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Opinion: गल्फ वॉर की रणनीति खत्म? क्या अब बिना ग्राउंड फोर्स के जीते जा सकते हैं युद्ध? एयर पावर कैसे बन सकती है गेमचेंजर

अगर युद्ध के तरीके को सच में बदलना है, तो इस पुरानी सोच को बदलना होगा। इसके लिए जरूरी है कि एयर पावर को अकेले इस्तेमाल करने की रणनीति भी बनाई जाए, न कि हमेशा जमीनी सेना के साथ जोड़कर ही देखा जाए...

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📍नई दिल्ली | 19 Apr, 2026, 12:46 PM

Air Power Future Warfare: एयर पावर की रणनीतिक क्षमता तकनीकी सीमाओं से नहीं, बल्कि 1991 के गल्फ वॉर की सोच पर आधारित पुरानी सैन्य सोच यानी डॉक्ट्रिन के कारण सीमित हो जाती है। आज एयर पावर में लगातार निगरानी (इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस यानी ISR), सटीक हमले (मास प्रिसिजन) और रियल-टाइम लॉजिस्टिक्स मॉनिटरिंग जैसी क्षमताएं मौजूद हैं, जो किसी भी युद्ध को निर्णायक बना सकती हैं या युद्ध से पहले ही स्थिति बदल सकती हैं। मिलिट्री हिस्ट्री बताता है कि जब तक युद्ध के मैदान में झटके नहीं लगते, तब तक ऐसी पुरानी सोच बनी रहती है। इसलिए जरूरी है कि तकनीक की तेजी के साथ सैन्य सोच भी बदली जाए।

Air Power Future Warfare: आधुनिक युद्ध में गल्फ वॉर की सोच क्यों पड़ रही है पुरानी

1991 के ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म के दौरान जो टारगेटिंग रणनीति अपनाई गई, उसने सैन्य सोच को बदल दिया था। उस समय एयर पावर का इस्तेमाल इराक के कमांड और कंट्रोल सिस्टम को कमजोर करने, एयर डिफेंस को खत्म करने, स्कड मिसाइल सिस्टम को तबाह करने और जमीन पर सेना भेजने से पहले एयर सुपीरियरिटी हासिल करने के लिए किया गया था।

इस सोच का आधार यह था कि एयर पावर जमीन पर लड़ने वाली सेना की मदद के लिए है, उसे बदलने के लिए नहीं। बाद में कोसोवो, अफगानिस्तान और लीबिया जैसे ऑपरेशनों में भी यही मॉडल अपनाया गया। लेकिन आज बदलते वैश्विक हालात, खासकर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव, इस सोच को फिर से परखने की जरूरत दिखाते हैं।

क्या एयर पावर जमीन पर कब्जा नहीं कर सकती?

आम तौर पर माना जाता है कि केवल आसमान से युद्ध नहीं जीता जा सकता। यह सोच इतिहास पर आधारित है, लेकिन अब यह पूरी तरह सही नहीं रह गई है। आलोचकों का कहना है कि एयर पावर जमीन पर कब्जा नहीं कर सकती, लोगों को नियंत्रित नहीं कर सकती और दुश्मन के नेटवर्क को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकती।

ये सीमाएं पहले सही थीं, लेकिन अब तकनीक में हुए बदलावों को नजरअंदाज करना सही नहीं है। पहले एयर पावर सीमित सेंसर, कमजोर संचार और धीमी जानकारी के कारण बाधित थी। दुश्मन आसानी से छिप सकता था और खुद को फिर से संगठित कर सकता था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं।

इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस में हुई क्रांति

इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस (ISR) में जो बदलाव आया है, वह एयर पावर के लिए सबसे बड़ा और असरदार बदलाव माना जाता है। आज के आधुनिक ISR सिस्टम, जैसे सैटेलाइट नेटवर्क, ऊंचाई पर उड़ने वाले बिना पायलट वाले प्लेटफॉर्म (ड्रोन), आपस में जुड़े सेंसर सिस्टम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से डेटा का विश्लेषण, इन सबने मिलकर बहुत बड़े इलाके में भी दुश्मन की गतिविधियों पर लगातार नजर रखना संभव बना दिया है।

पहले के समय, खासकर कोल्ड वॉर और गल्फ वॉर के दौरान, सेना को “फॉग ऑफ वॉर” यानी युद्ध के दौरान अनिश्चितता और जानकारी की कमी की चिंता रहती थी। लेकिन अब आधुनिक ISR सिस्टम की वजह से सेंसर से लेकर हमले तक का समय बहुत कम हो गया है और निगरानी का दायरा भी बहुत बड़ा हो गया है।

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इसका असर टारगेट चुनने की रणनीति पर भी साफ दिखता है। पहले एयर ऑपरेशन में ज्यादा ध्यान ऐसे टारगेट्स पर होता था जो स्थिर होते थे, जैसे एयरबेस, कमांड सेंटर, रडार स्टेशन या फैक्ट्रियां। लेकिन अब एयर पावर चलते-फिरते टारगेट्स पर भी लगातार नजर रख सकती है। दुश्मन की सप्लाई और मूवमेंट को लगभग रियल टाइम में देखा जा सकता है और उसके काम करने के तरीके को समझकर पहले ही उसकी मंशा का अंदाजा लगाया जा सकता है।

यह सिर्फ टारगेटिंग की सटीकता बढ़ने भर की बात नहीं है, बल्कि यह एक बड़ा बदलाव है, जिसे कुछ विशेषज्ञ “पूरे युद्ध क्षेत्र की लगभग पूरी जानकारी होना” यानी हर गतिविधि पर नजर रखने की क्षमता के रूप में देखते हैं।

मास प्रिसिजन का क्या है नया मतलब

“मास प्रिसिजन” शब्द पहली नजर में थोड़ा उल्टा या अजीब लग सकता है, खासकर उन लोगों के लिए जो पुरानी सैन्य सोच से परिचित हैं। पहले माना जाता था कि सटीक हमला (प्रिसिजन) और बड़े पैमाने पर हमला (मास) एक साथ संभव नहीं हैं। प्रिसिजन वेपंस कम होते थे, महंगे होते थे और उन्हें चलाने के लिए खास हालात चाहिए होते थे। वहीं बड़े पैमाने पर किए गए हमले अक्सर कम सटीक होते थे और इनमें गलती से आम लोगों को नुकसान पहुंचने का खतरा ज्यादा रहता था।

लेकिन अब यह फर्क पहले जैसा नहीं रहा। आज के समय में प्रिसिजन गाइडेड हथियारों को बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। नई गाइडेंस टेक्नोलॉजी, बेहतर मैन्युफैक्चरिंग और नेटवर्क के जरिए टारगेट चुनने की क्षमता ने इसे आसान बना दिया है। अब एक साथ कई प्लेटफॉर्म कई टारगेट्स पर सटीक हमला कर सकते हैं और सफल होने की संभावना भी ज्यादा रहती है।

अब “मास प्रिसिजन” का मतलब है कि एक बड़े इलाके में एक साथ या बहुत कम समय के अंतर में कई सटीक हमले किए जाएं। इससे दुश्मन को सोचने और जवाब देने का समय नहीं मिलता और उसके सिस्टम में एक के बाद एक गड़बड़ी शुरू हो जाती है।

जब इसे एडवांस आईएसआर (इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस) के साथ जोड़ा जाता है, तो टारगेट करने का तरीका भी बदल जाता है। अब सिर्फ बड़े ठिकानों पर हमला करने के बजाय दुश्मन के पूरे सिस्टम को कमजोर करने पर ध्यान दिया जाता है। जैसे उसकी सप्लाई ले जाने वाले काफिले, मरम्मत करने वाली जगहें, कम्युनिकेशन सिस्टम, ईंधन के भंडार और वो लोग या नेटवर्क जो उसकी सेना को चलाते हैं।

इस तरह टारगेट केवल दुश्मन को खत्म करना नहीं, बल्कि उसकी पूरी क्षमता को कमजोर करना होता है, ताकि उसका सैन्य सिस्टम काम करने लायक न बचे।

दुश्मन के लिए फिर से खड़ा होना हुआ मुश्किल

पहले के समय में एयर पावर की एक बड़ी कमजोरी यह थी कि दुश्मन अपने नुकसान की भरपाई कर लेता था। अगर एयर स्ट्राइक में फैक्ट्रियां नष्ट हो जाती थीं, तो उन्हें कहीं और शिफ्ट कर लिया जाता था। टैंक यूनिट्स खत्म हो जाती थीं, तो नई यूनिट्स तैयार कर ली जाती थीं। यानी एयर पावर का असर होता था, लेकिन दुश्मन धीरे-धीरे फिर से खड़ा हो जाता था।

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अब हालात बदल गए हैं। आधुनिक एयर पावर में एक नई चीज जुड़ गई है, जिसे “पर्सिस्टेंस” कहा जाता है, यानी लगातार मौजूद रहना। आज ड्रोन और लंबे समय तक उड़ान भरने वाले सिस्टम कई दिनों या हफ्तों तक एक ही इलाके पर नजर रख सकते हैं।

इसका मतलब यह है कि अगर आज किसी सप्लाई काफिले को नष्ट किया गया, तो अगले दिन उसकी नई व्यवस्था बनने से पहले ही उस पर नजर रखकर उसे रोका जा सकता है। अगर किसी रिपेयर फैसिलिटी को नुकसान पहुंचाया गया है, तो उसे ठीक होने से पहले ही फिर निशाना बनाया जा सकता है। इसी तरह, दुश्मन के लीडर या कमांड सिस्टम को दोबारा संगठित होने से पहले ही दबाव में लाया जा सकता है।

इस तरह दुश्मन धीरे-धीरे नहीं, बल्कि लगातार कमजोर होता जाता है। उसे दोबारा ताकत जुटाने का मौका ही नहीं मिलता। इसी सोच को अब कुछ विशेषज्ञ “टाइम-सेंसिटिव टारगेटिंग” कहते हैं। इसका मतलब है कि सही समय पर, लगातार और समझदारी से सटीक हमले किए जाएं, ताकि दुश्मन अपनी रणनीति बदलने या खुद को फिर से तैयार करने से पहले ही कमजोर हो जाए।

सैन्य सोच में बदलाव की जरूरत

इस बदलाव को लागू करने में सबसे बड़ी रुकावट तकनीक नहीं, बल्कि सोच और सिस्टम की है। कई सैन्य संस्थाएं, जैसे अमेरिकी एयर फोर्स, आज भी पुराने मॉडल पर काम कर रही हैं, जो 1991 के गल्फ वॉर के समय बना था।

आज भी एयर पावर को पूरी तरह स्वतंत्र ताकत की तरह नहीं, बल्कि जमीन पर लड़ने वाली सेना की मदद करने वाले साधन के रूप में देखा जाता है। हथियार खरीदने की योजनाएं भी पुराने तरह के युद्ध को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। ट्रेनिंग और पढ़ाई में भी उन्हीं तरीकों पर जोर दिया जाता है, जो अब बदल चुके हालात में उतने उपयोगी नहीं हैं।

अगर युद्ध के तरीके को सच में बदलना है, तो इस पुरानी सोच को बदलना होगा। इसके लिए जरूरी है कि एयर पावर को अकेले इस्तेमाल करने की रणनीति भी बनाई जाए, न कि हमेशा जमीनी सेना के साथ जोड़कर ही देखा जाए।

इसके साथ ही कुछ और बातों को भी ध्यान में रखना होगा, जैसे आम लोगों को नुकसान कम से कम हो, दुश्मन की कमजोरियों को समझा जाए, और साइबर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और स्पेस टेक्नोलॉजी को एक साथ जोड़कर इस्तेमाल किया जाए।

ईरान का उदाहरण इसे समझने में मदद करता है। वहां का मिलिट्री स्ट्रक्चर काफी जटिल है, अलग-अलग जगहों पर फैला नेतृत्व, मजबूत कमांड सिस्टम, सुरंगों का नेटवर्क, मोबाइल मिसाइल लॉन्चर और ऐसी आबादी जो एक जैसी सोच नहीं रखती।

पुरानी सोच के मुताबिक, पहले इन सभी ठिकानों को कमजोर किया जाएगा और फिर जमीन पर हमला किया जाएगा, जो शायद कभी हो ही न।

लेकिन नई सोच यह कहती है कि सीधे हमला करने की बजाय दुश्मन की पूरी सैन्य क्षमता को उसके सपोर्ट सिस्टम से अलग किया जाए। जैसे उसका एनर्जी सिस्टम, इकोनॉमिक नेटवर्क, सप्लाई चेन और तकनीकी संसाधनों को निशाना बनाया जाए। साथ ही लगातार निगरानी रखी जाए, ताकि वह दोबारा खुद को मजबूत न कर सके।

निष्कर्ष: बदलती सोच की जरूरत

“ऑम्निसिएंट अवेयरनेस” का मतलब है युद्ध के मैदान की लगभग पूरी और लगातार जानकारी होना, यानी दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रखना।

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यह कहना कि सिर्फ एयर पावर से युद्ध नहीं जीता जा सकता, यह कहना गलत है। यह बस पुराने युद्धों के अनुभव पर आधारित एक बात है। अब तक एयर पावर जिस तरह इस्तेमाल हुई है, वह उस समय की सोच, तकनीक और राजनीतिक सीमाओं पर निर्भर थी। लेकिन आज हालात बदल गए हैं। अब बेहतर आईएसआर (निगरानी और जानकारी जुटाने की क्षमता), सटीक हमले (मास प्रिसिजन), लगातार मौजूद रहने की क्षमता (पर्सिस्टेंस) और नई रणनीतियों के साथ एयर पावर की ताकत पहले से काफी अलग हो सकती है।

सैन्य इतिहास बताता है कि जब भी नई तकनीक आती है, तो उसे अपनाने में समय लगता है। अक्सर सेनाएं पुरानी सोच पर ही काम करती रहती हैं, जब तक कोई बड़ी असफलता उन्हें बदलाव के लिए मजबूर नहीं करती। आज अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव और बदलते युद्ध के हालात इस बात का संकेत देते हैं कि अब पुरानी रणनीतियों को फिर से देखने की जरूरत है।

आने वाले समय में एयर पावर का इस्तेमाल 1991 के गल्फ वॉर जैसा नहीं होगा। अब ऑपरेशन नेटवर्क के जरिए जुड़े हुए होंगे, जहां बड़े पैमाने पर तेजी से सटीक हमले किए जाएंगे। एयर पावर लगातार मौजूद रहकर दुश्मन को संभलने का मौका नहीं देगी। अब फोकस दुश्मन की पूरी सिस्टम को कमजोर करने पर होगा, न कि सिर्फ उसकी सेना को खत्म करने पर।

सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन नई सोच और तकनीकों को सही तरीके से लागू किया जाए और पुरानी सोच को पीछे छोड़ा जाए।

एयर पावर हमेशा भविष्य की ताकत मानी जाती रही है। अब सवाल यह है कि क्या आज की सेनाएं इस नए भविष्य को अपनाएंगी या फिर 35 साल पुरानी सोच में ही फंसी रहेंगी। (Air Power Future Warfare)

(डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में लिखे गए विचार और राय लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि वे रक्षा समाचार की राय को दिखाते हों)

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  • CAPSS EV VK 10 4 26 Image1

    विंग कमांडर विकास कल्याणी भारतीय वायुसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी हैं। उन्हें दिसंबर 2003 में फाइटर पायलट के रूप में कमीशन किया गया था। वे एक क्वालिफाइड फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर (QFI) हैं और उन्होंने डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज (DSSC), वेलिंगटन से स्टाफ कोर्स भी किया है।

    वे एक अनुभवी फाइटर पायलट रहे हैं और फिलहाल नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज (CAPSS) में सीनियर फेलो के तौर पर काम कर रहे हैं। इससे पहले वे इंडिया फाउंडेशन में विजिटिंग सीनियर रिसर्च फेलो रह चुके हैं और विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन (VIF) से भी जुड़े रहे हैं।

    उनकी विशेषज्ञता भारतीय महासागर क्षेत्र (IOR), एयर पावर रणनीति, इंडो-पैसिफिक में रक्षा और विदेश नीति, और समुद्री सुरक्षा जैसे विषयों में है। वे पुणे यूनिवर्सिटी से डिफेंस और स्ट्रैटेजिक स्टडीज में पीएचडी कर रहे हैं।

    विंग कमांडर कल्याणी ‘Vision SAGAR: IAF in the Indian Ocean’ किताब के लेखक भी हैं और समय-समय पर रक्षा, एयर पावर और रणनीतिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं।

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Wg Cdr Vikas Kalyani
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विंग कमांडर विकास कल्याणी भारतीय वायुसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी हैं। उन्हें दिसंबर 2003 में फाइटर पायलट के रूप में कमीशन किया गया था। वे एक क्वालिफाइड फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर (QFI) हैं और उन्होंने डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज (DSSC), वेलिंगटन से स्टाफ कोर्स भी किया है।

वे एक अनुभवी फाइटर पायलट रहे हैं और फिलहाल नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज (CAPSS) में सीनियर फेलो के तौर पर काम कर रहे हैं। इससे पहले वे इंडिया फाउंडेशन में विजिटिंग सीनियर रिसर्च फेलो रह चुके हैं और विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन (VIF) से भी जुड़े रहे हैं।

उनकी विशेषज्ञता भारतीय महासागर क्षेत्र (IOR), एयर पावर रणनीति, इंडो-पैसिफिक में रक्षा और विदेश नीति, और समुद्री सुरक्षा जैसे विषयों में है। वे पुणे यूनिवर्सिटी से डिफेंस और स्ट्रैटेजिक स्टडीज में पीएचडी कर रहे हैं।

विंग कमांडर कल्याणी ‘Vision SAGAR: IAF in the Indian Ocean’ किताब के लेखक भी हैं और समय-समय पर रक्षा, एयर पावर और रणनीतिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं।

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