📍नई दिल्ली | 2 Jul, 2026, 8:43 PM
NORA-50 Stealth Antenna System: भारत और जापान ने डिफेंस टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में पहली बार को-डेवलपमेंट और को-प्रोडक्शन की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है। गुरुवार को भारत-जापान शिखर सम्मेलन के दौरान यूनीकॉर्न (UNIted COnbined Radio aNtenna) प्रोजेक्ट को दोनों देशों के पहले डिफेंस को-डेवलपमेंट प्रोग्राम के रूप में आगे बढ़ाने पर सहमति बनी। इस परियोजना के तहत जापान की अत्याधुनिक NORA-50 स्टेल्थ एंटीना मास्ट तकनीक को भारत में डेवलप और निर्मित किया जाएगा। वहीं, भारत की तरफ से इस परियोजना में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) प्रमुख भूमिका निभाएगी।
NORA-50 Stealth Antenna System: क्या है NORA-50 और क्यों है खास?
सूत्रों के मुताबिक NORA-50 वास्तव में यूनीकॉर्न (UNIted COnbined Radio aNtenna) सिस्टम का जापानी नाम है। यह एक इंटीग्रेटेड स्टेल्थ एंटीना मास्ट है, जिसे जापान ने अपनी नौसेना के आधुनिक युद्धपोतों के लिए डेवलप किया है।
पारंपरिक युद्धपोतों में कम्युनिकेशन, रडार, डेटा लिंक और विभिन्न सेंसरों के लिए अलग-अलग एंटीना लगाए जाते हैं। इससे जहाज का ऊपरी हिस्सा काफी जटिल दिखाई देता है और उसका रडार क्रॉस सेक्शन (RCS) बढ़ जाता है। रडार क्रॉस सेक्शन जितना अधिक होगा, दुश्मन के रडार के लिए जहाज का पता लगाना उतना आसान होगा।
NORA-50 इस पूरे सिस्टम को बदल देता है। इसमें सभी प्रमुख एंटीना और सेंसरों को एक ही मास्ट के भीतर इंटीग्रेट कर दिया गया है। इससे जहाज का बाहरी हिस्सा साफ-सुथरी रहता है और उसकी स्टेल्थ क्षमता काफी बढ़ जाती है।
भारत और जापान के बीच पहला प्रोजेक्ट
इस प्रोजेक्ट का मेमोरेंडम ऑफ इम्प्लीमेंटेशन नवंबर 2024 में टोक्यो में हस्ताक्षरित किया गया था। अब भारत-जापान शिखर सम्मेलन में इसे दोनों देशों के पहले संयुक्त रक्षा विकास कार्यक्रम के रूप में औपचारिक रूप से आगे बढ़ाया गया है।
भारतीय पक्ष की ओर से भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) इस परियोजना में प्रमुख भूमिका निभाएगी। कंपनी भारत में इस प्रणाली का विकास और उत्पादन करेगी। जापानी पक्ष अपनी तकनीकी विशेषज्ञता और डिजाइन उपलब्ध कराएगा। सूत्रों के मुताबिक इससे भारत में उच्च स्तरीय नौसैनिक इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण क्षमता भी विकसित होगी।
जापान की तीन बड़ी कंपनियों ने डेवलप की तकनीक
NORA-50 सिस्टम को जापान की एनईसी कॉरपोरेशन ने डेवलप किया है। इस परियोजना में साम्पा कोग्यो के.के. और द योकोहामा रबर कंपनी लिमिटेड ने भी तकनीकी सहयोग दिया है।
यह सिस्टम वर्तमान में जापान की अत्याधुनिक मोगामी क्लास (30FFM) स्टेल्थ फ्रिगेट पर इस्तेमाल किया जा रह है। अब यही तकनीक भारत के साथ साझा की जा रही है।
भारतीय नौसेना के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह तकनीक?
सूत्रों का कहना है कि आधुनिक नेवल वॉरफेयर में केवल हथियार ही निर्णायक नहीं होते, बल्कि जहाज की पहचान छिपाने, सुरक्षित संचार बनाए रखने और विभिन्न सेंसरों से मिलने वाली जानकारी को तेजी से साझा करने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
NORA-50 इन सभी जरूरतों को एक साथ पूरा करता है। यही कारण है कि इसे आधुनिक स्टेल्थ युद्धपोतों की सबसे महत्वपूर्ण तकनीकों में गिना जाता है।
फाइबर रीइन्फोर्स्ड प्लास्टिक से बना है पूरा मास्ट
सूत्रों के मुताबिक NORA-50 का बाहरी हिस्सा फाइबर रीइन्फोर्स्ड प्लास्टिक (FRP) रेडोम से तैयार किया गया है। यह हल्का होने के साथ-साथ समुद्री मौसम का सामना करने में सक्षम होता है।
यह समुद्री हवा, नमी और तेज तापमान में भी लंबे समय तक टिकाऊ रहता है। साथ ही इसका रखरखाव पारंपरिक मेटल स्ट्रक्चर्स की तुलना में आसान होता है।
स्पायर शेप डिजाइन से बढ़ती है स्टेल्थ क्षमता
NORA-50 का डिजाइन सामान्य एंटीना मास्ट जैसा नहीं है। इसका आकार स्पायर शेप या बार शेप डोम जैसा रखा गया है। इस विशेष डिजाइन का उद्देश्य रडार वेव्स के रिफ्लेक्शन को कम करना है। जब किसी युद्धपोत का रडार क्रॉस सेक्शन कम होता है तो दुश्मन के लिए उसकी सही पहचान करना अधिक कठिन हो जाता है।
सूत्रों के मुताबिक NORA-50 केवल कम्युनिकेशन एंटीना नहीं है, बल्कि यह एक इंटीग्रेटेड इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम है।
इसमें टैक्टिकल डेटा लिंक, लिंक-16, टैक्टिकल एयर नेविगेशन सिस्टम (TACAN), विभिन्न कम्युनिकेशन एंटीना और कई अन्य सेंसर एक साथ लगाए गए हैं।
युद्ध के दौरान यही सिस्टम जहाज, हेलिकॉप्टर, समुद्री गश्ती विमान और अन्य नौसैनिक प्लेटफॉर्म के बीच सुरक्षित डेटा साझा करने का काम करते हैं।
क्या है लिंक-16?
सूत्रों के अनुसार लिंक-16 पश्चिमी देशों और नाटो सेनाओं द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला सुरक्षित मिलिट्री डेटा नेटवर्क है। इसके जरिए युद्ध के दौरान विभिन्न प्लेटफॉर्म वास्तविक समय में टारगेट की जानकारी, दुश्मन की स्थिति और ऑपरेशन से जुड़ा डेटा साझा कर सकते हैं। इसी कारण इसे आधुनिक नेटवर्क आधारित युद्ध सिस्टम का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
TACAN सिस्टम में भी किया गया बदलाव
सूत्रों का कहना है कि NORA-50 में टैक्टिकल एयर नेविगेशन सिस्टम (TACAN) को भी नए डिजाइन के साथ शामिल किया गया है। पारंपरिक जहाजों में TACAN एंटीना मास्ट के सबसे ऊपरी हिस्से पर लगाया जाता था। लेकिन NORA-50 में इसे नीचे की ओर स्थापित किया गया है।
इसके अलावा पारंपरिक डिस्क की जगह हॉलो डोनट आकार अपनाया गया है। इससे रडार से पहचान की संभावना कम होती है जबकि सिस्टम की कार्यक्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता।
कैसे बदलता है पूरे युद्धपोत का इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम?
सूत्रों के मुताबिक पहले किसी युद्धपोत पर अलग-अलग एंटीना होने के कारण उनके बीच इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंटरफेरेंस की समस्या भी रहती थी। NORA-50 में सभी एंटीना एक वैज्ञानिक तरीके से लगाए गए हैं। इससे सिग्नल की गुणवत्ता बेहतर रहती है और विभिन्न प्रणालियां एक-दूसरे को प्रभावित नहीं करतीं।
वहीं, NORA-50 के कई फायदे हैं। जहाज का रडार क्रॉस सेक्शन कम होता है, जिससे स्टेल्थ क्षमता बढ़ती है। एंटीना की बेहतर स्थिति के कारण संचार और रेडियो रिसेप्शन मजबूत होता है। कई अलग-अलग एंटीना हटने से जहाज का वजन कम होता है और जगह की बचत होती है। रखरखाव आसान हो जाता है तथा बिजली गिरने जैसी प्राकृतिक कारणों से सुरक्षा भी बेहतर मिलती है। इसके अलावा यह सिस्टम एक साथ कई फ्रीक्वेंसी बैंड पर संचार करने में सक्षम है।
जापान के आधुनिक युद्धपोतों में पहले से मौजूद है यह तकनीक
यूनीकॉर्न सिस्टम जापान की आधुनिक मोगामी क्लास स्टेल्थ फ्रिगेट पर पहले से इस्तेमाल किया जा रहा है। इस मास्ट के भीतर सामरिक डेटा लिंक, टैक्टिकल एयर नेविगेशन सिस्टम, विभिन्न संचार एंटीना और कई अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण एकीकृत किए गए हैं। इससे जहाज पर अलग-अलग एंटीना लगाने की जरूरत नहीं रहती।
सूत्रों का कहना है कि यही तकनीक अब भारतीय नौसेना की जरूरतों के अनुरूप विकसित की जाएगी।
सूत्रों का कहना है कि भविष्य में भारतीय नौसेना के नए फ्रिगेट, डिस्ट्रॉयर और अन्य प्रमुख युद्धपोतों पर इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे भारतीय नौसेना को सुरक्षित संचार, बेहतर सेंसर इंटीग्रेशन, कम रडार सिग्नेचर और आधुनिक नेटवर्क आधारित युद्ध क्षमता हासिल होगी।
शिखर सम्मेलन में इन पर हुई चर्चा
रक्षा सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापानी प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता में रक्षा, समुद्री सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, क्रिटिकल मिनरल्स, ऊर्जा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग जैसे कई विषयों पर चर्चा हुई।
बैठक के दौरान दोनों देशों ने इस बात पर जोर दिया कि बदलते वैश्विक सुरक्षा माहौल में भारत और जापान की रणनीतिक साझेदारी पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। इसी क्रम में रक्षा तकनीक के क्षेत्र में संयुक्त विकास को नई दिशा देने पर सहमति बनी।
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।



