📍नई दिल्ली | 29 May, 2026, 1:42 PM
Indian Tank Drone System: भारतीय सेना अब फ्यूचर टैंकों को हमला और निगरानी करने वाले हाईटेक कॉम्बैट ड्रोन प्लेटफॉर्म से भी लैस करने की तैयारी कर रही है। आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड (AVNL) ने एक ऐसा प्रोजेक्ट शुरू किया है, जिससे भारतीय टैंक दुश्मन पर कई किलोमीटर दूर से ड्रोन हमला कर सकेंगे। इसके साथ ही टैंक के अंदर बैठे जवान रियल टाइम वीडियो फीड देखकर दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रख पाएंगे।
एवीएनएल और हैवी व्हीकल्स फैक्ट्री अवाडी ने भारतीय सेना के फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल (एफआरसीवी) प्रोग्राम के लिए एडवांस्ड ड्रोन सिस्टम डेवलप करने का एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट जारी किया है। यह सिस्टम एवीएनएल के नए 55 टन वाले मेन बैटल टैंक (एमबीटी) के लिए बनाया जाएगा। इस प्रोजेक्ट के तहत तीन अलग-अलग तरह के ड्रोन तैयार किए जाएंगे, जिनमें लॉइटरिंग मुनिशन, अनटेदर्ड सर्विलांस ड्रोन और टेदर्ड ड्रोन शामिल हैं।
यह पूरा प्रोजेक्ट रक्षा मंत्रालय की “बाय इंडियन-आईडीडीएम” कैटेगरी के तहत होगा, जिसमें बड़े स्तर पर स्वदेशी तकनीक और भारतीय कंपनियों की भागीदारी होगी। शुरुआती प्रोटोटाइप चरण में कम से कम 50 प्रतिशत स्वदेशी कंटेंट जरूरी रखा गया है, जबकि सीरीज प्रोडक्शन के अंतिम चरण में इसे बढ़ाकर 80 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है।
Indian Tank Drone System: क्या है AVNL का नया ड्रोन सिस्टम
एवीएनएल द्वारा तैयार किया जा रहा यह ड्रोन सिस्टम केवल एक ड्रोन नहीं बल्कि पूरा कॉम्बैट नेटवर्क होगा। इसमें तीन अलग-अलग प्लेटफॉर्म एक साथ काम करेंगे। इनका उद्देश्य टैंक को दूर से हमला करने, आसमान से निगरानी करने और युद्ध के दौरान लगातार कम्युनिकेशन बनाए रखने की क्षमता देना है।
इस सिस्टम की सबसे खास बात यह है कि टैंक क्रू को दुश्मन के इलाके में बिना आगे बढ़े हमला करने की क्षमता मिलेगी। मौजूदा टैंक आमतौर पर अपनी गन की रेंज तक ही प्रभावी होते हैं, लेकिन नए ड्रोन सिस्टम के जरिए टैंक 15 से 20 किलोमीटर दूर तक दुश्मन को ट्रैक और निशाना बना सकेगा।
सूत्रों का कहना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने यह दिखा दिया है कि भविष्य की लड़ाई में ड्रोन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रहने वाली है। इसी वजह से दुनिया की बड़ी सेनाएं अब ड्रोन-इंटीग्रेटेड टैंक और आर्मर्ड सिस्टम डेवलप कर रही हैं।
लॉइटरिंग मुनिशन से सटीक हमला
इस पूरे सिस्टम का सबसे घातक हिस्सा लॉइटरिंग मुनिशन (एलएम) होगा। इसे आम भाषा में “कामीकाजे ड्रोन” भी कहा जाता है। यह ड्रोन टैंक से लॉन्च होगा और दुश्मन के इलाके के ऊपर काफी देर तक उड़ान भरते हुए टारगेट को खोज कर हमल करेगा।
एवीएनएल की तरफ से जारी तकनीकी जानकारी के अनुसार इस ड्रोन की न्यूनतम रेंज 15 किलोमीटर होगी। यह कम से कम 45 मिनट तक हवा में रह सकेगा और 30 मिनट तक टारगेट एरिया के ऊपर लॉइटर कर सकेगा। साथ ही, इसका वारहेड कम से कम 500 मिमी और बेहतर स्थिति में 600 मिमी तक आर्मर भेदने में सक्षम होना चाहिए।
यह ड्रोन एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर (ERA) को भी भेद सकेगा। आधुनिक युद्ध में कई देशों के टैंक ईआरए सिक्योरिटी से लैस होते हैं, जिन्हें नष्ट करना आसान नहीं होता। एवीएनएल चाहता है कि उसका ड्रोन ऊपर से हमला कर दुश्मन के सबसे कमजोर हिस्से को निशाना बनाए। इसे “टॉप अटैक” मोड कहा जाता है। आधुनिक टैंकों की छत बाकी हिस्सों की तुलना में कमजोर होती है, इसलिए ऊपर से हमला बेहद प्रभावी माना जाता है।
इस लॉइटरिंग म्यूनिशन को टैंक से कैनिस्टर या ट्यूब के जरिए लॉन्च किया जाएगा। लॉन्च के बाद यह 5 सेकंड के भीतर सक्रिय होकर उड़ान भर सकेगा। ड्रोन का कैनिस्टर पूरी तरह वाटरप्रूफ होगा और 5 मीटर गहरे पानी में भी सुरक्षित रहेगा। इसके अलावा यह टैंक की तेज रफ्तार, झटकों और मुख्य तोप की फायरिंग के दौरान भी सुरक्षित रहना चाहिए। यह सिस्टम सिर्फ मैदानी इलाकों के लिए नहीं बल्कि रेगिस्तान, जंगल, शहरी इलाकों और पहाड़ों में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा।
एलएम ड्रोन में एंटी-जैमिंग सिस्टम, फ्रीक्वेंसी हॉपिंग और एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन जैसी तकनीकें भी होंगी। ताकि ताकि दुश्मन रेडियो सिग्नल जाम करके इसे गिरा न सके। ड्रोन को GNSS डिनाइड वातावरण में भी काम करना होगा। यानी यदि दुश्मन जीपीएस सिग्नल जाम कर दे तब भी यह अपना मिशन पूरा कर सके।
इसमें ऑटोमैटिक टारगेट ट्रैकिंग सिस्टम लगाया जाएगा, जिससे चलते हुए टैंक या तेज रफ्तार से वाले टारगेट को भी ट्रैक किया जा सकेगा। जानकारी के अनुसार यह 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल रहे टारगेट पर भी हमला कर सकता है। ड्रोन की सटीकता इतनी ज्यादा रखी गई है कि इसका सर्कुलर एरर प्रॉबेबिलिटी (CEP) सिर्फ 1 मीटर से कम होना चाहिए।
इसमें EO/IR गिम्बल भी लगाया जाएगा। यानी दिन और रात दोनों समय दुश्मन को पहचानने वाले कैमरे। इसमें ऑटोमैटिक टारगेट ट्रैकिंग की क्षमता भी होगी। एवीएनएल ने साफ कहा है कि यह ड्रोन केवल टैंक के आदेश पर ही अंतिम हमला करेगा। यानी इंसानी नियंत्रण हमेशा रहेगा।
अनटेदर्ड सर्विलांस ड्रोन करेगा निगरानी
दूसरा सिस्टम अनटेदर्ड सर्विलांस ड्रोन (यूएसडी) होगा। इसका मुख्य काम दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखना और टैंक क्रू को लाइव वीडियो फीड देना होगा। यह ड्रोन टैंक को “बियॉन्ड लाइन ऑफ साइट” क्षमता देगा। यानी टैंक चालक दल उन लक्ष्यों को भी देख सकेगा जो सीधे दिखाई नहीं देते। यह ड्रोन लगभग 20 किलोमीटर तक की दूरी से हाई क्वालिटी वीडियो भेज सकेगा। इसमें डे और नाइट ऑपरेशन क्षमता होगी, यानी दिन और रात दोनों समय निगरानी की जा सकेगी।
यूएसडी में ईओ और आईआर सेंसर लगाए जाएंगे। ईओ यानी इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर सामान्य विजुअल निगरानी करेंगे जबकि आईआर यानी इन्फ्रारेड सिस्टम अंधेरे में भी दुश्मन की गतिविधियां पकड़ सकेगा।
इस ड्रोन को मैनुअल और सेमी-ऑटोमैटिक दोनों मोड में उड़ाया जा सकेगा। अगर जीपीएस सिग्नल जाम हो जाएं तब भी यह विजन-बेस्ड नेविगेशन और आईएनएस सिस्टम के जरिए काम करता रहेगा। इस ड्रोन में AES-256 एन्क्रिप्शन या उससे बेहतर सुरक्षा प्रणाली होनी चाहिए ताकि दुश्मन इसके डेटा को इंटरसेप्ट न कर सके।
इस सिस्टम की एक और खासियत यह है कि यह लॉइटरिंग मुनिशन के साथ मिलकर काम करेगा। यानी यूएसडी पहले टारगेट की पहचान करेगा और उसके बाद एलएम ड्रोन को टारगेट की लोकेशन भेजी जाएगी। एवीएनएल चाहता है कि सर्विलांस ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन और टैंक एक ही C4ISR नेटवर्क में काम करें। (Indian Tank Drone System)
टेदर्ड ड्रोन करेगा लगातार हवाई निगरानी
तीसरा सिस्टम टेदर्ड ड्रोन (टीडी) होगा। यह सामान्य ड्रोन से काफी अलग होगा। इसे टैंक से केबल के जरिए जोड़ा जाएगा और उसी से पावर सप्लाई मिलेगी।
आमतौर पर ड्रोन की सबसे बड़ी समस्या बैटरी लाइफ होती है, लेकिन टेदर्ड ड्रोन घंटों तक लगातार उड़ान भर सकता है क्योंकि उसे बिजली सीधे टैंक से मिलती रहेगी। एवीएनएल ने कहा है कि टेदर्ड ड्रोन सिस्टम में ऑटोमैटिक विंच सिस्टम, पावर मॉड्यूल और हाई बैंडविड्थ डेटा ट्रांसमिशन होना चाहिए।
इसका इस्तेमाल लगातार हवाई निगरानी और कम्युनिकेशन रिले के लिए किया जाएगा। युद्ध के दौरान यह ड्रोन ऊंचाई पर रहकर आसपास के इलाके की निगरानी करेगा और टैंक यूनिट्स के बीच कम्युनिकेशन नेटवर्क को मजबूत करेगा।
इसमें हाई-बैंडविड्थ डेटा ट्रांसमिशन सिस्टम होगा जिससे रियल टाइम वीडियो फीड तुरंत टैंक तक पहुंचेगी।
पूरे सिस्टम को -20 डिग्री से +45 डिग्री तापमान में काम करने योग्य बनाया जाएगा। ड्रोन सिस्टम को टैंक के साथ इस तरह इंटीग्रेट किया जाएगा कि वाहन की मोबिलिटी प्रभावित न हो।
एवीएनएल ने यह भी कहा है कि सभी ड्रोन सिस्टम MIL-STD-461E और MIL-STD-464C जैसे मिलिटरी स्टैंडर्ट्स पर आधारित होंगे।
एक ही कंट्रोल सिस्टम से चलेंगे तीनों ड्रोन
एवीएनएल की ईओआई में साफ कहा गया है कि तीनों ड्रोन सिस्टम के लिए एक ही इंटीग्रेटेड डिस्प्ले यूनिट बनाई जाएगी। यानी टैंक के अंदर बैठा क्रू एक ही कंट्रोल पैनल से एलएम, यूएसडी और टीडी तीनों को ऑपरेट कर सकेगा।
इस यूनिट में जॉयस्टिक, टच कंट्रोल और डिजिटल इंटरफेस दिए जाएंगे। रियल टाइम टेलीमेट्री, वीडियो फीड और टारगेट डेटा इसी सिस्टम पर दिखाई देगा। (Indian Tank Drone System)
3 प्रोटोटाइप और 590 यूनिट्स की योजना
एवीएनएल ने इस प्रोजेक्ट को दो फेज में बांटा है। पहले फेज में तीन प्रोटोटाइप सिस्टम विकसित किए जाएंगे। इनमें तीनों ड्रोन प्लेटफॉर्म शामिल होंगे। दूसरे चरण में कुल 590 सीरीज प्रोडक्शन यूनिट्स का टारगेट रखा गया है। हालांकि यह उत्पादन रक्षा मंत्रालय द्वारा एफआरसीवी प्रोग्राम में एवीएनएल के चयन पर निर्भर करेगा। अगर सेना एवीएनएल के टैंक को चुनती है, तभी बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन होगा।
शुरुआत में तीन टैंकों पर यह तकनीक लगाकर उसका परीक्षण होगा। यदि सेना और रक्षा मंत्रालय परीक्षण में संतुष्ट रहते हैं तो बाद में 590 टैंक ड्रोन सिस्टम से लैस किए जाएंगे। हालांकि दस्तावेज में साफ कहा गया है कि यह संख्या भविष्य में सेना की जरूरत के हिसाब से बदल भी सकती है।
एवीएनएल ने साफ किया है कि सिस्टम को कई स्तर के ट्रायल से गुजरना होगा। पहले बेंच टेस्टिंग होगी, फिर डायनामिक स्टैंड टेस्ट और उसके बाद टैंक पर इंटीग्रेशन किया जाएगा। इसके अलावा ईएमआई-ईएमसी टेस्ट, पर्यावरणीय परीक्षण और लाइव फायरिंग ट्रायल भी होंगे। ड्रोन सिस्टम को स्थिर और गतिशील दोनों तरह के टारगेट के खिलाफ जांचा जाएगा।
इन परीक्षणों के बाद ही सिस्टम को बड़े स्तर पर उत्पादन के लिए मंजूरी मिलेगी।
इस परियोजना के तहत पहला प्रोटोटाइप सप्लाई ऑर्डर मिलने के 12 महीने के भीतर तैयार करना होगा। इसके बाद बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू होगा। दस्तावेज के अनुसार सीरीज प्रोडक्शन चरण में 30 सिस्टम से शुरुआत होगी। इसके बाद अगले चरण में 45 सिस्टम तैयार किए जाएंगे। तीसरे चरण में 85 सिस्टम का उत्पादन होगा।
इसके बाद चौथे और पांचवें चरण में 100-100 सिस्टम बनाए जाएंगे। उसके बाद छठे चरण में 110 और सातवें चरण में 120 सिस्टम तैयार किए जाएंगे। इस तरह कुल संख्या 590 तक पहुंचेगी। (Indian Tank Drone System)
क्या है एफआरसीवी प्रोग्राम
एफआरसीवी यानी फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल भारतीय सेना का अगली पीढ़ी का टैंक प्रोग्राम है। इसे “प्रोजेक्ट रंजीत” नाम से भी जाना जाता है।
इसका उद्देश्य पुराने टी-72 अजेय टैंकों को बदलना है। भारतीय सेना के पास बड़ी संख्या में टी-72 टैंक मौजूद हैं, जिनमें से कई अब पुराने हो चुके हैं।
एफआरसीवी को लगभग 55 टन क्लास का मीडियम वेट टैंक बनाया जा रहा है। इसमें आधुनिक फायरपावर, एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम, एआई आधारित टारगेट ट्रैकिंग और ड्रोन इंटीग्रेशन जैसी क्षमताएं होंगी। (Indian Tank Drone System)
एफआरसीवी टैंक की खासियतें
एफआरसीवी में 120 एमएम स्मूथबोर गन लगाए जाने की योजना है। यह टैंक एपीएफएसडीएस, हीट और एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल जैसे आधुनिक गोला-बारूद इस्तेमाल कर सकेगा।
टैंक में ऑटोलोडर सिस्टम होगा जिससे फायरिंग की गति बढ़ेगी। इसकी अधिकतम स्पीड करीब 70 किलोमीटर प्रति घंटा रखी गई है।
टैंक में एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम भी होगा जो आने वाली मिसाइलों और ड्रोन हमलों को रोक सकेगा। इसके अलावा इसमें मॉड्यूलर आर्मर, सीबीआरएन प्रोटेक्शन और थर्मल सिग्नेचर मैनेजमेंट जैसी तकनीकें भी शामिल होंगी। (Indian Tank Drone System)


