📍नई दिल्ली/जोरहाट | 13 Jun, 2026, 12:27 PM
AN-32 Crash in Jorhat: असम के जोरहाट एयर फोर्स स्टेशन पर भारतीय वायुसेना का एक एएन-32 ट्रांसपोर्ट विमान लैंडिंग के दौरान हादसे का शिकार हो गया। शुरुआती जानकारी के अनुसार विमान रनवे पर उतरते समय क्रैश लैंडिंग का शिकार हुआ, जिसके बाद उसमें आग लग गई। विमान में विस्फोट जैसी स्थिति की भी बात कही गई है। हादसे के तुरंत बाद बचाव और जांच टीमें मौके पर पहुंच गईं। घटना की जांच शुरू कर दी गई है और वायुसेना की ओर से विस्तृत आधिकारिक रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है।
यह हादसा ऐसे समय हुआ है जब एएन-32 अब भी भारतीय वायुसेना की परिवहन क्षमता की रीढ़ माना जाता है। लगभग चार दशक पहले सेवा में शामिल हुआ यह विमान आज भी देश के सबसे कठिन और दुर्गम इलाकों में सैनिकों, हथियारों, राशन और अन्य जरूरी सामग्री पहुंचाने का काम कर रहा है।
AN-32 Crash in Jorhat: जुलाई 1984 में शामिल हुआ था एएन-32?
एएन-32 सोवियत संघ में विकसित एक ट्विन इंजन टर्बोप्रॉप मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट है। इसे विशेष रूप से भारतीय वायुसेना की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया था। दरअसल भारत को ऐसा विमान चाहिए था जो ऊंचे पहाड़ी इलाकों, गर्म मौसम और छोटे रनवे पर भी आसानी से उड़ान भर सके।
एएन-32 को पुराने एएन-26 विमान के आधार पर तैयार किया गया, लेकिन इसमें ज्यादा ताकतवर इंजन लगाए गए। यही वजह है कि यह लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, सियाचिन और उत्तर-पूर्व के कई दुर्गम इलाकों में सफलतापूर्वक ऑपरेशन कर सकता है।
भारतीय वायुसेना में यह विमान जुलाई 1984 में शामिल किया गया था। इसके बाद 1984 से 1991 के बीच बड़ी संख्या में विमान भारत पहुंचे। कुल मिलाकर भारत ने करीब 125 एएन-32 विमान खरीदे थे।

भारतीय वायुसेना का सबसे भरोसेमंद ट्रांसपोर्ट विमान
एएन-32 को अक्सर भारतीय वायुसेना का “वर्कहॉर्स” कहा जाता है। इसका कारण इसकी बहुमुखी क्षमता है। यह विमान सैनिकों की तैनाती, रसद आपूर्ति, हवाई परिवहन, राहत सामग्री पहुंचाने और आपदा प्रबंधन अभियानों में लगातार इस्तेमाल किया जाता रहा है।
सियाचिन ग्लेशियर से लेकर अरुणाचल प्रदेश की अग्रिम चौकियों तक हजारों उड़ानें इसी विमान ने भरी हैं। कई ऐसे हवाई पट्टियां हैं जहां बड़े विमान नहीं उतर सकते, लेकिन एएन-32 वहां आसानी से ऑपरेट कर सकता है।
वायुसेना के अधिकारियों का मानना रहा है कि ऊंचाई वाले इलाकों में इसकी उपयोगिता आज भी बेहद महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि इतने पुराने होने के बावजूद इसे पूरी तरह सेवा से बाहर नहीं किया गया है।
🚨 Breaking: IAF AN-32 Aircraft Involved in Accident at Jorhat Air Force Station
An Indian Air Force AN-32 transport aircraft was involved in an accident at Jorhat Air Force Station, Assam, during landing on 13 June 2026.
According to initial information, the aircraft reportedly… pic.twitter.com/9AkFDW8vrw— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) June 13, 2026
सुरक्षित लैंडिंग की प्रक्रिया में था विमान
जोरहाट एयर फोर्स स्टेशन उत्तर-पूर्व भारत में वायुसेना का एक महत्वपूर्ण ठिकाना है। यहां से नियमित रूप से परिवहन और रसद मिशन ऑपरेट किए जाते हैं।
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार विमान सुरक्षित लैंडिंग की प्रक्रिया में था, लेकिन रनवे पर उतरते समय किसी तकनीकी या ऑपरेशनल समस्या के कारण दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इसके बाद विमान में आग लग गई। हालांकि हादसे की वास्तविक वजह जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
यह घटना 2019 में अरुणाचल प्रदेश में हुए एएन-32 हादसे से अलग है। उस दुर्घटना में विमान उड़ान के दौरान लापता हो गया था और बाद में उसका मलबा मिला था। वर्तमान घटना एयरबेस पर लैंडिंग के दौरान हुई है।
कैसा रहा है एएन-32 का सुरक्षा रिकॉर्ड
एएन-32 लंबे समय से कठिन परिस्थितियों में उड़ान भरता रहा है। यही कारण है कि इसके परिचालन इतिहास में कई दुर्घटनाएं भी दर्ज हैं।
1986 में एक विमान अरब सागर के ऊपर लापता हो गया था। उसी साल जम्मू क्षेत्र में भी एक दुर्घटना हुई। 1990 में केरल के पर्वतीय क्षेत्र में एक विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ। 1999 में दिल्ली के पास हुई दुर्घटना सबसे गंभीर घटनाओं में गिनी जाती है, जिसमें कई लोगों की जान गई थी।
2009 में अरुणाचल प्रदेश के मेचुका क्षेत्र में एक एएन-32 दुर्घटनाग्रस्त हुआ। 2016 में बंगाल की खाड़ी के ऊपर उड़ान भर रहा विमान लापता हो गया था। 2019 में फिर अरुणाचल प्रदेश में एक विमान हादसे का शिकार हुआ था। उस हादसे में 13 लोगों की मौत हुई थी।
हालांकि सूत्रों का कहना है कि इन घटनाओं को केवल विमान की डिजाइन से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। एएन-32 का अधिकांश ऑपरेशन बेहद चुनौतीपूर्ण वातावरण में होता है, जहां मौसम, ऊंचाई और भूभाग स्वयं बड़े जोखिम पैदा करते हैं।

क्यों जरूरत पड़ी आधुनिकीकरण की?
सालों तक लगातार सेवा देने के बाद वायुसेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन विमानों को आधुनिक बनाए रखना था। इसी जरूरत को देखते हुए भारत ने 2009 में बड़े आधुनिकीकरण कार्यक्रम की शुरुआत की।
इसके लिए यूक्रेन की कंपनी स्पेट्सटेक्नोएक्सपोर्ट के साथ लगभग 400 मिलियन डॉलर का समझौता किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य 105 विमानों की तकनीकी उम्र बढ़ाना और उनमें आधुनिक सिस्टम्स लगाना था।
वायुसेना का फोकस केवल विमान को उड़ाने योग्य बनाए रखना नहीं था, बल्कि उसकी सुरक्षा, विश्वसनीयता और ऑपरेशनल क्षमता को भी बढ़ाना था।
अपग्रेड में हुए क्या-क्या बदलाव?
आधुनिकीकरण कार्यक्रम के तहत विमानों में आधुनिक एवियोनिक्स लगाए गए। कॉकपिट को पहले की तुलना में ज्यादा डिजिटल बनाया गया। नेविगेशन और कम्यूनिकेशन सिस्टम्स को बेहतर किया गया ताकि पायलटों को अधिक सटीक जानकारी मिल सके।
विमान में नया ऑक्सीजन सिस्टम लगाया गया। चालक दल के लिए बेहतर सीटें उपलब्ध कराई गईं। इंजन और एयरफ्रेम की तकनीकी उम्र बढ़ाने पर भी काम किया गया।
इन सुधारों के बाद विमान का ऑपरेशन पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाने की कोशिश की गई।
यूक्रेन और भारत में हुआ अपग्रेड
इस परियोजना के तहत लगभग 45 विमानों का आधुनिकीकरण यूक्रेन में किया गया। बाकी विमानों पर भारत में काम शुरू किया गया।
कानपुर स्थित 1 बेस रिपेयर डिपो और 3 बीआरडी चंडीगढ़ समेत अन्य सैन्य रखरखाव प्रतिष्ठानों को इस परियोजना में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई। बाद में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए भारतीय उद्योगों की भागीदारी भी बढ़ाई गई। यूक्रेन से लगभग 35 अपग्रेडेड एएन-32आरई विमान डिलीवर किए गए।
रूस-यूक्रेन तनाव के कारण परियोजना को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी सहायता में बाधाएं आईं। इसके बावजूद भारतीय वायुसेना ने घरेलू स्तर पर ओवरहॉल और लाइफ एक्सटेंशन कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। 2019 में भारत और यूक्रेन ने फिर से समझौता किया और रूसी मूल के पुर्जों के विकल्प तैयार किए गए।
2040 तक सेवा में रखने की योजना
वायुसेना का मानना है कि एएन-32 अभी भी कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा सकता है। इसी कारण कई विमानों की सेवा अवधि बढ़ाने की योजना पर काम किया गया।
अपग्रेड किए गए विमानों कम से कम 60 विमानों को 2040 तक सेवा में बनाए रखने की योजना तैयार की गई है। इसके लिए नियमित ओवरहॉल, निरीक्षण और तकनीकी सुधार जारी हैं।
हालांकि समानांतर रूप से नए परिवहन विमानों को भी शामिल किया जा रहा है ताकि भविष्य में ऑपरेशनल बोझ कम किया जा सके।
सी-295 से कैसे अलग है एएन-32?
पिछले कुछ वर्षों में भारतीय वायुसेना ने सी-295 विमान को शामिल करना शुरू किया है। यह आधुनिक तकनीक वाला नया ट्रांसपोर्ट विमान है। सी-295 को मुख्य रूप से एवरो एचएस-748 को रिप्लेस करने के लिए खरीदा गया था।
भारत ने स्पेन से कुल 56 सी-295 विमान खरीदे हैं। इनमें से 16 स्पेन से डिलीवर किए गए हैं। बाकी 40 विमान टाटा एडवांस्ड सिस्टम वडोदरा में में बना रही है। जिसमें से पहले जहाज ने हाल ही में पहली उड़ान भी भरी है। भारतीय निर्मित विमानों की डिलीवरी 2026 के अंत से शुरू होने की उम्मीद है। सभी 40 भारतीय विमान अगस्त 2031 तक डिलीवर होने हैं।
सी-295 अधिक वजन उठा सकता है, ज्यादा सैनिकों को ले जा सकता है और आधुनिक डिजिटल कॉकपिट से लैस है। इसका रखरखाव भी अपेक्षाकृत आसान माना जाता है। वहीं यह मल्टीरोल भी है, यह सिर्फ ट्रांसपोर्ट नहीं, बल्कि समुद्री निगरानी, मेडिकल इवैक्यूएशन आदि भी कर सकता है।
इसके बावजूद एएन-32 की एक बड़ी ताकत उसकी ऊंचाई वाले इलाकों में काम करने की क्षमता है। लद्दाख और उत्तर-पूर्व के कई क्षेत्रों में इसका प्रदर्शन अब भी प्रभावशाली माना जाता है।
यही कारण है कि दोनों विमानों को फिलहाल अलग-अलग भूमिकाओं में इस्तेमाल किया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि एएन-32 को तब तक चलाया जाएगा जब तक नया मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट (MTA) या सी-295 पूरी तरह नहीं आ जाता।
एएन-32 और सी-295 में क्या है अंतर
भारतीय वायुसेना का एएन-32 लगभग 40 साल पुराना विमान है, जबकि सी-295 नई पीढ़ी का आधुनिक ट्रांसपोर्ट विमान है। दोनों का काम सैनिकों और सामान को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना है, लेकिन उनकी क्षमताओं में काफी अंतर है।
सामान ले जाने की क्षमता की बात करें तो सी-295 ज्यादा ताकतवर है। एएन-32 एक बार में लगभग 7 टन तक सामान ले जा सकता है, जबकि सी-295 करीब 9 टन से ज्यादा भार उठा सकता है। इसी तरह सैनिकों के परिवहन में भी सी-295 आगे है। एएन-32 जहां 42 से 50 सैनिकों को ले जा सकता है, वहीं सी-295 करीब 70 सैनिकों को एक साथ ले जाने में सक्षम है।
रेंज यानी एक बार ईंधन भरने के बाद उड़ान की दूरी में भी सी-295 बेहतर है। एएन-32 लगभग 2,500 किलोमीटर तक उड़ सकता है, जबकि सी-2953,700 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय कर सकता है।
हालांकि गति के मामले में एएन-32 थोड़ा आगे है। इसकी अधिकतम गति लगभग 530 किलोमीटर प्रति घंटा है, जबकि सी-295 की गति लगभग 509 किलोमीटर प्रति घंटा है। लेकिन यह अंतर बहुत ज्यादा नहीं है।
जहां एएन-32 आज भी अपनी खास पहचान बनाए हुए है, वह है ऊंचाई वाले इलाकों और छोटे रनवे पर ऑपरेशन। लद्दाख, सियाचिन और उत्तर-पूर्व के दुर्गम क्षेत्रों में एएन-32 का प्रदर्शन बेहद अच्छा माना जाता है। इसे खास तौर पर “हॉट एंड हाई” परिस्थितियों के लिए डिजाइन किया गया था। यही वजह है कि भारतीय वायुसेना अब भी इस पर भरोसा करती है।
नए मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट की तलाश
भारतीय वायुसेना लंबे समय से ऐसे नए ट्रासंपोर्ट एयरक्राफ्ट की तलाश कर रही है जो एएन-32 और हेवी ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट के बीच की जरूरतों को पूरा कर सके।
इसी उद्देश्य से मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट कार्यक्रम पर काम चल रहा है। इस कार्यक्रम के तहत 18 से 30 टन तक भार उठाने वाले आधुनिक विमान खरीदने की योजना बनाई गई है।
इससे भविष्य में परिवहन क्षमता को और मजबूत करने में मदद मिलेगी। हालांकि फिलहाल एएन-32 वायुसेना की ऑपरेशनल जरूरतों का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।
उत्तर-पूर्व और हिमालय में एएन-32 की भूमिका
भारतीय वायुसेना के लिए उत्तर-पूर्व और हिमालयी क्षेत्र हमेशा चुनौतीपूर्ण रहे हैं। यहां मौसम तेजी से बदलता है, रनवे छोटे होते हैं और कई बार विजिबिलिटी बेहद कम होती है।
ऐसे वातावरण में एएन-32 ने वर्षों तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सैनिकों की तैनाती, गोला-बारूद की आपूर्ति, राहत सामग्री पहुंचाने और आपदा के समय सहायता पहुंचाने जैसे मिशनों में इस विमान का खूब इस्तेमाल हुआ है।



