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स्टेल्थ फ्रिगेट तारागिरी है एडवांस स्पॉटर ड्रोन से लैस, चलते जहाज पर भी कर सकता काम

यह ड्रोन जहाज के लिए “फोर्स मल्टीप्लायर” की तरह काम करता है। इसका मतलब है कि जहाज की ताकत और निगरानी क्षमता कई गुना बढ़ जाती है...

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📍नई दिल्ली | 18 Apr, 2026, 12:38 PM

INS Taragiri spotter drone integration: भारतीय नौसेना के नए स्टेल्थ फ्रिगेट आईएनएस तारागिरी के साथ अब एक स्वदेशी मैरिटाइम स्पॉटर ड्रोन भी जोड़ा गया है। इस इंटीग्रेशन को नौसेना की निगरानी और ऑपरेशन क्षमता में एक अहम बढ़त के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि यह शिप को डिस्ट्रिब्यूटेड आईएसआर नोड में बदल देता है, जिससे समुद्र और आसमान दोनों से एक साथ जानकारी जुटाना आसान हो जाता है।

आईएनएस तारागिरी भारतीय नौसेना का नया स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट है, जिसे 3 अप्रैल को विशाखापट्टनम में कमीशन किया गया था। यह प्रोजेक्ट 17ए के तहत बनने वाले नीलगिरी क्लास के सात फ्रिगेट्स की सीरीज का चौथा जहाज है। इस जहाज को मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड में तैयार किया गया है।

करीब 6,670 टन वजन वाला यह जहाज मल्टी-रोल कैपेबिलिटी के साथ आता है। इसमें एंटी-एयर, एंटी-सर्फेस और एंटी-सबमरीन ऑपरेशन करने की क्षमता है। स्टेल्थ डिजाइन की वजह से यह दुश्मन के रडार से आसानी से बच सकता है। इसके साथ ही इसमें ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल, एडवांस्ड रडार और सोनार सिस्टम जैसे आधुनिक उपकरण लगे हैं। (INS Taragiri spotter drone integration)

INS Taragiri spotter drone integration: क्या है मैरिटाइम स्पॉटर ड्रोन

आईएनएस तारागिरी के साथ जिस मैरिटाइम स्पॉटर ड्रोन को जोड़ा गया है, वह पुणे की कंपनी सागर डिफेंस इंजीनियरिंग ने बनाया है। यह एक मल्टी-कॉप्टर यूएवी है, जिसे खास तौर पर समुद्र में इस्तेमाल के लिए डिजाइन किया गया है।

इसका डिजाइन ऐसा बनाया गया है कि अगर इसमें कोई खराबी आती है, तो इसके पार्ट्स जल्दी बदले जा सकते हैं। इसमें कार्बन फाइबर और हल्की धातु का इस्तेमाल किया गया है, जिससे यह मजबूत के साथ हल्का भी रहता है।

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इस ड्रोन की सबसे खास बात यह है कि यह चलते हुए जहाज से भी उड़ान भर सकता है और उसी पर वापस उतर सकता है। आम तौर पर ड्रोन को स्थिर प्लेटफॉर्म की जरूरत होती है, लेकिन यह सिस्टम समुद्र में 20 नॉट्स की स्पीड पर चलते जहाज पर भी काम कर सकता है।

यह ड्रोन लगभग 72 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ सकता है। तेज हवा में भी काम करने के लिए इसे मजबूत बनाया गया है और यह लगभग 16 मीटर प्रति सेकंड की हवा को झेल सकता है, जो समुद्र के हालात के हिसाब से जरूरी है।

यह ड्रोन रियल टाइम वीडियो और तस्वीरें भेज सकता है, जिससे दूर तक निगरानी करना आसान हो जाता है। इसकी रेंज करीब 20 किलोमीटर तक है और यह एक बार में करीब एक घंटे तक उड़ान भर सकता है। यह स्पॉटर 90 से 120 मिनट तक काम कर सकते हैं।

भारतीय नौसेना ने इस ड्रोन की अहमियत को देखते हुए 2021 में करीब 30 यूनिट्स का ऑर्डर दिया था और बाद में 60 और ड्रोन मंगाए। इस तरह की तकनीक दुनिया में बहुत कम कंपनियों के पास है और सागर डिफेंस भी उनमें शामिल है। (INS Taragiri spotter drone integration)

कैसे काम करता है यह सिस्टम

आईएनएस तारागिरी और स्पॉटर ड्रोन का यह संयोजन एक तरह से समुद्र और आसमान के बीच तालमेल बनाता है। जहाज के अपने रडार और सेंसर की एक सीमा होती है, लेकिन ड्रोन उस सीमा से आगे जाकर निगरानी कर सकता है।

इसमें एडवांस कैमरे इलेक्ट्रो-ऑप्टिक कैमरा और थर्मल इमेजर लगे होते हैं। इनकी मदद से यह दिन और रात दोनों समय टारगेट को देख सकता है। यह लाइव वीडियो भेज सकता है, तस्वीरें ले सकता है और आसपास की पूरी स्थिति की जानकारी देता है। कुछ वेरिएंट में जहाजों की पहचान करने वाला सिस्टम भी लगाया गया है।

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ड्रोन से मिलने वाला यह डेटा सीधे जहाज तक पहुंचता है, जिससे आसपास की स्थिति की बेहतर समझ बनती है। इससे ऑपरेशन के दौरान फैसले लेने में मदद मिलती है और जहाज की पहुंच भी बढ़ जाती है।

यह ड्रोन पूरी तरह ऑटोमेटेड तरीके से काम कर सकता है। यानी यह खुद ही उड़ान भर सकता है, मिशन पूरा कर सकता है और वापस जहाज पर उतर सकता है। इसमें जियोफेंसिंग और फॉलो-मी जैसे फीचर्स भी होते हैं, जिससे इसे अलग-अलग कामों में इस्तेमाल करना आसान हो जाता है।

इसे जहाज के कंट्रोल सिस्टम से चलाया जा सकता है। इसके अलावा मार्कोस कमांडोज इसे हेंड हील्ड डिवाइस से भी ऑपरेट कर सकते हैं। जरूरत पड़ने पर इसका कंट्रोल एक जहाज से दूसरे जहाज को भी दिया जा सकता है। इसमें एंटी-जैमिंग तकनीक भी होती है, जिससे दुश्मन इसके सिग्नल को बाधित नहीं कर पाता।

ऑपरेशन में क्या फायदा

इस सिस्टम के जरिए समुद्र में लगातार निगरानी रखना आसान हो जाता है। जहाज को हर समय अपने आसपास की गतिविधियों की जानकारी मिलती रहती है। इससे संदिग्ध जहाजों, तस्करी या अन्य गतिविधियों पर नजर रखना संभव होता है।

ड्रोन का इस्तेमाल खास तौर पर ऐसे इलाकों में उपयोगी होता है, जहां समुद्री क्षेत्र बहुत बड़ा होता है और हर जगह एक साथ नजर रखना चुनौतीपूर्ण होता है। इस तरह का सिस्टम एक जहाज को ज्यादा इलाके को कवर करने में सक्षम बनाता है।

यह ड्रोन जहाज के लिए “फोर्स मल्टीप्लायर” की तरह काम करता है। इसका मतलब है कि जहाज की ताकत और निगरानी क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। जहाज के रडार की जो सीमा होती है, यह ड्रोन उससे आगे जाकर जानकारी देता है, जिससे लगातार निगरानी संभव होती है। (INS Taragiri spotter drone integration)

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पहले भी हुआ इस्तेमाल

सूत्रों के मुताबिक, इसी तरह के ड्रोन का इस्तेमाल मार्च 2024 में पहले भी नौसेना के ऑपरेशन में किया जा चुका है। सोमाली पाइरेट्स को रोकने के लिए एंटी-पाइरेसी मिशन के दौरान इन ड्रोन ने आईएनएस कोलकाता को रियल टाइम जानकारी देने में अहम भूमिका निभाई थी। इससे मार्कोस को स्थिति समझने और कार्रवाई करने में आसानी हुई थी। हालांकि पाइरेट्स ने ड्रोन पर फायरिंग भी की थी, बावजूद इसके ड्रोन काम करता रहा।

आईएनएस तारागिरी और स्पॉटर ड्रोन दोनों ही स्वदेशी तकनीक पर आधारित हैं। जहाज के निर्माण में बड़ी संख्या में भारतीय कंपनियों का योगदान रहा है, वहीं ड्रोन भी देश में ही डिजाइन और विकसित किया गया है। (INS Taragiri spotter drone integration)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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