📍नई दिल्ली/चंडीगढ़ | 15 Jun, 2026, 12:01 PM
Army Hospital Voyeurism Case: भारतीय सेना के एक पूर्व हवलदार से जुड़ा एक मामला इन दिनों चर्चा में है। यह मामला शुरू में कथित जासूसी की जांच से जुड़ा था, लेकिन जांच के दौरान जो सामने आया उसने सैन्य अधिकारियों को भी हैरान कर दिया। सेना की खुफिया एजेंसी ने जब एक हवलदार का मोबाइल फोन जांच के लिए जब्त किया तो उसमें महिलाओं के निजी पलों के वीडियो और तस्वीरें मिलीं। इसके बाद मामला जासूसी से हटकर महिलाओं की निजता के उल्लंघन से जुड़ा गंभीर अपराध बन गया।
इस मामले में सेना की अदालत ने पूर्व हवलदार को दोषी मानते हुए एक साल की कठोर कैद, सेवा से बर्खास्तगी और रैंक में कमी की सजा सुनाई थी। हालांकि अब आर्मेड फोर्सेस ट्रिब्यूनल (एएफटी) ने उनकी अपील लंबित रहने तक उन्हें जमानत दे दी है।
Army Hospital Voyeurism Case: जासूसी की जांच के दौरान सामने आया मामला
मामला पूर्व हवलदार मोरे संदीप सदाशिव से जुड़ा है, जो साल 2020 में 474 इंजीनियर ब्रिगेड मुख्यालय में तैनात थे। जून 2022 में वह त्वचा संबंधी बीमारी के इलाज के लिए पश्चिमी कमान के कमांड अस्पताल, चंडीमंदिर पहुंचे थे।
डॉक्टरों ने जांच के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कर लिया। इलाज के दौरान वह अस्पताल के एक वार्ड में रह रहे थे। इसी बीच जुलाई 2022 में सैन्य खुफिया अधिकारियों को उन पर कुछ संवेदनशील सूचनाओं से जुड़े संदेह हुए। जांच के दौरान उनका मोबाइल फोन जब्त कर लिया गया।
जब अधिकारियों ने मोबाइल फोन की जांच की तो जासूसी से जुड़ा कोई सबूत नहीं मिला। लेकिन फोन में ऐसी सामग्री मिली जिससे अधिकारी भी हैरान रह गए। (Army Hospital Voyeurism Case)
मोबाइल में मिले महिलाओं के निजी वीडियो
जांच के दौरान मोबाइल फोन से 28 वीडियो और तस्वीरें बरामद हुईं। सेना के अनुसार ये वीडियो और तस्वीरें अस्पताल के महिला वॉशरूम में रिकॉर्ड की गई थीं।
आरोप था कि जुलाई 2022 के दौरान अस्पताल में भर्ती रहने के समय उन्होंने महिलाओं की जानकारी और सहमति के बिना उनके निजी पलों की रिकॉर्डिंग की थी। जिस महिला वॉशरूम की बात सामने आई, वह उस वार्ड के सामने स्थित था जहां वह भर्ती थे।
मामले को बेहद गंभीर माना गया क्योंकि यह घटना एक सैन्य अस्पताल के भीतर हुई थी। ऐसे अस्पतालों में सैनिकों के अलावा उनके परिवारों का भी इलाज होता है। इसलिए महिलाओं की निजता से जुड़ा यह मामला सुरक्षा और नैतिकता दोनों दृष्टि से संवेदनशील माना गया।
सेना ने दर्ज किया मामला
मोबाइल से मिले वीडियो और तस्वीरों के आधार पर सेना ने उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 354सी के तहत कार्रवाई शुरू की।
यह धारा किसी महिला की सहमति के बिना उसके निजी पलों को देखना, रिकॉर्ड करना या उसकी तस्वीर लेना अपराध मानती है। कानून में इसे वॉयरिज्म कहा जाता है।
सेना के अधिकारियों का कहना था कि किसी भी महिला की निजता का उल्लंघन अस्वीकार्य है और सेना ऐसे मामलों में सख्त रुख अपनाती है। (Army Hospital Voyeurism Case)
कोर्ट मार्शल में चला मुकदमा
मामले की सुनवाई जिला कोर्ट मार्शल में की गई। सुनवाई के दौरान मोबाइल फोन से बरामद सामग्री को महत्वपूर्ण साक्ष्य माना गया।
सैन्य अदालत ने आरोपों को गंभीर मानते हुए पूर्व हवलदार को दोषी करार दिया। अदालत ने उन्हें एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई। इसके साथ ही उन्हें सेना की सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
सजा के तहत उनकी रैंक में भी कमी की गई। सेना में बर्खास्तगी सबसे कड़ी प्रशासनिक सजाओं में गिनी जाती है क्योंकि इससे सेवा संबंधी कई लाभ प्रभावित होते हैं।
मार्च 2026 में इस सजा को औपचारिक रूप से लागू कर दिया गया। (Army Hospital Voyeurism Case)
एएफटी में पहुंचा मामला
सजा मिलने के बाद पूर्व हवलदार ने आर्मेड फोर्सेस ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया। उनकी ओर से दलील दी गई कि उन्होंने पहले ही नौ महीने से अधिक समय हिरासत में बिताया है। साथ ही अपील पर अंतिम फैसला आने में काफी समय लग सकता है।
मामले की सुनवाई चंडीगढ़ स्थित एएफटी पीठ में हुई। न्यायमूर्ति सुधीर मित्तल और लेफ्टिनेंट जनरल रवेंद्र पाल सिंह की पीठ ने मामले पर विचार किया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि अपील पर तुरंत फैसला होने की संभावना नहीं है और आरोपी पहले ही सजा का बड़ा हिस्सा काट चुका है।
एएफटी ने स्पष्ट किया कि जमानत दिए जाने का मतलब दोषमुक्त करना नहीं है। न्यायाधिकरण ने कहा कि अपील लंबित रहने तक शेष सजा को स्थगित किया जा सकता है। इसी आधार पर पूर्व हवलदार को जमानत देने का आदेश दिया गया।
अदालत ने उन्हें आवश्यक जमानती बांड और शर्तें पूरी करने के बाद रिहा करने का निर्देश दिया। जानकारों का कहना है कि ऐसे मामलों में यदि सजा तीन साल से कम हो और अपील का निपटारा जल्द होने की संभावना न हो, तो अदालतें कई बार सजा पर अस्थायी रोक लगा देती हैं।
मामले की सुनवाई के दौरान एक अन्य कानूनी मुद्दा भी चर्चा में रहा। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि कोर्ट मार्शल के फैसले को औपचारिक रूप से मंजूरी मिलने में काफी समय लगा।
सेना अधिनियम के तहत कोर्ट मार्शल का फैसला तब तक पूरी तरह प्रभावी नहीं माना जाता जब तक उसे उच्च सैन्य अधिकारियों की स्वीकृति नहीं मिल जाती।
बचाव पक्ष का कहना था कि इस देरी के कारण अपील का अधिकार भी प्रभावित हुआ। एएफटी ने इस पहलू पर भी ध्यान दिया और कहा कि किसी व्यक्ति को उसका वैधानिक अधिकार नहीं छीना जा सकता। (Army Hospital Voyeurism Case)
सेना में ऐसे मामलों को क्यों माना जाता है गंभीर?
सेना में अनुशासन सबसे महत्वपूर्ण आधार होता है। सैनिकों और अधिकारियों से न केवल प्रोफेशनल कंडक्ट बल्कि उच्च नैतिक मानकों की भी अपेक्षा की जाती है।
विशेष रूप से अस्पताल, प्रशिक्षण संस्थान और पारिवारिक आवासीय क्षेत्रों में महिलाओं की निजता से जुड़े मामलों को बेहद गंभीरता से लिया जाता है। यही वजह है कि इस मामले में केवल आपराधिक सजा ही नहीं दी गई, बल्कि सेवा से बर्खास्तगी जैसी कड़ी कार्रवाई भी की गई।
सेना के भीतर यह स्पष्ट नीति रही है कि महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा से जुड़े मामलों में किसी तरह की ढिलाई नहीं बरती जाएगी।
बता दें कि चंडीमंदिर स्थित कमांड अस्पताल पश्चिमी कमान का प्रमुख सैन्य अस्पताल माना जाता है। यहां बड़ी संख्या में सैनिक, पूर्व सैनिक और उनके परिवार इलाज के लिए आते हैं। अस्पताल में अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं और यह सेना की प्रमुख स्वास्थ्य संस्थाओं में गिना जाता है। (Army Hospital Voyeurism Case)


