📍नई दिल्ली | 4 Jul, 2026, 1:37 PM
IAF Officer Transfer Case: भारतीय वायुसेना के स्क्वाड्रन लीडर दीपक सिंधु की पोस्टिंग को लेकर चल रहा मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ कहा कि डिफेंस अफसरों की पोस्टिंग तय करना न्यायालय का काम नहीं है। हालांकि, मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए केंद्र सरकार ने कोर्ट को भरोसा दिया कि अधिकारी की पोस्टिंग उत्तर-पूर्व में नहीं की जाएगी। इसके बजाय उन्हें ऐसी जगह तैनात किया जाएगा, जहां हवाई संपर्क बेहतर हो, ताकि वे जरूरत पड़ने पर अपने परिवार तक जल्दी पहुंच सकें।
IAF Officer Transfer Case: क्या है पूरा मामला
स्क्वाड्रन लीडर दीपक सिंधु भारतीय वायुसेना की अकाउंट्स शाखा से जुड़े अधिकारी हैं और और लीगल ऑफिसर के रूप में काम करते हैं। उनकी पिछली तैनाती राजस्थान के जोधपुर स्थित 32 विंग एयर फोर्स स्टेशन पर थी।
इस साल 27 फरवरी को भारतीय वायुसेना ने उनका तबादला असम के तेजपुर स्थित 11 विंग एयर फोर्स स्टेशन के लिए कर दिया था। उन्हें 30 मार्च तक जॉइन करना था।
इसके बाद स्क्वाड्रन लीडर दीपक सिंधु ने इस आदेश को अदालत में चुनौती दी। उनका कहना था कि यह पोस्टिंग सामान्य कार्यकाल नीति के अनुरूप नहीं है और उनकी पारिवारिक परिस्थितियों पर भी पर्याप्त विचार नहीं किया गया।
माता-पिता की इकलौती संतान
अधिकारी ने अदालत को बताया कि वे अपने माता-पिता की इकलौती संतान हैं। उनके पिता का किडनी में ट्यूमर होने के कारण ऑपरेशन हो चुका है और एक किडनी निकाली जा चुकी है। वहीं उनकी मां 50 प्रतिशत तक झुलसने की पुरानी दुर्घटना से प्रभावित हैं और उन्हें लंबे समय तक देखभाल की आवश्यकता रहती है।
उन्होंने यह भी बताया कि वे पहले असम के जोरहाट में उत्तर-पूर्व क्षेत्र में सेवा दे चुके हैं। ऐसे में दोबारा उसी क्षेत्र में भेजे जाने से परिवार की देखभाल करना और कठिन हो जाएगा। (IAF Officer Transfer Case)
राजस्थान हाई कोर्ट में क्या हुआ
सबसे पहले यह मामला राजस्थान हाई कोर्ट पहुंचा। वहां सिंगल बेंच ने अधिकारी की दलीलों को सुनने के बाद ट्रांसफर आदेश रद्द कर दिया था।
अदालत ने माना कि सामान्य कार्यकाल नीति और मानवीय परिस्थितियों पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया था। इसी आधार पर अधिकारी को राहत दी गई।
लेकिन इसके बाद केंद्र सरकार ने इस फैसले को हाई कोर्ट की डिविजन बेंच में चुनौती दी।
जून 2026 में राजस्थान हाई कोर्ट की खंडपीठ ने सिंगल बेंच का फैसला पलट दिया और वायुसेना के ट्रांसफर आदेश को फिर से बहाल कर दिया।
डिविजन बेंच ने कहा कि सशस्त्र बलों में पोस्टिंग का फैसला मुख्य रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा, ऑपरेशनल जरूरत और संगठन की जरूरतों के आधार पर लिया जाता है। अदालत ऐसे मामलों में बहुत सीमित दायरे में ही हस्तक्षेप कर सकती है।
अदालत ने यह भी कहा कि पोस्टिंग पॉलिसी एक प्रशासनिक व्यवस्था है। इससे किसी अधिकारी को किसी विशेष स्थान पर रहने का कानूनी अधिकार स्वतः प्राप्त नहीं हो जाता।
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले के बाद स्क्वाड्रन लीडर दीपक सिंधु ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हालिया सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरमण ने केंद्र सरकार की ओर से अदालत को बताया कि अधिकारी को उत्तर-पूर्व क्षेत्र में पोस्ट नहीं किया जाएगा। सरकार उन्हें ऐसी जगह तैनात करेगी, जहां से हवाई संपर्क बेहतर हो।
जब अधिकारी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रेखा पल्ली ने यह स्पष्ट करने को कहा कि भविष्य में भी उत्तर-पूर्व में पोस्टिंग नहीं होगी, तब सरकार की ओर से दोबारा यही आश्वासन दिया गया। (IAF Officer Transfer Case)
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत डिफेंस अफसरों की पोस्टिंग का माइक्रो मैनेजमेंट नहीं कर सकती।
उन्होंने हल्के अंदाज में यह भी कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट ही स्क्वाड्रन लीडर और विंग कमांडर की पोस्टिंग तय करने लगे तो स्थिति अलग ही हो जाएगी।
अदालत ने सरकार के इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया और मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए सरकार के रुख की सराहना भी की।
बता दें कि भारतीय न्यायपालिका लंबे समय से यह मानती रही है कि सेना, नौसेना और वायुसेना की पोस्टिंग पूरी तरह प्रशासनिक और ऑपरेशनल विषय हैं।
किस अधिकारी को कहां तैनात किया जाएगा, इसका फैसला संबंधित सर्विस हेडक्वॉर्टर करता है। इसमें यूनिट की जरूरत, उपलब्ध पद, ऑपरेशनल जिम्मेदारियां और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे कई पहलुओं पर विचार किया जाता है।
इसी कारण अदालतें सामान्य तौर पर ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं करतीं। केवल तभी दखल दिया जाता है, जब किसी आदेश में स्पष्ट रूप से नियमों का उल्लंघन, दुर्भावना या कानूनी प्रक्रिया की गंभीर अनदेखी दिखाई दे।
क्या इकलौती संतान होने पर विशेष पोस्टिंग मिलती है
इस मामले के दौरान एक और महत्वपूर्ण सवाल सामने आया कि क्या भारतीय सशस्त्र बलों में इकलौती संतान होने पर विशेष पोस्टिंग का अधिकार मिलता है।
सूत्रों के अनुसार ऐसा कोई अलग नियम मौजूद नहीं है, जिसके तहत किसी अधिकारी को केवल इसलिए मनचाही पोस्टिंग मिल जाए क्योंकि वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान है।
ऐसी परिस्थितियों को केवल मानवीय आधार यानी कम्पैशनेट ग्राउंड के रूप में देखा जाता है। संबंधित अधिकारी आवेदन कर सकता है, लेकिन अंतिम फैसला सर्विस हेडक्वॉर्टर ही करता है। (IAF Officer Transfer Case)
ऑपरेशनल जरूरत सबसे ऊपर
भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना की पोस्टिंग पॉलिसी में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि संगठन की जरूरत और ऑपरेशनल आवश्यकताएं सर्वोच्च प्राथमिकता होती हैं।
यदि किसी अधिकारी की पारिवारिक परिस्थितियां गंभीर हों, तब भी यह जरूरी नहीं कि उसकी पोस्टिंग बदल दी जाए। हर आवेदन का अलग-अलग मूल्यांकन किया जाता है और यह देखा जाता है कि संबंधित अधिकारी को राहत देना सेवा की जरूरतों के अनुरूप संभव है या नहीं।
किन मामलों में मानवीय आधार पर राहत मिल सकती है
सूत्रों के अनुसार गंभीर बीमारी, दिव्यांग आश्रित, परिवार की विशेष परिस्थितियां या लंबे समय तक देखभाल की जरूरत जैसे मामलों में अधिकारी कम्पैशनेट पोस्टिंग का अनुरोध कर सकते हैं।
लेकिन यह कोई कानूनी अधिकार नहीं होता। सर्विस हेडक्वॉर्टर उपलब्ध पद, ऑपरेशनल जरूरत और प्रशासनिक स्थिति को देखते हुए फैसले लेता है। इसलिए हर मामले का परिणाम अलग हो सकता है। (IAF Officer Transfer Case)
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