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समुद्र से लेकर दलदल तक दौड़ेगा होवरक्राफ्ट H-561, भारतीय तटरक्षक के बेड़े में शामिल हुआ पहला मेड-इन-इंडिया एयर कुशन व्हीकल

H-561 के साथ भारत ने पहली बार ऐसे प्लेटफॉर्म को देश में तैयार कर सेवा में शामिल किया है, जो समुद्र और जमीन दोनों प्रकार के इलाकों में संचालन करने में सक्षम है...

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📍नई दिल्ली/गोवा | 18 Jun, 2026, 10:36 PM

Indigenous Air Cushion Vehicle H-561: भारत की समुद्री सुरक्षा क्षमता को मजबूत करने के लिए भारतीय तटरक्षक बल ने गुरुवार को अपने बेड़े में पहला स्वदेशी एयर कुशन व्हीकल (एसीवी) H-561 यानी होवरक्राफ्ट को शामिल कर लिया। गोवा स्थित चौगुले एंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड के रस्साईम शिपयार्ड में आयोजित समारोह के दौरान इस प्लेटफॉर्म को औपचारिक रूप से सेवा में शामिल किया गया।

अब तक देश को एयर कुशन व्हीकल के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता था। H-561 भारत में डिजाइन और निर्मित पहला एयर कुशन व्हीकल है, जिसे आम भाषा में हॉवरक्राफ्ट भी कहा जाता है।

Indigenous Air Cushion Vehicle H-561: क्या होता है एयर कुशन व्हीकल?

H-561 के साथ भारत ने पहली बार ऐसे प्लेटफॉर्म को देश में तैयार कर सेवा में शामिल किया है, जो समुद्र और जमीन दोनों प्रकार के इलाकों में संचालन करने में सक्षम है। एयर कुशन व्हीकल या हॉवरक्राफ्ट एक ऐसा वाहन होता है जो पानी, दलदल, रेत, कीचड़ और समुद्र तट जैसे इलाकों में आसानी से चल सकता है। सामान्य जहाज या नाव को चलने के लिए पानी की एक निश्चित गहराई चाहिए होती है, लेकिन एयर कुशन व्हीकल के साथ ऐसा नहीं है।

इस वाहन के नीचे हवा का एक कुशन तैयार किया जाता है। शक्तिशाली लिफ्ट फैन नीचे की ओर हवा भेजते हैं, जिससे वाहन जमीन या पानी की सतह से थोड़ा ऊपर उठ जाता है। इसके बाद पीछे लगे प्रोपेलर इसे आगे बढ़ाते हैं।

यही वजह है कि यह प्लेटफॉर्म उन इलाकों में भी पहुंच सकता है जहां सामान्य पेट्रोल बोट या जहाज नहीं पहुंच पाते।

Indigenous Air Cushion Vehicle H-561
Indigenous Air Cushion Vehicle H-561 (Image Source: PIB)

भारतीय तटरक्षक को क्यों थी इसकी जरूरत?

भारत की समुद्री सीमा लगभग 7,500 किलोमीटर लंबी है। इसके अलावा देश के पास विशाल तटीय क्षेत्र, क्रीक, मैंग्रोव, दलदली इलाके और द्वीपीय क्षेत्र भी हैं।

रक्षा सूत्रों के अनुसार गुजरात के कच्छ क्षेत्र, पश्चिम बंगाल के सुंदरबन, ओडिशा के तटीय इलाकों और अंडमान-निकोबार जैसे क्षेत्रों में कई ऐसे स्थान हैं जहां सामान्य जहाजों की पहुंच सीमित रहती है।

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ऐसे क्षेत्रों में निगरानी, तस्करी विरोधी अभियान, खोज एवं बचाव अभियान और आपदा राहत कार्यों के लिए एयर कुशन व्हीकल बेहद उपयोगी माना जाता है।

पहले विदेश से खरीदे जाते थे हॉवरक्राफ्ट

भारतीय तटरक्षक के पास पहले भी हॉवरक्राफ्ट मौजूद थे, लेकिन वे सभी विदेश से खरीदे गए थे।

सूत्रों के मुताबिक तटरक्षक बल लंबे समय से ब्रिटेन की ग्रिफॉन हॉवरवर्क कंपनी के हॉवरक्राफ्ट का इस्तेमाल कर रहा था। शुरुआती चरण में छह हॉवरक्राफ्ट खरीदे गए थे, जबकि बाद में अतिरिक्त यूनिट्स को शामिल किया गया। कुल मिलाकर भारतीय तटरक्षक के पास 18 विदेशी हॉवरक्राफ्ट मौजूद रहे।

इन प्लेटफॉर्म्स ने वर्षों तक सेवा दी, लेकिन समय के साथ उनके रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी सपोर्ट से जुड़ी चुनौतियां सामने आने लगीं।

इसी कारण लंबे समय से एक स्वदेशी विकल्प विकसित करने की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। (Indigenous Air Cushion Vehicle H-561)

387 करोड़ रुपये की परियोजना

रक्षा मंत्रालय और चौगुले एंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड के बीच अक्टूबर 2024 में लगभग 387.44 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट किया गया था।

इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत कुल छह एयर कुशन व्हीकल तैयार किए जाने हैं। H-561 इस सीरीज का पहला प्लेटफॉर्म है जिसे अब भारतीय तटरक्षक के बेड़े में शामिल किया गया है। सूत्रों के अनुसार बाकी पांच प्लेटफॉर्म भी चरणबद्ध तरीके से तैयार किए जा रहे हैं।

Indigenous Air Cushion Vehicle H-561
Indigenous Air Cushion Vehicle H-561 (Image Source: PIB)

भारत में कैसे बना यह प्लेटफॉर्म?

रक्षा उद्योग से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक इस परियोजना के लिए गोवा स्थित चौगुले शिपयार्ड में विशेष निर्माण सुविधाएं विकसित की गईं।

हॉवरक्राफ्ट निर्माण सामान्य जहाज निर्माण से अलग माना जाता है। इसके लिए तापमान नियंत्रण, विशेष असेंबली प्रक्रिया और उच्च स्तर की इंजीनियरिंग की जरूरत होती है।

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H-561 के निर्माण के दौरान भारतीय इंजीनियरों और तकनीशियनों ने कई नई तकनीकों पर काम किया। यही कारण है कि इस परियोजना को केवल एक प्लेटफॉर्म निर्माण कार्यक्रम नहीं बल्कि तकनीकी क्षमता निर्माण कार्यक्रम के रूप में भी देखा जा रहा है।

तकनीकी रूप से कितना खास है H-561?

रक्षा सूत्रों के अनुसार H-561 को मरीन ग्रेड एल्युमिनियम से बनाया गया है। इससे वाहन का वजन कम रहता है और समुद्री वातावरण में जंग लगने की संभावना भी कम होती है।

इस प्लेटफॉर्म का कुल वजन लगभग 30 टन के आसपास बताया जाता है। वहीं यह कई टन तक अतिरिक्त पेलोड ले जाने में सक्षम है।

इसमें बेहद ताकतवर डीजल इंजन लगाए गए हैं जो इसे तेज रफ्तार देते हैं। हालांकि इसकी सही सही रफ्तार कितनी है, इसकी जानकारी नहीं दी गई है, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि यह तटीय सुरक्षा अभियानों और तुरंत जवाबी कार्रवाई के लिए पर्याप्त है। (Indigenous Air Cushion Vehicle H-561)

किन अभियानों में होगा इस्तेमाल?

भारतीय तटरक्षक बल के लिए यह प्लेटफॉर्म कई प्रकार के मिशनों में उपयोगी साबित होगा। सूत्रों के मुताबिक इसका इस्तेमाल समुद्री निगरानी, तस्करी विरोधी अभियान, अवैध घुसपैठ की रोकथाम, खोज एवं बचाव अभियान और आपदा राहत कार्यों में किया जाएगा।

विशेष रूप से चक्रवात, बाढ़ और समुद्री आपदाओं के दौरान यह प्लेटफॉर्म राहत सामग्री और बचाव दल को तेजी से प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचाने में मदद कर सकता है। (Indigenous Air Cushion Vehicle H-561)

उथले पानी में सबसे ज्यादा फायदा

सामान्य जहाजों और पेट्रोल बोट्स को ऑपरेट करने के लिए पर्याप्त गहराई वाले पानी की आवश्यकता होती है। लेकिन एयर कुशन व्हीकल को इसकी जरूरत नहीं होती। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।

उथले पानी, समुद्र तट, दलदल, क्रीक और मैंग्रोव क्षेत्रों में यह बिना किसी परेशानी के ऑपरेट हो सकता है। यही वजह है कि दुनिया के कई देशों की कोस्ट गार्ड और सैन्य बल ऐसे प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हैं।

समुद्री सुरक्षा चुनौतियों के बीच बढ़ी जरूरत

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय तटरक्षक की जिम्मेदारियां लगातार बढ़ी हैं। समुद्री तस्करी, अवैध गतिविधियां, मछुआरों की सुरक्षा, समुद्री प्रदूषण नियंत्रण और खोज एवं बचाव अभियानों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है।

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ऐसे में ऐसे प्लेटफॉर्म की जरूरत महसूस की जा रही थी जो कम समय में चुनौतीपूर्ण इलाकों तक पहुंच सके।

रक्षा सूत्रों का कहना है कि H-561 इसी आवश्यकता को पूरा करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। (Indigenous Air Cushion Vehicle H-561)

तटरक्षक, रक्षा मंत्रालय और उद्योग की संयुक्त पहल

इस परियोजना को भारतीय तटरक्षक, रक्षा मंत्रालय और घरेलू उद्योग के बीच सहयोग का उदाहरण माना जा रहा है।

अधिकारियों के मुताबिक परियोजना के दौरान कई सरकारी और निजी संस्थानों ने मिलकर काम किया। इसका उद्देश्य केवल एक वाहन तैयार करना नहीं था, बल्कि देश में हॉवरक्राफ्ट निर्माण क्षमता विकसित करना भी था। (Indigenous Air Cushion Vehicle H-561)

समुद्री आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और कदम

रक्षा उत्पादन क्षेत्र से जुड़े सूत्रों का कहना है कि भारत पिछले कुछ वर्षों से जहाज, गश्ती पोत, इंटरसेप्टर बोट, ऑफशोर पेट्रोल वेसल और अन्य समुद्री प्लेटफॉर्म का स्वदेशी निर्माण बढ़ा रहा है। अब एयर कुशन व्हीकल का निर्माण भी उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

भारतीय तटरक्षक के लिए यह प्लेटफॉर्म तटीय निगरानी, सुरक्षा और त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता को मजबूत करने वाले नए साधनों में शामिल हो गया है। (Indigenous Air Cushion Vehicle H-561)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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