📍नई दिल्ली/जकार्ता | 7 Jul, 2026, 3:23 PM
Astra Missile Indonesia Deal: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को नई मजबूती मिली है। यात्रा के दौरान ब्रह्मोस मिसाइल सहयोग, एयर-टू-एयर मिसाइल सहयोग, सैन्य प्रशिक्षण, समुद्री सुरक्षा और रक्षा तकनीक से जुड़े कई अहम समझौतों और पहलों पर सहमति बनी। खास बात यह है कि इंडोनेशिया भारत में बनी अस्त्र (Astra) एयर-टू-एयर मिसाइल को अपने सु-27 और सु-30 लड़ाकू विमानों के लिए खरीदना चाहता है। इंडोनेशिया 150 से अधिक अस्त्र एमके-1 मिसाइलें खरीदने पर विचार कर रहा है। साथ ही भविष्य में लंबी दूरी वाली अस्त्र एमके-2 मिसाइल को भी शामिल करने की संभावना पर चर्चा चल रही है।
भारत और इंडोनेशिया के बीच एयर-टू-एयर मिसाइल सहयोग से न केवल दोनों देशों के रक्षा संबंध और मजबूत होंगे। वहीं इंडोनेशिया के भारतीय अस्त्र मिसाइल के खरीदने से भारत के रक्षा निर्यात को बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को वैश्विक पहचान मिलेगी।
इसके साथ ही दोनों देशों के बीच रक्षा तकनीक, सैन्य प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग भी बढ़ेगा। यह सहयोग भारत के स्वदेशी मिसाइल विकास कार्यक्रम और रक्षा अनुसंधान को भी मजबूती देगा।
Astra Missile Indonesia Deal: क्यों बढ़ी अस्त्र मिसाइल की मांग
इंडोनेशियाई वायुसेना में कई देशों के लड़ाकू विमान शामिल हैं। इसमें 33 अमेरिकी एफ-16, 5 रूसी सु-27 और 11 सु-30, और 6 फ्रांस के राफेल विमान शामिल हैं। इंडोनेशिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती रूसी मूल के हथियारों और मिसाइलों की समय पर सप्लाई की है। पिछले कुछ सालों में वैश्विक हालात बदलने के बाद रूस से स्पेयर पार्ट्स और मिसाइलों की सप्लाई प्रभावित हुई है। ऐसे में इंडोनेशिया ऐसे विकल्प तलाश रहा है जो तकनीकी रूप से आधुनिक होने के साथ भरोसेमंद सप्लाई चेन भी उपलब्ध कराएं।
सूत्रों का कहना है कि इस खरीद में मिसाइल को इंडोनेशिया के फाइटर जेट्स के साथ जोड़ने, पायलटों और तकनीकी स्टाफ की ट्रेनिंग तथा लॉजिस्टिक सपोर्ट भी शामिल हैं।
अस्त्र एमके-1 मिसाइल की क्या है रेंज
अस्त्र एमके-1 भारत की पहली स्वदेशी बियॉन्ड विजुअल रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल है। यह दुश्मन के लड़ाकू विमान को काफी दूर से निशाना बनाने के लिए विकसित की गई है।
अगर मिसाइल सामने से आ रहे टारगेट (हेड-ऑन) पर दागी जाए, तो इसकी मारक क्षमता लगभग 110 किलोमीटर तक होती है। वहीं, अगर टारगेट मिसाइल से दूर जा रहा हो (टेल-चेज), तो इसकी प्रभावी रेंज करीब 20 से 40 किलोमीटर रहती है।
सूत्रों का कहना है कि हाल के सालों में मिसाइल की परफॉरमेंस में कई सुधार किए गए हैं। ऑपरेशनल अनुभवों और परीक्षणों के आधार पर इसकी प्रभावी रेंज को बढ़ाकर लगभग 160 किलोमीटर तक पहुंचाने की दिशा में काम किया गया है, जिससे यह पहले की तुलना में अधिक दूरी से टारगेट को निशाना बनाने में सक्षम हो गई है।
तकनीकी रूप से यह मिसाइल मैक 4.5 से अधिक यानी लगभग 5,500 किलोमीटर प्रति घंटे से ज्यादा की रफ्तार से उड़ सकती है। इसकी लंबाई लगभग 3.6 से 3.84 मीटर, वजन करीब 154 किलोग्राम और व्यास 178 मिलीमीटर है। इसमें लगभग 15 किलोग्राम का प्री-फ्रैगमेंटेड हाई-एक्सप्लोसिव वारहेड लगाया गया है, जो टारगेट के पास पहुंचकर अधिकतम नुकसान पहुंचाने के लिए तैयार किया गया है।
मिसाइल में सिंगल-पल्स स्मोकलेस सॉलिड रॉकेट मोटर लगी है, जिससे उड़ान के दौरान धुएं का निशान बहुत कम बनता है, जिससे कम आरसीएस बनता है और दुश्मन के लिए इसे पहचानना कठिन हो जाता है। (Astra Missile Indonesia Deal)
🚨 BREAKING | Big India–Indonesia Defence & Strategic Boost Expected
Ahead of PM Narendra Modi’s meeting with Indonesian President Prabowo Subianto, several major outcomes are expected, according to sources:🔹 Indonesia likely to expand its BrahMos missile inventory, with India… https://t.co/fuZSSNjSHh pic.twitter.com/Qe6nREHzHD
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) July 7, 2026
सु-30 पर इंटीग्रेशन क्यों आसान माना जा रहा है
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इंडोनेशिया के सु-27 और सु-30 लड़ाकू विमान उसी फ्लैंकर परिवार के हैं, जिस पर भारतीय वायुसेना का सु-30एमकेआई बना है।
भारतीय वायुसेना कई सालों से सु-30 पर अस्त्र मिसाइल को ऑपरेट कर रही है। इसलिए इंडोनेशिया के विमान पर इस मिसाइल को जोड़ने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान मानी जा रही है।
हालांकि दोनों विमानों में कुछ इलेक्ट्रॉनिक और एवियोनिक्स का अंतर हैं, लेकिन बेसिक प्लेटफॉर्म एक जैसा होने के कारण बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव की जरूरत पड़ने की संभावना बेहद कम है।
कैसे होती है किसी मिसाइल की इंटीग्रेशन
किसी भी नई मिसाइल को सीधे विमान के नीचे लगाकर उड़ाया नहीं जा सकता। इसके लिए लंबी तकनीकी प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है।
सबसे पहले यह सुनिश्चित किया जाता है कि मिसाइल विमान के हार्डपॉइंट्स यानी उन स्थानों पर सुरक्षित तरीके से लग सके, जहां हथियार लगाए जाते हैं। इसके लिए विशेष लॉन्च रेल और एडॉप्टर लगाए जाते हैं।
इसके बाद विमान के वेपन मैनेजमेंट सिस्टम में बदलाव किए जाते हैं ताकि कॉकपिट से मिसाइल को कंट्रोल किया जा सके।
इसके बाद फायर कंट्रोल सिस्टम और विमान के रडार को मिसाइल के साथ जोड़ा जाता है ताकि टारगेट की जानकारी लगातार मिसाइल तक पहुंचती रहे।
जब यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है तब ग्राउंड टेस्ट, कैरी टेस्ट, सेपरेशन टेस्ट और आखिर में एक्चुअल फायरिंग ट्रायल्स किए जाते हैं। (Astra Missile Indonesia Deal)
अस्त्र मिसाइल को कैसे मिलता है टारगेट
अस्त्र भारत की पहली स्वदेशी लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइल है, जिसे डीआरडीओ ने विकसित किया है और इसका उत्पादन भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (बीडीएल) कर रही है।
अस्त्र एक बियॉन्ड विजुअल रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल है। इसका मतलब है कि यह ऐसे टारगेट पर भी हमला कर सकती है जिसे पायलट अपनी आंखों से नहीं देख सकता।
जब विमान का रडार किसी दुश्मन विमान को खोज लेता है तो उसकी स्थिति, गति और दिशा की जानकारी मिसाइल के कंप्यूटर में भेजी जाती है।
मिसाइल लॉन्च होने के बाद शुरुआती चरण में इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम के आधार पर आगे बढ़ती है। उड़ान के दौरान विमान से डेटालिंक के जरिए टारगेट की नई जानकारी लगातार भेजी जाती रहती है।
जब मिसाइल टारगेट के काफी करीब पहुंच जाती है, तब उसका एक्टिव रडार सीकर अपने आप चालू हो जाता है। इसके बाद मिसाइल स्वयं टारगेट को खोजकर उसका पीछा करती है और उस पर हमला करती है।
इसी कारण इसे फायर एंड फॉरगेट कैटेगरी की मिसाइल माना जाता है।
रडार और सीकर कैसे करते हैं काम
अस्त्र एमके-1 में टारगेट तक पहुंचने के लिए कई आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। उड़ान की शुरुआत में यह इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम की मदद से आगे बढ़ती है। बीच की उड़ान में लड़ाकू विमान से डेटालिंक के जरिए टारगेट की नई जानकारी मिलती रहती है। अंतिम चरण में इसका स्वदेशी एक्टिव रडार सीकर अपने आप टारगेट को खोजकर उसका पीछा करता है और सटीक हमला करता है।
अस्त्र मिसाइल का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उसका एक्टिव रडार सीकर है। शुरुआती उड़ान के दौरान मिसाइल पूरी तरह विमान पर निर्भर रहती है।
यदि टारगेट दिशा बदलता है तो सीकर लगातार उसका पीछा करता रहता है। मिसाइल में इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग से बचने के लिए ईसीसीएम (इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटर मेजर्स) क्षमता भी दी गई है, जिससे दुश्मन द्वारा रडार को भ्रमित करने की कोशिश का असर कम हो जाता है। (Astra Missile Indonesia Deal)
अस्त्र मिसाइल की कितनी है कीमत?
सूत्रों और उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अस्त्र एमके-1 मिसाइल की एक यूनिट की कीमत लगभग 7 से 8 करोड़ रुपये है। यही कीमत इसे दुनिया की आधुनिक बियॉन्ड विजुअल रेंज एयर-टू-एयर (BVRAAM) मिसाइलों में सबसे किफायती विकल्पों में शामिल करती है।
अस्त्र एमके-2 की आधिकारिक कीमत अभी सार्वजनिक नहीं की गई है। हालांकि, इसमें अधिक लंबी मारक क्षमता और ड्यूल-पल्स रॉकेट मोटर जैसी नई तकनीक जोड़ी जा रही है। ऐसे में इसकी कीमत करीब 9 से 10 करोड़ रुपये प्रति मिसाइल हो सकती है।
यदि कीमत की तुलना की जाए, तो भारत की अस्त्र एमके-1 सबसे सस्ती है। रूस की आर-77 मिसाइल की कीमत पहले कम थी, लेकिन हाल के सालों में सप्लाई चेन की दिक्कतों के कारण इसकी कीमत बढ़ गई है और अब इसकी एक मिसाइल की लागत लगभग 8.5 से 10 करोड़ रुपये या उससे अधिक मानी जाती है।
चीन की पीएल-15 मिसाइल की अनुमानित कीमत लगभग 8.5 से 10.5 करोड़ रुपये प्रति यूनिट है।
अमेरिका की एआईएम-120 (AMRAAM) मिसाइल के आधुनिक संस्करण की कीमत करीब 9.5 करोड़ से 15 करोड़ रुपये प्रति मिसाइल तक है।
वहीं यूरोप की मीटिओर (Meteor) मिसाइल सबसे महंगी है। इसकी एक मिसाइल की कीमत लगभग 18 से 20 करोड़ रुपये तक है।
अस्त्र की सबसे बड़ी ताकत इसकी कम कीमत और स्वदेशी निर्माण है। विदेशी मिसाइलों की तुलना में इसे खरीदने में कम खर्च आता है और इसके रखरखाव पर भी कम लागत आती है।
चूंकि यह पूरी तरह भारतीय तकनीक पर आधारित है, इसलिए इसके लिए किसी तीसरे देश की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं पड़ती। स्पेयर पार्ट्स, मरम्मत और सॉफ्टवेयर अपग्रेड भी देश के भीतर ही किए जा सकते हैं।
रूस की आर-77 मिसाइल लंबे समय से कई देशों द्वारा इस्तेमाल की जा रही है, लेकिन हाल के वर्षों में सप्लाई और स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता प्रभावित हुई है।
यूरोप की मीटिओर मिसाइल तकनीकी रूप से बेहद आधुनिक मानी जाती है, लेकिन इसकी ऊंची कीमत के कारण केवल कुछ ही देश इसे खरीद पाते हैं।
अमेरिका की एम्राम मिसाइल दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली एयर-टू-एयर मिसाइलों में शामिल है, लेकिन इसके निर्यात पर अमेरिकी नियम लागू होते हैं और खरीद प्रक्रिया भी काफी जटिल होती है।
चीन की पीएल-15 लंबी दूरी की मिसाइल है, लेकिन इसकी उपलब्धता सीमित है और इसका निर्यात भी चुनिंदा देशों तक ही रहता है। (Astra Missile Indonesia Deal)
केवल मिसाइल नहीं, पूरा वेपन पैकेज मिलेगा
किसी भी देश को केवल मिसाइलें नहीं बेची जातीं। इसके साथ एक पूरा ऑपरेशनल पैकेज दिया जाता है।
इस पैकेज में मिसाइलों के अलावा लॉन्चर इंटरफेस, टेस्ट इक्विपमेंट, स्पेयर पार्ट्स, ग्राउंड सपोर्ट सिस्टम, तकनीकी दस्तावेज, सॉफ्टवेयर अपडेट और रखरखाव से जुड़ी सुविधाएं भी शामिल होती हैं।
इसके अलावा मिसाइलों की नियमित जांच, स्टोरेज, परिवहन और समय-समय पर उनकी सर्विसिंग की व्यवस्था भी बनाई जाती है।
बीडीएल करेगी मिसाइलों का उत्पादन
अस्त्र मिसाइल का डिजाइन डीआरडीओ ने विकसित किया है, जबकि इसका उत्पादन भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (बीडीएल) करती है।
बीडीएल मिसाइल के सभी प्रमुख हिस्सों को जोड़ने, अंतिम परीक्षण करने और गुणवत्ता जांच के बाद उसे भारतीय वायुसेना या निर्यात के लिए तैयार करती है।
यदि इंडोनेशिया का ऑर्डर अंतिम रूप लेता है, तो मिसाइलों का उत्पादन चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा ताकि सप्लाई समय पर पूरी हो सके। (Astra Missile Indonesia Deal)
ऑपरेशनल ट्रेनिंग भी होगी महत्वपूर्ण
सूत्रों के अनुसार नई मिसाइल मिलने के बाद सबसे महत्वपूर्ण काम पायलटों की ट्रेनिंग होती है। पायलटों को यह सिखाया जाता है कि किस दूरी पर मिसाइल दागना सबसे प्रभावी रहेगा, किस प्रकार के टारगेट पर कौन-सा मोड इस्तेमाल करना है और किस परिस्थिति में फायरिंग नहीं करनी चाहिए।
इसके साथ ही ग्राउंड क्रू को मिसाइल को सुरक्षित तरीके से विमान पर लगाने, उसकी जांच करने, सॉफ्टवेयर अपडेट करने और तकनीकी निरीक्षण की ट्रेनिंग भी दी जाती है। (Astra Missile Indonesia Deal)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।



