📍नई दिल्ली/द्रास | 26 Jul, 2026, 1:23 AM
Official Kargil War History: हर साल 26 जुलाई को पूरा देश कारगिल विजय दिवस मनाता है। वहीं इस साल पूरे देश में कारगिल युद्ध में जीत की 27वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। साल 1999 में मई से जुलाई तक चले इस युद्ध में 545 वीरों ने ऑपरेशन विजय में सर्वोच्च बलिदान दिया था। हर साल विजय दिवस मनाने वाली सरकार पांच साल पहले किए अपने एक अहम वादे को ही भूल जाती है। साल 2021 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एलान किया था कि कारगिल युद्ध की वर्षगांठ के 25 साल पूरे होने पर इस जंग का आधिकारिक और प्रमाणिक इतिहास सार्वजनिक किया जाएगा। लेकिन यह वादा पांच साल बाद भी पूरा होने का इंतजार ही कर रहा है।
गौरतलब है कि कारगिल युद्ध से जुड़ीं कई घटनाओं पर अभी तक आम राय मौजूद नहीं हैं। मसलन पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ वास्तव में कब शुरू हुई थी। इसी तरह युद्ध की पहली सैन्य क्षति किसे माना जाए, जैसे कई सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं। वहीं इन सवालों पर अधिकारियों की बीच भी कोई एक राय मौजूद नहीं है।
Official Kargil War History: कई किताबें आईं, लेकिन आधिकारिक इतिहास नहीं
कारगिल युद्ध पर अब तक 15 से 20 प्रमुख पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें तत्कालीन थल सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक, वरिष्ठ सैन्य अधिकारी और कारगिल युद्ध में शामिल रहे कई अधिकारियों की किताबें शामिल हैं। उस समय 3 इन्फैंट्री डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग रहे लेफ्टिनेंट जनरल बधवार ने भी अपने अनुभव लिखे हैं।
इन पुस्तकों ने युद्ध के अलग-अलग पहलुओं को सामने रखा गया है, लेकिन कई घटनाओं के विवरण एक-दूसरे से मेल नहीं खाते।
उदाहरण के तौर पर आज भी यह सवाल पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि पाकिस्तानी घुसपैठ वास्तव में कब शुरू हुई थी। वहीं युद्ध की पहली सैन्य क्षति किसे माना जाए, इस पर भी अलग-अलग विवरण मिलते हैं। कुछ विवरणों में लांस नायक खड़ग सिंह का उल्लेख है, जबकि कुछ में कैप्टन सौरभ कालिया और कुछ में मेजर अमित भारद्वाज को युद्ध की पहली शहादत बताया गया है।
इसी कारण सैन्य इतिहासकार लंबे समय से एक आधिकारिक और प्रमाणिक युद्ध इतिहास की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं। कारगिल युद्ध पर सरकार का आधिकरिक दस्तावेज सामने आने पर इन सभी सवालों से पर्दा उठ सकता है।
साल 2000 में शुरू हुआ था कारगिल विजय दिवस
कारगिल युद्ध मई से जुलाई 1999 के बीच नियंत्रण रेखा पर लड़ा गया था। पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों ने द्रास, कारगिल, बटालिक, मुश्कोह और काक्सर सेक्टर की कई रणनीतिक चोटियों पर कब्जा कर लिया था।
जिसके बाद भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय शुरू किया। भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन सफेद सागर चलाया और भारतीय नौसेना ने अरब सागर में ऑपरेशन तलवार के माध्यम से पाकिस्तान नौसेना की घेराबंदी कर दी थी। 26 जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने सभी प्रमुख चोटियों पर फिर से नियंत्रण स्थापित कर लिया। इसके बाद वर्ष 2000 से हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस मनाया जा रहा है। (Official Kargil War History)
कारगिल रिव्यू कमेटी ने की थी सिफारिश
कारगिल युद्ध समाप्त होने के बाद जुलाई 1999 में केंद्र सरकार ने वरिष्ठ रणनीतिक विशेषज्ञ के. सुब्रह्मण्यम की अध्यक्षता में कारगिल रिव्यू कमेटी (केआरसी) का गठन किया था।
समिति ने दिसंबर 1999 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी। इस रिपोर्ट में स्पष्ट सिफारिश की गई कि कारगिल जैसे एतिहासिक हाई एल्टीट्यूड युद्ध का आधिकारिक और प्रमाणिक इतिहास जल्द प्रकाशित किया जाना चाहिए।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया था कि भारत ने 1965 और 1971 के युद्धों का भी आधिकारिक इतिहास सार्वजनिक नहीं किया था। समिति का मानना था कि सही युद्ध इतिहास उपलब्ध होने से भविष्य की सैन्य योजना बेहतर बनेगी और गलत सूचनाओं पर भी रोक लगेगी।
बाद में ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स और एनएन वोहरा समिति ने भी इसी दिशा में सुझाव दिए थे। (Official Kargil War History)
2021 में बनी नई नीति
करीब दो दशक बाद रक्षा मंत्रालय ने इस दिशा में औपचारिक कदम उठाया। 12 जून 2021 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने युद्ध और सैन्य अभियानों के इतिहास के संग्रह, गोपनीयता समाप्त करने तथा संकलन और प्रकाशन संबंधी नीति को मंजूरी दी।
इस नीति के अनुसार किसी भी युद्ध या सैन्य अभियान का इतिहास अधिकतम पांच वर्ष के भीतर तैयार किया जाना चाहिए।
नीति में यह भी तय किया गया कि युद्ध खत्म होने के दो साल के भीतर एक समिति बनाई जाएगी। इसके बाद अगले तीन साल में सभी दस्तावेजों का संकलन और इतिहास तैयार किया जाएगा। (Official Kargil War History)
25 साल बाद रिकॉर्ड सार्वजनिक करने का प्रावधान
नई नीति में यह भी कहा गया कि युद्ध संबंधी रिकॉर्ड सामान्य रूप से 25 वर्ष बाद सार्वजनिक किए जा सकते हैं।
इसके लिए संबंधित विभाग अपने रिकॉर्ड की समीक्षा करेंगे। युद्ध इतिहास तैयार होने के बाद 25 वर्ष से पुराने दस्तावेज नेशनल आर्काइव को भी भेजे जा सकते हैं। यह प्रक्रिया पब्लिक रिकॉर्ड्स एक्ट 1993 और उससे जुड़े नियमों के तहत पूरी की जाएगी।
रक्षा मंत्रालय की नीति के मुताबिक मंत्रालय का हिस्ट्री डिवीजन पूरे कार्य का समन्वय करेगा। इसके लिए एक समिति बनाई जाएगी जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्रालय के जॉइंट सेक्रेटरी करेंगे।
समिति में सेना, नौसेना, वायुसेना, इंटीग्रेट डिफेंस स्टाफ, विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय तथा आवश्यकता पड़ने प्रमुख सैन्य इतिहासकार भी शामिल किए जा सकते हैं।
सभी सैन्य संगठन अपनी युद्ध डायरी, ऑपरेशनल रिकॉर्ड, कार्यवाही संबंधी दस्तावेज और अन्य अभिलेख हिस्ट्री डिवीजन को उपलब्ध कराएंगे।
लेकिन कारगिल युद्ध को 27 वर्ष पूरे हो चुके हैं। 25 वर्ष की अवधि भी जुलाई 2024 में पूरी हो गई। इसके बावजूद अब तक रक्षा मंत्रालय ने कारगिल युद्ध का आधिकारिक इतिहास सार्वजनिक नहीं किया है। न ही सार्वजनिक रूप से यह जानकारी दी गई है कि कारगिल युद्ध के लिए इतिहास तैयार करने वाली समिति का गठन कब हुआ या उसका कार्य किस चरण में है। (Official Kargil War History)
सेनाओं का चल रहा है बड़ा ट्रांसफॉर्मेशन
सूत्रों का कहना है कि साल 2021 के बाद भारतीय सशस्त्र सेनाओं में बड़े स्तर पर परिवर्तन चल रहे हैं। तीनों सेनाओं के एकीकरण, संयुक्त कमानों की अवधारणा और थिएटराइजेशन की प्रक्रिया पर काम हो रहा है।
सूत्रों के अनुसार इसी कारण कई प्रशासनिक और संरचनात्मक कार्यों को प्राथमिकता दी गई, जबकि युद्ध इतिहास से जुड़ी प्रक्रिया अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सकी। हालांकि इस संबंध में रक्षा मंत्रालय की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। (Official Kargil War History)
ब्रिगेडियर सुरिंदर सिंह ने भी उठाया था मुद्दा
कारगिल युद्ध के दौरान 121 (इंडिपेंडेंट) इन्फैंट्री ब्रिगेड की कमान संभालने वाले ब्रिगेडियर सुरिंदर सिंह (सेवानिवृत्त) भी लंबे समय से आधिकारिक युद्ध इतिहास की आवश्यकता पर जोर दिया था। उन्होंने साल 2025 में सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका भी दायर की थी, जिसमें कारगिल युद्ध से जुड़े रिकॉर्ड की समीक्षा और तथ्यों को सही रूप में सामने लाने की मांग की गई थी। उन्होंने लिखा था कि कारगिल युद्ध से जुड़े रहे सैनिक और वरिष्ठ अधिकरियों का जीवनकाल रहते इस युद्ध का प्रमाणिक इतिहास लिख लिया जाना चाहिए।
क्यों जरूरी है युद्ध का इतिहास लेखन?
स्पेनिश-अमेरिकी दार्शनिक जॉर्ज सांतायना ने 1905 में अपनी पुस्तक द लाइफ ऑफ रीजन में लिखा था, “जो लोग इतिहास को याद नहीं रखते, वे उसे दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं।”
युद्ध इतिहास के विशेषज्ञ इस कथन का अक्सर उल्लेख करते हैं। उनका मानना है कि युद्धों से मिलने वाले सबक केवल सैनिकों के लिए नहीं, बल्कि नीति निर्माताओं, सैन्य योजनाकारों और पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। इससे भविष्य की सैन्य शिक्षा, प्रशिक्षण और शोध को दिशा मिलती है। (Official Kargil War History)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।



