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समंदर में नहीं छिप पाएंगी चीन-पाकिस्तान की पनडुब्बियां, भारतीय नौसेना दुश्मन की सबमरींस को दूर से ही करेगी ट्रैक

सीटीएलएस एक ऐसा आधुनिक सोनार सिस्टम है, जिसे एक स्टैंडर्ड कंटेनर के भीतर तैयार किया जाएगा। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसी जहाज पर बड़ा बदलाव किए बिना भी इसे लगाया या हटाया जा सकेगा...

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📍नई दिल्ली | 6 Jul, 2026, 11:38 AM

Indian Navy Sonar System: भारतीय नौसेना समुद्र के नीचे दुश्मन की गतिविधियों पर पैनी नजर रखने की तैयारी कर रही है। रक्षा मंत्रालय ने कंटेनराइज्ड थिएटर लेवल सोनार (सीटीएलएस) के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (आरएफआई) जारी की है। इस सिस्टम का मकसद पानी के नीचे लगातार निगरानी बनाए रखना, पनडुब्बियों का लंबी दूरी से पता लगाना और थिएटर स्तर पर एंटी-सबमरीन वॉरफेयर क्षमता को मजबूत करना है। डॉक्यूमेंट के अनुसार यह सिस्टम भारतीय नौसेना के उपयुक्त जहाजों पर कंटेनर के तौर पर लगाया जाएगा, जिससे जरूरत के अनुसार इसे अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर तेजी से तैनात किया जा सके।

Indian Navy Sonar System: क्या है कंटेनराइज्ड थिएटर लेवल सोनार

सीटीएलएस एक ऐसा आधुनिक सोनार सिस्टम है, जिसे एक स्टैंडर्ड कंटेनर के भीतर तैयार किया जाएगा। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसी जहाज पर बड़ा बदलाव किए बिना भी इसे लगाया या हटाया जा सकेगा। इससे नौसेना एक ही सिस्टम को अलग-अलग जहाजों पर जरूरत के अनुसार इस्तेमाल कर सकेगी।

आरएफआई के अनुसार इस सिस्टम में कम फ्रीक्वेंसी वाला एक्टिव ट्रांसमीटर, पैसिव रिसीवर एरे, ऑपरेटर कंसोल, विंच और हैंडलिंग सिस्टम शामिल होंगे। पूरा सिस्टम कंटेनर के भीतर इंटीग्रेट रहेगा और जहाज पर केवल सीमित बदलाव करने होंगे। (Indian Navy Sonar System)

पानी के नीचे लंबी दूरी तक रखेगा नजर

रक्षा मंत्रालय चाहता है कि नया सिस्टम गहरे समुद्र, उथले पानी और जटिल तटीय इलाकों में भी प्रभावी ढंग से काम करे। इसका मुख्य काम पानी के भीतर मौजूद पनडुब्बियों और अन्य टारगेट्स का पता लगाना, उनकी पहचान करना और लगातार ट्रैक करना होगा।

सिस्टम को इस तरह डेवलप किया जाएगा ताकि वह एक साथ कई टारगेट्स पर नजर रख सके और लंबे समय तक लगातार निगरानी करने में सक्षम हो। इसके जरिए भारतीय नौसेना को समुद्र के नीचे बनने वाली स्ट्रैटेजिक इमेज को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलेगी। (Indian Navy Sonar System)

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एक्टिव और पैसिव दोनों मोड में करेगा काम

आरएफआई के अनुसार सीटीएलएस केवल एक तरह के सोनार पर निर्भर नहीं रहेगा। इसमें एक्टिव और पैसिव दोनों तरह की क्षमता होगी।

एक्टिव मोड में सिस्टम ध्वनि तरंग भेजकर सामने मौजूद टारगेट की पहचान करेगा। वहीं पैसिव मोड में यह केवल पानी के भीतर मौजूद जहाजों और पनडुब्बियों से निकलने वाली आवाजों को सुनकर उनकी पहचान करेगा।

दोनों मोड को एक साथ भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। इससे मोनो-स्टैटिक, बाई-स्टैटिक और मल्टी-स्टैटिक ऑपरेशन संभव होंगे, जो आधुनिक एंटी-सबमरीन ऑपरेशन में काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

Indian Navy Sonar System
(Image for reference Purpose only. AI-Generated Image)

कम फ्रीक्वेंसी वाला एक्टिव सोनार होगा सबसे बड़ी ताकत

डॉक्यूमेंट के अनुसार सिस्टम का एक्टिव हिस्सा एक किलोहर्ट्ज से कम फ्रीक्वेंसी पर काम करेगा। कम फ्रीक्वेंसी की ध्वनि तरंगें समुद्र में ज्यादा दूरी तक जाती हैं, इसलिए लंबी दूरी पर पनडुब्बियों का पता लगाने में यह अधिक प्रभावी मानी जाती हैं।

सिस्टम में वेरिएबल डेप्थ सोनार लगाया जाएगा, जिसे लगभग 200 मीटर तक पानी के भीतर नीचे उतारा जा सकेगा। इससे समुद्र की अलग-अलग परतों में मौजूद ध्वनि की स्थिति के अनुसार बेहतर डिटेक्शन संभव होगा। साथ ही सिस्टम अपने डेप्थ कंट्रोल को समुद्री परिस्थितियों के अनुसार अपने आप एडजस्ट कर सकेगा।

पैसिव रिसीवर एरे लगातार सुनेंगे समुद्र की आवाज

सीटीएलएस का पैसिव हिस्सा ट्विन थिन लाइन रिसीवर एरे पर बेस्ड होगा। प्रत्येक एरे में कम से कम 180 एकॉस्टिक एलिमेंट होंगे, जो समुद्र में मौजूद बेहद हल्की आवाजों को भी रिकॉर्ड कर सकेंगे।

यह सिस्टम 10 हर्ट्ज से 2 किलोहर्ट्ज तक की फ्रीक्वेंसी पर काम करेगा। इससे पनडुब्बियों की मशीनरी, प्रोपेलर और पानी में बनने वाले हाइड्रोडायनामिक शोर की पहचान की जा सकेगी। सिस्टम में बीम फॉर्मिंग, एडैप्टिव नॉइज सप्रेशन और टारगेट मोशन एनालिसिस जैसी आधुनिक तकनीक भी शामिल होगी।

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शोर के बीच भी टारगेट की करेगा पहचान

समुद्र के भीतर हमेशा शांत वातावरण नहीं होता। लहरें, जहाज, समुद्री जीव और मौसम लगातार शोर पैदा करते रहते हैं। ऐसे माहौल में टारगेट की पहचान करना चुनौतीपूर्ण होता है।

इसी कारण आरएफआई में एडवांस्ड डिजिटल सिग्नल प्रोसेसिंग की मांग की गई है। सिस्टम हाई नॉइज और रिवरबरेशन की स्थिति में भी टारगेट को खोजने, उसकी स्थिति निर्धारित करने और उसकी पहचान करने में सक्षम होना चाहिए। इसमें ऑटोमैटिक ट्रैकिंग के साथ ऑपरेटर असिस्टेड ट्रैकिंग की सुविधा भी होगी।

कंटेनर डिजाइन से तेजी से होगी तैनाती

सीटीएलएस को 20 या 40 फुट के आईएसओ मानक कंटेनर में तैयार किया जाएगा। इससे इसे अलग-अलग जहाजों पर तेजी से लगाया और हटाया जा सकेगा।

सिस्टम को मॉड्यूलर बनाया जाएगा, ताकि एक्टिव मॉड्यूल, पैसिव मॉड्यूल, प्रोसेसिंग यूनिट और ऑपरेटर कंसोल को जरूरत पड़ने पर अलग-अलग बदला या अपग्रेड किया जा सके। नौसेना ने कम से कम 15 साल की सर्विस लाइफ की भी मांग की है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी होगा हिस्सा

आरएफआई में आधुनिक ऑपरेटर कंसोल की मांग की गई है। इन कंसोल पर हाई रेजोल्यूशन डिस्प्ले होंगे, जिनमें वॉटरफॉल डिस्प्ले, ट्रैक टेबल, टैक्टिकल डिस्प्ले और डेमॉन एनालिसिस जैसी सुविधाएं उपलब्ध होंगी।

सिस्टम में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित अलर्ट, डिसीजन सपोर्ट टूल और मल्टीमॉडल डेटा फ्यूजन जैसी तकनीक भी शामिल होगी। इससे ऑपरेटर कम समय में ज्यादा सटीक निर्णय ले सकेंगे। (Indian Navy Sonar System)

मिशन शुरू होने से पहले बताएगा सफलता की संभावना

सीटीएलएस में एक विशेष मॉडलिंग और प्रेडिक्शन सॉफ्टवेयर भी होगा। यह समुद्र की गहराई, तापमान, साउंड वेलोसिटी प्रोफाइल, समुद्री तल की बनावट और आसपास के शोर जैसी जानकारियों का विश्लेषण करेगा।

इसके आधार पर सिस्टम पहले ही बता सकेगा कि किसी क्षेत्र में पनडुब्बी का पता चलने की संभावना कितनी है, किस दिशा में सेंसर लगाने से बेहतर परिणाम मिलेंगे और मिशन के दौरान किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। (Indian Navy Sonar System)

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भारतीय नौसेना के मौजूदा सिस्टम से भी जुड़ेगा

रक्षा मंत्रालय चाहता है कि नया सोनार भारतीय नौसेना के मौजूदा कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम के साथ आसानी से जुड़ सके। इसके अलावा यह नेविगेशन सेंसर, पर्यावरण सेंसर और अन्य ऑनबोर्ड सिस्टम से भी डेटा साझा करेगा।

मिशन के दौरान रिकॉर्ड किया गया डेटा सुरक्षित रूप से स्टोर होगा और बाद में ट्रेनिंग तथा विश्लेषण के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा। भविष्य में इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित अपग्रेड भी जोड़े जा सकेंगे। (Indian Navy Sonar System)

वेंडर्स के लिए तय किए सख्त मानक

आरएफआई में कंपनियों के लिए कई शर्तें भी रखी गई हैं। आवेदन करने वाली कंपनी को मैन्युफैक्चरर या सिस्टम इंटीग्रेटर होना होगा। रक्षा क्षेत्र में अनुभव, पर्याप्त वित्तीय क्षमता, मेंटेनेंस और रिपेयर की सुविधा तथा जरूरी लाइसेंस भी अनिवार्य होंगे।

रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि पहले टेक्निकल मूल्यांकन होगा। इसके बाद चयनित कंपनियों के सिस्टम का भारत में बिना किसी वित्तीय प्रतिबद्धता के ट्रायल कराया जाएगा। सफल मूल्यांकन के बाद आगे की खरीद प्रक्रिया शुरू होगी। (Indian Navy Sonar System)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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