📍द्रास, कारगिल | 25 Jul, 2026, 11:33 PM
Kargil Vijay Diwas 2026: कारगिल युद्ध की 27वीं वर्षगांठ पर बेहद भावुक पल देखने को मिला। पहली बार भारतीय सेना ने शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक ऐसा कदम उठाया, जिसने वहां हर मौजूद व्यक्ति की आंखें नम कर दीं। कारगिल विजय दिवस की पूर्व संध्या पर सेना ने कारगिल युद्ध में सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर सैनिकों के परिजनों को उन रणभूमियों की पवित्र मिट्टी भेंट की, जहां उनके अपने देश की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे।
द्रास स्थित कारगिल युद्ध स्मारक परिसर में आयोजित विशेष समारोह के दौरान 40 कलश शहीदों के परिजनों को सौंपे गए। इन कलशों में द्रास, कारगिल और बटालिक सेक्टर के विभिन्न युद्धस्थलों से एकत्र की गई पवित्र मिट्टी रखी गई थी।
जैसे ही परिवारों ने इन कलशों को हाथों में लिया, पूरा वातावरण भावुक हो उठा। कई परिजनों ने मिट्टी से भरे कलश को सीने से लगा लिया। उनके लिए यह केवल मिट्टी नहीं थी, बल्कि उस रणभूमि का हिस्सा था जहां उनके पिता, पति, भाई या बेटे ने मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था।
Kargil Vijay Diwas 2026: द्रास के लामोचन व्यू प्वाइंट पर हुआ विशेष आयोजन
कारगिल विजय दिवस के अवसर पर द्रास सेक्टर के लामोचन व्यू प्वाइंट और कारगिल युद्ध स्मारक क्षेत्र में विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। सेना ने द्रास, कारगिल और बटालिक सेक्टर की उन चोटियों और युद्धस्थलों से पवित्र मिट्टी एकत्र की थी, जहां वर्ष 1999 के युद्ध के दौरान भारतीय सैनिकों ने कठिन परिस्थितियों में लड़ाई लड़ी थी।
समारोह में उपस्थित सैन्य अधिकारियों ने शहीद परिवारों को सम्मानपूर्वक कलश सौंपे। कार्यक्रम का उद्देश्य केवल श्रद्धांजलि देना नहीं था, बल्कि शहीद परिवारों को उस पवित्र धरती से जोड़ना भी था, जहां भारतीय सैनिकों ने देश की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर किए।
राष्ट्रीय समर स्मारक से द्रास तक पहुंची पवित्र मिट्टी
इस भावनात्मक पहल की शुरुआत 14 जुलाई को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय समर स्मारक से हुई थी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने वहां से 30 सदस्यीय मोटरसाइकिल अभियान को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था।
यह दल राष्ट्रीय समर स्मारक की पवित्र मिट्टी लेकर द्रास स्थित कारगिल युद्ध स्मारक पहुंचा। इसके बाद राष्ट्रीय समर स्मारक की मिट्टी और कारगिल की रणभूमि की मिट्टी का प्रतीकात्मक संगम कराया गया। इस अवसर पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि राष्ट्रीय समर स्मारक की मिट्टी जब कारगिल की पवित्र भूमि से मिलेगी तो यह देश की वर्तमान पीढ़ी की श्रद्धा और अमर वीरों के शौर्य तथा बलिदान का प्रतीक बनेगी।
A conversation with Veer Nari, whose husband Lance Naik Dilwar Singh made the supreme sacrifice during the Kargil War, was a powerful reminder that the legacy of our heroes lives on through the strength, resilience and courage of their families #KargilVijayDiwas,… pic.twitter.com/tuSGBrb2zR
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) July 25, 2026
शहीद परिवारों के लिए यादगार पल
समारोह के दौरान कई ऐसे दृश्य देखने को मिले, जिन्होंने उपस्थित लोगों को भावुक कर दिया। कुछ परिवारों ने कलश को माथे से लगाया तो कुछ ने उसे सीने से लगाकर अपने प्रियजनों को याद किया। कई परिजनों की आंखों से आंसू छलक पड़े।
कारगिल युद्ध को 27 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन जिन परिवारों ने अपने बेटे, पति या पिता को खोया था, उनके लिए समय जैसे वर्ष 1999 में ही ठहर गया है। रणभूमि की मिट्टी उनके लिए उस आखिरी स्थान की याद लेकर आई, जहां उनके अपने ने देश के लिए अंतिम सांस ली थी।

मई से जुलाई 1999 तक चला था कारगिल युद्ध
कारगिल युद्ध भारतीय सैन्य इतिहास के सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण अभियानों में गिना जाता है। मई से जुलाई 1999 के बीच नियंत्रण रेखा के पास द्रास, कारगिल, बटालिक, मुश्कोह घाटी और काक्सर सेक्टर में पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों ने कई रणनीतिक चोटियों पर कब्जा कर लिया था।
इन ऊंचाइयों से श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग पर नजर रखी जा सकती थी, जो लद्दाख क्षेत्र के लिए सबसे महत्वपूर्ण आपूर्ति मार्ग है। इस कारण भारत के लिए इन चोटियों को वापस हासिल करना सैन्य दृष्टि से बेहद जरूरी था।
भारतीय सेना ने शुरू किया था ऑपरेशन विजय
भारतीय सेना ने कब्जाई गई चोटियों को वापस लेने के लिए ऑपरेशन विजय शुरू किया। यह अभियान अत्यंत कठिन परिस्थितियों में चलाया गया। सैनिकों को 15 हजार से 18 हजार फीट की ऊंचाई पर बर्फीली चोटियों पर चढ़ते हुए लड़ाई लड़नी पड़ी।
ऑक्सीजन की कमी, बेहद कम तापमान, सीधी खड़ी चट्टानें और ऊपर से दुश्मन की गोलाबारी जैसी चुनौतियों के बावजूद भारतीय सैनिक लगातार आगे बढ़ते रहे। इसी अभियान के दौरान भारतीय सेना ने कई महत्वपूर्ण चोटियों पर फिर से तिरंगा फहराया।
इन चोटियों पर हुई थी सबसे कठिन लड़ाई
कारगिल युद्ध के दौरान टाइगर हिल, तोलोलिंग, प्वाइंट 5140, प्वाइंट 4875, प्वाइंट 5203, प्वाइंट 4812, खालुबार रिज और जुबार टॉप जैसी कई रणनीतिक चोटियां युद्ध का केंद्र बनीं।
इन चोटियों पर कब्जा आसान नहीं था। दुश्मन ऊंचाई पर पहले से मौजूद था, जबकि भारतीय सैनिकों को नीचे से चढ़ाई करते हुए हमला करना पड़ा। इसके बावजूद भारतीय सेना ने साहस, अनुशासन और उत्कृष्ट सैन्य रणनीति का परिचय देते हुए सभी प्रमुख इलाकों पर दोबारा नियंत्रण स्थापित किया।
ऊंचाई पर लड़ाई होती है सबसे कठिन
कारगिल युद्ध की सबसे बड़ी चुनौती उसका भौगोलिक क्षेत्र था। 15 से 18 हजार फीट की ऊंचाई पर हवा में ऑक्सीजन सामान्य स्तर से काफी कम होती है। सैनिकों को पहले शरीर को उस वातावरण के अनुसार तैयार करना पड़ता है। इसके बाद भारी हथियारों और गोला-बारूद के साथ बर्फीली ढलानों पर आगे बढ़ना पड़ता है।
ऐसी परिस्थितियों में हेलीकॉप्टर संचालन, रसद आपूर्ति और घायलों को निकालना भी बेहद कठिन हो जाता है। यही कारण है कि कारगिल युद्ध को आधुनिक सैन्य इतिहास के सबसे चुनौतीपूर्ण हाई एल्टीट्यूड अभियानों में शामिल किया जाता है।
द्रास, कारगिल और बटालिक की वही चोटियां आज भी भारतीय सेना के शौर्य, साहस और कर्तव्यनिष्ठा की गवाही देती हैं। इन्हीं रणभूमियों की मिट्टी जब शहीदों के परिवारों तक पहुंची तो वह उनके लिए अपने प्रियजनों की अंतिम कर्मभूमि का प्रतीक बन गई।
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रक्षा समाचार न्यूज डेस्क भारत की अग्रणी हिंदी रक्षा समाचार टीम है, जो Indian Army, Navy, Air Force, DRDO, रक्षा उपकरण, युद्ध रणनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी विश्वसनीय और विश्लेषणात्मक खबरें पेश करती है। हम लाते हैं सटीक, सरल और अपडेटेड Defence News in Hindi। हमारा उद्देश्य है – "हर खबर, देश की रक्षा से जुड़ी।"
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।



