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डीआरडीओ का ‘नेत्र’ अब फुल कॉम्बैट रेडी, रडार से लेकर बैटल मैनेजमेंट तक संभालेगा मोर्चा

‘नेत्र’ के तीन विमान भारतीय वायुसेना की नंबर 200 स्क्वाड्रन से जुड़े हैं। यह यूनिट पंजाब के भिसियाना एयर बेस से ऑपरेट होती है। इन विमानों का इस्तेमाल एयरबोर्न सर्विलांस और बैटल मैनेजमेंट भूमिका में किया जाता है...

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📍नई दिल्ली/बेंगलुरु | 25 Jun, 2026, 9:38 PM

Netra AWACS FOC: भारतीय वायुसेना को स्वदेशी ‘नेत्र’ एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम का फाइनल ऑपरेशनल क्लियरेंस (FOC) मिल गया है। एफओसी मिलने में करीब इसे नौ साल का लंबा वक्त लगा, जिसमें सिस्टम ने पहले शुरुआती ऑपरेशनल क्लियरेंस हासिल किया, फिर असली मिलिट्री ऑपरेशंस में काम किया। वहीं यूजर फीडबैक मिलने के बाद इसे ऑपरेशनल मंजूरी दी गई।

डीआरडीओ ने 25 जून को बेंगलुरु में भारतीय वायुसेना को ‘नेत्र’ का फाइनल ऑपरेशनल क्लियरेंस सर्टिफिकेट सौंपा। समारोह की अध्यक्षता करते हुए डिप्टी चीफ ऑफ एयर स्टाफ एयर मार्शल अवधेश कुमार भारती ने बालाकोट स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सिस्टम के ऑपरेशनल इस्तेमाल और इसकी विश्वसनियता का जिक्र किया। उन्होंने यह भी कहा कि स्वदेशी तकनीक होने की वजह से आज की मौजूदा जरूरतों को देखते हुए सिस्टम में जरूरी बदलाव करना आसान होता है।

‘नेत्र’ भारत का पहला स्वदेशी एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल प्लेटफॉर्म है। इसे आसमान में तैनात ‘आंख’ कहा जाता है, लेकिन इसका काम केवल दूर तक देखना नहीं है। यह हवा में उड़ते हुए लड़ाकू विमानों, मिसाइलों, ड्रोन, हेलीकॉप्टरों और सतह पर मौजूद गतिविधियों की जानकारी जुटाता है। फिर उस जानकारी को लड़ाकू विमानों, ग्राउंड कंट्रोल स्टेशनों और कमांड नेटवर्क तक पहुंचाने में मदद करता है।

Netra AWACS FOC: 2017 में आईओसी मिला था, अब ऑपरेशनल मंजूरी

नेत्र’ को 2017 में इनिशियल ऑपरेशनल क्लियरेंस मिला था। इसका मतलब है कि सिस्टम एक निश्चित कॉन्फिगरेशन में ऑपरेशनल इस्तेमाल के लिए तैयार है, लेकिन उसके कुछ परफॉर्मेंस स्टैंडर्ड्स, मिशन प्रोफाइल, विश्वसनीयता आंकड़ों और यूजर की जरूरतों को देखते हुए सिस्टम पर आगे काम जारी रहता है।

वहीं, फाइनल ऑपरेशनल क्लियरेंस में सिस्टम को तय ऑपरेशनल जरूरतों, फ्लाइट टेस्ट, एयरवर्थिनेस, मिशन सिस्टम इंटीग्रेशन और यूजर इवैल्यूशन के बाद अंतिम स्तर की मंजूरी मिलती है। इसमें लंबे समय तक उड़ान, अलग-अलग मौसम, इलेक्ट्रोनिक एन्वायर्नमेंट, कम्यूनिकेशन नेटवर्क, मिशन क्रू के कामकाज और युद्ध जैसी परिस्थितियों में सिस्टम के व्यवहार की जांच शामिल रहती है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार, ‘नेत्र’ के आईओसी से एफओसी तक के सफर में भारतीय वायुसेना के ऑपरेशनल अनुभव का अहम स्थान रहा। वास्तविक अभियानों में मिले अनुभव ने यह समझने में मदद की कि हवा में मौजूद कमांड प्लेटफॉर्म से किस तरह की सूचना चाहिए, उसे कितनी तेजी से भेजना है और मिशन क्रू को किस प्रकार की मदद की जरूरत पड़ती है।

‘नेत्र’ के तीन विमान भारतीय वायुसेना की नंबर 200 स्क्वाड्रन से जुड़े हैं। यह यूनिट पंजाब के भिसियाना एयर बेस से ऑपरेट होती है। इन विमानों का इस्तेमाल एयरबोर्न सर्विलांस और बैटल मैनेजमेंट भूमिका में किया जाता है। (Netra AWACS FOC)

बालाकोट के बाद सिंदूर से मिला ऑपरेशनल अनुभव

फरवरी 2019 में बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद भारतीय वायुसेना के लिए एयर सर्विलांस, एयर डिफेंस कंट्रोल की जरूरत महसूस हुई। ऐसे मिशनों में एयरबोर्न अर्ली वार्निंग सिस्टम हवा में रहकर एक विस्तृत एयर पिक्चर तैयार करता है।

इस एयर पिक्चर में रडार स्क्रीन पर अलग-अलग दिशा से आ रहे विमानों की पहचान, उनकी ऊंचाई, रफ्तार, मार्ग, इलेक्ट्रॉनिक संकेत और मित्र या शत्रु होने की जानकारी को जोड़ा जाता है। इसके बाद कंट्रोलर लड़ाकू विमानों को जरूरी दिशा, ऊंचाई या इंटरसेप्शन निर्देश दे सकते हैं।

रक्षा मंत्रालय ने बताया कि ‘नेत्र’ ने बालाकोट स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपनी योग्यता साबित की। सूत्रों के अनुसार वास्तविक ऑपरेशनल फीडबैक ने सिस्टम सॉफ्टवेयर स्टैबिलिटी, डेटा हैंडलिंग, मिशन डिस्प्ले, कम्युनिकेशन इंटीग्रेशन और क्रू वर्कलोड जैसे क्षेत्रों में सुधार की प्रक्रिया को दिशा दी।

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युद्ध या तनावपूर्ण ऑपरेशन में सिस्टम को एक साथ कई प्रकार की सूचनाएं संभालनी पड़ती हैं। लड़ाकू विमान, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, ड्रोन, रडार वार्निंग सिग्नल, ग्राउंड बेस्ड रडार और कम्यूनिकेशन नेटवर्क से आने वाला डेटा तेजी से बदलता रहता है। ऐसे समय में केवल टारगेट देखना काफी नहीं होता। सही टारगेट को सही समय पर सही फाइटर तक पहुंचाना अधिक महत्वपूर्ण होता है। (Netra AWACS FOC)

ऑपरेशन सिंदूर में भरोसे की परीक्षा

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ‘नेत्र’ के इस्तेमाल और विश्वसनीयता का उल्लेख स्वयं डिप्टी चीफ ऑफ एयर स्टाफ ने किया। इससे यह संकेत मिलता है कि सिस्टम ने केवल टेस्ट फ्लाइट्स में नहीं, बल्कि ऑपरेशनल एन्वायरनमेंट में भी अपनी भूमिका निभाई।

एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल विमान किसी भी हवाई अभियान में कमांड और कंट्रोल की परत को मजबूत करता है। यह विमान ऊंचाई पर उड़ते हुए दूर तक रडार कवरेज देता है। जमीन पर लगे रडार की भी सीमा होती है। वहीं, हवा में मौजूद रडार प्लेटफॉर्म को इस तरह की समस्या नहीं होती।

‘नेत्र’ जैसे प्लेटफॉर्म का काम कम ऊंचाई पर उड़ते टारगेट की पहचान में मदद करना है। कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमान, क्रूज मिसाइल या ड्रोन को पकड़ना चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि वे जमीन की सतह और अन्य संकेतों के बीच छिप सकते हैं। एयरबोर्न रडार उन्हें काफी ऊपर से देख सकता है।

सूत्रों के अनुसार, आईओसी के बाद मिले फीडबैक में मिशन सॉफ्टवेयर, डेटा फ्यूजन और ऑपरेटर इंटरफेस पर विशेष ध्यान दिया गया। (Netra AWACS FOC)

क्या है ‘नेत्र’ और यह हवा में कैसे काम करता है

‘नेत्र’ एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम ब्राजील की एम्ब्रेयर ईआरजे-145 क्षेत्रीय जेट पर बना है। यह मूल रूप से एक छोटा यात्री विमान प्लेटफॉर्म है, लेकिन डीआरडीओ के सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स ने इसे मिशन एयरक्राफ्ट के रूप में बदला।

इस विमान के ऊपर एक बड़ा एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे रडार लगाया गया है। इसे एईएसए रडार कहा जाता है। सामान्य रडार में एंटीना को मेकैनिकली घुमाया जाता है, जबकि एईएसए रडार में हजारों छोटे ट्रांसमिट-रिसीव मॉड्यूल होते हैं। ये इलेक्ट्रॉनिक तरीके से बीम को अलग-अलग दिशा में भेजते हैं।

इस तकनीक का लाभ यह है कि रडार तेजी से स्कैन कर सकता है और एक साथ कई टारगेट्स को ट्रैक कर सकता है। ‘नेत्र’ के रडार को लगभग 240 डिग्री कवरेज के लिए डिजाइन किया गया है। विमान के ऊपर लगे रडार डोम को देखने पर यह एक लंबी आयताकार संरचना जैसा दिखाई देता है, जिसे बैलेंस बीम रडार भी कहा जाता है।

रडार के अलावा विमान में इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स भी लगाए गए हैं। यह सिस्टम दुश्मन के रडार, संचार या अन्य इलेक्ट्रॉनिक एमीशन को पकड़ने में मदद करता है। कई बार कोई टारगेट रडार स्क्रीन पर स्पष्ट नहीं दिखता, लेकिन उसके इलेक्ट्रॉनिक संकेत से उसकी मौजूदगी का अंदाजा लगाया जा सकता है। (Netra AWACS FOC)

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आसान नहीं था छोटे एम्ब्रेयर विमान पर बड़ा रडार लगाना 

‘नेत्र’ कार्यक्रम की सबसे मुश्किल कहानी विमान के ऊपर रडार लगाने से जुड़ी है। एम्ब्रेयर ईआरजे-145 एक छोटा जेट है। इसे मूल रूप से यात्रियों को ले जाने के लिए बनाया गया था। ऐसे विमान पर भारी रडार, मिशन कंप्यूटर, ऑपरेटर कंसोल, कूलिंग सिस्टम, बिजली की जरूरत और संचार उपकरण लगाना एक सामान्य मॉडिफिकेशन नहीं होता।

रडार केवल वजन नहीं बढ़ाता। बल्कि उसका आकार और विमान की छत पर उसकी स्थिति और हवा के प्रवाह को भी बदल देता है। विमान की रफ्तार, ईंधन खपत, स्टेबिलिटी, और नियंत्रण क्षमता पर इसका असर पड़ सकता है। इसलिए एयरफ्रेम में स्ट्रक्चरल रीइन्फोर्समेंट की जरूरत पड़ती है। इसका मतलब है कि विमान के ढांचे के कुछ हिस्सों को अतिरिक्त मजबूती दी जाती है, ताकि वह रडार डोम का वजन और उड़ान के दौरान लगने वाली फोर्सको सह सके।

इसके साथ ही सेंटर ऑफ ग्रेविटी का संतुलन बनाए रखना जरूरी होता है। यदि विमान के ऊपर भारी उपकरण लगा दिया जाए और वजन का संतुलन बिगड़ जाए, तो उड़ान सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। इसलिए मिशन उपकरणों, बिजली इकाइयों, केबलिंग, कंसोल और अन्य सिस्टम की स्थिति बहुत सोच-समझकर तय की जाती है।

सूत्रों के अनुसार, इस तरह के प्लेटफॉर्म में थर्मल मैनेजमेंट भी एक बड़ी चुनौती होता है। एईएसए रडार, मिशन कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम काफी गर्मी पैदा करते हैं। उस गर्मी को नियंत्रित करने के लिए विशेष कूलिंग व्यवस्था चाहिए। यदि तापमान नियंत्रण ठीक नहीं हो, तो इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की विश्वसनीयता घट सकती है। (Netra AWACS FOC)

बिजली और कूलिंग का अलग मिशन सिस्टम

यात्री विमान में बिजली की जरूरत मुख्य रूप से फ्लाइट कंट्रोल, केबिन सिस्टम, रोशनी, संचार और इंजन से जुड़े उपकरणों के लिए होती है। लेकिन एयरबोर्न अर्ली वार्निंग प्लेटफॉर्म में रडार, सर्वर, डेटा प्रोसेसर, इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट सिस्टम और मिशन कंसोल लगातार बिजली लेते हैं।

इसी कारण ‘नेत्र’ में पावर मैनेजमेंट एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रिब्यूशन ऐसा होना चाहिए कि किसी एक सिस्टम में समस्या आने पर पूरा मिशन सिस्टम बंद न हो। इसके लिए रिडंडेंसी का सिद्धांत अपनाया जाता है। रिडंडेंसी का अर्थ है कि किसी जरूरी सिस्टम के लिए बैकअप व्यवस्था उपलब्ध हो।

विमान में ड्यूल ऑक्सिलरी पावर यूनिट जैसी व्यवस्था का उद्देश्य भी बिजली और सहायक प्रणालियों की विश्वसनीयता बढ़ाना है। मिशन के दौरान रडार और अन्य सेंसर को लगातार चलना होता है। इसके साथ एयर कंडीशनिंग और इलेक्ट्रॉनिक कूलिंग की जरूरत भी बनी रहती है।

एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग क्षमता इस प्लेटफॉर्म के लिए एक और महत्वपूर्ण तकनीकी पहलू है। हवा में ईंधन भरने के लिए विमान पर रिफ्यूलिंग प्रोब लगाया जाता है। यह प्रोब विमान की नाक के पास या आगे के हिस्से में दिखता है। रिफ्यूलिंग के दौरान विमान को टैंकर के पीछे तय दूरी और गति पर स्थिर रहना पड़ता है। इसके लिए पायलटिंग, फ्लाइट कंट्रोल और एयरफ्रेम इंटीग्रेशन में विशेष मानक अपनाने होते हैं। (Netra AWACS FOC)

कॉम्बैट मैनेजमेंट में ‘नेत्र’ की भूमिका

‘नेत्र’ केवल निगरानी विमान नहीं है। इसका वास्तविक महत्व बैटल मैनेजमेंट में है। बैटल मैनेजमेंट का अर्थ है कि हवा में मौजूद अलग-अलग प्लेटफॉर्म को एक ही ऑपरेशनल तस्वीर के आधार पर निर्देशित करना होता है।

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जब कई लड़ाकू विमान एक साथ मिशन पर हों, तो उनके बीच कॉर्डिनेशन जरूरी होता है। किस विमान को किस दिशा में जाना है, कौन सा लक्ष्य प्राथमिक है, किस खतरे से दूरी रखनी है और किस समय इंटरसेप्शन करना है, ऐसी जानकारी एयरबोर्न कंट्रोलर के जरिए दी जा सकती है।

‘नेत्र’ से मिलने वाली जानकारी को ग्राउंड आधारित एयर डिफेंस नेटवर्क से जोड़ा जाता है। भारतीय वायुसेना का इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (आईएसीसीएस) कहा जाता है, अलग-अलग रडार और सेंसर से मिलने वाली जानकारी को जोड़ने का काम करता है। एयरबोर्न प्लेटफॉर्म इस नेटवर्क को ऊंचाई से मिलने वाली सूचना देता है।

ऑपरेशन सिंदूर के संदर्भ में एयर मार्शल अवधेश कुमार भारती ने स्वदेशी सिस्टम में बदलाव करने की क्षमता को महत्वपूर्ण बताया। इसका मतलब यह है कि जरूरत पड़ने पर मिशन सॉफ्टवेयर, डेटा प्रोसेसिंग या इंटरफेस में बदलाव के लिए विदेशी मूल उपकरण निर्माता पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना पड़ता। (Netra AWACS FOC)

दोस्त और दुश्मन की पहचान में आईएफएफ की भूमिका

हवाई युद्ध में सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि स्क्रीन पर दिख रहा लक्ष्य अपना है या विरोधी। इसी काम के लिए आइडेंटिफिकेशन फ्रेंड या फो सिस्टम इस्तेमाल होता है। इसे आईएफएफ कहा जाता है।

यदि कोई विमान सही कोड के साथ जवाब देता है, तो सिस्टम उसे मित्र विमान के रूप में पहचानने में मदद करता है। यदि जवाब नहीं मिलता या संदिग्ध संकेत मिलते हैं, तो उसे आगे जांच के लिए चिन्हित किया जा सकता है। यह प्रक्रिया ऑपरेटर, खुफिया सूचना और अन्य सेंसर डेटा के साथ मिलकर काम करती है।

‘नेत्र’ में रडार, इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स, आईएफएफ और कम्युनिकेशन सिस्टम एक साथ काम करते हैं। यही कारण है कि इसे फ्लाइंग कमांड सेंटर कहा जाता है। यह केवल किसी लक्ष्य को देखता नहीं, बल्कि उसकी पहचान, ट्रैकिंग और प्रतिक्रिया की प्रक्रिया में भी भूमिका निभाता है। (Netra AWACS FOC)

स्वदेशी सिस्टम का रखरखाव आसान

विदेशी एयरबोर्न अर्ली वार्निंग सिस्टम खरीदने पर उसके रडार, सॉफ्टवेयर, स्पेयर पार्ट्स और अपग्रेड के लिए मूल निर्माता देश पर निर्भरता रहती है। कई बार किसी संवेदनशील सॉफ्टवेयर बदलाव या नए हथियार डेटा लिंक के इंटीग्रेशन के लिए लंबी मंजूरी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।

‘नेत्र’ स्वदेशी कार्यक्रम होने के कारण भारतीय वायुसेना, डीआरडीओ और घरेलू उद्योग के पास सिस्टम को समझने और उसमें बदलाव करने की क्षमता मौजूद है। यह क्षमता केवल उत्पादन के स्तर पर नहीं, बल्कि पूरे जीवनकाल के रखरखाव में महत्वपूर्ण होती है।

सूत्रों के अनुसार, फाइनल ऑपरेशनल क्लियरेंस तक पहुंचने में यही यूजर-साइंटिस्ट तालमेल निर्णायक रहा। वायुसेना ने ऑपरेशनल जरूरत बताई, वैज्ञानिकों ने उसे तकनीकी रूप दिया और उद्योग ने सिस्टम निर्माण तथा इंटीग्रेशन में भूमिका निभाई। (Netra AWACS FOC)

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