📍नई दिल्ली | 17 Jul, 2026, 1:06 PM
Kargil War Timeline 1999: कारगिल युद्ध को हुए 27 साल बीत चुके हैं। इसे भारत के सैन्य इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण लड़ाइयों में गिना जाता है। साल 1999 में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के कारगिल, द्रास, बटालिक और मुश्कोह सेक्टर की ऊंची चोटियों पर गुपचुप तरीके से कब्जा करने की योजना बनाई। शुरुआत में इसे आतंकियों की घुसपैठ माना गया, लेकिन कुछ ही दिनों में यह साफ हो गया कि इसके पीछे पाकिस्तान सेना की सुनियोजित कार्रवाई थी।
कारगिल युद्ध अचानक शुरू नहीं हुआ था। फरवरी 1999 से ही पाकिस्तान की गतिविधियां तेज होने लगी थीं। भारतीय सेना के दस्तावेजों के अनुसार, कई घटनाएं एक के बाद एक हुईं, जिन्होंने अंततः बड़े सैन्य अभियान का रूप लिया। फरवरी से जून 1999 के बीच हुई घटनाओं ने युद्ध की दिशा तय की। आइए जानते हैं इस पूरे घटनाक्रम की पूरी टाइमलाइन।
Kargil War Timeline 1999: फरवरी 1999: मुश्कोह सेक्टर से शुरू हुई घुसपैठ
भारतीय सेना के रिकॉर्ड के अनुसार सर्दियों में फरवरी 1999 में पाकिस्तान सेना ने मुश्कोह सेक्टर में घुसपैठ शुरू कर दी थी। उस समय यह आम गतिविधियां लग रही थीं, लेकिन बाद में पता चला कि पाकिस्तानी सेना सुनियोजित तरीके से ऊंची पहाड़ियों पर कब्जा जमाने की तैयारी कर रही थी।
इन इलाकों में सर्दियों के दौरान भारी बर्फबारी होती है। कई ऊंची चौकियां मौसम के कारण खाली करनी पड़ती थीं। पाकिस्तान ने इसी स्थिति का फायदा उठाकर भारतीय क्षेत्र में कई स्थानों पर अपनी मौजूदगी बना ली। (Kargil War Timeline 1999)
अप्रैल 1999: युद्धाभ्यास में उठा था घुसपैठ का मुद्दा
अप्रैल 1999 में बादामी बाग (श्रीनगर) स्थित 15 कोर मुख्यालय में एक कोर वार गेम आयोजित किया गया। इस अभ्यास के दौरान 70 इन्फैंट्री ब्रिगेड के कमांडर ब्रिगेडियर देविंदर सिंह ने टाइगर हिल और अन्य बिना कब्जे वाली चोटियों में संभावित घुसपैठ का मुद्दा उठाया।
उस समय यह केवल एक सैन्य आकलन माना गया, लेकिन कुछ हफ्तों बाद यही आशंका असलियत में बदल गई।
3-5 मई: स्थानीय चरवाहे ने सबसे पहले देखी घुसपैठ
3 मई 1999 को बटालिक सेक्टर के स्थानीय निवासी ताशी नामग्याल ने कुछ काले पठानी सूट पहने कुछ संदिग्ध लोगों को ऊंची पहाड़ियों पर देखा। उन्होंने तुरंत इसकी जानकारी भारतीय सेना को दी। इसी के बाद पता चला कि पाकिस्तान कुछ बड़ी तैयारी कर रहा है। सेना ने सूचना मिलने के बाद 5 मई को इलाके में पेट्रोलिंग बढ़ाई और हालात की जानकारी लेना शुरू कर दिया। (Kargil War Timeline 1999)
9 मई: कारगिल के गोला-बारूद डिपो पर हमला
रविवार 9 मई 1999 को पाकिस्तान ने कारगिल स्थित भारतीय सेना के अम्युनिशन डंप पर भारी गोलाबारी की। पाकिस्तानी सेना ने दोपहर से गोलाबारी शुरू की, जो 10 मई तक चली। इस हमले में गोला-बारूद के भंडार को काफी नुकसान पहुंचा। कारगिल शहर के बारू इलाके में भारतीय सेना का बड़ा गोला-बारूद डंप (अम्युनिशन डंप) था, जो पहाड़ियों में फैला हुआ था और कारगिल शहर के बेहद करीब था।
यह पहली बार था जब पाकिस्तानी सेना ने खुले तौर पर भारी तोपखाने का इस्तेमाल किया। विस्फोट 2-3 दिनों तक चले, और गोले-बारूद उड़कर आसपास बिखर गए। (Kargil War Timeline 1999)
10 मई: सेना प्रमुख विदेश दौरे पर
10 मई को तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक पोलैंड और चेकोस्लोवाकिया के आधिकारिक दौरे पर रवाना हुए। इसी दौरान सीमा पर हालात तेजी से बदल रहे थे। बाद में जनरल मलिक को स्थिति की गंभीरता देखते हुए अपना दौरा बीच में छोड़कर भारत लौटना पड़ा। (Kargil War Timeline 1999)
11 मई: वायुसेना से हेलीकॉप्टर मदद मांगी
11 मई 1999 को उधमपुर स्थित उत्तरी कमान मुख्यालय ने भारतीय वायुसेना से एमआई-25, एमआई-35 अटैक हेलीकॉप्टर और हथियारबंद एमआई-17 हेलीकॉप्टरों की मांग की। हालांकि उस समय यह अनुरोध स्वीकार नहीं किया गया। कारण यह बताया गया कि कारगिल क्षेत्र की ऊंचाई इन हेलीकॉप्टरों की प्रभावी ऑपरेटिंग सीमा से अधिक थी।
12 और 13 मई: द्रास सेक्टर में भी हुई घुसपैठ की पुष्टि
12 मई को पहली बार द्रास सेक्टर में भी दुश्मन की मौजूदगी का पता चला। इसके अगले ही दिन यानी 13 मई को कारगिल के अम्युनिशन डंप पर हुए हमले के केवल चार दिन बाद द्रास स्थित भारतीय सेना का ट्रांजिट कैंप भी पाकिस्तान की भारी गोलाबारी का शिकार हुआ। इससे भारतीय सेना को स्पष्ट संकेत मिल गया कि यह सामान्य सीमा उल्लंघन नहीं, बल्कि बड़े सैन्य अभियान का हिस्सा है।
14 मई: वायुसेना की मदद पर हुई अहम बैठक
14 मई 1999 को तत्कालीन उप सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल चंद्र शेखर ने चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी की बैठक में भारतीय वायुसेना को अभियान में शामिल करने की जरूरत पर जोर दिया। उस समय तत्कालीन वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अनिल यशवंत टिपनिस ने कहा कि इसके लिए भारत सरकार की औपचारिक मंजूरी आवश्यक होगी।
इसी दिन एक और महत्वपूर्ण घटना हुई। 4 जाट रेजिमेंट के कैप्टन सौरभ कालिया के नेतृत्व में पांच सैनिकों (सिपाही अर्जुन राम बसावनबिहा, सिपाही भंवर लाल बागरिया, सिपाही भिखा राम, सिपाही मूला राम और सिपाही नरेश सिंह) की गश्ती टीम बजरंग पोस्ट (काकसर सेक्टर, ऊंचाई लगभग 13,000–14,000 फीट) की ओर गई, लेकिन यह दल वापस नहीं लौटा। यह कारगिल युदध की शुरुआत की पहली बड़ी क्षति थी।
पाकिस्तानी सेना (नॉर्दर्न लाइट इन्फेंट्री और रेंजर्स) ने उन पर हमला बोल दिया। घंटों तक भीषण गोलीबारी हुई। गोला-बारूद खत्म होने के बाद कालिया ने बेस कैंप से संपर्क किया और रीइन्फोर्समेंट मांगी। लेकिन इससे पहले ही पाकिस्तानी प्लाटून ने उन्हें घेर लिया और जिंदा पकड़ लिया। कैप्टन सौरभ कालिया और उनके पांच साथियों को 15 मई से 7 जून 1999 तक (लगभग 22-23 दिन) पाकिस्तानी हिरासत में रखा गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार उन्हें बेहद क्रूर यातनाएं दी गईं। 9 जून 1999 को पाकिस्तानी सेना ने उनके क्षत-विक्षत शव भारतीय पक्ष को सौंपे। जिसके बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ जिनेवा कन्वेंशन के उल्लंघन का नोटिस भेजा।
16 मई: कैप्टन अमित भारद्वाज की टुकड़ी पर हमला
लापता गश्ती दल की तलाश के लिए 16 मई को कैप्टन अमित भारद्वाज के नेतृत्व में एक प्लाटून भेजी गई। जांच के दौरान इस दल पर घात लगाकर हमला किया गया। इस मुठभेड़ में कैप्टन अमित भारद्वाज और एक जूनियर कमीशंड अधिकारी शहीद हो गए।
इसी दिन 8 माउंटेन डिवीजन की 56 माउंटेन ब्रिगेड को कश्मीर घाटी से द्रास भेजने का आदेश दिया गया। यह फैसला युद्ध की दिशा बदलने वाला साबित हुआ क्योंकि इसके बाद बड़े स्तर पर सैनिकों की तैनाती शुरू हुई। (Kargil War Timeline 1999)
17 मई: पहली बार हुई कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की बैठक
17 मई 1999 को नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) की पहली बैठक हुई।
इस बैठक में रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री को कारगिल की स्थिति की जानकारी दी गई। सेना ने वायुसेना को अभियान में शामिल करने का प्रस्ताव रखा, लेकिन उस समय इसे मंजूरी नहीं मिली। (Kargil War Timeline 1999)
20 मई: सेना प्रमुख लौटे भारत
हालात की गंभीरता को देखते हुए 20 मई को सेना प्रमुख जनरल वी. पी. मलिक अपना विदेश दौरा बीच में छोड़कर भारत लौट आए। उनके लौटने के बाद सैन्य अभियान की गति और योजना दोनों में तेजी आई।
22 मई: टाइगर हिल और तोलोलिंग पर पहला बड़ा हमला
22 मई 1999 को 56 माउंटेन ब्रिगेड ने द्रास सेक्टर की जिम्मेदारी संभाली।
उसी दिन टाइगर हिल, तोलोलिंग और पॉइंट 5140 पर कब्जा वापस लेने के लिए पहला बड़ा सैन्य हमला शुरू किया गया। हालांकि यह हमला सफल नहीं हो सका और भारतीय सेना को भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। ऊंची पहाड़ियों पर बैठे पाकिस्तानी सैनिकों को सामरिक बढ़त हासिल थी। (Kargil War Timeline 1999)
23 से 27 मई: अतिरिक्त सैन्य बल की तैनाती
23 मई को 79 माउंटेन ब्रिगेड को मुश्कोह सेक्टर भेजा गया ताकि वहां की जिम्मेदारी संभाली जा सके। 24 मई को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई सीसीएस बैठक में भारतीय वायुसेना के इस्तेमाल की मंजूरी दी गई। साथ ही स्पष्ट निर्देश दिया गया कि अभियान के दौरान वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलओसी) या अंतरराष्ट्रीय सीमा पार नहीं की जाएगी।
26 मई 1999 को भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन सफेद सागर शुरू किया। पहले ही दिन तीन विमान और हेलीकॉप्टर खोने के बाद वायुसेना ने अपनी रणनीति में बदलाव किया और ऊंचाई पर स्थित लक्ष्यों के अनुसार अभियान को फिर से तैयार किया।
इसी दौरान 26-27 मई को पाकिस्तान सेना प्रमुख और रावलपिंडी स्थित चीफ ऑफ जनरल स्टाफ के बीच हुई बातचीत भारतीय एजेंसियों ने इंटरसेप्ट की। इन बातचीतों से पहली बार स्पष्ट प्रमाण मिला कि कारगिल घुसपैठ में पाकिस्तान सेना सीधे तौर पर शामिल थी, न कि केवल आतंकवादी या घुसपैठिए।
27 मई: 6 माउंटेन डिवीजन को भी किया गया एक्टिव
27 मई 1999 को सेना मुख्यालय ने 6 माउंटेन डिवीजन को सोनमर्ग के पास जोजिला दर्रे तक पहुंचने का आदेश दिया। इसका उद्देश्य जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त सैन्य बल उपलब्ध कराना था।
इसी समय भारतीय एजेंसियों द्वारा इंटरसेप्ट की गई बातचीत से यह भी साफ हो गया कि कारगिल की पूरी योजना पाकिस्तान सेना की टॉप लीडरशिप उस समय जनरल परवेज मुशर्रफ की जानकारी में बनाई गई थी।
31 मई: प्रधानमंत्री ने माना युद्ध जैसे हालात
31 मई 1999 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सार्वजनिक रूप से कहा कि कारगिल में युद्ध जैसी स्थिति बन चुकी है। इसके बाद सैन्य और प्रशासनिक स्तर पर फैसलों में तेजी आने लगी। (Kargil War Timeline 1999)
1 जून: 8 माउंटेन डिवीजन ने संभाली कमान
1 जून को 8 माउंटेन डिवीजन के टैक्टिकल मुख्यालय ने मुश्कोह और द्रास सेक्टर की जिम्मेदारी संभाल ली। यहीं से भारतीय सेना ने अलग-अलग क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से जवाबी अभियान शुरू किया।
4 जून: स्पेशल फोर्स की एंट्री
4 जून 1999 को 9 पैरा स्पेशल फोर्स की बटालियन, जिसकी कमान कर्नल जॉन एबॉट के पास थी, कारगिल पहुंची।
इसके बाद 50 पैरा ब्रिगेड, जिसकी कमान ब्रिगेडियर प्रभोध भारद्वाज संभाल रहे थे, को भी अभियान में शामिल किया गया। इन विशेष बलों को कठिन पर्वतीय इलाकों में विशेष ऑपरेशन के लिए लगाया गया।
6 जून: बोफोर्स तोप का इस्तेमाल
6 जून को भारतीय सेना ने पहली बार बोफोर्स एफएच-77बी हॉवित्जर का लंबी दूरी से सीधे टारगेट पर फायर करने का प्रयोग तोलोलिंग में किया। सामान्य तौर पर बोफोर्स का उपयोग अप्रत्यक्ष गोलाबारी के लिए किया जाता है, लेकिन कारगिल की ऊंची पहाड़ियों में इसे सीधे टारगेट पर दागा गया। इससे दुश्मन के बंकरों को भारी नुकसान पहुंचा और आगे के हमलों के लिए रास्ता तैयार हुआ।
12 जून: तोलोलिंग पर पहला बड़ा हमला
12 जून 1999 को 8 माउंटेन डिवीजन के नेतृत्व में 56 माउंटेन ब्रिगेड ने तोलोलिंग हाइट्स और पॉइंट 5140 पर बड़ा हमला शुरू किया।
यह हमला बेहद कठिन था क्योंकि पाकिस्तानी सैनिक ऊंची चोटियों पर बैठे थे, जबकि भारतीय सैनिकों को नीचे से चढ़ाई करते हुए हमला करना पड़ रहा था। (Kargil War Timeline 1999)
13 जून: तोलोलिंग पर फहराया तिरंगा
13 जून 1999 कारगिल युद्ध का महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। 2 राजपूताना राइफल्स ने भीषण लड़ाई के बाद तोलोलिंग हाइट्स पर कब्जा कर लिया। यह कारगिल युद्ध में भारतीय सेना की पहली बड़ी टैक्टिकल जीत थी।
तोलोलिंग की जीत से द्रास क्षेत्र में भारतीय सेना की स्थिति मजबूत हुई और आगे के अभियानों के लिए आधार तैयार हुआ।
17 जून: पॉइंट 5140 की ओर बढ़ा अभियान
17 जून को 13 जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स ने रॉकी नॉब क्षेत्र में दिन के उजाले में हमला किया। यह अभियान सफल रहा और भारतीय सेना ने आगे बढ़ने के लिए महत्वपूर्ण सामरिक स्थिति हासिल कर ली।
19 जून: पॉइंट 5140 पर कब्जा
19 जून 1999 को 13 जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स ने पॉइंट 5140 पर सफल हमला किया। यह द्रास क्षेत्र की सबसे ऊंची टैक्टिकल चोटियों में से एक थी। इसी अभियान के दौरान कैप्टन विक्रम बत्रा ने “ये दिल मांगे मोर” का मैसेज दिया था, जो बाद में पूरे देश में चर्चा का विषय बना।
पॉइंट 5140 पर कब्जा मिलने के बाद भारतीय सेना को टाइगर हिल की दिशा में आगे बढ़ने में महत्वपूर्ण बढ़त मिली।
28 जून: मारपोला रिज पर सफलता
28 जून को भारतीय सेना ने मारपोला रिज क्षेत्र में अभियान शुरू किया। 56 माउंटेन ब्रिगेड के नेतृत्व में 2 राजपूताना राइफल्स ने ब्लैक रॉक क्षेत्र में सफलता हासिल की, जबकि 18 गढ़वाल राइफल्स ने पॉइंट 4700 पर कब्जा कर लिया।
इन सफलताओं से द्रास क्षेत्र में पाकिस्तान की कई अग्रिम पोस्ट दबाव में आ गईं।
1 जुलाई: सैंडो टॉप पर स्पेशल ऑपरेशन
1 जुलाई को 9 पैरा स्पेशल फोर्स ने टारगिल हिल के नीचे सैंडो टॉप पर विशेष अभियान शुरू किया। दिन निकलने के बाद दुश्मन की नजर पड़ने पर स्पेशल फोर्सेज को आर्टिलरी की आड़ लेकर पीछे हटना पड़ा। इसके बाद अभियान की रणनीति में बदलाव किया गया।
3 और 4 जुलाई: टाइगर हिल की निर्णायक लड़ाई
3 जुलाई 1999 को 92 माउंटेन ब्रिगेड, जिसकी कमान ब्रिगेडियर एमपीएस बाजवा के पास थी, उन्होंने 18 ग्रेनेडियर्स के साथ मिलकर टाइगर हिल पर हमला शुरू किया। 4 जुलाई की सुबह भारतीय सैनिक टाइगर हिल की चोटी तक पहुंच गए। हालांकि शुरुआती घोषणा समय से पहले कर दी गई थी, लेकिन लगातार लड़ाई के बाद भारतीय सेना ने पूरी चोटी पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। उसी दिन 79 माउंटेन ब्रिगेड के नेतृत्व में ब्रिगेडियर रमेश कक्कड़ ने पॉइंट 4875 पर भी सफल हमला किया।
7 जुलाई: ट्विन बंप पर कब्जा
7 जुलाई को 2 नागा रेजिमेंट ने ट्विन बंप पर कब्जा कर लिया। इस सफलता से पॉइंट 4875 के आसपास भारतीय सेना की स्थिति और मजबूत हो गई। पॉइंट 4875 (टाइगर हिल कॉम्प्लेक्स का हिस्सा) मुश्कोह वैली में स्थित एक प्रमुख ऊंची चोटी थी। पाकिस्तानी सेना ने इसकी चोटियों पर कब्जा करके भारतीय सैनिकों और सप्लाई काफिले पर तोपों और मोर्टार से हमला कर रही थी।
2 नागा रेजिमेंट (कमांडिंग ऑफिसर कर्नल डी.के. बादोला) को 27 जून 1999 को द्रास-मश्कोह सेक्टर में शामिल किया गया। सिर्फ 7 दिनों के एक्रोमेटाइजेशन (ऊंचाई के अभ्यस्त होने) के बाद ही उन्हें ट्विन बंप्स पर हमला करने का काम सौंपा गया। यह हमला टाइगर हिल पर हमला कर रही इकाइयों (जैसे 8 सिख) पर दबाव कम करने के लिए था। आर्टिलरी से ट्विन बंप्स पर भारी गोलाबारी की गई। इससे पाकिस्तानी ठिकानों को काफी नुकसान पहुंचा।
ट्विन बंप्स पर कब्जे के बाद पाकिस्तानी सेना को पॉइंट 4875 और टाइगर हिल क्षेत्र से पीछे हटना पड़ा।
2 नागा रेजिमेंट को इस ऑपरेशन में भारी कीमत चुकानी पड़ी। उनके लगभग 18 सैनिक शहीद हुए। यूनिट को बैटल ऑनर: मुश्कोह, थिएटर ऑनर: कारगिल और सीओएएस यूनिट सिटेशन का सम्मान मिला।
10 जुलाई: पाकिस्तान ने हार मानी
लगातार सैन्य दबाव के बाद 10 जुलाई 1999 को पाकिस्तान ने संघर्षविराम स्वीकार किया। पाकिस्तान के डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशंस (डीजीएमओ) ने 10 जुलाई से सैनिकों की वापसी शुरू करने और 16 जुलाई तक इसे पूरा करने पर सहमति दी। मश्कोह से 12–15 जुलाई, द्रास से 14–15 जुलाई और बटालिक से 15–16 जुलाई तक वापसी की बात हुई।
16 जुलाई: पीछे हटने के वादे से मुकरा पाकिस्तान
16 जुलाई को भारतीय सेना ने पाया कि पाकिस्तान ने तय समय के अनुसार सभी क्षेत्रों से सैनिक नहीं हटाए हैं।
इसके बाद कई स्थानों पर भारतीय सेना ने अभियान जारी रखा। कुछ क्षेत्रों में पाकिस्तानी सैनिक अभी भी भारतीय क्षेत्र पर मौजूद थे। वहीं, वापसी के दौरान पाकिस्तान ने कई जगहों पर माइंस और बूबी ट्रैप बिछा दिए थे।
जबकि तीन प्रमुख फीचर्स पर पाकिस्तान की उपस्थिति अभी भी बनी हुई थी।
21 जुलाई: अंतिम सैन्य कार्रवाई की मंजूरी
21 जुलाई 1999 को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से शेष घुसपैठियों को पूरी तरह बाहर निकालने के लिए अंतिम सैन्य कार्रवाई की अनुमति मांगी गई। उसी दिन अनुमति मिलने के बाद भारतीय सेना ने शेष क्षेत्रों में अभियान शुरू किया।
26 जुलाई: कारगिल विजय दिवस
26 जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने घोषणा की कि सभी घुसपैठियों और पाकिस्तानी सैनिकों को कब्जे वाले क्षेत्रों से पूरी तरह बाहर निकाल दिया गया है। इसी दिन को हर वर्ष कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है।
अगस्त में भी जारी रही सैन्य कार्रवाई
इसके बाद भी पाकिस्तान की ओर से तोपखाने की गोलाबारी जारी रही। 20 अगस्त 1999 को भारतीय तोपखाने ने पोस्ट 44 पर भारी जवाबी कार्रवाई की। यह पोस्ट पॉइंट 13620 के पास स्थित थी। युद्ध समाप्त होने के बाद भी सेना ने सीमावर्ती इलाकों की सुरक्षा मजबूत करने का काम जारी रखा। मध्य अगस्त 1999 में 8 माउंटेन डिवीजन को कारगिल क्षेत्र की सुरक्षा मजबूत करने और खाली स्थानों पर परमानेंस डिफेंस सिस्टम तैयार करने का आदेश दिया गया। (Kargil War Timeline 1999)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।



