📍नई दिल्ली | 2 Jun, 2026, 3:22 PM
Indian Army Organic Air Power: भारतीय सेना को अपने लिए अलग एयर पावर यानी हेलिकॉप्टर और अन्य हवाई संसाधन मिलने चाहिए या नहीं, इस मुद्दे पर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। हाल ही में एक थिंक टैंक के विश्लेषण में कहा गया कि देश की तीनों सेनाओं के हवाई संसाधनों को एक जगह लाकर बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है। वहीं दूसरी ओर कई सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि सेना को अपनी जरूरतों के मुताबिक खुद के एयर एसेट्स रखना जरूरी है, क्योंकि जमीनी युद्ध के दौरान तत्काल हवाई मदद कई बार निर्णायक साबित होती है।
हालांकि मामला केवल संसाधनों के बंटवारे का नहीं है, बल्कि युद्ध के मैदान में सैनिकों तक समय पर मदद पहुंचाने और ऑपरेशन की सफलता से भी जुड़ा है। कारगिल युद्ध, सियाचिन और 1971 के युद्ध जैसे उदाहरणों को देखते हुए सेना के लिए ऑर्गेनिक एयर पावर की आवश्यकता पर फिर चर्चा हो रही है।
Indian Army Organic Air Power: आखिर क्या है ऑर्गेनिक एयर पावर?
ऑर्गेनिक एयर पावर का मतलब है कि किसी सेना के पास अपने नियंत्रण में ऐसे हवाई संसाधन हों जिन्हें वह सीधे अपने ऑपरेशन के लिए इस्तेमाल कर सके। इसमें मुख्य रूप से हेलिकॉप्टर, टोही विमान और अन्य सपोर्ट प्लेटफॉर्म शामिल होते हैं।
सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि जमीनी लड़ाई के दौरान कई बार मिनटों में फैसला लेना पड़ता है। ऐसे समय में अगर हवाई सहायता के लिए किसी दूसरी सेवा पर निर्भर रहना पड़े तो प्रतिक्रिया में देरी हो सकती है। यही वजह है कि दुनिया के कई देशों की सेनाओं के पास अपनी अलग एविएशन यूनिट मौजूद हैं।
1971 के युद्ध से मिले सबक
भारतीय सैन्य इतिहास में 1971 का युद्ध एक बड़ा उदाहरण माना जाता है। उस दौरान पूर्वी मोर्चे पर तेजी से बढ़ती सेना को रसद, सैनिकों की आवाजाही और अन्य मदद की जरूरत थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि कई इलाकों में सेना के एविएशन संसाधनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जमीनी कमांडरों को सीधे उपलब्ध हवाई सहायता ने ऑपरेशन को रफ्तार देने में मदद की। इसी अनुभव ने बाद के सालों में आर्मी एविएशन को और मजबूत करने की सोच को बढ़ावा दिया। (Indian Army Organic Air Power)
सियाचिन में हेलिकॉप्टर हैं लाइफलाइन
1984 में सियाचिन में शुरू हुए ऑपरेशन मेघदूत ने दिखाया कि ऊंचे और कठिन इलाकों में हेलिकॉप्टर कितने जरूरी होते हैं।
सियाचिन दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र माना जाता है। यहां सैनिकों तक राशन, हथियार, दवाइयां और अन्य जरूरी सामान पहुंचाने का सबसे बड़ा साधन हेलिकॉप्टर ही हैं।
ऐसे हालात में केवल उड़ान भरना ही चुनौती नहीं होता, बल्कि बेहद कम तापमान और ऑक्सीजन की कमी में सुरक्षित संचालन भी बड़ी जिम्मेदारी होती है। सेना का तर्क है कि ऐसे मिशनों के लिए उन्हीं पायलटों की जरूरत होती है जो सेना की कार्यप्रणाली और जमीनी जरूरतों को अच्छी तरह समझते हों।
कारगिल युद्ध में दिखी सेना एविएशन की ताकत
1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना ने दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमले कर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वहीं आर्मी एविएशन कोर के चीता और चेतक हेलिकॉप्टरों ने भी बेहद अहम जिम्मेदारी निभाई।
कारगिल की ऊंची चोटियों तक रसद पहुंचाने, घायल सैनिकों को निकालने और अग्रिम चौकियों तक सहायता पहुंचाने का काम इन हेलिकॉप्टरों ने किया।
रक्षा मामलों से जुड़ी पुस्तक द इंडियन डिफेंस बजट के अनुसार कारगिल अभियान के दौरान सेना एविएशन कोर ने लगभग 2,500 मिशन पूरे किए और 2,700 घंटे से अधिक उड़ान भरी। इस दौरान करीब 900 घायलों को सुरक्षित बाहर निकाला गया।
यह सब इसलिए संभव हो सका क्योंकि हेलिकॉप्टर सीधे सेना कमांड के नियंत्रण में थे और जरूरत के अनुसार तुरंत तैनात किए जा सकते थे। (Indian Army Organic Air Power)
क्या कहता है दुनिया की बड़ी सेनाओं का मॉडल?
अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि सभी हवाई संसाधन एक ही एयर फोर्स के पास होने चाहिए। लेकिन कई देशों की व्यवस्था इससे अलग है।
अमेरिका की सेना के पास खुद का विशाल एविएशन बेड़ा है। अमेरिकी सेना एविएशन के पास हजारों रोटरी विंग एयरक्राफ्ट यानी हेलिकॉप्टर हैं। संख्या के लिहाज से यह दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य हवाई क्षमताओं में से एक है।
ब्रिटेन की सेना के पास भी अपने अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर हैं, जिन्हें आर्मी एविएशन कोर ऑपरेट करता है। इनका इस्तेमाल सीधे जमीनी अभियानों के सपोर्ट में किया जाता है।
इन उदाहरणों को देखते हुए कई विशेषज्ञ मानते हैं कि जमीनी युद्ध की जरूरतें अलग होती हैं और उनके लिए समर्पित हवाई संसाधन जरूरी हैं।
ब्रह्मोस मिसाइल का उदाहरण भी चर्चा में
विश्लेषण में एक और दिलचस्प मुद्दा उठाया गया है। भारतीय सेना ने 2007 में ब्रह्मोस मिसाइल रेजिमेंट को शामिल किया था। बाद में भारतीय वायुसेना ने भी ब्रह्मोस मिसाइल को अपने प्लेटफॉर्म पर शामिल किया।
कुछ विशेषज्ञ सवाल उठाते हैं कि अगर अलग-अलग सेवाओं द्वारा समान क्षमता वाले सिस्टम अपनाने को संसाधनों की पुनरावृत्ति माना जाए, तो फिर यह तर्क केवल आर्मी एविएशन पर ही क्यों लागू किया जाए।
उनका कहना है कि कई बार अलग-अलग सर्विसेज की जरूरतें अलग होती हैं और उसी के आधार पर संसाधनों का चयन किया जाता है। (Indian Army Organic Air Power)
वायुसेना के सामने भी बड़े आधुनिकीकरण कार्यक्रम
इस बहस के बीच भारतीय वायुसेना भी कई बड़े आधुनिकीकरण कार्यक्रमों पर काम कर रही है।
36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए लगभग 59 हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए। इसके बाद तेजस एमके-1ए के 83 विमानों का अनुबंध करीब 48 हजार करोड़ रुपये का रहा। फिर अतिरिक्त 97 तेजस एमके-1ए विमानों के लिए भी बड़ा समझौता किया गया।
इसके अलावा तेजस एमके-2 और एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) जैसे कार्यक्रम भी चल रहे हैं। हाल ही में एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) कार्यक्रम के लिए आरएफपी जारी की गई है, और फुल-स्केल इंजीनियरिंग डेवलपमेंट (FSDE) कार्यक्रम के लिए 15,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे।
इन सभी परियोजनाओं के लिए अलग प्रशिक्षण, रखरखाव और सपोर्ट सिस्टम की जरूरत होती है।
विश्लेषकों का कहना है कि संसाधनों के बेहतर उपयोग पर चर्चा करते समय सभी सेवाओं के कार्यक्रमों को समान नजरिए से देखना चाहिए। (Indian Army Organic Air Power)
सेना की जरूरत का सवाल
भारतीय सेना का कहना है कि उसकी मांग किसी संस्थागत प्रतिस्पर्धा या अधिकार क्षेत्र बढ़ाने से जुड़ी नहीं है। सेना का मुख्य तर्क यह है कि जमीनी अभियानों के दौरान उसे तत्काल और हवाई सहायता की जरूरत होती है।
पहाड़ी इलाकों, सीमावर्ती क्षेत्रों और आतंकवाद विरोधी अभियानों में कई बार ऐसी परिस्थितियां बनती हैं जहां मिनटों में लिए गए फैसले मिशन की सफलता तय करते हैं। ऐसे में सीधे सेना के नियंत्रण में मौजूद हेलिकॉप्टर और हवाई संसाधन अधिक प्रभावी साबित हो सकते हैं। (Indian Army Organic Air Power)
The debate over organic air power for the Indian Army has gained renewed attention, driven by lessons from the Kargil War, Siachen operations, and modern battlefield requirements. Army Aviation helicopters played a critical role in casualty evacuation, logistics, and frontline support during Kargil, completing thousands of missions in extreme conditions. Military experts argue that dedicated air assets under Army control ensure faster response and better coordination during combat. As warfare evolves, the demand for organic air power is increasingly being viewed as an operational necessity rather than a duplication of resources.

