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Pinaka MBRL: ड्रोन या FPV अटैक से बचाने के लिए सेना ने पिनाका रॉकेट लॉन्चर पर लगाया यह खास ‘जुगाड़’, ऑपरेशन सिंदूर के बाद उठाया यह कदम

ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान को इसका अंदेशा लग गया था, भारत उसके खिलााफ पिनाका इस्तेमाल कर सकता है, तो उसने पिनाका की मूवमेंट पर नजर रखने के लिए निगरानी ड्रोन भेजे थे, जिन्हें भारतीय सुरक्षा बलों ने मार गिराया था...

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📍नई दिल्ली | 25 Sep, 2025, 7:04 PM

Pinaka MBRL: भारतीय सेना पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम को ड्रोन खतरों से सुरक्षित रखने के लिए एक नया कदम उठाया है। अब इन रॉकेट लॉन्चरों पर कोप केज लगाया जा रहा है। हाल ही में इसकी एक फोटो सामने आई जिसमें पिनाका सिस्टम के ऊपर कोप केज लगा हुआ है। सेना ने यह कदम रूस-यूक्रेन और इजराइल-हमास युद्धों से मिली सीख के बाद उठाया है। जहां ड्रोन ने पारंपरिक भारी हथियारों को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद इसे बड़े पैमाने पर अपनाना शुरू किया है। हालांकि इस ऑपरेशन में पिनाका का इस्तेमाल नहीं हुआ था।

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पिनाका भारत का स्वदेशी मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर जिसे डीआरडीओ ने बनाया है। यह सिस्टम 90 किमी तक की मारक क्षमता वाली मिसाइलें दाग सकता है। वहीं, आधुनिक युद्ध में छोटे, सस्ते और तेजी से तैनात होने वाले ड्रोन यानी यूएवी और एफपीवी फर्स्ट पर्सन व्यू टाइप ड्रोन से बड़े हथियारों बड़ा नुकसान देखने को मिल रहा है। इन चुनौतियों के देखते हुए भारतीय सेना ने पिनाका और अन्य आर्टिलरी सिस्टम पर ‘कोप केज’ लगाने का फैसला किया है।

कोप केज एक सस्ता और सरल जुगाड़ है, जो टैंक, रॉकेट लॉन्चर, और अन्य सैन्य उपकरणों के ऊपरी हिस्से पर लगाया जाता है। यह जालीदार स्ट्रक्चर ड्रोन से गिराए गए विस्फोटकों, लॉयटरिंग म्यूनिशन (जैसे कामिकेज़ ड्रोन), और टॉप-अटैक एंटी-टैंक मिसाइलों को रोकने में मदद करता है। यह हथियारों को सीधे टकराने से पहले विस्फोट को ट्रिगर करता है, जिससे नुकसान कम होता है और चालक दल सुरक्षित रहते हैं। भारत में इसे स्वदेशी रूप से बनाया जा रहा है, जो लागत को और कम करता है। भारतीय सेना ने यह तकनीक यूक्रेन-रशिया युद्ध और इजराइल-हमास संघर्ष से मिली सीख के बाद अपनाई है, क्योंकि इन संघर्षों में कोप-स्टाइल प्रोटेक्शन ने कई मौकों पर बड़े नुकसान होने से बचाया है।

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भारतीय सेनाओं ने 2023 से कोप केज का इस्तेमाल शुरू किया और ऑपरेशन सिंदूर के बाद इसकी तैनाती में तेजी देखी गई है। सैन्य सूत्र बताते हैं कि कोप केज को पहले कुछ प्रमुख प्लेटफॉर्म्स पर आजमाया गया, फिर बड़े पैमाने पर रोल-आउट किया गया। पिनाका बैटरियों, मोबाइल रॉकेट सिस्टम, कुछ बख्तरबंद वाहनों और लॉजिस्टिक्स काफिलों पर यह स्ट्रक्चर लगाया जा रहा है ताकि सीमाओं पर होने वाले ड्रोन हमलों का सामना बेहतर तरीके से किया जा सके।

एक बड़े फायदे के तौर पर कोप केज को सस्ता और फटाफट लगाये जाने वाला सिस्टम माना जा रहा है। इसे मौजूदा वाहनों और सिस्टम पर बिना किसी बड़े मैकेनिकल परिवर्तन के लगाया जा सकता है, जिससे लागत और समय दोनों बचते हैं। सैनिक कारवाईयों में कम-लागत जुगाड़ों की जरूरत उस समय देखने को मिली जब सस्ते ड्रोनों ने महंगे हथियारों को भी निशाना बनाना शुरू किया।

क्यों लगाया पिनाका पर?

ऑपरेशन सिंदूर में पिनाका का सीधा इस्तेमाल तो नहीं हुआ। हां, अग्रिम मोर्चों पर यह सिस्टम तैनात जरूर किया गया था और उसे रिजर्व में रखा गया था ताकि जरूरत पड़ने पर तुरंत काम में लिया जा सके। रक्षा सूत्रों का कहना है कि अगर पिनाका को सक्रिय रूप से उपयोग में लाया जाता तो विरोधी को मौजूदा नुकसान से कहीं ज्यादा झेलना पड़ता। सूत्रों ने बताया कि पाकिस्तान को इसका अंदेशा लग गया था, इसीलिए उसने पिनाका की मूवमेंट पर नजर रखने के लिए निगरानी ड्रोन भेजे थे, जिन्हें भारतीय सुरक्षा बलों ने मार गिराया।

पिनाका फील्ड में तेज प्लट-आउट और शूट-एंड-स्कूट कैपेबिलिटी देता है। सूत्रों के मुताबिक, 2025 तक पिनाका की कुछ रेजिमेंटें ऑपरेशनल हैं और आगे बढ़ते हुए और बैटरियां तैनात की जा रही हैं। फिलहाल पिनाका की 6 रेजिमेंट ऑपरेशनल हैं, जो कुल 18 बैटरी बनाती हैं। वहीं, 2025 के अंत तक 8 रेजिमेंट (24 बैटरी) और 2026 के मध्य तक 10 रेजिमेंट (30 बैटरी) ऑपरेशनल करने की योजना है। वहीं, पिनाका पर कोप केज लगाने का फैसला उन्हीं रेजिमेंट्स और बैटरी के ऑपरेशनल सुरक्षा स्तर को और बढ़ाने के मकसद से लिया गया है।

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पिनाका की एक बैटरी में छह लॉन्चर होते हैं और हर लॉन्चर में बारह रॉकेट लगे रहते हैं, यानी कुल मिलाकर एक बैटरी में 72 रॉकेट होते हैं। सूत्रों के अनुसार 72 रॉकेट लगभग 44 सेकंड में फायर किए जा सकते हैं। एक पूरी बैटरी की कटिंग-पॉवर लगभग 0.8 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को प्रभावी ढंग से तबाह कर सकती है और इसके जरिए एक बार में लगभग 7.2 टन विस्फोटक टारगेट को निशाना बना सकता है।

किन हथियारों पर हो रहा इस्तेमाल

भारतीय सेना ने कोप केज को विभिन्न बख्तरबंद वाहनों, आर्टिलरी सिस्टम, और लॉजिस्टिक इक्विपमेंट्स पर तैनात किया है। भारतीय सेना का मुख्य युद्धक टैंक टी-90 भीष्म अब टॉप-अटैक प्रोटेक्शन केज (TAPC) से लैस है। यह टरेट के ऊपर लगाया गया है ताकि ड्रोन और मिसाइल हमलों से ऊपरी कवच की रक्षा हो सके। इसकी शुरुआत 2023 में पश्चिमी कमांड (पाकिस्तान सीमा) पर हुई।

Pinaka MBRL Cope Cage
T-90 Tank with Cope Cage

वहीं, मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री यूनिट्स में इस्तेमाल होने वाला बीएमपी-2 सरथ इन्फैंट्री फाइटिंग व्हीकल (IFV) भी अब कोप केज से लैस है। 2025 में पहली बार इसकी पूरी फ्लीट पर यह जाली लगाई गई, ताकि FPV (फर्स्ट-पर्सन व्यू) ड्रोन्स से होने वाले हमलों से बचा जा सके।

इसके अलावा बीएम-21 रॉकेट लॉन्चर जो वज्र कोर का हिस्सा है। 2025 में इस पर कोप केज लगाए गए ताकि ड्रोन हमलों से लॉन्चर और क्रू की सुरक्षा हो।

साथ ही, लंबी दूरी के बीएम-30 स्मर्च रॉकेट लॉन्चर को भी 2025 में कोप केज से अपग्रेड किया गया है। यह आर्टिलरी रेजिमेंट्स में तैनात है और टॉप-अटैक ड्रोंस से बचाव के लिए इसका इस्तेमाल हो रहा है। यह सिस्टम 90 किमी तक मार कर सकता है।

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105 एमएम इंडियन फील्ड गन पर भी अगस्त 2025 से कोप केज लगाया गया है। यह आर्टिलरी गन क्रू और ब्रेच एरिया को एफपीवी ड्रोंस और लॉयटरिंग म्यूनिशन से बचाता है।

इसके अलावा सीमा पर लॉजिस्टिक सप्लाई के लिए इस्तेमाल होने वाले अशोक लेलैंड स्टैलियन ट्रकों पर 16 फीट×9 फीट का वायर मेश केज लगाया गया। जून 2025 से यह बॉर्डर कन्वॉय में ड्रोन हमलों से सामान की सुरक्षा करता है।

हाल के मिलिट्री अभ्यासों में कोप केज वाले प्लेटफ़ॉर्म ने अच्छा प्रदर्शन दिखाया है। सैनिकों और इकाइयों से मिले फीडबैक में यह बात सामने आई कि यह उपाय कारगर है। फील्ड-इंस्पेक्शन्स और रन-ऑफ-ऑपरेशन टेस्ट के बाद कर्नल स्तर के कमांडरों ने इसे सीमाओं पर तैनात करने की सिफारिशें दी हैं। साथ ही टेक्निकल प्रयोगशालाओं में इसके डिजाइन में सुधार के सुझाव भी उठाए जा रहे हैं ताकि वजन कम करके और अधिक असरदार बनाया जा सके।

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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