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Explainer: भारत के 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट AMCA की सैटेलाइट तस्वीरें क्यों हो रहीं वायरल? आसान भाषा में समझें स्टेल्थ टेस्टिंग क्यों है जरूरी?

हाल के दिनों में सामने आई हाई-रिजॉल्यूशन सैटेलाइट तस्वीरों में एएमसीए का फुल साइज वाला इंजीनियरिंग मॉडल दुंडीगल स्थित आउटडोर रडार क्रॉस सेक्शन फैसिलिटी में दिखाई दिया। यह सुविधा एयरफोर्स अकादमी के नजदीक स्थित है और यहां कई मिलिट्री प्लेटफॉर्म्स की रडार सिग्नेचर की जांच की जाती है...

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📍नई दिल्ली | 11 Jun, 2026, 12:52 PM

AMCA Stealth Testing: भारत के स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान एएमसीए (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) की एक तस्वीर बेहद वायरल हो रही है। हाल ही में सामने आई सैटेलाइट तस्वीरों में एएमसीए का एक फुल-स्केल इंजीनियरिंग एयरफ्रेम हैदराबाद के दुंडीगल स्थित विशेष रडार क्रॉस सेक्शन टेस्टिंग कैंपस में दिखाई दिया है। यह वही मॉडल माना जा रहा है जिसे एयरो इंडिया 2025 के दौरान पहली बार सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया गया था।

तस्वीर सामने आने के बाद रक्षा विशेषज्ञों, ओपन सोर्स इंटेलिजेंस (ओएसआईएनटी) और सैन्य मामलों में रुचि रखने वाले लोगों के बीच एएमसीए को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। वजह केवल तस्वीर नहीं है, बल्कि वह जगह है जहां यह एयरफ्रेम दिखाई दिया है। यह जगह भारत की सबसे महत्वपूर्ण स्टेल्थ टेस्टिंग फैसिलिटी में से एक मानी जाती है।

AMCA Stealth Testing: क्या दिखा सैटेलाइट तस्वीरों में?

हाल के दिनों में सामने आई हाई-रिजॉल्यूशन सैटेलाइट तस्वीरों में एएमसीए का फुल साइज वाला इंजीनियरिंग मॉडल दुंडीगल स्थित आउटडोर रडार क्रॉस सेक्शन फैसिलिटी में दिखाई दिया। यह सुविधा एयरफोर्स अकादमी के नजदीक स्थित है और यहां कई मिलिट्री प्लेटफॉर्म्स की रडार सिग्नेचर की जांच की जाती है।

तस्वीरों से संकेत मिला कि एएमसीए का यह मॉडल ग्राउंड-बेस्ड स्टेल्थ ट्रायल्स से गुजर रहा है। किसी भी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान के विकास में यह सबसे महत्वपूर्ण चरणों में से एक माना जाता है।

किसी लड़ाकू विमान को केवल तेज, शक्तिशाली या आधुनिक बनाना काफी नहीं होता। बल्कि आधुनिक युद्ध में सबसे बड़ी चुनौती दुश्मन के रडार से बचना है। इसी वजह से स्टेल्थ तकनीक किसी भी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है।

एएमसीए क्या है और इसे इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जा रहा है?

एएमसीए भारत का पहला स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का स्टेल्थ मल्टीरोल लड़ाकू विमान है। इसे एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (एडीए) और डीआरडीओ मिलकर डेवलप कर रहे हैं।

यह विमान भारतीय वायुसेना की भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य एक ऐसा लड़ाकू विमान बनाना है जो दुश्मन के रडार पर कम दिखाई दे, लंबी दूरी तक मिशन कर सके और एक साथ कई प्रकार के युद्ध अभियानों को अंजाम दे सके।

एएमसीए को एयर सुपीरियोरिटी, ग्राउंड अटैक, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और प्रिसिजन स्ट्राइक जैसे मिशनों के लिए डिजाइन किया जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी स्टेल्थ क्षमता होगी।

क्या होती है रडार क्रॉस सेक्शन टेस्टिंग?

एएमसीए की तस्वीरों के वायरल होने का सबसे बड़ा कारण इसकी रडार क्रॉस सेक्शन यानी आरसीएस टेस्टिंग है।

जब कोई रडार किसी विमान पर रेडियो तरंगें भेजता है, तो विमान उन तरंगों का कुछ हिस्सा वापस रडार की तरफ रिफ्लेक्ट करता है। रडार इसी रिफ्लेक्ट सिग्नल्स के आधार पर विमान का पता लगाता है।

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रडार पर किसी विमान की पहचान कितनी आसानी से होगी, यह उसके रडार क्रॉस सेक्शन पर निर्भर करता है।

यदि किसी विमान का आरसीएस अधिक है तो वह रडार पर जल्दी दिखाई देगा। यदि आरसीएस बहुत कम है तो उसे पहचानना मुश्किल हो जाता है।

स्टेल्थ विमान विकसित करने का मुख्य उद्देश्य इसी आरसीएस को कम करना होता है।

दुंडीगल की सुविधा में क्या है खास?

हैदराबाद के पास स्थित यह विशेष टेस्टिंग सेंटर भारत की सबसे एडवांस आरसीएस मीजरमेंट फैसिलिटी में गिना जाता है। यहां विमान को एक विशेष प्लेटफॉर्म पर रखा जाता है। इसके बाद विभिन्न कोणों और अलग-अलग फ्रीक्वेंसी से रडार तरंगें भेजी जाती हैं।

इंजीनियर यह जांचते हैं कि विमान का कौन-सा हिस्सा सबसे ज्यादा रडार सिग्नल वापस भेज रहा है।

यदि किसी हिस्से से ज्यादा रिफ्लेक्शन मिलता है तो डिजाइन में बदलाव किए जाते हैं। कभी विमान के आकार में परिवर्तन किया जाता है, कभी विशेष रडार अब्जॉर्ब करने वाले मैटेरियल का इस्तेमाल किया जाता है।

यही प्रक्रिया एएमसीए जैसे स्टेल्थ विमान को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

AMCA में RCS कम करने की पूरी तकनीक समझिए

जब किसी रडार से रेडियो तरंगें निकलती हैं और वे किसी विमान से टकराती हैं, तो उनका कुछ हिस्सा वापस रडार तक पहुंचता है। इसी लौटे हुए सिग्नल के आधार पर रडार विमान की मौजूदगी का पता लगाता है। यदि विमान ज्यादा सिग्नल वापस भेजता है तो वह आसानी से दिखाई देता है। यदि बहुत कम सिग्नल लौटते हैं तो उसे पहचानना कठिन हो जाता है।

सामान्य चौथी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों का आरसीएस लगभग 5 से 10 वर्ग मीटर तक हो सकता है, जबकि आधुनिक स्टेल्थ विमान जैसे एफ-22 और एफ-35 का आरसीएस हजारों गुना कम लगभग 0.001 से 0.01 वर्ग मीटर माना जाता है। जो रडार पर लगभग अदृश्य जैसा दिखता है। एएमसीए को भी इसी श्रेणी की स्टेल्थ क्षमता देने का प्रयास किया जा रहा है।

किसी भी स्टेल्थ विमान में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उसके आकार की होती है। यदि किसी विमान की सतह सपाट हो या उसमें तेज कोने हों, तो रडार तरंगें सीधे वापस लौट सकती हैं। इससे विमान आसानी से पकड़ में आ जाता है। इसी कारण आधुनिक स्टेल्थ फाइटर जेट्स को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि रडार तरंगें सीधे वापस लौटने के बजाय अलग-अलग दिशाओं में बिखर जाएं।

एएमसीए के डिजाइन में भी इसी सिद्धांत का उपयोग किया गया है। इसे एज अलाइनमेंट कहा जाता है। इससे रडार सिग्नल का रिफ्लेक्शन और कम हो जाता है।

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आधुनिक स्टेल्थ विमान विशेष प्रकार की रडार एब्जॉर्बिंग मैटेरियल (RAM) तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। यह ऐसी सामग्री होती है जो रडार तरंगों को वापस लौटाने के बजाय उन्हें अपने अंदर अवशोषित कर लेती है। जब रडार ऊर्जा इस सामग्री से टकराती है तो उसका बड़ा हिस्सा गर्मी में बदल जाता है और वापस रडार तक नहीं पहुंचता।

एएमसीए में बड़े पैमाने पर कंपोजिट मैटेरियल का उपयोग किया जा रहा है। उपलब्ध जानकारियों के अनुसार एयरफ्रेम का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा कंपोजिट सामग्री से तैयार किया जा रहा है।

वहीं, पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों में इंटरनल वेपन्स बे का उपयोग किया जाता है। इसकी वजह है कि जब हथियारों के दरवाजे बंद रहते हैं तो विमान की बाहरी सतह पूरी तरह चिकनी दिखाई देती है, जिससे उसका आरसीएस काफी कम हो जाता है।

एएमसीए की कौन-कौन सी खूबियां इसे बनाती हैं खास?

एएमसीए को पूरी तरह आधुनिक युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखकर डेवलप किया जा रहा है। यह ट्विन इंजन लड़ाकू विमान होगा। इसमें एडवांस सेंसर, आधुनिक एवियोनिक्स, सेंसर फ्यूजन तकनीक और अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम शामिल किए जाएंगे।

विमान के अंदर इंटरनल वेपन्स बे होगा, जहां मिसाइलें और बम रखे जाएंगे। इससे हथियार विमान के बाहर दिखाई नहीं देंगे और उसका रडार सिग्नेचर कम रहेगा।

इसमें बड़ी मात्रा में कंपोजिट मटेरियल का उपयोग किया जाएगा। इसके अलावा रडार एब्जॉर्बिंग मटेरियल भी लगाया जाएगा ताकि रडार तरंगों को सोखा जा सके।

तस्वीर में दिखा मॉडल फाइनल डिजाइन नहीं

सूत्रों का कहना है कि सैटेलाइट तस्वीरों में दिखाई देने वाला एयरफ्रेम एएमसीए का फाइनल वर्जन नहीं है। एयरो इंडिया 2025 में प्रदर्शित मॉडल पुराने कॉन्फिगरेशन पर बेस्ड था। उस समय इसमें डाइवर्टरलेस सुपरसोनिक इनलेट यानी डीएसआई तकनीक शामिल नहीं थी।

बाद में एएमसीए के नए डिजाइन में डीएसआई इनलेट जोड़े गए हैं।

डीएसआई तकनीक आधुनिक स्टेल्थ विमानों में महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि इससे रडार सिग्नेचर कम होता है और स्ट्रक्चर भी आसान बनती है।

एएमसीए के नए डिजाइन में डाइवर्टरलेस सुपरसोनिक इनलेट (DSI) तकनीक जोड़ी गई है। यह आधुनिक स्टेल्थ विमानों की महत्वपूर्ण विशेषता मानी जाती है। पारंपरिक एयर इनटेक में अतिरिक्त डाइवर्टर प्लेटें होती थीं, जो रडार पर दिखाई दे सकती थीं। डीएसईआई तकनीक में इन अतिरिक्त हिस्सों की जरूरत नहीं पड़ती। इससे विमान का वजन कम होता है, रखरखाव आसान होता है और रडार सिग्नेचर भी घटता है। (AMCA Stealth Testing)

पुराने मॉडल से टेस्टिंग करना क्यों सामान्य प्रक्रिया है?

कई लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि यदि डिजाइन बदल चुका है तो पुराने मॉडल की टेस्टिंग क्यों की जा रही है। वास्तव में यह दुनिया के लगभग सभी बड़े फाइटर जेट कार्यक्रमों में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया है।

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इंजीनियरिंग मॉडल का इस्तेमाल प्रारंभिक परीक्षणों के लिए किया जाता है। इस दौरान स्ट्रक्चर, स्टेल्थ क्षमता, सेंसर इंटीग्रेशन और रखरखाव से जुड़े कई पहलुओं की जांच होती है।

जब तक फाइनल डिजाइन तैयार होता है, तब तक परीक्षणों से मिली जानकारी के आधार पर कई बदलाव किए जा चुके होते हैं। (AMCA Stealth Testing)

कहां तक पहुंचा एएमसीए प्रोजेक्ट?

एएमसीए प्रोजेक्ट पिछले कई वर्षों से विकास के चरण में है। 2024 में सरकार ने इसके प्रोटोटाइप विकास के लिए 15,000 करोड़ रुपये से अधिक की मंजूरी दी थी। इसके तहत पांच प्रोटोटाइप बनाए जाने हैं।

पहले तीन प्रोटोटाइप उड़ान परीक्षणों के लिए उपयोग किए जाएंगे जबकि अन्य प्रोटोटाइप हथियार परीक्षण और सिस्टम मूल्यांकन में इस्तेमाल होंगे।

हाल के वर्षों में निजी उद्योग को भी परियोजना में शामिल किया गया है। कई भारतीय कंपनियां विमान के अलग-अलग हिस्सों के निर्माण में भागीदारी कर रही हैं। (AMCA Stealth Testing)

ग्राउंड टेस्ट एयरफ्रेम की क्या है भूमिका

जो एयरफ्रेम सैटेलाइट तस्वीरों में दिखाई दिया है, वह कभी उड़ान नहीं भरेगा। इसके बावजूद इसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। इसी प्रकार के एयरफ्रेम का इस्तेमाल उपकरणों की स्थिति जांचने, वायरिंग लेआउट देखने, सेंसर फिटमेंट का मूल्यांकन करने और स्ट्रक्चरल इंटरफेस की जांच के लिए किया जाता है।

इसके अलावा मेंटनेंस की प्रक्रिया और विभिन्न सिस्टमों के इंटीग्रेशन का परीक्षण भी इन्हीं मॉडल्स पर किया जाता है। इससे वास्तविक उड़ान प्रोटोटाइप बनने से पहले कई तकनीकी जोखिम कम हो जाते हैं। (AMCA Stealth Testing)

भारत के लिए क्यों जरूरी है एएमसीए

भारतीय वायुसेना लंबे समय से पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान की जरूरत महसूस कर रही है। दुनिया में अमेरिका का एफ-35, चीन का जे-20 और रूस का एसयू-57 जैसे विमान पहले से मौजूद हैं। खास तौर पर चीन के जे-20 के प्रोटोटाइप ने पहली उड़ान 2011 में भरी थी। आज चीन के पास 300 से ज्यादा जे-30 फाइटर जेट्स हैं। ऐसे में भारत का अपना स्टेल्थ फाइटर विकसित करना रक्षा क्षेत्र में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। (AMCA Stealth Testing)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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