल सकता है फायदा

सूत्रों का कहना है कि यदि एएमसीए में एटीवी जैसी वर्किंग सिस्टम अपनाया जाता है तो फैसले लेने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। अलग-अलग एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल बन सकता है। समयसीमा पर ज्यादा प्रभावी निगरानी रखी जा सकती है। तकनीकी जोखिमों का समय रहते समाधान निकाला जा सकता है और निजी तथा सरकारी क्षेत्र की क्षमता का बेहतर उपयोग हो सकता है।

सूत्रों के मुताबिक भारत के लिए एएमसीए केवल एक नया लड़ाकू विमान नहीं है, बल्कि देश एयरोस्पेस उद्योग की अगली पीढ़ी की तकनीकों का आधार बनने जा रहा है। ऐसे में प्रोजेक्ट का मैनेजमेंट भी उसी स्तर का होना चाहिए।

एटीवी प्रोजेक्ट ने यह दिखाया कि यदि राष्ट्रीय महत्व के प्रोजेक्ट को मिशन मोड में चलाया जाए, स्पष्ट नेतृत्व हो, सभी एजेंसियां एक साथ काम करें और लगातार राजनीतिक व प्रशासनिक समर्थन मिलता रहे, तो बेहद मुश्किल डिफेंस प्रोग्राम भी सफलतापूर्वक पूरे किए जा सकते हैं। (AMCA ATV Model)

Author

  • Herry Photo

    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

रक्षा समाचार WhatsApp Channel Follow US
हरेंद्र चौधरी
हरेंद्र चौधरी
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

Most Popular