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भारत ने रचा नया इतिहास! डिफेंस प्रोडक्शन पहुंचा 1.78 लाख करोड़ रुपये के पार, दुनिया खरीद रही भारतीय हथियार

रक्षा मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2020-21 में भारत का कुल डिफेंस प्रोडक्शन 84,643 करोड़ रुपये था। उस समय से लेकर अब तक उत्पादन में 110 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हो चुकी है...

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📍नई दिल्ली | 17 Jun, 2026, 12:13 PM

India Defence Production 2025-26: भारत ने डिफेंस प्रोडक्शन के क्षेत्र में एक नया रिकॉर्ड बना दिया है। वित्त वर्ष 2025-26 में देश का कुल डिफेंस प्रोडक्शन बढ़कर 1.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार यह अब तक का सबसे बड़ा वार्षिक रक्षा उत्पादन है। पिछले वित्त वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा करीब 1.54 लाख करोड़ रुपये था। यानी एक साल के भीतर डिफेंस प्रोडक्शन में 15.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।

रक्षा क्षेत्र से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में स्वदेशी रक्षा निर्माण, निजी उद्योग की बढ़ती भागीदारी और सरकार की आत्मनिर्भर भारत नीति ने उत्पादन क्षमता को तेजी से बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। यही वजह है कि अब भारत केवल अपनी सेनाओं की जरूरतें पूरी करने तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के कई देशों को रक्षा उपकरण भी निर्यात कर रहा है।

India Defence Production 2025-26: रक्षा मंत्री ने दी बधाई

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस उपलब्धि पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि देश का डिफेंस प्रोडक्शन नई ऊंचाइयों पर पहुंचा है। उन्होंने इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और डिफेंस प्रोडक्शन विभाग, सार्वजनिक क्षेत्र तथा निजी उद्योगों के सामूहिक प्रयासों को श्रेय दिया।

उन्होंने कहा कि डिफेंस प्रोडक्शन में लगातार बढ़ोतरी देश के विस्तारित रक्षा औद्योगिक आधार का संकेत है। उनके अनुसार स्वदेशी उत्पादन क्षमता बढ़ने से भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता भी मजबूत हुई है। (India Defence Production 2025-26)

पांच साल में दोगुने से ज्यादा हुआ डिफेंस प्रोडक्शन

रक्षा मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2020-21 में भारत का कुल डिफेंस प्रोडक्शन 84,643 करोड़ रुपये था। उस समय से लेकर अब तक उत्पादन में 110 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हो चुकी है।

अगर एक दशक पीछे जाएं तो तस्वीर और भी दिलचस्प नजर आती है। वित्त वर्ष 2013-14 में देश का स्वदेशी डिफेंस प्रोडक्शन केवल 43,746 करोड़ रुपये था। वर्तमान आंकड़े को देखें तो पिछले 12 सालों में यह लगभग चार गुना बढ़ चुका है।

रक्षा उद्योग से जुड़े जानकारों के अनुसार यह वृद्धि केवल बड़े प्लेटफॉर्म्स की वजह से नहीं हुई है। इसके पीछे हजारों छोटे और मध्यम उद्योगों का नेटवर्क भी काम कर रहा है, जो मिसाइल, रडार, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, गोला-बारूद और विभिन्न सब-सिस्टम्स का निर्माण कर रहे हैं। (India Defence Production 2025-26)

सरकारी कंपनियों का दबदबा, लेकिन निजी क्षेत्र तेजी से बढ़ा

वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान कुल डिफेंस प्रोडक्शन में रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों और अन्य सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी करीब 76 प्रतिशत रही। वहीं निजी क्षेत्र का योगदान 24 फीसदी तक पहुंच गया।

यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पिछले वित्त वर्ष में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 22 प्रतिशत थी। अब यह बढ़कर अपने अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है।

सूत्रों के मुताबिक निजी क्षेत्र का कुल उत्पादन लगभग 42,000 करोड़ रुपये रहा। रक्षा उद्योग में काम कर रही निजी कंपनियों ने मिसाइल सिस्टम, ड्रोन, एयरोस्पेस कंपोनेंट्स, आर्टिलरी सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक्स और नौसैनिक प्लेटफॉर्म्स के निर्माण में उल्लेखनीय योगदान दिया है।

रक्षा क्षेत्र से जुड़े सूत्रों के अनुसार यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ वर्ष पहले तक देश का अधिकांश रक्षा उत्पादन हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल), भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल), भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (बीडीएल), मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स (एमडीएल), गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) और आयुध निर्माणी नेटवर्क जैसी सरकारी संस्थाओं पर निर्भर था। लड़ाकू विमान, मिसाइल, युद्धपोत, रडार और गोला-बारूद उत्पादन में सरकारी क्षेत्र की भूमिका सबसे बड़ी थी।

हालांकि पिछले कुछ वर्षों में तस्वीर तेजी से बदली है। अब लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी), टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, अदाणी डिफेंस, भारत फोर्ज, महिंद्रा डिफेंस और आदित्य बिड़ला समूह जैसी निजी कंपनियां बड़े रक्षा कार्यक्रमों का हिस्सा बन चुकी हैं। ये कंपनियां केवल पार्ट्स सप्लाई करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि मिसाइल लॉन्चर, आर्टिलरी सिस्टम, ड्रोन, बख्तरबंद वाहन, एयरोस्पेस स्ट्रक्चर, रडार और नौसैनिक प्लेटफॉर्म्स जैसे क्षेत्रों में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

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सूत्रों का कहना है कि निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी ने रक्षा उत्पादन क्षमता को कई गुना बढ़ाने में मदद की है। इसके साथ ही रक्षा उद्योग का पूरा सप्लाई चेन नेटवर्क भी मजबूत हुआ है। वर्तमान में 16,000 से अधिक सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) डिफेंस प्रोडक्शन इकोसिस्टम का हिस्सा हैं। ये कंपनियां सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक मॉड्यूल, केबलिंग सिस्टम, मैकेनिकल पार्ट्स, कंपोजिट स्ट्रक्चर, प्रिसिजन इंजीनियरिंग कंपोनेंट्स और विभिन्न सब-सिस्टम्स का निर्माण कर रही हैं।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार आज किसी भी आधुनिक मिसाइल, रडार, युद्धपोत या लड़ाकू विमान के निर्माण में हजारों छोटे-बड़े कंपोनेंट्स की जरूरत होती है। इनमें से बड़ी संख्या अब देश के भीतर ही तैयार की जा रही है। यही कारण है कि निजी उद्योग और एमएसएमई सेक्टर को भारत के बढ़ते रक्षा उत्पादन का महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है। (India Defence Production 2025-26)

रक्षा निर्यात ने भी बनाया नया रिकॉर्ड

डिफेंस प्रोडक्शन में आई तेजी का असर निर्यात पर भी साफ दिखाई दे रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। यह भी देश के इतिहास का सबसे बड़ा रक्षा निर्यात आंकड़ा है। वित्त वर्ष 2013-14 में निर्यात मात्र 686 करोड़ रुपये था, जो वित्त वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड 62.66 फीसदी बढ़ा है।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार यह उपलब्धि दर्शाती है कि भारतीय रक्षा उद्योग अब केवल घरेलू जरूरतों के लिए उत्पादन नहीं कर रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी जगह बना रहा है।

सूत्रों के मुताबिक भारत से निर्यात होने वाले प्रमुख उत्पादों में मिसाइल सिस्टम, रॉकेट, गोला-बारूद, रडार, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, नौसैनिक उपकरण, ड्रोन और विभिन्न रक्षा प्लेटफॉर्म शामिल हैं। (India Defence Production 2025-26)

आर्मेनिया के साथ 16,000 करोड़ रुपये से अधिक के रक्षा सौदे

भारत का रक्षा निर्यात अब 80 से अधिक देशों तक पहुंच चुका है। इनमें फुल वेपन सिस्टम्स के अलावा छोटे कंपोनेंट्स भी शामिल हैं। पिछले कुछ सालों में आर्मेनिया, फिलीपींस, वियतनाम, इंडोनेशिया, अमेरिका, फ्रांस और कई अन्य देशों ने भारतीय डिफेंस प्रोडक्ट्स में रुचि दिखाई है।

आर्मेनिया इस समय भारत का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण रक्षा ग्राहक बनकर उभरा है। वर्ष 2020 के बाद से दोनों देशों के बीच करीब 1.5 से 2 अरब डॉलर यानी लगभग 12,000 से 16,000 करोड़ रुपये से अधिक के रक्षा सौदे हुए हैं। रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक आर्मेनिया लंबे समय तक रूसी हथियारों पर निर्भर रहा, लेकिन क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों और बदलते भू-राजनीतिक हालात के बाद उसने भारत की ओर रुख किया। (India Defence Production 2025-26)

आर्मेनिया भारत से पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम खरीदने वाला पहला विदेशी देश बना। वर्ष 2022 में लगभग 245 मिलियन डॉलर के इस सौदे ने भारतीय रक्षा निर्यात के लिए नया अध्याय खोला। आर्मेनिया में पिनाका को “शांत” नाम से जाना जाता है। इसकी लंबी मारक क्षमता और कम समय में बड़ी संख्या में रॉकेट दागने की क्षमता को वहां की सेना ने महत्वपूर्ण माना है।

इसके अलावा आकाश-1एस एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम का पहला विदेशी ग्राहक भी आर्मेनिया ही बना। लगभग 25 किलोमीटर की इंटरसेप्शन रेंज वाला यह सिस्टम दुश्मन के लड़ाकू विमान, हेलिकॉप्टर और ड्रोन को निशाना बनाने में सक्षम माना जाता है। इसके साथ ही एटीएजीएस 155 एमएम हॉवित्जर, एमएआरजी 155 ट्रक माउंटेड सेल्फ प्रोपेल्ड गन सिस्टम, स्वाथी वेपन लोकेटिंग रडार, जेडएडीएस काउंटर ड्रोन सिस्टम, एंटी टैंक मिसाइल, मोर्टार, आर्टिलरी शेल, बुलेटप्रूफ जैकेट और नाइट विजन उपकरण भी आर्मेनिया को निर्यात किए गए हैं। आर्मेनिया ने अपनी सैन्य परेड में इन भारतीय प्रणालियों को प्रमुखता से प्रदर्शित भी किया है। (India Defence Production 2025-26)

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फिलीपींस-वियतनाम ने खरीदी ब्रह्मोस, इंडोनेशिया कतार में

दक्षिण चीन सागर क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच फिलीपींस भी भारत के प्रमुख रक्षा ग्राहकों में शामिल हो चुका है। फिलीपींस ने भारत से ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल सिस्टम खरीदने का फैसला किया, जिसे भारतीय रक्षा उद्योग का अब तक का सबसे बड़ा मिसाइल निर्यात सौदा माना जाता है। जनवरी 2022 में करीब 375 मिलियन डॉलर के इस समझौते के तहत तीन मिसाइल बैटरियां, लॉन्चर और सपोर्ट उपकरण शामिल हैं। पहला बैच अप्रैल 2024 में भारतीय वायुसेना के सी-17 ग्लोबमास्टर विमान के जरिए पहुंचाया गया था, जबकि दूसरा बैच अप्रैल 2025 में डिलीवर किया गया।

वियतनाम भी भारतीय रक्षा उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार बनकर उभरा है। रक्षा सूत्रों के अनुसार वियतनाम ने ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल सिस्टम के लिए भारत के साथ लगभग 620 से 629 मिलियन डॉलर का समझौता किया है। इससे पहले भारत वियतनाम को हाई स्पीड गार्ड बोट्स भी उपलब्ध करा चुका है।

इंडोनेशिया भी ब्रह्मोस मिसाइल खरीद प्रक्रिया के अंतिम चरण में बताया जा रहा है। इसके अलावा भारत पहले ही इंडोनेशिया को 40 एमएम नेवल गन सिस्टम उपलब्ध करा चुका है। दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देश भारतीय रक्षा उत्पादों को किफायती और भरोसेमंद विकल्प के रूप में देख रहे हैं। (India Defence Production 2025-26)

अमेरिका एयरोस्पेस कंपोनेंट्स और सब-सिस्टम्स का खरीदार

अमेरिका की बात करें तो वह भारत से पूर्ण हथियार प्रणालियों की तुलना में एयरोस्पेस कंपोनेंट्स और सब-सिस्टम्स का बड़ा खरीदार है। हैदराबाद स्थित टाटा-बोइंग एयरोस्पेस फैसिलिटी में बने अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर के फ्यूजलाज, विंग्स और अन्य संरचनात्मक हिस्से अमेरिका भेजे जाते हैं। इसके अलावा सी-130 और एफ-16 जैसे विमानों के कई महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स भी भारत में तैयार होकर वैश्विक सप्लाई चेन का हिस्सा बन रहे हैं।

फ्रांस भी भारत से हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक्स, सॉफ्टवेयर और विभिन्न एयरोस्पेस कंपोनेंट्स प्राप्त करता है। वहीं म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड और अन्य देशों को डोर्नियर-228 विमान, रडार, आर्टिलरी सिस्टम, आर्मर्ड व्हीकल्स, एम्युनिशन और अन्य सैन्य उपकरणों का निर्यात किया गया है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय हथियार प्रणालियों की बढ़ती मांग के पीछे कई कारण हैं। भारतीय सिस्टम पश्चिमी देशों के समान प्लेटफॉर्म्स की तुलना में अधिक किफायती माने जाते हैं। इसके अलावा भारत तकनीकी सहयोग, प्रशिक्षण और अपेक्षाकृत तेज डिलीवरी पर भी जोर दे रहा है। यही वजह है कि अब भारत केवल कंपोनेंट्स और स्पेयर पार्ट्स का निर्यातक नहीं रहा, बल्कि ब्रह्मोस, आकाश और पिनाका जैसे पूर्ण हथियार सिस्टम्स को भी वैश्विक बाजार में स्थापित कर चुका है। (India Defence Production 2025-26)

पिछले 12 सालों में इन नीतियों ने बदले हालात

रक्षा उत्पादन में आई इस रिकॉर्ड वृद्धि के पीछे केवल बढ़ती मांग नहीं, बल्कि पिछले एक दशक में लागू की गई कई महत्वपूर्ण नीतियां भी हैं। रक्षा क्षेत्र से जुड़े सूत्रों का कहना है कि सरकार ने पिछले 12 सालों के दौरान ऐसे कई फैसले लिए, जिन्होंने घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूत आधार प्रदान किया। (India Defence Production 2025-26)

सबसे महत्वपूर्ण कदमों में सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची को माना जाता है। इसके तहत 4,500 से अधिक रक्षा उपकरणों, हथियार प्रणालियों और विभिन्न सैन्य प्लेटफॉर्म्स को आयात प्रतिबंधित सूची में शामिल किया गया। इसका सीधा असर यह हुआ कि भारतीय सेनाओं की भविष्य की जरूरतों के लिए घरेलू उद्योग को उत्पादन के अवसर मिलने लगे। मिसाइल, रडार, गोला-बारूद, सेंसर, संचार प्रणाली और विभिन्न सैन्य प्लेटफॉर्म्स के निर्माण में भारतीय कंपनियों की भागीदारी तेजी से बढ़ी।

विदेशी निवेश नीति में किए गए बदलावों ने भी रक्षा क्षेत्र को रफ्तार दी। सरकार ने 74 प्रतिशत तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति दी, जबकि विशेष मामलों में सरकारी मंजूरी के जरिए 100 प्रतिशत तक एफडीआई का रास्ता खोला गया। रक्षा उद्योग से जुड़े जानकारों के अनुसार इससे विदेशी कंपनियों की तकनीक, पूंजी और विशेषज्ञता भारतीय उद्योग तक पहुंची, जिससे कई संयुक्त परियोजनाओं को बढ़ावा मिला।

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उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में स्थापित डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर भी इस बदलाव के महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरे हैं। अक्टूबर 2025 तक इन दोनों रक्षा औद्योगिक गलियारों में लगभग 9,145 करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित किया जा चुका था। इसके अलावा 289 से अधिक समझौता ज्ञापनों (एमओयू) पर हस्ताक्षर हुए और करीब 66,423 करोड़ रुपये की संभावित औद्योगिक क्षमता विकसित करने की दिशा में काम शुरू हुआ। इन कॉरिडोर में एयरोस्पेस, मिसाइल सिस्टम, आर्टिलरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और विभिन्न सैन्य उपकरणों के निर्माण की सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। (India Defence Production 2025-26)

वहीं, डिफेंस इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए इनोवेशंस फॉर डिफेंस एक्सीलेंस यानी आईडेक्स कार्यक्रम भी शुरू किया गया। इस पहल ने स्टार्टअप्स, एमएसएमई और युवा उद्यमियों को रक्षा क्षेत्र में नई तकनीक विकसित करने का अवसर दिया। सूत्रों के अनुसार आईडेक्स के तहत हजारों इनोवेशंस प्रोजेक्ट्स पर काम किया गया है, जिनमें ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, ऑटोनॉमस सिस्टम्स और एडवांस सेंसर टेक्नोलॉजी शामिल हैं।

उत्पादन आधारित प्रोत्साहन यानी पीएलआई स्कीम और अन्य औद्योगिक योजनाओं ने भी रक्षा क्षेत्र को मजबूती दी। विशेष रूप से ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक्स और उच्च तकनीक वाले उपकरणों के निर्माण में इन योजनाओं का प्रभाव दिखाई दिया है। इससे देश के भीतर विनिर्माण क्षमता बढ़ी और निजी निवेश को प्रोत्साहन मिला।

खरीद प्रक्रिया में सुधार भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है। डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2020 और बाद में डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल 2025 के जरिए रक्षा खरीद प्रक्रिया को अधिक तेज, पारदर्शी और “इंडियन फर्स्ट” विजन के अनुरूप बनाया गया। इससे भारतीय कंपनियों को रक्षा परियोजनाओं में अधिक अवसर मिलने लगे।

रक्षा क्षेत्र में ऑफसेट नीति में किए गए बदलाव और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर बढ़ते जोर ने भी घरेलू उद्योग की क्षमता बढ़ाई। कई विदेशी रक्षा कंपनियों को भारतीय उद्योग के साथ साझेदारी करने और स्थानीय स्तर पर उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

इसी के साथ डीआरडीओ और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड (टीडीएफ) ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लगभग 500 करोड़ रुपये के इस कोष के माध्यम से नई तकनीकों के डेवलपमेंट, रिसर्च, और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को सपोर्ट दिया गया। इससे निजी उद्योग, स्टार्टअप्स और अनुसंधान संस्थानों को उन्नत रक्षा तकनीकों पर काम करने का अवसर मिला।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इन सभी नीतिगत बदलावों का सबसे बड़ा असर स्वदेशी सामग्री यानी इंडिजिनस कंटेंट पर पड़ा है। एक समय ऐसा था जब भारत की रक्षा खरीद में 65 से 70 प्रतिशत तक निर्भरता आयात पर थी। अब स्थिति बदल रही है और घरेलू उत्पादन तथा स्थानीय सप्लाई चेन की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। कई प्रमुख रक्षा कार्यक्रमों में स्वदेशी सामग्री का स्तर 65 प्रतिशत या उससे अधिक तक पहुंच चुका है। (India Defence Production 2025-26)

कौन-कौन से प्रमुख स्वदेशी प्लेटफॉर्म बन रहे गेमचेंजर 

डिफेंस प्रोडक्शन में वृद्धि के पीछे कई बड़े कार्यक्रम शामिल हैं। वायुसेना के लिए एलसीए तेजस एमके-1ए का निर्माण जारी है। इसके अलावा एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए कार्यक्रम भी आगे बढ़ रहा है।

मिसाइल क्षेत्र में आकाश, अस्त्र, नाग, रुद्रम और पिनाका जैसे सिस्टम्स का उत्पादन बढ़ा है। नौसेना के लिए स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत, प्रोजेक्ट 17ए फ्रिगेट्स और अन्य युद्धपोत कार्यक्रमों ने भी रक्षा उद्योग को गति दी है।

थलसेना के लिए विभिन्न आर्टिलरी सिस्टम, बख्तरबंद प्लेटफॉर्म और गोला-बारूद उत्पादन में भी लगातार वृद्धि हुई है। (India Defence Production 2025-26)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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