📍नई दिल्ली/मुंबई | 15 Jun, 2026, 9:34 PM
Sea King Bravo Retirement: भारतीय नौसेना के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय गुपचुप ही समाप्त हो गया। लगभग 36 सालों तक समुद्र और आसमान में अपनी सेवाएं देने वाले सी किंग ब्रावो हेलीकॉप्टरों को आधिकारिक तौर पर सेवा से हटा दिया गया। मुंबई के कोलाबा स्थित आईएनएस शिक्रा (INAS 330) में इन हेलीकॉप्टरों ने अपनी अंतिम उड़ान भरी और इसके साथ ही नौसेना के सबसे भरोसेमंद समुद्री हेलीकॉप्टरों में से एक का सफर खत्म हो गया।
अंतिम उड़ान के दौरान दो सी किंग चार्ली हेलीकॉप्टरों ने सी किंग ब्रावो को एस्कॉर्ट किया। जब हेलीकॉप्टर अपनी आखिरी उड़ान पूरी कर वापस लौटा, तो फायर टेंडरों की ओर से उसे वॉटर कैनन सलामी दी गई। नौसेना में किसी विमान या जहाज की विदाई के समय यह सम्मान विशेष अवसरों पर दिया जाता है।
Sea King Bravo Retirement: 1989 में हुई थी सी किंग ब्रावो की एंट्री
सी किंग ब्रावो हेलीकॉप्टरों को भारतीय नौसेना ने 1989 और 1990 के बीच शामिल किया था। उस समय यह दुनिया के सबसे आधुनिक नौसैनिक हेलीकॉप्टरों में गिने जाते थे। इनका मुख्य काम दुश्मन के जहाजों और पनडुब्बियों का पता लगाना और जरूरत पड़ने पर उन पर हमला करना था।
एक समय में भारतीय नौसेना के पास लगभग 20 सी किंग ब्रावो हेलीकॉप्टर थे। बाद के वर्षों में कुछ हेलीकॉप्टर सेवा से बाहर होते गए और आखिर तक लगभग आठ हेलीकॉप्टर ही एक्टिव थे। 1990 के दशक और 2000 के शुरुआती सालों में इनमें मिड-लाइफ अपग्रेड भी किए गए, जिससे इसकी उम्र बढ़ी।
नौसेना में इन्हें अक्सर “फ्लाइंग फ्रिगेट” कहा जाता था। इसका कारण यह था कि यह हेलीकॉप्टर अकेले ही कई ऐसे काम कर सकता था जो सामान्य तौर पर एक युद्धपोत करता है। यह समुद्र की सतह पर मौजूद दुश्मन जहाजों को भी निशाना बना सकता था और समुद्र के नीचे छिपी पनडुब्बियों का भी शिकार कर सकता था। आज जो काम एमएच-60 रोमियो हेलीकॉप्टर करते हैं।

कैसे हुई भारतीय नौसेना में सी किंग की शुरुआत
भारतीय नौसेना ने पहली बार सी किंग हेलीकॉप्टर 1971 में खरीदे थे। उस समय पाकिस्तान की पनडुब्बियों से बढ़ते खतरे को देखते हुए नौसेना अपनी पनडुब्बी रोधी क्षमता मजबूत करना चाहती थी।
इसी उद्देश्य से सी किंग एमके-42 हेलीकॉप्टर खरीदे गए। इनके ऑपरेशन के लिए 17 अप्रैल 1971 को आईएनएएस-330 “हार्पून्स” स्क्वाड्रन की स्थापना की गई। कुछ महीनों बाद 26 जुलाई 1971 को पहले दो सी किंग हेलीकॉप्टर भारतीय विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत पर तैनात किए गए।
अप्रैल 1971 में सी किंग एमके-42 हेलीकॉप्टरों को शामिल किया गया। इसके बाद नीलगिरी क्लास फ्रिगेट्स पर सी किंग अल्फा वेरिएंट तैनात किए गए।
बाद में एमके-42 और एमके-42 अल्फा को सर्विस से हटा दिया गया। भारतीय नौसेना ने 1982 में अधिक एडवांस सी किंग एमके-42बी (ब्रावो) हेलीकॉप्टर खरीदने का फैसला किया। साल 1988 से 1992 के बीच नौसेना को लगभग 20 सी किंग एमके-42बी हेलीकॉप्टर मिले। इसके अलावा कुछ एमके-42सी वेरिएंट भी शामिल किए गए, जिनका उपयोग सैनिकों के परिवहन, विशेष अभियानों और असॉल्ट मिशनों के लिए किया जाता था। यही कारण था कि सी किंग परिवार कई दशकों तक भारतीय नौसेना की समुद्री शक्ति का अहम हिस्सा बना रहा। यही वजह है कि सी किंग ब्रावो को इस परिवार का आखिरी सक्रिय सदस्य माना जाता था।
बेहद एडवांस नेवल हेलीकॉप्टर
सी किंग एमके-42बी अपने समय का बेहद एडवांस नेवल हेलीकॉप्टर माना जाता था। इसमें दो शक्तिशाली रोल्स-रॉयस ग्नोम एच1400-1टी टर्बोशाफ्ट इंजन लगे थे, जिनकी मदद से यह लगभग 208 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ान भर सकता था। यही वजह थी कि भारतीय नौसेना इसे लंबे समय तक समुद्री अभियानों में इस्तेमाल करती रही।
इस हेलीकॉप्टर की सबसे बड़ी ताकत इसकी अत्याधुनिक निगरानी और पनडुब्बी खोजने वाली प्रणालियां थीं। इसमें एमईएल सुपर सर्चर रडार लगाया गया था, जो समुद्र की सतह पर मौजूद जहाजों और अन्य लक्ष्यों का पता लगाने में मदद करता था। वहीं अलकाटेल एचएस-12 डिपिंग सोनार समुद्र के भीतर छिपी पनडुब्बियों की खोज के लिए इस्तेमाल होता था। इसके अलावा इसमें इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स (ईएसएम) सिस्टम और एक्यूएस-902बी एकॉस्टिक प्रोसेसर भी लगे थे, जो दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने और पानी के भीतर की ध्वनियों का विश्लेषण करने में मदद करते थे।
आखिर इतनी खास क्यों थी यह मशीन?
जब सी किंग ब्रावो भारतीय नौसेना में शामिल हुआ था तब इसकी तकनीक अपने समय से काफी आगे मानी जाती थी। कई वर्षों तक इसे उड़ाने वाले रिटायर्ड कैप्टन संजय कर्वे बताते हैं कि उस दौर में इसकी एवियोनिक्स और मिशन सिस्टम बेहद एडवांस थे। हेलीकॉप्टर में ऐसे सेंसर लगे थे जो समुद्र के नीचे छिपी पनडुब्बियों का पता लगाने में मदद करते थे।
इसमें शक्तिशाली रडार, डिपिंग सोनार और इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस सिस्टम मौजूद थे। डिपिंग सोनार एक ऐसा उपकरण होता है जिसे हेलीकॉप्टर समुद्र में नीचे उतारता है और उससे पानी के भीतर मौजूद गतिविधियों की जानकारी प्राप्त करता है।
यही क्षमता इसे भारतीय नौसेना के लिए बेहद महत्वपूर्ण बनाती थी।
दुश्मन पनडुब्बियों के लिए बड़ा खतरा
सी किंग ब्रावो का सबसे महत्वपूर्ण काम एंटी-सबमरीन वारफेयर यानी पनडुब्बी रोधी अभियान था। समुद्र में दुश्मन की पनडुब्बियां अक्सर सतह के नीचे छिपकर चलती हैं। उन्हें ढूंढना किसी भी नौसेना के लिए सबसे कठिन कामों में से एक माना जाता है।
सी किंग ब्रावो अपने सोनार और सेंसरों की मदद से पनडुब्बियों का पता लगाता था। इसके बाद जरूरत पड़ने पर टॉरपीडो छोड़कर हमला भी कर सकता था। पनडुब्बियों को निशाना बनाने के लिए सी किंग ब्रावो व्हाइटहेड ए244एस या रूसी एपीआर-2 टॉरपीडो, डेप्थ चार्ज और समुद्री माइंस ले जा सकता था।
भारतीय नौसेना के अधिकारियों के अनुसार हिंद महासागर क्षेत्र में कई दशकों तक यह हेलीकॉप्टर पनडुब्बी रोधी अभियानों का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।

दुश्मन जहाजों पर भी कर सकता था हमला
सी किंग ब्रावो की दूसरी बड़ी खासियत उसकी एंटी-शिप क्षमता थी। इसमें दो सी ईगल एंटी-शिप मिसाइलें लगाई जाती थीं। ये मिसाइलें समुद्र में मौजूद दुश्मन जहाजों को काफी दूरी से निशाना बनाने में सक्षम थीं। यह हेलीकॉप्टर केवल पनडुब्बियों तक सीमित नहीं था। जरूरत पड़ने पर यह सतह पर मौजूद दुश्मन युद्धपोतों के खिलाफ भी कार्रवाई कर सकता था। इसी वजह से इसे “फ्लाइंग फ्रिगेट” कहा जाता था। इसके अलावा आत्मरक्षा और नजदीकी अभियानों के लिए इसमें मशीन गन और अन्य हल्के हथियार भी लगाए जा सकते थे।
कई युद्धपोतों और एयरक्राफ्ट कैरियर से किया ऑपरेशन
सी किंग ब्रावो हेलीकॉप्टरों की भारतीय नौसेना के कई प्रमुख युद्धपोतों पर तैनाती भी हुई। इनमें लीएंडर क्लास, गोदावरी क्लास और दिल्ली क्लास युद्धपोत शामिल रहे। इसके अलावा ये हेलीकॉप्टर एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत और आईएनएस विराट से भी ऑपरेट किए जाते रहे।
समुद्र में लंबे समय तक तैनाती के दौरान ये हेलीकॉप्टर नौसेना की आंख और कान की भूमिका निभाते थे। जहाज से काफी दूर जाकर वे खतरे की पहचान कर सकते थे और युद्धपोत को समय रहते चेतावनी दे सकते थे।
बचाई हजारों जानें
सी किंग ब्रावो का योगदान केवल युद्ध अभियानों तक सीमित नहीं रहा। इन हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल खोज और बचाव अभियानों में भी बड़े पैमाने पर किया गया। समुद्र में फंसे नाविकों को बचाने, दुर्घटनाओं में राहत पहुंचाने और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सहायता सामग्री पहुंचाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
कई मौकों पर खराब मौसम और ऊंची लहरों के बीच भी इन हेलीकॉप्टरों ने सफल मिशन पूरे किए। नौसेना के पूर्व अधिकारियों का कहना है कि अनेक समुद्री बचाव अभियानों में सी किंग ने लोगों की जान बचाई।
रिटायर्ड कैप्टन संजय कर्वे ने कहा कि सी किंग उनके जीवन का अहम हिस्सा रहा है। उन्होंने बताया कि इस हेलीकॉप्टर के साथ उन्होंने खुशियों और दुख दोनों के पल देखे।
उनके अनुसार जब कोई मिशन सफल होता था तो पूरी टीम खुश होती थी, लेकिन जब किसी साथी को खोना पड़ता था तो दुख भी उतना ही गहरा होता था।
उन्होंने कहा कि आज खुशी इस बात की है कि उन्हें इस शानदार प्लेटफॉर्म के साथ काम करने का मौका मिला, लेकिन दुख इस बात का है कि अब यह हेलीकॉप्टर भारतीय नौसेना के रंगों में उड़ता दिखाई नहीं देगा।
चीन और पाकिस्तान के बढ़ते समुद्री खतरे के बीच बड़ा बदलाव
सी किंग ब्रावो की विदाई ऐसे समय में हुई है जब हिंद महासागर क्षेत्र में पनडुब्बी गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं।
चीन के पास दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना मानी जाती है। उसके बेड़े में 60 से ज्यादा पनडुब्बियां शामिल हैं। इनमें परमाणु ऊर्जा से चलने वाली अटैक पनडुब्बियां भी हैं जो लंबे समय तक समुद्र में रह सकती हैं।
दूसरी ओर पाकिस्तान भी चीन की मदद से नई हैंगोर क्लास पनडुब्बियां शामिल कर रहा है। इन पनडुब्बियों में एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन तकनीक है, जिससे वे लंबे समय तक पानी के नीचे रह सकती हैं।
ऐसे माहौल में भारतीय नौसेना को अधिक आधुनिक पनडुब्बी रोधी हेलीकॉप्टरों की आवश्यकता महसूस हो रही थी।
अब कौन लेगा सी किंग की जगह?
सी किंग ब्रावो की जगह धीरे-धीरे अमेरिकी एमएच-60आर रोमियो हेलीकॉप्टर ले रहे हैं। भारत ने अमेरिका से 24 एमएच-60आर रोमियो हेलीकॉप्टर खरीदने का समझौता किया था। इनमें से 21 हेलीकॉप्टर भारतीय नौसेना को मिल चुके हैं।
इनमें से 15 सक्रिय सेवा में हैं जबकि कुछ ट्रेनिंग और कुछ को भारत के लिए खास बने सिस्टम्स को जोड़ने के लिए तैयार किया जा रहा है।
रोमियो हेलीकॉप्टरों को सी किंग की तुलना में एक पीढ़ी आगे की तकनीक माना जाता है। इनमें अत्याधुनिक मल्टी-मोड रडार, लो-फ्रीक्वेंसी डिपिंग सोनार, सोनोबॉय सिस्टम और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर लगे हैं, जो समुद्र की सतह और उसके नीचे मौजूद खतरों का पता लगाने में सक्षम हैं। दुश्मन की पनडुब्बियों को नष्ट करने के लिए इनमें एमके-54 टॉरपीडो और हेलफायर मिसाइलें भी लगाई गई हैं।
नौसेना को अभी भी हेलीकॉप्टरों की जरूरत
हालांकि रोमियो हेलीकॉप्टरों की एंट्री शुरू हो चुकी है, लेकिन भारतीय नौसेना की जरूरत इससे कहीं ज्यादा है।
नौसेना को 100 से अधिक मल्टी-रोल और पनडुब्बी रोधी हेलीकॉप्टरों की आवश्यकता बताई जाती है। लंबे समय से 123 नेवल मल्टी-रोल हेलीकॉप्टर खरीदने की योजना पर काम चल रहा है, लेकिन अभी तक अंतिम अनुबंध नहीं हुआ है।
इसके अलावा, स्वदेशी बहु-भूमिका हेलीकॉप्टरों (UH-M) की खरीद की योजनाएं भी चल रही हैं। सी किंग की जगह पर आने वाले नए प्लेटफॉर्म्स में एडवांस एवियोनिक्स, बेहतर इंजन दक्षता, कम रखरखाव लागत और ड्रोन इंटीग्रेशन जैसी खूबियां होंगी।
नौसेना के अधिकारियों का मानना है कि रोमियो हेलीकॉप्टर पुराने सी किंग और कामोव-28 बेड़े की तुलना में तकनीकी रूप से एक नई पीढ़ी का प्लेटफॉर्म हैं। हालांकि सी किंग और कामोव हेलीकॉप्टरों को समय-समय पर अपग्रेड किया गया था, लेकिन कई दशक पुराने होने के कारण उनके रखरखाव और उपलब्धता से जुड़ी चुनौतियां बढ़ रही थीं।



