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ड्रोन अटैक से बचेंगी भारतीय सेना की तोपें! फॉरवर्ड एरिया में तैनात पहली बार टोड आर्टिलरी गनों पर लगाया ये खास ‘जुगाड़’, देखें वीडियो

भारतीय सेना के पास कई तरह की टोड 155 मिलीमीटर आर्टिलरी गनें हैं, जिन्हें ट्रकों के जरिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जाता है। इन गनों में सेल्फ-प्रोपेल्ड गनों की तरह आर्मर्ड सिक्युरिटी नहीं होती...

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📍नई दिल्ली | 29 Jun, 2026, 11:13 AM

Towed Artillery Guns Anti Drone Cages: आधुनिक युद्ध में ड्रोन सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरे हैं। इसी चुनौती को देखते हुए भारतीय सेना ने अपनी आर्टिलरी यूनिट्स की सुरक्षा के लिए एक नया कदम उठाया है। पश्चिमी मोर्चे पर तैनात राइजिंग स्टार कोर (नौवीं कोर) ने पहली बार फॉरवर्ड एरिया में तैनात टोड आर्टिलरी गनों (खींची जाने वाली तोपखाना बंदूक सिस्टम) पर एंटी-ड्रोन केज लगाए हैं। सेना की किसी ऑपरेशनल फॉर्मेशन द्वारा इस तरह की व्यवस्था पहली बार अपनाई गई है।

Indian Army Anti Drone Cages: क्या हैं एंटी-ड्रोन केज

एंटी-ड्रोन केज धातु की मजबूत जाली और हल्के फ्रेम से बना एक सिक्योरिटी फ्रेमवर्क होता है, जिसे वेपन सिस्टम के ऊपर लगाया जाता है। इसे कई देशों में “कोप केज” के नाम से भी जाना जाता है। इसका उद्देश्य यह है कि यदि कोई ड्रोन सीधे हथियार या उसके क्रू पर हमला करने की कोशिश करे तो वह पहले इस जाली से टकराए।

यदि ड्रोन इस जाली में फंस जाता है या उससे टकरा जाता है तो उसका वारहेड टारगेट तक पहुंचने से पहले ही फट सकता है या उसका संतुलन बिगड़ सकता है। इससे मेन वेपन सिस्टम और उसके आसपास मौजूद सैनिकों को होने वाला नुकसान काफी कम हो जाता है। (Towed Artillery Guns Anti Drone Cages)

मजबूत सिंथेटिक नेट का इस्तेमाल

सूत्रों के मुताबिक, इन केजों में स्टील की जाली और मजबूत सिंथेटिक नेट का इस्तेमाल किया जाता है। बड़े ड्रोन मेटल की जाली से टकराते हैं, जबकि छोटे एफपीवी ड्रोन और क्वाडकॉप्टर नेट में उलझ सकते हैं। इससे उनका हमला सीधे गन तक नहीं पहुंच पाता।

इन केजों का डिजाइन इस तरह तैयार किया गया है कि जरूरत पड़ने पर इन्हें कुछ ही मिनटों में लगाया या हटाया जा सकता है। फायरिंग के समय भी इनकी बनावट ऐसी रखी जाती है कि तोप की बैरल की मूवमेंट और ऊंचाई पर ज्यादा असर न पड़े।

टोड आर्टिलरी गनों को क्यों मिली यह सुरक्षा

भारतीय सेना के पास कई तरह की टोड 155 मिलीमीटर आर्टिलरी गनें हैं, जिन्हें ट्रकों के जरिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जाता है। इन गनों में सेल्फ-प्रोपेल्ड गनों की तरह आर्मर्ड सिक्युरिटी नहीं होती। ऐसे में यदि किसी ड्रोन का हमला होता है तो गन और उसके चालक दल दोनों को ज्यादा खतरा रहता है।

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सूत्रों का कहना है कि इसी वजह से सबसे पहले फॉरवर्ड एरिया में तैनात टो आर्टिलरी गनों पर एंटी-ड्रोन केज लगाने का फैसला किया गया। इससे वेपन सिस्टम की सुरक्षा बढ़ेगी और गन क्रू को भी अतिरिक्त सुरक्षा मिलेगी। (Indian Army Anti Drone Cages)

क्या है वीडियो में

भारतीय सेना की राइजिंग स्टार कोर (नौवीं कोर) की तरफ से जारी वीडियो में दिखाया है कि सेना कैसे अपनी आर्टिलरी यूनिट्स को आधुनिक तकनीक से लैस कर रही है, ताकि दुश्मन का पता लगाने से लेकर उस पर हमला करने तक का समय बहुत कम किया जा सके। सेना इसे “सेंसर-टू-शूटर किल चेन” कहती है। यानी जैसे ही सेंसर किसी टाारगेट का पता लगाएं, उसी जानकारी के आधार पर कुछ ही समय में आर्टिलरी गन सटीक हमला कर सके।

वीडियो में एक ऊंचा मेटल मास्ट दिखाई देता है। यह ऑब्जर्वेशन पोस्ट, रडार या किसी आधुनिक सेंसर सिस्टम का हिस्सा हो सकता है। इसका काम दूर स्थित टारगेट की निगरानी करना और उसकी जानकारी कमांड पोस्ट तक पहुंचाना होता है।

इसके बाद सैनिकों को आधुनिक हथियारों के साथ अभ्यास करते हुए दिखाया गया है। वीडियो में दिन और रात दोनों समय निगरानी की क्षमता पर जोर दिया गया है। रात वाले हिस्से में ऊंचे पोल पर लगे कैमरे और सेंसर दिखाई देते हैं, जिनकी मदद से अंधेरे में भी इलाके पर नजर रखी जा सकती है।

वीडियो का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा थर्मल इमेजिंग का है। इसमें स्क्रीन पर थर्मल कैमरे की मदद से टारगेट दिखाई देता है और उस पर क्रॉसहेयर लगा होता है। पास में बैठे सैनिक और अधिकारी हेडसेट पहनकर उसी फीड की निगरानी करते हुए सेंसर से मिलने वाली जानकारी सीधे फायर कंट्रोल सिस्टम तक दे रहे हैं, ताकि टारगेट पर तेजी से कार्रवाई की जा सकती है।

वीडियो में रात के समय आर्टिलरी फायरिंग दिखाई गई है। इससे यह बताने की कोशिश की गई है कि आधुनिक सेंसर, थर्मल कैमरे, सुरक्षित संचार प्रणाली और एंटी-ड्रोन सुरक्षा के साथ भारतीय सेना अब दिन और रात दोनों समय तेजी से और अधिक सटीक तरीके से फायर मिशन पूरा करने की क्षमता विकसित कर रही है। (Towed Artillery Guns Anti Drone Cages)

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राइजिंग स्टार कोर ने उठाया पहला कदम

राइजिंग स्टार कोर का मुख्यालय हिमाचल प्रदेश के योल मिलिट्री स्टेशन में स्थित है। यह पश्चिमी कमांड के अधीन काम करती है और इसके जिम्मे पंजाब, जम्मू-कश्मीर तथा हिमाचल प्रदेश के कुछ संवेदनशील इलाके आते हैं।

इस कोर की जिम्मेदारी वाले इलाकों में सीमा के करीब कई महत्वपूर्ण सैन्य तैनातियां हैं। ऐसे में ड्रोन से होने वाले संभावित हमलों को देखते हुए आर्टिलरी गनों पर एंटी-ड्रोन केज लगाने का फैसला लिया गया। (Indian Army Anti Drone Cages)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ा ड्रोन पर फोकस

हाल के सैन्य अभियानों और सीमावर्ती इलाकों में ड्रोन के बढ़ते इस्तेमाल ने भारतीय सेना का ध्यान इस खतरे की ओर और अधिक बढ़ाया है। अब केवल निगरानी करने वाले ड्रोन ही नहीं, बल्कि विस्फोटक लेकर हमला करने वाले एफपीवी ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन भी युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं।

ऐसी स्थिति में केवल इलेक्ट्रॉनिक जैमर या एयर डिफेंस सिस्टम पर्याप्त नहीं माने जा रहे। सेना अब हथियार प्रणालियों की फिजिकल सेफ्टी को भी समान महत्व दे रही है। (Towed Artillery Guns Anti Drone Cages)

रूस-यूक्रेन युद्ध से मिले अहम सबक

रूस-यूक्रेन युद्ध ने पूरी दुनिया को दिखाया कि छोटे ड्रोन भी टैंक, आर्टिलरी गन और अन्य सैन्य प्लेटफॉर्म को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। कई मामलों में कुछ लाख रुपये के ड्रोन ने करोड़ों रुपये की सैन्य संपत्ति को नष्ट कर दिया।

इसी तरह नागोर्नो-कराबाख और पश्चिम एशिया के संघर्षों में भी ड्रोन का व्यापक इस्तेमाल हुआ। इन युद्धों के बाद दुनिया की कई सेनाओं ने अपनी सैन्य प्रणालियों पर अतिरिक्त सिक्योरिटी स्ट्रक्चर लगाने शुरू किए।

भारतीय सेना की मल्टी लेयर काउंटर-ड्रोन स्ट्रेटेजी

सूत्रों के मुताबिक, भारतीय सेना ड्रोन से निपटने के लिए कई स्तरों पर काम कर रही है। सबसे पहले रडार और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर के जरिए ड्रोन की पहचान की जाती है। इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक जैमर से ड्रोन का नियंत्रण बाधित करने की कोशिश होती है। जरूरत पड़ने पर एंटी-ड्रोन हथियारों से उसे मार गिराया जाता है।

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अब इन सभी उपायों के साथ एंटी-ड्रोन केज को भी शामिल किया जा रहा है। जो “लेयर्ड डिफेंस” यानी बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं। (Indian Army Anti Drone Cages)

पहले टैंकों पर भी लगाए जा चुके हैं ऐसे केज

रक्षा सूत्रों के अनुसार, भारतीय सेना इससे पहले टी-90 भीष्म टैंक, अर्जुन मुख्य युद्धक टैंक और कुछ अन्य सैन्य प्लेटफॉर्म पर भी ऐसे सिक्योरिटी स्ट्रक्चर का ट्रायल और इस्तेमाल कर चुकी है। अब पहली बार टोड आर्टिलरी गनों पर इस तरह का सिस्टम लगाया गया है। एंटी-ड्रोन केज की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी लागत अपेक्षाकृत कम होती है, लेकिन इससे हथियार प्रणाली की सुरक्षा काफी बढ़ जाती है। इसे स्थानीय स्तर पर भी तैयार किया जा सकता है और जरूरत के मुताबिक अलग-अलग हथियारों पर लगाया जा सकता है।

इसके अलावा यदि किसी केज को नुकसान पहुंचता है तो उसे बदलना भी आसान होता है। यही वजह है कि दुनिया की कई सेनाएं अब इस तरह की सुरक्षा व्यवस्था को तेजी से अपना रही हैं। (Towed Artillery Guns Anti Drone Cages)

बदलते युद्ध के मुताबिक बदल रही सेना

सूत्रों का कहना है कि भारतीय सेना लगातार बदलते बैटलफील्ड के अनुभवों का अध्ययन कर रही है और उसी के अनुसार अपने हथियारों तथा सैन्य प्लेटफॉर्म में जरूरी बदलाव कर रही है। राइजिंग स्टार कोर द्वारा टो की गई आर्टिलरी गनों पर एंटी-ड्रोन केज लगाना इसी प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है।

सेना के अनुसार, इसका उद्देश्य फॉरवर्ड एरिया में तैनात महत्वपूर्ण हथियारों की सुरक्षा बढ़ाना, गन क्रू को अतिरिक्त संरक्षण देना और ड्रोन जैसे नए खतरों के खिलाफ ऑपरेशनल तैयारी को मजबूत करना है। (Towed Artillery Guns Anti Drone Cages)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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