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114 राफेल और AMCA के बीच फंसी वायुसेना को मिला ये खास ऑफर, जो किसी विदेशी फाइटर जेट कंपनी ने पहले नहीं दिया!

स्वीडिश फाइटर जेट कंपनी साब ने भारत को अपने लेटेस्ट ग्रिपेन एफ लड़ाकू विमान का ऑफर दिया है। दिलचस्प बात यह है कि कंपनी ने सिंगल सीट ग्रिपेन ई के बजाय ट्विन सीटर ग्रिपेन एफ पर जोर दिया है...

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📍नई दिल्ली | 20 Jun, 2026, 1:56 PM

Gripen F Offer to IAF: भारतीय वायुसेना इस समय अपने सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक दौर से गुजर रही है। एक तरफ उसे चीन और पाकिस्तान जैसे दो मोर्चों पर लगातार बढ़ती चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसके लड़ाकू विमानों की गिरती संख्या लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। वायुसेना के लिए स्वीकृत 42 स्क्वाड्रन की तुलना में फिलहाल केवल 29 स्क्वाड्रन ही हैं। जबकि चीन के पास लगभग 100 एविएशन ब्रिगेड हैं, जिनमें पांचवी पीढ़ी के एयरक्राफ्ट जे-20 की एविएशन ब्रिगेड की संख्या लगभग 13 है। जबकि पाकिस्तान के पास लगभग 25 फाइटर/मल्टी-रोल स्क्वाड्रंस हैं और उसे चीन के पांचवी पीढ़ी के जे-35 एयरक्राफ्ट्स की डिलीवरी मिलनी भी जल्द शुरू हो जाएगी। ऐसे में भरतीय वायुसेना को नए लड़ाकू विमानों की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है।

इसी जरूरत को देखते हुए भारत ने 114 मल्टी रोल फाइटर एयरक्राफ्ट यानी एमआरएफए कार्यक्रम को आगे बढ़ाया है और फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमानों के लिए औपचारिक लेटर ऑफ रिक्वेस्ट भेजा है। हालांकि फाइन डील इस साल के आखिर तक होने की ही उम्मीद है क्योंकि कीमतों को लेकर बातचीत अभी भी जारी है। इसी बीच स्वीडन की डिफेंस कंपनी साब ने भारतीय वायुसेना के सामने बेहद खास प्रस्ताव रखा है।

सूत्रों के अनुसार स्वीडिश फाइटर जेट कंपनी साब ने भारत को अपने लेटेस्ट ग्रिपेन एफ लड़ाकू विमान का ऑफर दिया है। दिलचस्प बात यह है कि कंपनी ने सिंगल सीट ग्रिपेन ई के बजाय ट्विन सीटर ग्रिपेन एफ पर जोर दिया है। इस ऑफर में भारत को मिशन सिस्टम, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और कई अहम तकनीकें देने का प्रस्ताव दिया है।

Gripen F Offer to IAF: राफेल और एएमसीए के बीच क्यों बना है गैप

वायुसेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती टाइमलाइन को लेकर है। एक तरफ 114 राफेल विमानों की खरीद प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। दूसरी तरफ पांचवीं पीढ़ी के स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए को सर्विस में आने में अभी कई साल लग सकते हैं। फ्रांस से सीधे फ्लाई अवे कंडीशन में राफेल फाइटर जेट्स की शुरुआती डिलीवरी 2031 से शुरू होने की संभावना है। जबकि एएमसीए का पहला प्रोटोटाइप रोलआउट ही 2029 तक होने की उम्मीद है, वहीं सीरीज प्रोडक्शन 2035 के आसपास शुरू हो सकता है।

सूत्र बताते हैं कि एएमसीए प्रोजेक्ट के तहत प्रोटोटाइप डेवलपमेंट के लिए निजी कंपनियों को शामिल करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। लेकिन अत्याधुनिक स्टेल्थ लड़ाकू विमान बनाना दुनिया की सबसे मुश्किल प्रोजेक्ट्स में शामिल हैं। ऐसे में प्रोडक्शन लेवल तक पहुंचने में समय लगना स्वाभाविक माना जाता है।

यही वह गैप है जिसे साब एक मौके के तौर पर देख रही है। साब का दावा है कि ग्रिपेन एफ को लेकर समझौता होने के बाद पहले विमान की डिलीवरी तीन साल के भीतर शुरू की जा सकती है और कुछ सालों बाद भारत में लोकल प्रोजक्शन के जरिए हर साल लगभग 30 विमान बनाए जा सकते हैं। (Gripen F Offer to IAF)

Gripen F Offer to IAF
Image Source: SAAB

हाईवे से उड़ान भरने वाला फाइटर जेट

ग्रिपेन एफ की सबसे बड़ी खूबी उसकी ऑपरेशनल क्षमता मानी जाती है। यह विमान स्वीडन के शीत युद्ध काल के मिलिट्री डॉक्ट्रिन से डेवलप हुआ है। उस समय स्वीडन को आशंका थी कि युद्ध की स्थिति में उसके बड़े एयरबेस सबसे पहले निशाना बनाए जा सकते हैं।

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इसी के चलते ग्रिपेन को इस तरह डिजाइन किया गया कि वह सामान्य सड़कों और राजमार्गों से भी उड़ान भर सके। सूत्रों के अनुसार यह विमान लगभग 800 मीटर लंबे हाईवे सेक्शन से टेकऑफ और लैंडिंग कर सकता है।

भारत में पिछले कुछ सालों में सीमावर्ती इलाकों में इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी, नई सड़कों, सुरंगों और डुअल यूज वाले इंफ्रास्ट्रक्चर का तेजी से निर्माण हुआ है। लद्दाख, राजस्थान और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में कई ऐसे स्थान तैयार किए गए हैं जहां जरूरत पड़ने पर लड़ाकू विमान ऑपरेट किए जा सकते हैं।

सूत्रों का कहना है कि यदि किसी संघर्ष में बड़े एयरबेस निशाने पर आते हैं तो इस तरह की क्षमता वायुसेना को अतिरिक्त फायदा दे सकती है। (Gripen F Offer to IAF)

केवल पांच लोग और 15 मिनट

भारतीय वायुसेना के मौजूदा कई बड़े लड़ाकू विमानों को उड़ान के बाद फिर से मिशन के लिए तैयार करने में काफी समय और संसाधन लगते हैं। इसके लिए विशेष ग्राउंड सपोर्ट इक्विपमेंट, प्रशिक्षित तकनीशियन और बड़े मेंटेनेंस स्ट्रक्चर की जरूरत होती है। यहां तक कि जगुआर औऱ मिग-29 जैसे फाइटर जेट्स को एक सॉर्टी के बाद फिर से उड़ान लायक बनाने के लिए लंबे मेंटेनेंस टाइम की जरूरत होती है।

ग्रिपेन एफ के बारे में साब का दावा है कि यह बेहद कम संसाधनों के साथ ऑपरेट किया जा सकता है। विमान में लगा ऑटोमेटेड हेल्थ मॉनिटरिंग सिस्टम अधिकांश तकनीकी जांच खुद करता है।

सूत्रों के अनुसार ईंधन भरने, हथियार लगाने और अगली उड़ान के लिए तैयार करने की पूरी प्रक्रिया लगभग 15 मिनट में पूरी की जा सकती है। इसके लिए केवल पांच लोगों की टीम काफी बताई जाती है, जिनमें एक विशेषज्ञ तकनीशियन होना जरूरी है।

Gripen F Offer to IAF
Image Source: SAAB

सोर्स कोड को लेकर साब का यह है ऑफर

सूत्रों का कहना है कि ग्रिपेन प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उसकी ओपन आर्किटेक्चर डिजाइन है। आमतौर पर जब कोई देश विदेशी लड़ाकू विमान खरीदता है तो उसके मिशन सिस्टम और सॉफ्टवेयर का पूरा कंट्रोल ऑरिजनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर के पास रहता है। विमान में नया हथियार जोड़ना हो, रडार को अपग्रेड करना हो या इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम में बदलाव करना हो, तो विदेशी कंपनी की अनुमति और सहायता जरूरी होती है।

सूत्रों के अनुसार साब का दावा है कि ग्रिपेन एफ में फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम और मिशन सिस्टम को अलग-अलग रखा गया है। इसका मतलब यह है कि फ्लाइट सिक्योरिटी से जुड़े मूल सॉफ्टवेयर को छुए बिना मिशन सॉफ्टवेयर में बदलाव किए जा सकते हैं। (Gripen F Offer to IAF)

ग्रिपेन ऑफर की यह है सबसे बड़ी ताकत

सूत्रों के अनुसार भारतीय वायुसेना और रक्षा मंत्रालय की फ्रांस के साथ चल रही बातचीत में एक बड़ा मुद्दा राफेल लड़ाकू विमान के इंटरफेस कंट्रोल डॉक्यूमेंट्स (आईसीडी) और महत्वपूर्ण सॉफ्टवेयर तक पहुंच का भी है। आईसीडी दरअसल वे तकनीकी दस्तावेज होते हैं, जो बताते हैं कि विमान के अलग-अलग सिस्टम आपस में कैसे काम करते हैं और किस तरह एक-दूसरे से डेटा शेयर करते हैं।

सूत्रों का कहना है कि भारत चाहता है कि भविष्य में वह अपने स्वदेशी हथियारों और सेंसरों को राफेल में स्वतंत्र रूप से जोड़ सके। लेकिन बिना आईसीडी एक्सेस के ऐसा करना नामुमकिन है। ऐसी स्थिति में किसी नए भारतीय हथियार को विमान में जोड़ने के लिए मूल निर्माता कंपनी की मंजूरी और तकनीकी मदद की जरूरत पड़ती है।

सूत्र बताते हैं कि यदि इन सिस्टम्स के इंटरफेस कंट्रोल डॉक्यूमेंट्स तक पूरी पहुंच नहीं मिलती है, तो भविष्य में भारत के लिए अस्त्र बियॉन्ड विजुअल रेंज मिसाइल, रुद्रम एंटी रेडिएशन मिसाइल या ब्रह्मोस-एनजी जैसे स्वदेशी वेपन सिस्टम्स को पूरी तरह स्वतंत्र तरीके से प्रमाणित करना मुश्किल हो सकता है। हर बड़े इंटीग्रेशन के लिए फ्रांसीसी कंपनियों के साथ कॉर्डिनेशन की जरूरत पड़ सकती है।

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सूत्रों का कहना है कि यह केवल भारत से जुड़ा मामला नहीं है। फ्रांस ने संयुक्त अरब अमीरात, जर्मनी और अन्य राफेल ग्राहकों के साथ भी यही नीति अपनाई है। फ्रांस का कहना है कि राफेल के आरबीई2 एईएसए रडार, स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट और मिशन कंप्यूटर के सोर्स कोड को डेवलप करने में दशकों का वक्त लगा है और उन पर उसका पूरा अधिकार है। फ्रेंच कंपनी का मानना है कि राफेल के मूल सोर्स कोड और संवेदनशील एवियोनिक्स तक पहुंच देने से बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) और सुरक्षा से जुड़े जोखिम पैदा हो सकते हैं।

वहीं, फ्रांस को खास तौर इस बात की भी चिंता है कि अगर ब्रह्मोस-एनजी जैसी मिसाइल के इंटीग्रेशन से राफेल के कुछ संवेदनशील तकनीकी डेटा तक अप्रत्यक्ष पहुंच का जोखिम बन सकता है। (Gripen F Offer to IAF)

Gripen F Offer to IAF
Image Source: SAAB

क्यों है साब का प्रस्ताव सबसे खास

सूत्रों के मुताबिक ग्रिपेन एफ की सबसे बड़ी खासियत उसका ओपन आर्किटेक्चर मॉडल है। साब भारत को मिशन सिस्टम लेयर पर कहीं अधिक तकनीकी भागीदारी देने की बात कर रहा है। कंपनी का दावा है कि विमान के फ्लाइट कंट्रोल सॉफ्टवेयर और मिशन सॉफ्टवेयर को अलग-अलग रखा गया है। इससे सुरक्षा से समझौता किए बिना भारतीय इंजीनियर मिशन सिस्टम, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर एल्गोरिद्म और स्वदेशी हथियारों के इंटीग्रेशन पर ज्यादा आजादी के साथ काम कर सकते हैं।

बेंगलुरु में डिजाइन और एक्सीलेंस सेंटर बनाने का प्रस्ताव

साब ने भारत में एक विशेष एक्सीलेंस और डिजाइन सेंटर स्थापित करने का भी प्रस्ताव रखा है। सूत्रों के अनुसार इसका उद्देश्य केवल विमान बनाना नहीं बल्कि भारतीय इंजीनियरों और रिसर्च संस्थानों को सीधे डेवलपमेंट प्रोसेस में शामिल करना है। इससे भारतीय वैज्ञानिक और सॉफ्टवेयर इंजीनियर मिशन कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और अन्य स्ट्रैटेजिक सॉफ्टवेयर के डेवलपमेंट में शामिल हो सकते हैं। (Gripen F Offer to IAF)

दूसरे पायलट की जगह वारफेयर मैनेजमेंट अफसर

ग्रिपेन एफ में दूसरा कॉकपिट भी है। आमतौर पर दो सीट वाले विमान ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं, लेकिन ग्रिपेन एफ में दूसरी सीट का इस्तेमाल वेपन सिस्टम्स अफसर कर सकता है।

यह अधिकारी इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, सेंसर मैनेजमेंट, ड्रोन कंट्रोल और कॉम्बैट मिशनों का ऑपरेशन कर सकता है। आधुनिक युद्ध में जहां डेटा की संख्या लगातार बढ़ रही है, वहां यह अतिरिक्त सीट मिशन की क्षमता बढ़ाने वाली मानी जाती है।

लेकिन एक बड़ा जोखिम यह भी है!

जहां ग्रिपेन का ओपन सॉफ्टवेयर सिस्टम चर्चा में है, वहीं इसमें सबसे बड़ी कमजोरी भी है। ग्रिपेन एफ में जनरल इलेक्ट्रिक का एफ-414 टर्बोफैन इंजन लगाया गया है। यही इंजन भारत के तेजस एमके-2 और एएमसीए एमके-1 के लिए भी चुना गया है।

अगर किसी वजह से इंजन सप्लाई पर असर पड़ता है, तो उसका असर केवल ग्रिपेन पर नहीं बल्कि भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रमों पर भी पड़ सकता है। (Gripen F Offer to IAF)

एआई और नेटवर्क बेस्ड युद्ध पर फोकस

साब का कहना है कि ग्रिपेन ई और एफ को भविष्य के बैटलफील्ड को ध्यान में रखकर डेवलप किया गया है। विमान में एडवांस्ड एईएसए रडार, इंफ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम, सिक्योर कम्युनिकेशन नेटवर्क और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट मौजूद हैं।

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कंपनी का दावा है कि विमान बड़ी मात्रा में डेटा को तेजी से प्रोसेस कर सकता है और पायलट को फैसले लेने में मदद करता है। यही वजह है कि इसे नेटवर्क सेंट्रिक वारफेयर रेडी प्लेटफॉर्म के तौर पर भी देखा जा रहा है। (Gripen F Offer to IAF)

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कहां तक पहुंची बात

हालांकि स्वीडन की डिफेंस कंपनी साब का दावा है कि वह भारतीय वायुसेना को अपने आधुनिक ग्रिपेन एफ लड़ाकू विमान देने के प्रस्ताव पर भारतीय वायुसेना और डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) के साथ गंभीरता से बातचीत कर रही है। हालांकि वायुसेना के सूत्रों ने इस पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। लेकिन उन्होंने इतना जरूर कहा कि पिछले कुछ महीनों से साब उनके संपर्क में जरूर है।

साब का दावा है कि वह भारत को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित क्षमताओं के अलावा भारत में ही विमान के डिजाइन, मेंटेनेंस और भविष्य में अपग्रेड की सुविधा देने की बात कर रही है।

कंपनी का दावा है कि समझौता होने के बाद पहला ग्रिपेन लड़ाकू विमान लगभग तीन साल के भीतर भारत को मिल सकता है। साब ग्रिपेन एफ को अपनी श्रेणी का सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान बताती है। यह एक सिंगल इंजन, मल्टी रोल और नेटवर्क बेस्ड फाइटर जेट है, जिसे आधुनिक खतरों का सामना करने के लिए डेवलप किया गया है। (Gripen F Offer to IAF)

क्या हैं ग्रिपेन एफ की खूबियां

ग्रिपेन एफ की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को सप्रेस कर सकता है। कंपनी का दावा है कि यह विमान केवल 10 मिनट के भीतर अलग-अलग मिशनों के लिए तैयार किया जा सकता है।

इस विमान में रेवेन ईएस-05 एईएसए रडार लगा है, जिसे आधुनिक रडार तकनीकों में गिना जाता है। इसके अलावा इसमें इंफ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम, एडवांस इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और सिक्योर कम्यूनिकेशन सिस्टम भी मौजूद है। अमेरिका के बेहतरीन ईए-18जी ग्राउलर और एफ-16वी ब्लॉक 70 फाइटर जेट की तुलना में, ग्रिपेन एक साथ दो तरह के एयरक्राफ्ट रोल निभा सकता है।

साब का कहना है कि ग्रिपेन एफ भारत की आत्मनिर्भर रक्षा नीति के अनुरूप है और इसे भारतीय जरूरतों के अनुसार तैयार किया जा सकता है। कंपनी भारत में उत्पादन सुविधा स्थापित करने, स्थानीय सप्लाई चेन विकसित करने और भारतीय इंजीनियरों तथा तकनीशियनों को प्रशिक्षण देने की भी बात कर रही है।

पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वीडन दौरे के दौरान स्वीडिश वायुसेना के ग्रिपेन लड़ाकू विमानों ने उनके विमान को स्वीडिश हवाई क्षेत्र में एस्कॉर्ट किया था। इसे दोनों देशों के बढ़ते रक्षा सहयोग के प्रतीक के रूप में भी देखा गया था। (Gripen F Offer to IAF)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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