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डीआरडीओ के पूर्व प्रमुख डॉ. वी.के. सारस्वत बने डी-प्रोपल्स के चेयरमैन, ड्रोन और मिसाइल इंजन तकनीक पर करेंगे मार्गदर्शन

डॉ. वी.के. सारस्वत देश के जाने-माने रक्षा वैज्ञानिक हैं। वह पहले डीआरडीओ के प्रमुख और सचिव रह चुके हैं। वह नीति आयोग के सदस्य भी रहे हैं। उन्हें पद्म श्री और पद्म भूषण सम्मान मिल चुका है...

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📍नई दिल्ली | 22 Jun, 2026, 9:19 PM

Dr VK Saraswat D-Propulse Chairman: डीआरडीओ के पूर्व प्रमुख डॉ. विजय कुमार सारस्वत अब डी-प्रोपल्स एयरोस्पेस प्राइवेट लिमिटेड के बोर्ड चेयरमैन बन गए हैं। कंपनी के अनुसार, उन्होंने 8 जून से यह जिम्मेदारी संभाल ली है। डी-प्रोपल्स नई दिल्ली की एक भारतीय एयरोस्पेस कंपनी है, जो ड्रोन और मिसाइलों के लिए नई इंजन तकनीक पर काम कर रही है।

कंपनी का मुख्य काम रोटेटिंग डेटोनेशन इंजन यानी आरडीई तकनीक को विकसित करना है। यह ऐसा इंजन है जो ड्रोन और मिसाइल जैसे तेज गति वाले प्लेटफॉर्म को ताकत दे सकता है। डॉ. सारस्वत अब कंपनी की तकनीकी टीम को इस इंजन के विकास और परीक्षण में मार्गदर्शन देंगे।

डी-प्रोपल्स के सीईओ सौरव झा ने कहा कि डॉ. सारस्वत का कंपनी से जुड़ना उसके लिए महत्वपूर्ण है। कंपनी भारत में अपनी एयर-ब्रीदिंग इंजन तकनीक विकसित करना चाहती है, ताकि इंजन से जुड़ी जरूरी तकनीक देश के पास रहे।

Dr VK Saraswat D-Propulse Chairman: कौन हैं डॉ. वी.के. सारस्वत

डॉ. वी.के. सारस्वत देश के जाने-माने रक्षा वैज्ञानिक हैं। वह पहले डीआरडीओ के प्रमुख और सचिव रह चुके हैं। वह नीति आयोग के सदस्य भी रहे हैं। उन्हें पद्म श्री और पद्म भूषण सम्मान मिल चुका है।

डॉ. सारस्वत ने भारत के कई बड़े मिसाइल कार्यक्रमों में काम किया है। पृथ्वी, धनुष और अग्नि-5 मिसाइल के विकास में उनकी भूमिका रही है। भारत के बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस कार्यक्रम से भी वह जुड़े रहे हैं। इस कार्यक्रम का उद्देश्य दुश्मन की बैलिस्टिक मिसाइल को हवा में पहचानकर उसे नष्ट करने की क्षमता तैयार करना है।

कंपनी का कहना है कि डॉ. सारस्वत के अनुभव से उसे इंजन तकनीक, मिसाइल सिस्टम, रक्षा नीति और बड़े तकनीकी प्रोजेक्ट को चलाने में मदद मिलेगी।

किस तकनीक पर काम कर रही है डी-प्रोपल्स

डी-प्रोपल्स एक भारतीय डीप-टेक एयरोस्पेस कंपनी है। यह ऐसी तकनीक पर काम करती है जिसमें इंजन उड़ान के दौरान हवा को बाहर के वातावरण से लेता है। इसी हवा को ईंधन के साथ मिलाकर इंजन शक्ति पैदा करता है।

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ऐसे इंजन को एयर-ब्रीदिंग इंजन कहा जाता है। जेट इंजन, रैमजेट और स्क्रैमजेट भी इसी तरह के इंजन होते हैं। इनमें ऑक्सीजन को अलग टैंक में लेकर जाने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि इंजन हवा से ऑक्सीजन लेता है।

कंपनी का कहना है कि वह ऐसा इंजन बनाना चाहती है जो आकार में छोटा हो, वजन में हल्का हो और ईंधन का बेहतर इस्तेमाल करे। यह तकनीक खास तौर पर तेज गति वाले ड्रोन और मिसाइलों के लिए उपयोगी हो सकती है।

रोटेटिंग डेटोनेशन इंजन क्या है

रोटेटिंग डेटोनेशन इंजन को आसान शब्दों में समझें तो इसमें ईंधन और हवा का मिश्रण बहुत तेज तरीके से जलता है। सामान्य जेट इंजन में ईंधन धीरे और नियंत्रित तरीके से जलता है। लेकिन आरडीई में ईंधन और हवा के मिश्रण के अंदर बहुत तेज दबाव की लहर बनती है।

इस दबाव वाली लहर को डेटोनेशन वेव कहा जाता है। यह इंजन के अंदर गोलाकार रास्ते में लगातार घूमती रहती है। इसी वजह से इसका नाम रोटेटिंग डेटोनेशन इंजन रखा गया है।

जब यह दबाव वाली लहर घूमती है तो इंजन के पीछे से गर्म गैसें बहुत तेजी से निकलती हैं। इन गैसों की ताकत से थ्रस्ट पैदा होता है। थ्रस्ट वह ताकत है जो किसी मिसाइल, ड्रोन या विमान को आगे की तरफ धकेलती है।

सामान्य जेट इंजन से क्यों है अलग

सामान्य गैस टर्बाइन इंजन में कई हिस्से घूमते हैं। इसमें कंप्रेसर हवा को दबाता है। इसके बाद हवा और ईंधन को मिलाकर जलाया जाता है। फिर गर्म गैसें टर्बाइन से गुजरती हैं और टर्बाइन इंजन के कई हिस्सों को चलाती है।

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डी-प्रोपल्स का कहना है कि आरडीई के मुख्य हिस्से में ऐसे घूमने वाले पुर्जों की जरूरत नहीं होती। कंपनी ने दावा किया है कि इस इंजन में शून्य मूविंग पार्ट्स हो सकते हैं। इसका मतलब है कि इंजन के दहन वाले हिस्से में कंप्रेसर ब्लेड या टर्बाइन ब्लेड जैसे जटिल घूमने वाले हिस्से नहीं होंगे।

कंपनी के अनुसार, इससे इंजन का आकार छोटा और वजन कम रखा जा सकता है। हालांकि इस तकनीक को वास्तविक ड्रोन या मिसाइल में इस्तेमाल करने से पहले कई स्तरों पर परीक्षण करना जरूरी होता है।

डी-प्रोपल्स ने कहा है कि उसकी आरडीई तकनीक पारंपरिक इंजन की तुलना में 15 से 25 प्रतिशत तक अधिक थर्मल एफिशिएंसी दे सकती है। इसका आसान मतलब है कि इंजन ईंधन से मिलने वाली ऊर्जा का ज्यादा हिस्सा उपयोगी ताकत में बदल सकता है।

कंपनी ने यह भी दावा किया है कि आरडीई का थ्रस्ट-टू-वेट रेशियो रैमजेट और गैस टर्बाइन इंजन की तुलना में तीन गुना तक हो सकता है। थ्रस्ट-टू-वेट रेशियो का मतलब है कि इंजन अपने वजन के मुकाबले कितनी ताकत पैदा करता है।

यदि कोई इंजन कम वजन में ज्यादा थ्रस्ट देता है, तो ड्रोन या मिसाइल में ज्यादा ईंधन, सेंसर या अन्य उपकरण लगाने की जगह मिल सकती है। कंपनी का यह भी कहना है कि समान थ्रस्ट देने वाले रैमजेट या गैस टर्बाइन इंजन की तुलना में आरडीई को छोटा बनाया जा सकता है।

कंपनी के ये दावे अभी उसके तकनीकी विकास कार्यक्रम से जुड़े हैं। इंजन का वास्तविक प्रदर्शन परीक्षण, ईंधन, उड़ान की ऊंचाई, गति, तापमान और प्लेटफॉर्म की डिजाइन पर निर्भर करेगा।

आरडीई इंजन बनाना आसान नहीं

आरडीई तकनीक में सबसे बड़ी चुनौती इंजन के भीतर बनने वाली तेज दबाव तरंग को लगातार स्थिर रखना है। इंजन के अंदर हवा और ईंधन की सही मात्रा पहुंचनी चाहिए। तापमान और दबाव को भी नियंत्रित रखना पड़ता है।

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यदि डेटोनेशन वेव स्थिर नहीं रहती तो इंजन का प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है। इसलिए आरडीई के परीक्षण में तेज गति से डेटा रिकॉर्ड करने वाले सेंसर, तापमान मापने वाले उपकरण और दबाव मापने वाले विशेष यंत्र इस्तेमाल किए जाते हैं।

इंजन के दहन कक्ष को बहुत अधिक तापमान और दबाव सहना पड़ता है। इसलिए उसके लिए विशेष धातु और गर्मी सहने वाली सामग्री की जरूरत होती है। इंजन की एयर इनटेक, ईंधन सप्लाई और नोजल डिजाइन भी महत्वपूर्ण होते हैं।

डी-प्रोपल्स के अनुसार, डॉ. वी.के. सारस्वत और कंपनी के मुख्य तकनीकी अधिकारी डॉ. वी. रामानुजाचारी पहले भी साथ काम कर चुके हैं। दोनों पहले डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के समय के इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम से साथ रहे हैं।

यह भारत का बड़ा मिसाइल विकास कार्यक्रम था। इसके तहत पृथ्वी, अग्नि, आकाश, त्रिशूल और नाग जैसी मिसाइलों पर काम हुआ था। इस कार्यक्रम ने भारत को मिसाइल डिजाइन, गाइडेंस सिस्टम, इंजन तकनीक और लॉन्च सिस्टम में घरेलू क्षमता विकसित करने में मदद की।

कंपनी ने बताया कि डॉ. सारस्वत और डॉ. रामानुजाचारी अब डी-प्रोपल्स की युवा वैज्ञानिक और इंजीनियर टीम को मार्गदर्शन देंगे। टीम आरडीई तकनीक को ड्रोन और मिसाइल उपयोग के लिए विकसित कर रही है।

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