📍नई दिल्ली | 19 May, 2026, 1:05 PM
India AIP Submarine Deal: भारतीय नौसेना अगले कुछ महीनों में अपनी सबसे बड़ी पनडुब्बी परियोजनाओं में से एक को अंतिम रूप देने जा रही है। करीब 70 हजार करोड़ रुपये की लागत वाली प्रोजेक्ट-75 इंडिया यानी पी-75आई के तहत भारत छह नई एडवांस पनडुब्बियां खरीदेगा। इन पनडुब्बियों की सबसे बड़ी खासियत यह होगी कि इनमें एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी एआईपी तकनीक होगी, जिससे ये लंबे समय तक समुद्र के अंदर बिना सतह पर आए रह सकेंगी।
यह सौदा ऐसे समय में किया जा रहा है जब पाकिस्तान तेजी से अपने अंडरवॉटर बेड़े को मजबूत कर रहा है। चीन की मदद से पाकिस्तान ने हाल ही में नई हंगोर क्लास एआईपी पनडुब्बियां शामिल कर रहा है, जबकि भारतीय नौसेना के पास अभी तक एक भी ऑपरेशनल एआईपी पनडुब्बी नहीं है। वहीं भारतीय नौसेना भी अपनी कलवरी क्लास पनडुब्बी आईएनएस खंडेरी में जल्द ही स्वदेशी एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) सिस्टम लगाने की तैयारी कर रही है, जो इस साल के आखिर तक पूरा हो जाएगा।
India AIP Submarine Deal: सितंबर तक लग सकती है सौदे पर अंतिम मुहर
रक्षा सूत्रों के मुताबिक इस परियोजना से जुड़ी प्रक्रिया अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। इसी महीने इंटर-मिनिस्ट्रियल ग्रुप से मंजूरी मिलने की उम्मीद है। इसके बाद सितंबर तक कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तखत हो सकते हैं।
इस प्रोजेक्ट में मुंबई की सरकारी कंपनी मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड यानी एमडीएल भारतीय स्ट्रेटेजिक पार्टनर होगी। जर्मनी की कंपनी थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स यानी टीकेएमएस इसके साथ मिलकर काम करेगी।
रक्षा मंत्रालय के स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप मॉडल के तहत विदेशी कंपनी भारत को पनडुब्बी डिजाइन और तकनीक ट्रांसफर करेगी। इसके बाद भारत में ही इन पनडुब्बियों का निर्माण किया जाएगा।
क्या होती है एआईपी तकनीक
एआईपी तकनीक आधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों की सबसे अहम क्षमता मानी जाती है। सामान्य पनडुब्बियों को बैटरियां चार्ज करने के लिए कुछ समय बाद समुद्र की सतह के करीब आना पड़ता है या स्नॉर्कल इस्तेमाल करना पड़ता है। इस दौरान दुश्मन के रडार और सेंसर उन्हें पकड़ सकते हैं।
लेकिन एआईपी तकनीक वाली पनडुब्बियां लंबे समय तक पानी के अंदर रह सकती हैं। इससे उनकी स्टेल्थ क्षमता काफी बढ़ जाती है और दुश्मन के लिए उन्हें ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक नौसैनिक युद्ध में यह तकनीक बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि इससे पनडुब्बी बिना दिखाई दिए लंबे समय तक ऑपरेशन कर सकती है। (India AIP Submarine Deal)
सात साल बाद मिलेगी पहली पनडुब्बी
योजना के मुताबिक समझौते पर हस्ताक्षर होने के करीब सात साल बाद पहली पनडुब्बी नौसेना को मिलेगी। इसके बाद हर साल एक नई पनडुब्बी की डिलीवरी की जाएगी।
सरकार ने इस परियोजना में स्वदेशीकरण पर भी बड़ा जोर दिया है। पहली पनडुब्बी में कम से कम 45 प्रतिशत भारतीय उपकरण और सिस्टम होंगे। छठी पनडुब्बी तक यह हिस्सा बढ़ाकर 60 प्रतिशत किया जाएगा।
रक्षा मंत्रालय इसे “आत्मनिर्भर भारत” अभियान से जुड़ी बड़ी परियोजना मान रहा है। इसके जरिए भारत में पनडुब्बी निर्माण से जुड़ी घरेलू क्षमता बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। (India AIP Submarine Deal)
भारत के सामने बड़ी चुनौती
भारतीय नौसेना के पास इस समय 16 पारंपरिक पनडुब्बियां हैं। इनमें से कई पनडुब्बियां काफी पुरानी हो चुकी हैं और धीरे-धीरे उनकी सर्विस लाइफ खत्म होने की तरफ बढ़ रही है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि भारतीय नौसेना के पास अभी तक एक भी एआईपी क्षमता वाली पनडुब्बी ऑपरेशनल नहीं है। यही वजह है कि पी-75आई परियोजना को रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है।
रक्षा योजनाकारों का मानना है कि अगर नई पनडुब्बियां समय पर नहीं मिलीं तो भारत की अंडरवॉटर क्षमता पर असर पड़ सकता है। (India AIP Submarine Deal)
चीन की मदद से तेजी से आगे बढ़ रहा पाकिस्तान
दूसरी तरफ पाकिस्तान तेजी से अपनी अंडरवॉटर ताकत बढ़ा रहा है। 30 अप्रैल 2025 को पाकिस्तान ने चीन में बनी अपनी चौथी एआईपी क्षमता वाली पनडुब्बी को शामिल किया था।
यह हंगोर क्लास पनडुब्बी कार्यक्रम का हिस्सा है। पाकिस्तान कुल आठ हंगोर क्लास पनडुब्बियां चीन की मदद से बना रहा है।
रक्षा सूत्रों के मुताबिक अगले कुछ सालों में पाकिस्तान के पास 11 तक एआईपी पनडुब्बियां हो सकती हैं। इससे उसे लंबे समय तक समुद्र में छिपे रहने की क्षमता मिल जाएगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति भारतीय नौसेना के लिए चिंता का विषय है क्योंकि हिंद महासागर क्षेत्र में अंडरवॉटर मुकाबला तेजी से बढ़ रहा है। (India AIP Submarine Deal)
डीआरडीओ भी बना रहा स्वदेशी एआईपी सिस्टम
भारत केवल विदेशी तकनीक पर निर्भर नहीं रहना चाहता। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ भी स्वदेशी एआईपी सिस्टम विकसित कर रहा है।
सूत्रों के मुताबिक यह सिस्टम अगले महीने जून तक तैयार हो सकता है। इसे भारतीय नौसेना की कलवरी क्लास पनडुब्बी आईएनएस खंडेरी में लगाया जाएगा।
आईएनएस खंडेरी, कलवरी क्लास की दूसरी पनडुब्बी है। इसे रखरखाव के दौरान एआईपी मॉड्यूल से लैस किया जाएगा।
हालांकि इस परियोजना में पहले भी देरी हो चुकी है। शुरुआत में योजना थी कि आईएनएस कलवरी में ही एआईपी लगाया जाएगा, लेकिन सिस्टम समय पर तैयार नहीं हो पाया। इसी वजह से कलवरी का रिफिट बिना एआईपी के पूरा किया गया।
कलवरी क्लास बनी नौसेना की रीढ़
भारतीय नौसेना की कलवरी क्लास पनडुब्बियां फिलहाल देश की सबसे अहम पारंपरिक अंडरवॉटर ताकत मानी जाती हैं। इन्हें फ्रांस की नेवल ग्रुप की तकनीकी मदद से मझगांव डॉक में बनाया गया है।
इन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्कॉर्पीन क्लास के नाम से भी जाना जाता है। पिछले कुछ वर्षों में यह परियोजना भारत की घरेलू पनडुब्बी निर्माण क्षमता बढ़ाने में अहम साबित हुई है।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि पी-75आई इसी अनुभव को आगे बढ़ाने वाली अगली बड़ी परियोजना है। (India AIP Submarine Deal)
हिंद महासागर में बढ़ रही चीन की मौजूदगी
भारत की चिंता केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं है। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी यानी पीएलए नेवी भी हिंद महासागर क्षेत्र में तेजी से अपनी मौजूदगी बढ़ा रही है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन के पास इस समय करीब 355 युद्धपोत और पनडुब्बियां हैं। 2025 तक उसके पास 65 पनडुब्बियां होने का अनुमान है। 2035 तक यह संख्या 80 तक पहुंच सकती है।
चीन लगातार हिंद महासागर क्षेत्र में अपने जहाज, सर्विलांस प्लेटफॉर्म और पनडुब्बियां भेज रहा है। भारत इसे अपनी रणनीतिक चुनौती के तौर पर देख रहा है।
इसी वजह से भारतीय नौसेना अपनी कुल ताकत बढ़ाने की योजना पर काम कर रही है। फिलहाल नौसेना के पास 130 से ज्यादा युद्धपोत और पनडुब्बियां हैं। लक्ष्य अगले पांच वर्षों में इसे बढ़ाकर 170 से 175 तक पहुंचाने का है।
दुनिया के कई देशों के पास है एआईपी तकनीक
आज दुनिया की ज्यादातर आधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियों में एआईपी तकनीक इस्तेमाल हो रही है। जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन, जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों के पास पहले से ऑपरेशनल एआईपी सिस्टम हैं।
भारत फिलहाल इस तकनीक में पीछे माना जाता है। यही वजह है कि शुरुआती चरण में उसे विदेशी साझेदार की जरूरत पड़ रही है।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि एआईपी तकनीक केवल पनडुब्बी की क्षमता नहीं बढ़ाती, बल्कि पूरे नौसैनिक संतुलन को प्रभावित करती है। लंबे समय तक समुद्र के अंदर रहने वाली पनडुब्बियां दुश्मन के जहाजों, सप्लाई रूट्स और नौसैनिक गतिविधियों पर लगातार नजर रख सकती हैं। (India AIP Submarine Deal)


