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ईरान-इजरायल संघर्ष से सीख: ड्रोनों के झुंड से कैसे निपटेगा भारत? सेना बदलेगी एयर डिफेंस स्ट्रेटेजी

एक छोटे ड्रोन को गिराने के लिए महंगे मिसाइल का इस्तेमाल करना आर्थिक रूप से सही नहीं माना जाता। ऐसे में सस्ते और प्रभावी विकल्प तैयार करना जरूरी हो गया है...

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📍नई दिल्ली | 30 Mar, 2026, 12:32 PM

Iran-Israel War Lessons: पश्चिम एशिया में चल रहे इजरायल-ईरान-अमेरिका युद्ध से भारतीय सेनाओं ने कई जरूरी सबक लेने शुरू कर दिए हैं। इस युद्ध में जिस तरह छोटे और सस्ते ड्रोन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ, उसने पूरी दुनिया की सेनाओं का ध्यान अपनी ओर खींचा है। अब भारतीय सेनाओं में इस बात पर गंभीर चर्चा चल रही है कि देश की सुरक्षा के लिए एंटी-ड्रोन सिस्टम को तेजी से खरीदा जाए और उन्हें पुराने एयर डिफेंस सिस्टम के साथ जोड़ा जाए।

Iran-Israel War Lessons: छोटे ड्रोन बने बड़ी चुनौती

हाल के युद्धों में यह साफ दिखा है कि छोटे ड्रोन भी बड़े खतरे बन सकते हैं। इनकी कीमत बहुत कम होती है, लेकिन अगर इन्हें झुंड यानी स्वॉर्म के रूप में इस्तेमाल किया जाए, तो यह बड़े और महंगे हथियारों को भी चुनौती दे सकते हैं।

सूत्रों के अनुसार, एक छोटे ड्रोन को गिराने के लिए महंगे मिसाइल का इस्तेमाल करना आर्थिक रूप से सही नहीं माना जाता। ऐसे में सस्ते और प्रभावी विकल्प तैयार करना जरूरी हो गया है।

पुराने हथियारों को नए सिस्टम से जोड़ने की तैयारी

भारतीय सेना अब अपने पुराने यानी लेगेसी एयर डिफेंस सिस्टम को अपग्रेड करने पर ध्यान दे रही है। जैसे एल-70 गन जैसे सिस्टम का इस्तेमाल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ड्रोन गिराने में किया जा चुका है।

अब योजना यह है कि इन पुराने हथियारों को नए एंटी-ड्रोन सिस्टम के साथ इंटीग्रेट किया जाए, ताकि कम लागत में एक मजबूत एयर डिफेंस छतरी तैयार हो सके। (Iran-Israel War Lessons)

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स्वॉर्म ड्रोन का बढ़ता खतरा

वेस्ट एशिया के संघर्ष में यह देखा गया कि ईरान ने स्वॉर्म ड्रोन का इस्तेमाल किया, यानी एक साथ कई ड्रोन भेजे गए। इस तरह के हमले से एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बढ़ जाता है।

अगर एक साथ बहुत सारे ड्रोनहैं आते , तो उन्हें रोकना मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि भारत अब अपनी एंटी-ड्रोन क्षमता को मजबूत करने पर जोर दे रहा है। (Iran-Israel War Lessons)

रोबोटिक तकनीक पर भी ध्यान

सेना अब सिर्फ ड्रोन ही नहीं, बल्कि रोबोटिक सिस्टम पर भी फोकस बढ़ा रही है। ऐसे उपकरण जो माइन डिटेक्शन, सामान ढोने और अन्य कामों में मदद कर सकें, उन्हें शामिल करने की योजना है।

इससे सैनिकों पर निर्भरता कम होगी और जोखिम भी घटेगा। रोबोटिक सिस्टम कई खतरनाक काम बिना मानव नुकसान के कर सकते हैं।

किन स्ट्रक्चर को बनाए निशाना

वेस्ट एशिया संघर्ष में यह भी देखा गया कि देशों ने एक-दूसरे के एनर्जी रिसोर्सेस और प्रशासनिक ढांचे को निशाना बनाया। इससे उनके सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स पर बड़ा दबाव पड़ा।

भारतीय सेना इस पहलू पर भी विचार कर रही है कि भविष्य के युद्धों में किन लक्ष्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। (Iran-Israel War Lessons)

पैसिव उपायों की जरूरत

अधिकारियों का कहना है कि सिर्फ हथियारों से ही सुरक्षा नहीं मिलती, बल्कि कुछ पैसिव उपाय भी जरूरी होते हैं। इसमें फोर्स को अलग-अलग जगहों पर फैलाना, छिपाना, कैमोफ्लेज करना और अंडरग्राउंड स्ट्रक्चर तैयार करना शामिल है।

अगर एक ही जगह पर ज्यादा रिसोर्सेस रखे जाएं, तो वे आसानी से निशाना बन सकते हैं। इसलिए इन्हें सुरक्षित तरीके से दूसरी जगहों पर भी रखना जरूरी माना जा रहा है। (Iran-Israel War Lessons)

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एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव

हाल के युद्धोंमें यह भी देखा गया कि अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम भी दबाव में आ सकते हैं। जब एक साथ कई मिसाइल या ड्रोन हमला करते हैं, तो सबसे मजबूत सिस्टम भी चुनौती का सामना करता है।

इसी को ध्यान में रखते हुए भारत अपने एयर डिफेंस नेटवर्क को और मजबूत बनाने पर विचार कर रहा है।

डिसेंट्रलाइज्ड युद्ध की ओर बढ़ता फोकस

अब युद्ध का तरीका भी बदल रहा है। पहले जहां बड़े स्तर पर सेंट्रलाइज्ड ऑपरेशन होते थे, अब छोटे-छोटे यूनिट्स के जरिए डिसेंट्रलाइज्ड तरीके से लड़ाई लड़ी जा रही है।

इससे दुश्मन के लिए पूरे सिस्टम को निशाना बनाना मुश्किल हो जाता है। भारत में भी जॉइंट मिलिट्री कमांड बनाने पर चर्चा चल रही है, जिससे बेहतर तालमेल हो सके। (Iran-Israel War Lessons)

लंबी लड़ाई की तैयारी पर जोर

अधिकारियों का मानना है कि अब सिर्फ तेज और छोटे युद्ध ही नहीं, बल्कि लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष की तैयारी भी जरूरी है। इसके लिए संसाधनों का सही इस्तेमाल और लगातार सप्लाई बनाए रखना जरूरी होता है।

साथ ही यह भी जरूरी है कि युद्ध शुरू होने के साथ ही उसके उद्देश्य स्पष्ट हों और हर चरण में उसे खत्म करने की रणनीति तैयार रहे। (Iran-Israel War Lessons)

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