📍नई दिल्ली | 4 Jul, 2026, 7:37 PM
DRDO Active Protection System: रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) ने भारतीय सेना के टैंकों के लिए एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम (एपीएस) को एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी (एओएन) देने के बाद इस तकनीक पर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि सरकार की तरफ से जारी प्रेस रिलीज में यह साफ नहीं है कि सेना के लिए स्वदेशी एपीएस चुना जाएगा या किसी विदेशी सिस्टम को अपनाया जाएगा। लेकिन सूत्रों का कहना है कि यह एओएन डीआरडीओ के बनाए एपीएस को मिला है। वहीं, विदेशी सिस्टम्स की बात करें, तो इजरायल का ट्रॉफी सिस्टम, रूस के एरिना-एम और अफगानिट जैसे सिस्टम भी विकल्पों में गिने जा रहे हैं। लेकिन सरकार की प्राथमिकता स्वदेशी होगी।
यूक्रेन युद्ध के बाद दुनिया भर की सेनाओं ने टैंकों की सुरक्षा को नए नजरिए से देखना शुरू किया है। आधुनिक एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल, टॉप-अटैक हथियार, ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन ने पारंपरिक टैंक सुरक्षा की सीमाओं को सामने ला दिया है। इसी वजह से अब एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम को आधुनिक टैंक का जरूरी हिस्सा माना जा रहा है।
DRDO Active Protection System: क्या होता है एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम?
एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम यानी एपीएस ऐसा स्मार्ट सुरक्षा सिस्टम है, जो टैंक पर हमला करने वाली मिसाइल, रॉकेट या ड्रोन को टैंक तक पहुंचने से पहले ही पहचान लेता है और उसे रास्ते में ही निष्क्रिय या नष्ट करने की कोशिश करता है।
अब तक टैंक मुख्य रूप से मोटे स्टील, कंपोजिट आर्मर और एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर पर निर्भर रहते थे। ये सुरक्षा परतें हमला झेलने के लिए बनाई जाती हैं। इसके उलट एपीएस हमला होने का इंतजार नहीं करता, बल्कि खतरे को पहले ही रोकने की कोशिश करता है। आधुनिक युद्ध में यही सबसे बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
कैसे करता है काम एपीएस
एपीएस कई आधुनिक सेंसर, रडार और कंप्यूटर बेस्ड फायर कंट्रोल सिस्टम के साथ काम करता है। सबसे पहले एक्स-बैंड रडार या अन्य सेंसर आसपास के क्षेत्र पर लगातार नजर रखते हैं। जैसे ही कोई एंटी-टैंक मिसाइल, आरपीजी, ड्रोन या अन्य हथियार टैंक की ओर बढ़ता है, सिस्टम उसकी दिशा, रफ्तार और टकराने के संभावित स्थान की गणना करता है।
इसके बाद कुछ सेकंड से भी कम समय में कंप्यूटर फैसला करता है कि किस प्रकार का जवाब देना है। अगर खतरा गंभीर हो तो लॉन्चर से काउंटर म्यूनिशन दागा जाता है, जो हवा में ही उस मिसाइल या ड्रोन को नष्ट कर देता है।
पूरी प्रक्रिया इतनी तेजी से होती है कि कई बार टैंक के चालक दल को खतरे का एहसास होने से पहले ही सिस्टम कार्रवाई कर चुका होता है।
दो तरह के होते हैं एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम
एपीएस की मुख्य रूप से दो कैटेगरी हैं। पहला है सॉफ्ट-किल सिस्टम। इसमें आने वाली मिसाइल को नष्ट नहीं किया जाता, बल्कि उसके गाइडेंस सिस्टम को कन्फ्यूज किया जाता है। इसके लिए लेजर वार्निंग रिसीवर, इंफ्रारेड जैमर, स्मोक ग्रेनेड और इलेक्ट्रॉनिक काउंटर मेजर का इस्तेमाल किया जाता है। इसका उद्देश्य मिसाइल को टारगेट से भटका देना होता है।
दूसरा है हार्ड-किल सिस्टम। यह ज्यादा आधुनिक और असरदर माना जाता है। इसमें रडार खतरे को पहचानने के बाद छोटे इंटरसेप्टर या स्पेशल काउंटर म्यूनिशन दागता है, जो मिसाइल या रॉकेट को टैंक से कुछ मीटर पहले ही नष्ट कर देते हैं। वहीं, अब मॉडर्न सेनाएं अब दोनों तकनीकों का इस्तेमाल करने लगी हैं ताकि सुरक्षा कई स्तरों पर सुनिश्चित की जा सके। (DRDO Active Protection System)

डीआरडीओ बना रहा बेहद खास एपीएस
सूत्रों के मुताबिक डीआरडीओ भारतीय सेना के टी-90 भीष्म और अर्जुन जैसे आर्मर्ड फाइटिंग व्हीकल्स के लिए स्वदेशी एपीएस डेवलप कर रहा है। इसे डीआरडीओ की चेन्नई स्थित अवाडी कॉम्बैट व्हीकल्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (सीवीआरडीई) बना रही है।
सूत्रों के मुताबिक इस एपीएस को टैंक के चारों ओर 360 डिग्री सुरक्षा देने के लिए डिजाइन किया जा रहा है। इसमें चार एक्स-बैंड एईएसए रडार और रडार, लेजर तथा इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर का संयुक्त इस्तेमाल होगा। इसके साथ दो घूमने वाले लॉन्चर लगाए जाएंगे और हर लॉन्चर में दो-दो काउंटर म्यूनिशन होंगे।
यह सिस्टम लगभग 1,000 मीटर की दूरी से आने वाले खतरे का पता लगाने में सक्षम होगा। दावा किया जा रहा है कि यह 1,500 मीटर प्रति सेकंड से अधिक रफ्तार से आने वाली मिसाइलों या अन्य हथियारों को भी इंटरसेप्ट कर सकेगा।
इस सिस्टम में हार्ड-किल और सॉफ्ट-किल दोनों तकनीकों को एक साथ शामिल किया जा रहा है। सिस्टम का उद्देश्य एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल, आरपीजी, ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन और टॉप-अटैक हथियारों से टैंक की सुरक्षा करना है।
सूत्रों ने बताया कि इस सिस्टम में ब्लास्ट-फ्रेगमेंटेशन वॉरहेड या काइनेटिक इंटरसेप्टर बेस्ड हार्ड-किल काउंटरमेजर लगाए जाएंगे। इसका रिस्पॉन्स टाइम बेहद कम होगा और यह टॉप-अटैक मिसाइल, एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (एटीजीएम), आरपीजी, ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन जैसे खतरों से टैंक की सुरक्षा करने के लिए तैयार किया जा रहा है। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बेस्ड थ्रेट प्रायोरिटाइजेशन फीचर भी डेवलप किया जा रहा है, ताकि एक साथ कई खतरों की स्थिति में सिस्टम पहले सबसे बड़े खतरे पर कार्रवाई कर सके।
अर्जुन एमके-1ए टैंक के लिए तैयार
सूत्रों के अनुसार इसका प्रोटोटाइप तैयार हो चुका है। कमांड प्रोसेसर, फायर कंट्रोल यूनिट, रीलोड मैकेनिज्म और सेंसर फ्यूजन मॉड्यूल जैसे प्रमुख हिस्से सफलतापूर्वक काम कर जा रहे हैं। वहीं लॉन्च ट्यूब, सॉलिड प्रोपेलेंट और ब्लास्ट वॉरहेड जैसे महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स को डीआरडीओ की अन्य प्रयोगशालाओं में डेवलप किया गया है।
इस प्रोजेक्ट में सीवीआरडीई के अलावा एलआरडीई रडार और इलेक्ट्रॉनिक्स, टीबीआरएल टर्मिनल बैलिस्टिक्स तथा एचईएमआरएल ब्लास्ट काउंटरमेजर से जुड़े कार्यों में सहयोग कर रही हैं।
इस एपीएस को सबसे पहले अर्जुन एमके-1ए टैंक के लिए तैयार किया जा रहा है, लेकिन इसे टी-90 भीष्म टैंकों पर भी लगाया जा सके, इसके लिए इसे मॉड्यूलर डिजाइन दिया गया है। इसका उद्देश्य पुराने टैंकों पर भी आसानी से इसे फिट करना है। (DRDO Active Protection System)
पोखरण में किये जा चुके हैं ट्रायल
सूत्रों ने बताया कि डीआरडीओ के स्वदेशी एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम (एपीएस) के शुरुआती परीक्षण राजस्थान के पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में किए जा चुके हैं। इन परीक्षणों में सिस्टम की क्षमता को अलग-अलग परिस्थितियों में परखा गया। इसके लिए आरपीजी-7 सिमुलेंट और लेजर-गाइडेड एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (एटीजीएम) जैसे खतरों के खिलाफ परीक्षण किए गए। इन ट्रायल्स का उद्देश्य यह देखना था कि सिस्टम आने वाले खतरे को कितनी जल्दी पहचान सकता है और उसे समय रहते रोक सकता है।
सूत्रों के मुताबिक अब इस परियोजना के अगले चरण में व्हीकल बेस्ड ट्रायल किए जाएंगे। इसके तहत इसी साल अर्जुन एमके-1ए टैंक पर सिस्टम को लगाकर ट्रायल किए जाने की योजना है। ये ट्रायल डीआरडीओ की कॉम्बैट अवडी, सीवीआरडीई में किए जाएंगे। इसके बाद भारतीय सेना के साथ यूजर ट्रायल भी किए जाएंगे।
सूत्रों के अनुसार शुरुआती ट्रायल्स में सिस्टम ने 90 प्रतिशत से अधिक सफलता दर हासिल की है। रेगिस्तानी माहौल, धूल और तेज हवा जैसी परिस्थितियों में भी सिस्टम ने शानदार प्रदर्शन किया। ट्रायल्स के दौरान यह आरपीजी और लेजर-गाइडेड मिसाइल जैसे खतरों को सफलतापूर्वक पहचानने और रोकने में सक्षम रहा। रडार, सेंसर फ्यूजन और फायर कंट्रोल सिस्टम का प्रदर्शन भी शानदार रहा है। साथ ही, खतरे की पहचान से लेकर रिस्पॉन्स टाइम भी बेहद कम रहा।
सूत्रों ने बताया कि बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए डीआरडीओ निजी डिफेंस कंपनियों के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर मॉडल पर काम कर सकता है। अभी किसी कंपनी का अंतिम चयन नहीं हुआ है, लेकिन लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी), टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, भारत फोर्ज और कुछ अन्य भारतीय रक्षा कंपनियों को संभावित भागीदारों के रूप में देखा जा रहा है। (DRDO Active Protection System)
टॉप-अटैक हथियारों से भी सुरक्षा देने की तैयारी
आधुनिक युद्ध में सबसे बड़ा खतरा केवल सामने से आने वाली मिसाइलें नहीं हैं। अब कई एंटी-टैंक मिसाइलें ऊपर से हमला करती हैं। टैंक का ऊपरी हिस्सा अपेक्षाकृत कमजोर माना जाता है। इसी वजह से डीआरडीओ के सिस्टम में टॉप-अटैक खतरों से सुरक्षा देने की क्षमता भी विकसित की जा रही है।
डीएसी से जुड़े दस्तावेजों के अनुसार नए एपीएस को 360 डिग्री सुरक्षा देने के साथ ऑडियो-वीजुअल वार्निंग, सॉफ्ट-किल और हार्ड-किल दोनों उपायों से लैस होना होगा। (DRDO Active Protection System)
भारतीय सेना को इसकी जरूरत क्यों महसूस हुई
यूक्रेन युद्ध ने दुनिया की लगभग सभी सेनाओं को यह दिखाया कि केवल मोटा आर्मर काफी नहीं है। ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन और आधुनिक एंटी-टैंक मिसाइलों ने बड़ी संख्या में टैंकों को नुकसान पहुंचाया। कई मामलों में ऊपर से हमला करने वाली मिसाइलों ने भारी सुरक्षा वाले टैंकों को भी निष्क्रिय कर दिया।
रक्षा सूत्रों का कहना है कि इसी अनुभव के बाद भारत भी अपने टैंक बेड़े की सुरक्षा को नए स्तर पर ले जाने की तैयारी कर रहा है।
भारतीय सेना के पास कितने टी-90 टैंक हैं
भारतीय सेना के पास 1,200 से अधिक टी-90 भीष्म टैंक सेवा में हैं। इसके अलावा अर्जुन मुख्य युद्धक टैंक भी सेना का हिस्सा हैं।
वर्तमान में इन टैंकों पर कोई स्वदेशी हार्ड-किल एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम तैनात नहीं है। इन्हें मुख्य रूप से कंपोजिट आर्मर और एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर के सहारे सुरक्षित रखा जाता है। वहीं, एपीएस मिलने के बाद इन टैंकों के सर्वाइवल रेट में बड़ा सुधार हो सकता है। (DRDO Active Protection System)
विदेशी सिस्टम भी हैं विकल्प
इजरायल का ट्रॉफी एपीएस दुनिया का सबसे ज्यादा युद्ध में इस्तेमाल किया गया हार्ड-किल सिस्टम माना जाता है। यह असली युद्ध में भी कई बार सफलतापूर्वक इंटरसेप्शन कर चुका है।
रूस के एरिना-एम और अफगानिट सिस्टम भी हार्ड-किल श्रेणी में आते हैं। हाल के महीनों में रूस के टी-90एम टैंक पर एरिना-एम के नए वर्जन की तस्वीरें भी सामने आई हैं। इस सिस्टम को आधुनिक ड्रोन और टॉप-अटैक खतरों से निपटने के लिए अपग्रेड बनाया जा रहा है।
ब्रिटेन और जर्मनी की कंपनियां भी अपने-अपने एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम पर काम कर रही हैं, जबकि साब का समाधान मुख्य रूप से सॉफ्ट-किल तकनीक पर आधारित माना जाता है।
लार्सन एंड टुब्रो और इजरायल की राफेल कंपनी के बीच भारत में ट्रॉफी एपीएस के निर्माण और इंटीग्रेशन को लेकर सहयोग की घोषणा पहले ही हो चुकी है। (DRDO Active Protection System)
स्वदेशी सिस्टम कितना सस्ता?
सूत्रों के अनुसार डीआरडीओ का स्वदेशी एपीएस प्रति टैंक लगभग 12 से 15 करोड़ रुपये की लागत का हो सकता है।
इसके मुकाबले रूस के अफगानिट जैसे विदेशी सिस्टम की अनुमानित लागत 18 से 22 करोड़ रुपये प्रति टैंक बताई जाती है।
यदि स्वदेशी सिस्टम सफल रहता है तो बड़े टैंक बेड़े पर इसे लगाने में लागत कम रहने के साथ स्पेयर पार्ट्स और सप्लाई चेन पर भी भारत की निर्भरता घट सकती है। (DRDO Active Protection System)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।



