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Explainer: पिनाका LRGR की 60 KM मिनिमम रेंज क्यों है गेमचेंजर? जानिए कैसे बढ़ी भारतीय सेना की स्ट्राइक पावर

युद्ध के दौरान दुश्मन हमेशा एक निश्चित दूरी पर नहीं होता। कई बार दुश्मन की अग्रिम चौकियां 60 से 70 किलोमीटर दूर होती हैं, जबकि कई बार टारगेट 100 किलोमीटर से भी ज्यादा दूरी पर हो सकता है...

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📍नई दिल्ली | 8 Jul, 2026, 8:34 PM

Pinaka Long Range Guided Rocket: डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) ने बुधवार को पिनाका लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट (एलआरजीआर) का सफल परीक्षण किया। खास बात यह रही कि इस बार रॉकेट को उसकी अधिकतम दूरी पर नहीं, बल्कि यूजर डिफाइंड 60 किलोमीटर की मिनिमम रेंज पर परखा गया। सूत्रों के मुताबिक यह परीक्षण इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे यह साबित हुआ कि रॉकेट कम दूरी पर भी उतनी ही सटीकता से हमला कर सकता है, जितना लंबी दूरी पर करता है।

परीक्षण के दौरान रॉकेट को भारतीय सेना के मौजूदा पिनाका लॉन्चर से ही दागा गया। उड़ान के दौरान उसने तय ट्रैजेक्टरी पर चलते हुए तय टारगेट को सटीक निशाना बनाया।

Pinaka Long Range Guided Rocket: क्या होती है मिनिमम रेंज और यह क्यों है जरूरी

अक्सर किसी मिसाइल या रॉकेट को लेकर जब बात होती है, तो उसकी रेंज को लेकर होती है। लेकिन न्यूनतम दूरी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। मिनिमम रेंज का मतलब उस सबसे कम दूरी से है, जहां तक कोई रॉकेट पूरी क्षमता के साथ सुरक्षित और सटीक तरीके से हमला कर सकता है।

यदि कोई हथियार केवल अधिकतम दूरी के लिए बनाया गया हो, तो वह नजदीक के टारगेट पर प्रभावी नहीं रह जाता। ऐसे में सेना को अलग वेपन सिस्टम का सहारा लेना पड़ता है। पिनाका एलआरजीआर की 60 किलोमीटर की न्यूनतम दूरी इस समस्या को काफी हद तक खत्म करती है। अब एक ही लॉन्चर से अपेक्षाकृत नजदीक और दूर, दोनों तरह के टारगेट्स को निशाना बनाया जा सकता है। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

युद्ध के मैदान में क्यों बढ़ जाता है इसका महत्व

सूत्रों का कहना है कि युद्ध के दौरान दुश्मन हमेशा एक निश्चित दूरी पर नहीं होता। कई बार दुश्मन की अग्रिम चौकियां 60 से 70 किलोमीटर दूर होती हैं, जबकि कई बार टारगेट 100 किलोमीटर से भी ज्यादा दूरी पर हो सकता है।

ऐसी स्थिति में सेना के लिए सबसे बड़ी जरूरत एक ऐसे हथियार की होती है, जो अलग-अलग दूरी पर समान सटीकता के साथ काम करे। पिनाका एलआरजीआर इसी जरूरत को पूरा करता है। यदि किसी कमांडर को अचानक 65 किलोमीटर दूर मौजूद टारगेट पर हमला करना हो, तो उसे किसी दूसरे हथियार का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

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गाइडेड रॉकेट में मिनिमम रेंज क्यों तय की जाती है

सामान्य रॉकेट और गाइडेड रॉकेट में बड़ा अंतर यह होता है कि गाइडेड रॉकेट उड़ान के दौरान लगातार अपनी दिशा नियंत्रित करता रहता है।

रॉकेट लॉन्च होने के बाद पहले फेज में स्थिर उड़ान हासिल करता है। इसके बाद उसका नेविगेशन और गाइडेंस सिस्टम एक्टिव होकर उसे सही ट्रैजेक्टरी पर रखता है। आखिरी चरण में कंट्रोल सिस्टम छोटे-छोटे सुधार करता है ताकि टारगेट पर सटीक हमला हो सके।

यदि दूरी बहुत कम हो तो रॉकेट को इन सभी प्रक्रियाओं के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलता। इसी कारण हर गाइडेड हथियार की एक न्यूनतम प्रभावी दूरी तय की जाती है। पिनाका एलआरजीआर में यह दूरी 60 किलोमीटर रखी गई है। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

एक ही लॉन्चर से कई दूरी के टारगेट

पिनाका सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत इसकी कॉमन लॉन्चर फिलॉसफी है। सूत्रों के अनुसार सेना को नए रॉकेट के लिए अलग लॉन्चर खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

मौजूदा पिनाका लॉन्चर से ही स्टैंडर्ड पिनाका रॉकेट, गाइडेड पिनाका और लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट दागे जा सकते हैं। इससे लॉजिस्टिक आसान होती है और सिस्टम पर भी कम खर्च आता है।

एक ही प्लेटफॉर्म से लगभग 60 किलोमीटर से लेकर 120 किलोमीटर तक की दूरी पर टारगेट साधने की क्षमता सेना के लिए बेहद फायदेमंद मानी जा रही है। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

गाइडेड तकनीक कैसे करती है काम

पिनाका एलआरजीआर सामान्य अनगाइडेड रॉकेट की तरह केवल बैलिस्टिक रास्ते पर नहीं उड़ता। रॉकेट में आधुनिक नेविगेशन और गाइडेंस तकनीक लगी है, जो उड़ान के दौरान उसकी दिशा पर लगातार नजर रखती है। यदि हवा, तापमान या अन्य कारणों से रॉकेट अपनी तय दिशा से थोड़ा भी हटता है, तो कंट्रोल सिस्टम तुरंत उसे सही रास्ते पर वापस लाने का प्रयास करता है।

इसी वजह से इसकी सटीकता पहले के अनगाइडेड रॉकेट की तुलना में काफी बेहतर मानी जाती है।

सेना को क्या मिलेगा फायदा

इस नई क्षमता से भारतीय सेना की रॉकेट आर्टिलरी पहले के मुकाबले ज्यादा फायदेमंद हो जाएगी। पहले अलग-अलग दूरी के टारगेट्स के लिए अलग हथियारों की जरूरत पड़ सकती थी। अब एक ही प्लेटफॉर्म से कई दूरी पर हमला किया जा सकेगा।

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इससे ऑपरेशन की योजना बनाना आसान होगा, प्रतिक्रिया देने में कम समय लगेगा और हथियारों की तैनाती भी ज्यादा प्रभावी तरीके से की जा सकेगी। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

डीएसी ने भी दी थी मंजूरी

दिसंबर 2025 में डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) ने पिनाका लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट परियोजना को मंजूरी दी थी। इस परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 2,500 करोड़ रुपये रखी गई थी। इसमें केवल रॉकेट ही नहीं बल्कि उनसे जुड़े सपोर्ट सिस्टम और अन्य आवश्यक उपकरण भी शामिल हैं। डीएसी की मंजूरी मिलने के बाद इस प्रणाली के उत्पादन और सेना में शामिल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

नवंबर 2024 में पूरे हुए थे 75 किमी वाले गाइडेड पिनाका के परीक्षण

नवंबर 2024 में डीआरडीओ ने 75 किलोमीटर रेंज वाले गाइडेड पिनाका रॉकेट के महत्वपूर्ण फ्लाइट ट्रायल पूरे किए थे। ये परीक्षण प्रोविजनल स्टाफ क्वालिटेटिव रिक्वायरमेंट्स (पीएसक्यूआर) वैलिडेशन ट्रायल का हिस्सा थे। इनका उद्देश्य यह देखना था कि रॉकेट तय दूरी पर कितनी सटीकता से हमला करता है और लगातार कई रॉकेट दागे जाने पर उसका प्रदर्शन कैसा रहता है।

परीक्षण के दौरान दो अलग-अलग भारतीय कंपनियों द्वारा बनाए गए रॉकेटों को अलग-अलग लॉन्चरों से दागा गया। इसमें रेंज, सटीकता, स्थिरता और फायरिंग की गति जैसे सभी प्रमुख मानकों की जांच की गई। इन परीक्षणों के सफल रहने के बाद सेना के लिए गाइडेड पिनाका की राह और आसान हुई। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

दिसंबर 2025 में पहली बार 120 किलोमीटर रेंज वाला एलआरजीआर उड़ा

29 दिसंबर 2025 को डीआरडीओ ने पहली बार पिनाका लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट का सफल फ्लाइट टेस्ट किया। यह परीक्षण ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज से किया गया था। उस समय रॉकेट को उसकी अधिकतम डिजाइन रेंज यानी लगभग 120 किलोमीटर तक दागा गया।

पूरी उड़ान के दौरान रॉकेट ने निर्धारित ट्रैजेक्टरी का पालन किया और लक्ष्य पर सटीक प्रहार किया। रेंज पर मौजूद सभी ट्रैकिंग सिस्टम ने उड़ान के हर चरण की निगरानी की। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इस नए रॉकेट को भारतीय सेना के मौजूदा पिनाका लॉन्चर से ही दागा गया। इससे यह साबित हो गया कि नए सिस्टम के लिए अलग लॉन्चर विकसित करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

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सात रेजिमेंट पूरी तरह ऑपरेशनल

सूत्रों के मुताबिक भारतीय सेना में पिनाका की सात रेजिमेंट पूरी तरह ऑपरेशनल हैं, जबकि आठवीं रेजिमेंट को भी आवश्यक उपकरण मिलने शुरू हो गए हैं। इसी दौरान एलआरजीआर को इन रेजिमेंटों में शामिल करने की तैयारी शुरू हुई। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

आर्मेनिया बना पहला विदेशी ग्राहक

भारत ने गाइडेड पिनाका प्रणाली का पहला निर्यात आर्मेनिया को किया है। 18 जनवरी 2026 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नागपुर स्थित सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड के संयंत्र से गाइडेड पिनाका रॉकेटों की पहली खेप को रवाना किया। रक्षा सूत्रों के अनुसार आर्मेनिया ने पहले ही पिनाका की चार बैटरियों के लिए करीब 2,000 करोड़ रुपये का समझौता किया था। इसी सौदे के तहत गाइडेड रॉकेट भी शामिल हैं। यह पहला अवसर था जब भारत ने गाइडेड पिनाका प्रणाली किसी विदेशी देश को निर्यात की। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

भारतीय उद्योग की भी बड़ी भूमिका

पिनाका कार्यक्रम में सरकारी और निजी दोनों क्षेत्र की कंपनियां शामिल हैं। डीआरडीओ ने इसकी तकनीक विकसित की है, जबकि उत्पादन का काम अलग-अलग भारतीय कंपनियों को दिया गया है।

रॉकेट निर्माण में म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड और इकोनॉमिक एक्सप्लोसिव्स लिमिटेड की भूमिका है। वहीं लॉन्चर और उससे जुड़े वाहनों के विकास में लार्सन एंड टुब्रो तथा टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स जैसी कंपनियां भी योगदान दे रही हैं। (Pinaka Long Range Guided Rocket)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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