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सूर्यास्त्र रॉकेट सिस्टम के ‘स्क्रूड्राइवर असेंबली’ वाले आरोपों पर NIBE का पलटवार; ट्रायल, तकनीक और खरीद प्रक्रिया पर दिया जवाब

कंपनी ने अपने बयान में कहा कि सूर्यास्त्र को केवल विदेशी प्रोडक्ट की असेंबली बताना भारतीय इंजीनियरों, निजी रक्षा उद्योग और भारतीय सेनाओं की ऑपरेशनल जरूरतों का अपमान है...

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📍नई दिल्ली | 17 Jun, 2026, 10:47 AM

NIBE Suryastra Rocket System: भारतीय सेना के लिए खरीदे गए लंबी दूरी के गाइडेड रॉकेट लॉन्चर सिस्टम ‘सूर्यास्त्र’ को लेकर कुछ रक्षा विशेषज्ञों और मीडिया रिपोर्ट्स में इस सिस्टम को विदेशी तकनीक पर आधारित बताते हुए सवाल उठाए गए थे। वहीं अब इस सिस्टम का निर्माण करने वाली कंपनी नाइब लिमिटेड ने एक आधिकारिक बयान जारी कर सभी आरोपों को खारिज कर दिया है। कंपनी का कहना है कि सूर्यास्त्र पूरी तरह भारतीय सेना की तय तकनीकी आवश्यकताओं, स्पेसिफिकेशंस और खरीद अनुबंध की शर्तों पर खरा उतरता है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार यह विवाद केवल एक रॉकेट लॉन्चर सिस्टम तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्मनिर्भर भारत, रक्षा उत्पादन, तकनीकी हस्तांतरण और आपातकालीन खरीद प्रक्रिया जैसे बड़े मुद्दों से भी जुड़ा हुआ है। इसी वजह से सूर्यास्त्र कार्यक्रम पर सेना, उद्योग और रक्षा विशेषज्ञों की नजर बनी हुई है। (NIBE Suryastra Rocket System)

NIBE Suryastra Rocket System: क्या है पूरा मामला?

मामले की शुरुआत तब हुई जब कुछ डिफेंस एक्सपर्ट्स और मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि भारतीय सेना द्वारा खरीदा गया सूर्यास्त्र यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर वास्तव में विदेशी डिजाइन (इजरायली एल्बिट सिस्टम्स का PULS)) पर आधारित प्लेटफॉर्म है और इसमें स्वदेशी कंटेंट बेहद कम है। इसे “स्क्रूड्राइवर असेंबली” बताते हुए कहा गया कि मुख्य तकनीक को विदेश से आई लेकिन भारत में केवल जोड़ने या असेंबल करने का काम किया गय।

रक्षा मामलों से जुड़े सूत्रों ने उस समय यह भी सवाल उठाया कि जिस स्पीड से इस सिस्टम की खरीद हुई, वह असामान्य रूप से तेज थी। जनवरी 2026 में कॉन्ट्रैक्ट, मई में परीक्षण और उसके कुछ दिनों बाद पहली खेप की सप्लाई ने कई सवाल खड़े किए।

इन्हीं आरोपों के बाद नाइब लिमिटेड ने आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी किया और कहा कि रिपोर्टों में कई तथ्यात्मक त्रुटियां हैं तथा महत्वपूर्ण तकनीकी जानकारियों को नजरअंदाज किया गया है। (NIBE Suryastra Rocket System)

नाइब ने आरोपों को बताया भ्रामक

कंपनी ने अपने बयान में कहा कि सूर्यास्त्र को केवल विदेशी प्रोडक्ट की असेंबली बताना भारतीय इंजीनियरों, निजी रक्षा उद्योग और भारतीय सेनाओं की ऑपरेशनलजरूरतों का अपमान है।

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कंपनी का कहना है कि मार्च 2025 में टेक्नोलॉजी कोलैबोरेशन एग्रीमेंट के तहत कुछ वैश्विक भागीदारों के साथ सहयोग जरूर किया गया था, लेकिन सिस्टम का निर्माण, इंटीग्रेशन और उत्पादन भारत में ही किया गया है।

नाइब के अनुसार सूर्यास्त्र परियोजना केवल एक रॉकेट लॉन्चर नहीं है बल्कि देश में लंबी दूरी की गाइडेड रॉकेट तकनीक डेवलप करने की व्यापक पहल का हिस्सा है। (NIBE Suryastra Rocket System)

शिरडी में बनी 200 एकड़ की डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी

कंपनी ने अपने बयान में महाराष्ट्र के शिरडी में स्थापित 200 एकड़ के इंटीग्रेटेड डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग कॉम्प्लेक्स का विशेष उल्लेख किया है।

इस परिसर में स्ट्रक्चरल इंटीग्रेशन, रॉकेट सिस्टम असेंबली, गोला-बारूद उत्पादन और विभिन्न रॉकेट कंपोनेंट्स के लोकेलाइजेशन की सुविधाएं डेवलप की गई हैं।

कंपनी का दावा है कि इस परिसर का उद्देश्य केवल एक उत्पाद तैयार करना नहीं, बल्कि रक्षा उत्पादन के लिए दीर्घकालिक औद्योगिक क्षमता तैयार करना है।

नाइब का कहना है कि यदि किसी सिस्टम के लिए शुरुआती चरण में वैश्विक तकनीकी सहयोग लिया गया है तो इसका मतलब यह नहीं कि पूरा सिस्टम विदेशी है। कंपनी का तर्क है कि दुनिया की अधिकांश आधुनिक रक्षा परियोजनाएं बहुराष्ट्रीय तकनीकी सहयोग के आधार पर आगे बढ़ती हैं। (NIBE Suryastra Rocket System)

सूर्यास्त्र क्या है?

रक्षा सूत्रों के अनुसार सूर्यास्त्र एक यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चिंग सिस्टम है जिसे लंबी दूरी के सटीक हमलों के लिए डेवलप किया गया है।

यह सिस्टम दो अलग-अलग रेंज वाले गाइडेड रॉकेट के साथ आता है। पहला वर्जन लगभग 150 किलोमीटर की दूरी तक टारगेट को हिट कर सकता है, जबकि दूसरा वर्जन 300 किलोमीटर तक अंदर तक मार कर सकता है।

कंपनी के अनुसार यह सिस्टम भारतीय सेना की लंबी दूरी की सटीक मारक क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।

परीक्षण को लेकर क्या दावा किया गया?

नाइब ने अपने बयान में कहा कि 18 और 19 मई को ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज में सूर्यास्त्र सिस्टम का तकनीकी मूल्यांकन किया गया। कंपनी के अनुसार दोनों संस्करणों ने परीक्षण के दौरान निर्धारित प्रदर्शन मानकों को पूरा किया।

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नाइब ने दावा किया कि 150 किलोमीटर वाले संस्करण ने लगभग 1.5 मीटर का सर्कुलर एरर प्रोबेबल (सीईपी) हासिल किया। रक्षा तकनीक की भाषा में इसका मतलब यह है कि रॉकेट टारगेट के बेहद करीब जाकर गिरा।

कंपनी के अनुसार 300 किलोमीटर वाले डीप स्ट्राइक सिस्टम ने भी लगभग 2 मीटर का सर्कुलर एरर प्रोबेबल दर्ज किया।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यदि यह आंकड़े स्वतंत्र रूप से सत्यापित होते हैं तो यह लंबी दूरी की गाइडेड रॉकेट सिस्टम के लिए हाई लेवल की सटीकता मानी जाती है। (NIBE Suryastra Rocket System)

परीक्षण पर उठे सवाल

हालांकि दूसरी ओर कुछ रक्षा सूत्रों ने परीक्षणों को लेकर अलग दावे भी किए हैं। कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि मई में हुए परीक्षणों में एक उड़ान के दौरान रॉकेट ने अपेक्षित प्रदर्शन नहीं किया। कुछ सूत्रों ने दावा किया कि परीक्षण उड़ानों में से एक रॉकेट अपने टारगेट तक पहुंचने से पहले टूट गया था।

हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। नाइब ने अपने आधिकारिक बयान में किसी भी तकनीकी विफलता की बात से इनकार किया है और कहा है कि सिस्टम ने सफलतापूर्वक सभी मूल्यांकन पूरे किए। यही कारण है कि सूर्यास्त्र कार्यक्रम को लेकर दो अलग-अलग दावे सामने आए हैं और बहस जारी है। (NIBE Suryastra Rocket System)

आपातकालीन खरीद प्रक्रिया पर भी उठे सवाल

सूर्यास्त्र को लेकर दूसरा बड़ा विवाद इसकी खरीद प्रक्रिया में जल्दबाजी को लेकर है। सूत्रों के अनुसार भारतीय सेना ने जनवरी 2026 में लगभग 293 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट किया था। यह खरीद इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट नियमों के तहत की गई थी। वहीं, कॉन्ट्रैक्ट, ट्रायल और सप्लाई के बीच समय काफी कम था। जिस पर सवाल उठाए गए।

लेकिन नाइब का कहना है कि पूरी प्रक्रिया डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) द्वारा स्वीकृत इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट फ्रेमवर्क के तहत की गई।

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कंपनी के अनुसार इस सिस्टम का उद्देश्य युद्धक जरूरतों को तेजी से पूरा करना है। इसके तहत कानूनी, वित्तीय और प्रक्रियागत निगरानी की सभी शर्तें लागू रहती हैं। (NIBE Suryastra Rocket System)

सेना को क्यों चाहिए था सूर्यास्त्र?

सूत्रों के मुताबिक ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना ने कुछ ऐसे गैप्स की पहचान की थी जहां लंबी दूरी की सटीक मारक क्षमता को और मजबूत करने की जरूरत महसूस हुई।

इसी दौरान कई नए सिस्टम्स की तलाश शुरू हुई ताकि सेना की ऑपरेशनल क्षमता को तेजी से बढ़ाया जा सके। इसी संदर्भ में कुछ खरीद प्रक्रियाओं को आपातकालीन श्रेणी में आगे बढ़ाया गया। (NIBE Suryastra Rocket System)

आत्मनिर्भरता बनाम विदेशी तकनीक

सूर्यास्त्र विवाद का सबसे बड़ा पहलू आत्मनिर्भरता से जुड़ा हुआ है। कुछ रक्षा विशेषज्ञों का तर्क है कि भारत को केवल विदेशी डिजाइन वाले प्रोडक्ट्स की असेंबली नहीं करनी चाहिए, बल्कि मूल तकनीक और बौद्धिक संपदा विकसित करनी चाहिए।

उनका कहना है कि वास्तविक आत्मनिर्भरता तभी मानी जाएगी जब डिजाइन, सॉफ्टवेयर, मार्गदर्शन प्रणाली, रॉकेट मोटर और अन्य महत्वपूर्ण तकनीकें भारत में विकसित हों।

दूसरी ओर उद्योग जगत से जुड़े सूत्रों का कहना है कि आधुनिक रक्षा उत्पादन में तकनीकी सहयोग सामान्य प्रक्रिया है। उनका तर्क है कि किसी भी वेपन सिस्टम में लोकल प्रोडक्शन, लोकल सप्लाई चेन और भारतीय इंजीनियरिंग क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। (NIBE Suryastra Rocket System)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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