📍नई दिल्ली | 29 May, 2026, 11:34 AM
Project-75I Submarine Deal: वित्त मंत्रालय ने भारतीय नौसेना की अंडरवॉटर ताकत बढ़ाने के लिए करीब 70 हजार करोड़ रुपये की उस बड़ी डील को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत भारत में छह नई पीढ़ी की एडवांस कन्वेंशनल पनडुब्बियां बनाई जाएंगी। यह पूरा प्रोजेक्ट “प्रोजेक्ट-75आई” यानी पी-75आई के तहत आगे बढ़ाया जाएगा।
इन पनडुब्बियों का निर्माण मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड यानी एमडीएल और जर्मनी की कंपनी थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स यानी टीकेएमएस मिलकर करेंगे। यह डील भारतीय नौसेना की पानी के नीचे लड़ने की क्षमता को काफी मजबूत मानी जा रही है।
सूत्रों के मुताबिक वित्त मंत्रालय से मंजूरी मिलने के बाद अब इस प्रस्ताव को जल्द कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) के सामने रखा जाएगा। अंतिम मंजूरी के बाद कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर होंगे।
Project-75I Submarine Deal: सात साल बाद मिलेगी पहली पनडुब्बी
जानकारी के अनुसार कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के करीब सात साल बाद पहली पनडुब्बी भारतीय नौसेना को सौंपी जाएगी। इसके बाद हर साल एक-एक पनडुब्बी की डिलीवरी की जाएगी।
यह प्रोजेक्ट भारत के सबसे बड़े नेवल निर्माण कार्यक्रमों में शामिल माना जा रहा है। खास बात यह है कि इन पनडुब्बियों में एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी एआईपी सिस्टम लगाया जाएगा, जिससे उनकी ताकत कई गुना बढ़ जाएगी।
क्यों जरूरी हैं नई पनडुब्बियां
भारतीय नौसेना लंबे समय से अपनी पुरानी डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को बदलने की योजना पर काम कर रही थी। प्रोजेक्ट-75आई की कल्पना 1990 के दशक के अंत में की गई थी। इसका उद्देश्य नौसेना के पुरानी हो चुकी सिंधुघोष क्लास (किलो क्लास) और शिशुमार क्लास (टाइप 209) पनडुब्बियों को आधुनिक विकल्प देना था। 2005 में प्रोजेक्ट-75 के तहत फ्रांस से स्कॉर्पीन क्लास (कलवरी क्लास) की 6 पनडुब्बियां बनाई गईं, जिसकी आखिरी पनडुब्बी आईएनएस वाघशीर जनवरी 2025 में कमीशन हुई। लेकिन पी-75आई को वित्तीय कारणों से टाल दिया गया। लेकिन अब 2026 में इस डील मंजूरी मिल गई है।
नौसेना के पास वर्तमान में 7-18 डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां हैं– इनमें 6 कलवरी क्लास, और बाकी 7-9 सिंधुघोष क्लास की हैं। जबकि चार 4 शिशुमार क्लास की है, जिन्हें 1980 के दशक में शामिल किया गया था। वहीं इनमें से कोई भी एआईपी टेक्नोलॉजी से लैस नहीं है। जबकि डीआरडीओ का स्वदेशी एआईपी सिस्टम कलवरी क्लास में रेट्रोफिट के लिए देरी का शिकार है।
दूसरी तरफ चीन तेजी से अपनी नौसैनिक ताकत बढ़ा रहा है। चीन के पास लगभग 50 आधुनिक पनडुब्बियां हैं, जिनमें कई एआईपी तकनीक से लैस हैं। पाकिस्तान भी चीन से नई 8 युआन क्लास पनडुब्बियां हासिल कर रहा है।
ऐसे में भारतीय नौसेना को ऐसी नई पनडुब्बियों की जरूरत महसूस हो रही थी जो लंबे समय तक समुद्र के भीतर रह सकें और दुश्मन को बिना पता चले ऑपरेशन कर सकें। (Project-75I Submarine Deal)
कैसी होंगी नई पनडुब्बियां
ये पनडुब्बियां जर्मन एचडीडब्ल्यू टाइप-214 डिजाइन पर आधारित होंगी। हालांकि भारतीय जरूरतों के हिसाब से इनमें कई बदलाव किए जाएंगे।
इनका वजन लगभग 3500 टन तक हो सकता है। यह भारतीय नौसेना की अब तक की सबसे बड़ी कन्वेंशनल पनडुब्बियों में शामिल होंगी।
इनकी लंबाई करीब 71 मीटर होगी और ये लगभग 400 मीटर गहराई तक समुद्र में ऑपरेट कर सकेंगी।
इन पनडुब्बियों में एडवांस सोनार सिस्टम, कम शोर करने वाला प्रोपेलर और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम लगाए जाएंगे। इसी वजह से इन्हें बेहद खतरनाक “स्टेल्थ हंटर” माना जा रहा है।
क्या होता है एआईपी सिस्टम
इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी खासियत एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी एआईपी सिस्टम है। सामान्य डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को हर कुछ दिनों में बैटरी चार्ज करने के लिए सतह पर आना पड़ता है। इससे दुश्मन को उनके बारे में पता चलने का खतरा रहता है।
लेकिन एआईपी सिस्टम वाली पनडुब्बियां कई दिनों तक बिना सतह पर आए समुद्र के अंदर रह सकती हैं। इससे उनकी पहचान करना बेहद मुश्किल हो जाता है।
जर्मन कंपनी का पीईएम फ्यूल सेल आधारित एआईपी सिस्टम दुनिया की सबसे शांत तकनीकों में गिना जाता है। इसी वजह से यह पनडुब्बियां दुश्मन के रडार और सोनार से बचने में ज्यादा सक्षम होंगी। (Project-75I Submarine Deal)
किन हथियारों से लैस होंगी
नई पनडुब्बियों में 533 एमएम के टॉरपीडो ट्यूब लगाए जाएंगे। इनके जरिए भारी टॉरपीडो और एंटी-शिप मिसाइल दागी जा सकेंगी।
रिपोर्ट्स के अनुसार इनमें भारतीय वरुणास्त्र टॉरपीडो और लंबी दूरी की मिसाइलों को भी शामिल किया जा सकता है। इसके अलावा ये पनडुब्बियां दुश्मन के जहाजों, पनडुब्बियों और तटीय ठिकानों पर हमला करने में सक्षम होंगी।
इनमें स्पेशल फोर्स ऑपरेशन की क्षमता भी होगी। यानी समुद्र के रास्ते कमांडो ऑपरेशन भी किए जा सकेंगे।
हिंद महासागर में बढ़ेगी भारत की ताकत
भारतीय नौसेना के लिए हिंद महासागर क्षेत्र बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। चीन लगातार इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है। चीन की नौसेना हिंद महासागर में लंबे समय तक तैनाती कर रही है और कई देशों में पोर्ट सुविधाएं विकसित कर रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि नई पनडुब्बियां भारत को समुद्र में रणनीतिक बढ़त देने में मदद करेंगी। ये पनडुब्बियां समुद्री रास्तों की निगरानी, दुश्मन की गतिविधियों पर नजर और अंडरवॉटर डिटरेंस बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएंगी।
इस प्रोजेक्ट को “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” अभियान का बड़ा हिस्सा माना जा रहा है। इन पनडुब्बियों का निर्माण भारत में होगा और धीरे-धीरे इनमें स्वदेशी सामग्री का प्रतिशत बढ़ाया जाएगा।
जानकारी के मुताबिक पहली पनडुब्बी में लगभग 45 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री होगी। वहीं छठी पनडुब्बी तक यह बढ़कर करीब 60 प्रतिशत हो जाएगी।
जर्मन कंपनी टीकेएमएस भारत को डिजाइन और तकनीक भी ट्रांसफर करेगी। इससे भारतीय शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री को नई तकनीक सीखने का मौका मिलेगा।
एमडीएल पहले भी बना चुका है आधुनिक पनडुब्बियां
मुंबई स्थित मझगांव डॉक पहले भी फ्रांस की मदद से स्कॉर्पीन यानी कलवरी क्लास पनडुब्बियां बना चुका है। प्रोजेक्ट-75 के तहत छह कलवरी क्लास पनडुब्बियों का निर्माण किया गया था।
जनवरी 2025 में आखिरी पनडुब्बी आईएनएस वाघशीर नौसेना में शामिल हुई थी। इस प्रोजेक्ट से एमडीएल को आधुनिक पनडुब्बी निर्माण का बड़ा अनुभव मिला।
अब उसी अनुभव का इस्तेमाल पी-75आई प्रोजेक्ट में किया जाएगा। (Project-75I Submarine Deal)
जर्मनी के साथ मजबूत हो रहे रक्षा संबंध
भारत और जर्मनी के बीच रक्षा सहयोग लगातार बढ़ रहा है। अप्रैल 2026 में दोनों देशों ने डिफेंस इंडस्ट्रियल कोऑपरेशन रोडमैप पर हस्ताक्षर किए थे।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जर्मनी में टीकेएमएस की फैसिलिटी का दौरा भी किया था। दोनों देशों के बीच हथियार निर्माण, तकनीक साझेदारी और रक्षा उद्योग सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
भारत पहले भी जर्मनी से टाइप-209 पनडुब्बियां हासिल कर चुका है। अब नई पीढ़ी की टाइप-214 आधारित पनडुब्बियां दोनों देशों के रक्षा संबंधों को और मजबूत करेंगी।
एलएंडटी-नवान्टिया को पीछे छोड़कर जीती बोली
इस प्रोजेक्ट के लिए एक और बड़ी प्रतिस्पर्धा एलएंडटी और स्पेन की नवान्टिया कंपनी की तरफ से थी। लेकिन आखिर में एमडीएल और टीकेएमएस की बोली को चुना गया।
सूत्रों का कहना है कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, निर्माण क्षमता और कीमत जैसे कई पहलुओं पर विचार करने के बाद यह फैसला लिया गया। (Project-75I Submarine Deal)
नौसेना के आधुनिकीकरण पर फोकस
भारतीय नौसेना इस समय बड़े स्तर पर आधुनिकीकरण अभियान चला रही है। देशभर के शिपयार्ड में लगभग 60 युद्धपोत और पनडुब्बियां निर्माणाधीन हैं।
नए नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्ण स्वामीनाथन के कार्यभार संभालने के बाद नौसेना के आधुनिकीकरण पर और ज्यादा जोर दिए जाने की उम्मीद जताई जा रही है।
नौसेना का लक्ष्य 2047 तक पूरी तरह आत्मनिर्भर बनने का है। इसी रणनीति के तहत स्वदेशी युद्धपोत, पनडुब्बियां और नेवल सिस्टम तेजी से विकसित किए जा रहे हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि 2030-40 तक नौसेना के पास 24 से ज्यादा आधुनिक कन्वेंशनल और न्यूक्लियर पनडुब्बियां हो सकती हैं। (Project-75I Submarine Deal)
भारत की परमाणु पनडुब्बी क्षमता भी बढ़ रही
इसी बीच भारत अपनी परमाणु पनडुब्बी ताकत भी लगातार मजबूत कर रहा है। हाल ही में भारत ने अपनी तीसरी न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी आईएनएस अरिदमन को नौसेना में शामिल किया है।
भारत के पास पहले से आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात जैसी स्वदेशी परमाणु पनडुब्बियां मौजूद हैं। ये देश की न्यूक्लियर ट्रायड क्षमता का हिस्सा हैं।
अब पी-75आई जैसी एडवांस कन्वेंशनल पनडुब्बियों के शामिल होने से भारतीय नौसेना की कुल अंडरवॉटर क्षमता और मजबूत मानी जा रही है।
वहीं, इस प्रोजेक्ट से देश में बड़े स्तर पर रोजगार पैदा होने की भी उम्मीद है। पनडुब्बी निर्माण में स्टील, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनिंग, सेंसर और इंजीनियरिंग सेक्टर की कई भारतीय कंपनियां जुड़ेंगी। इस प्रोजेक्ट से एमएसएमई सेक्टर को भी इससे बड़ा फायदा मिलेग, जिससे देश के डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को मजबूती मिलेगी। (Project-75I Submarine Deal)


