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DRDO को चाहिए घातक टर्बोजेट इंजन, वजन हो 25 किग्रा से कम, देता हो 180 किलोग्राम-फोर्स तक का थ्रस्ट

डीआरडीओ ने इस इंजन के लिए बेहद खास तकनीकी जरूरतें तय की हैं। इंजन का व्यास 275 मिलीमीटर और लंबाई 540 मिलीमीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। इसके बावजूद इसे 130 से 180 किलोग्राम-फोर्स तक थ्रस्ट पैदा करना होगा...

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📍नई दिल्ली | 22 May, 2026, 7:00 AM

DRDO Compact Turbojet Engine EoI: डीआरडीओ ने भारत के रक्षा और एयरोस्पेस सेक्टर से जुड़ी कंपनियों के लिए एक बेहद अहम एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) जारी किया है। हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमारत (आरसीआई) ने 130 से 180 किलोग्राम-फोर्स थ्रस्ट वाले कॉम्पैक्ट टर्बोजेट इंजन सिस्टम के लिए ईओआई जारी की है। खास बात यह है कि डीआरडीओ केवल उन्हीं इंजनों में दिलचस्पी दिखा रहा है जो पहले से फ्लाइट-प्रूवन हों, यानी किसी उड़ने वाले प्लेटफॉर्म पर सफलतापूर्वक इस्तेमाल किए जा चुके हों।

यह ईओआई भारत के मिसाइल, टारगेट ड्रोन और लॉयटरिंग म्यूनिशन प्रोग्राम्स के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। छोटे आकार के लेकिन ज्यादा ताकतवर टर्बोजेट इंजन मॉडर्न वेपन सिस्टम्स का अहम हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे इंजन लंबी दूरी तक उड़ान भरने वाले ड्रोन, टारगेट एयरक्राफ्ट और क्रूज मिसाइलों में इस्तेमाल होते हैं।

DRDO Compact Turbojet Engine EoI: क्या चाहता है डीआरडीओ

आरसीआई ने साफ कहा है कि उसे ऐसा टर्बोजेट इंजन चाहिए जो पहले से किसी एयर या ग्राउंड लॉन्च सिस्टम में उड़ान भर चुका हो। नई तकनीक या केवल डेवलपमेंट स्टेज वाले प्रस्ताव स्वीकार नहीं किए जाएंगे। कंपनियों को यह साबित करना होगा कि उनका इंजन पहले किसी सिस्टम पर इस्तेमाल हो चुका है और उसे संबंधित एजेंसी से फ्लाइट क्लियरेंस भी मिला हुआ है।

डीआरडीओ ने अपने डॉक्यूमेंट में कहा है कि इंजन के साथ उससे जुड़ी सभी जरूरी एक्सेसरीज भी कंपनियों को देनी होंगी। इसमें फ्यूल पंप, फ्यूल लाइन, इंजन कंट्रोल यूनिट, वाल्व, ग्राउंड टेस्ट सिस्टम और दूसरी तकनीकी चीजें शामिल हैं। फ्यूल टैंक डीआरडीओ खुद विकसित करेगा, लेकिन बाकी पूरा सिस्टम कंपनी को उपलब्ध कराना होगा। (DRDO Compact Turbojet Engine EoI)

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180 किलोग्राम-फोर्स तक थ्रस्ट

डीआरडीओ ने इस इंजन के लिए बेहद खास तकनीकी जरूरतें तय की हैं। इंजन का व्यास 275 मिलीमीटर और लंबाई 540 मिलीमीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। इसके बावजूद इसे 130 से 180 किलोग्राम-फोर्स तक थ्रस्ट पैदा करना होगा।

इसके अलावा इंजन का कुल वजन 25 किलोग्राम से कम होना चाहिए। हालांकि इतने हल्के वजन में इतना ज्यादा थ्रस्ट हासिल करना आसान नहीं होता। यही वजह है कि दुनिया में बहुत कम कंपनियां इस कैटेगरी के कॉम्पैक्ट टर्बोजेट इंजन बनाती हैं।

डीआरडीओ चाहता है कि यह इंजन 9.5 किलोमीटर से ज्यादा ऊंचाई पर भी काम कर सके और 0.9 मैक तक की स्पीड पर भी काम करे। साथ ही इसे बेहद ठंडे और गर्म मौसम में भी स्टार्ट होना चाहिए। ईओआई के मुताबिक इंजन माइनस 30 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 40 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में भी काम करना चाहिए।

किन वेपन सिस्टम में हो सकता है इस्तेमाल

हालांकि डीआरडीओ ने आधिकारिक तौर पर किसी विशेष प्रोजेक्ट का नाम नहीं लिया है, लेकिन जानकार मानते हैं कि इस तरह के इंजन कई तरह की सिस्टम्स में इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

इसमें हाई-स्पीड टारगेट ड्रोन, लॉयटरिंग म्यूनिशन, छोटे क्रूज मिसाइल सिस्टम और एयर-लॉन्च प्लेटफॉर्म शामिल हो सकते हैं। भारत पहले से “अभ्यास” जैसे हाई-स्पीड एक्सपेंडेबल एरियल टारगेट डेवलप कर चुका है। ऐसे सिस्टम्स में छोटे लेकिन ज्यादा पावर वाले इंजन की जरूरत होती है।

आधुनिक युद्ध में ड्रोन और लॉयटरिंग म्यूनिशन की भूमिका तेजी से बढ़ी है। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों में छोटे जेट इंजन वाले ड्रोन और क्रूज हथियारों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल देखा गया है। ऐसे में भारत भी अपनी स्वदेशी क्षमता मजबूत करने पर जोर दे रहा है। (DRDO Compact Turbojet Engine EoI)

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ग्राउंड टेस्टिंग की भी शर्त

डीआरडीओ ने इंजन सप्लाई के साथ कंपनियों से पूरी टेस्टिंग क्षमता भी मांगी है। डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि कंपनियों के पास अलग-अलग आरपीएम और ऊंचाई की परिस्थितियों में इंजन की ग्राउंड टेस्टिंग करने की क्षमता होनी चाहिए।

इसके अलावा कंपनियों को इंजन का “कैरेक्टरिस्टिक मॉडल” भी देना होगा। जिसमें इंजन अलग-अलग स्पीड, ऊंचाई और मैक नंबर पर कितना थ्रस्ट देगा, उसका पूरा डेटा उपलब्ध कराना होगा। यह डेटा मिसाइल और ड्रोन डिजाइन के दौरान बेहद अहम होता है क्योंकि उसी के आधार पर उड़ान का व्यवहार तय किया जाता है। (DRDO Compact Turbojet Engine EoI)

कौन कंपनियां ले सकेंगी हिस्सा

डीआरडीओ ने ईओआई में कंपनियों के लिए कई सख्त शर्तें रखी हैं। केवल वही कंपनियां भाग ले सकेंगी जो कंपनी एक्ट के तहत रजिस्टर्ड हों और जिनके पास एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ा वैध एएस9100 या समकक्ष सर्टिफिकेशन हो।

इसके अलावा इंजन को किसी मान्यता प्राप्त एजेंसी से फ्लाइट क्लियरेंस मिला होना जरूरी है। कंपनियों को यह भी साबित करना होगा कि उनका इंजन पहले से किसी एयर या ग्राउंड लॉन्च प्लेटफॉर्म पर उड़ान भर चुका है।

डीआरडीओ ने कंपनियों से उनके पुराने ऑर्डर, रक्षा क्षेत्र में अनुभव और अन्य देशों या भारतीय संस्थानों के साथ किए गए काम का रिकॉर्ड भी मांगा है। (DRDO Compact Turbojet Engine EoI)

भारत अभी भी आयात पर निर्भर

भारत ने मिसाइल और ड्रोन तकनीक में काफी प्रगति की है, लेकिन छोटे जेट इंजनों के मामले में अब भी विदेशी कंपनियों पर निर्भरता बनी हुई है। दुनिया में अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, रूस और कुछ यूरोपीय कंपनियां इस तकनीक में आगे मानी जाती हैं।

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रक्षा क्षेत्र के जानकारों के मुताबिक टर्बोजेट इंजन बनाना बेहद जटिल काम है। इसमें हाई-टेम्परेचर मेटल, सटीक एयरफ्लो डिजाइन, माइक्रो-टर्बाइन और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स का इस्तेमाल होता है।

यही वजह है कि डीआरडीओ इस बार किसी नई तकनीक पर रिस्क लेने के बजाय फ्लाइट-प्रूवन सिस्टम चाहता है, ताकि विकास प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ सके।

डीआरडीओ ने 29 मई को आरसीआई हैदराबाद में टेक्निकल इंटरैक्शन मीटिंग रखी है। इसमें इच्छुक कंपनियां हिस्सा लेकर तकनीकी जरूरतों पर चर्चा कर सकेंगी। ईओआई जमा करने की अंतिम तारीख 11 जून है, जबकि प्रपोजल्स को 12 जून को खोला जाएगा।

डीआरडीओ ने साफ किया है कि केवल उन्हीं कंपनियों को आगे की आरएफपी यानी रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा जो प्री-क्वालिफिकेशन शर्तें पूरी करेंगी। (DRDO Compact Turbojet Engine EoI)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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