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Explainer: क्या है भारतीय सेना का नया ड्रोन कमांड स्ट्रक्चर? अश्नि प्लाटून से बाज बटालियन तक ऐसे बदलेगी युद्ध की तस्वीर

यूक्रेन युद्ध में छोटे एफपीवी ड्रोन ने महंगे टैंक, आर्मर्ड व्हीकल्स और कमांड पोस्ट तक को निशाना बनाया। इसी युद्ध ने दुनिया की सेनाओं को यह समझाया कि ड्रोन को अलग हथियार नहीं बल्कि पूरी मिलिट्री स्ट्रक्चर का हिस्सा बनाना होगा...

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📍नई दिल्ली | 6 Jul, 2026, 7:22 PM

Indian Army Drone Command Structure: ड्रोन अब मॉडर्न वॉरफेयर का हिस्सा बन चुके हैं। अब केवल टैंक, तोप और लड़ाकू विमान ही किसी सेना की ताकत तय नहीं करते, बल्कि ड्रोन भी युद्ध का अहम हिस्सा बन चुके हैं। यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया के संघर्ष और हाल के कई सैन्य अभियानों ने दिखाया है कि छोटे एफपीवी ड्रोन से लेकर लंबी दूरी तक उड़ने वाले सर्विलांस ड्रोन तक, हर श्रेणी के मानव रहित सिस्टम अब युद्ध का तरीका बदल रहे हैं।

वहीं, भारतीय सेना भी इसी बदलाव के अनुरूप अपने ड्रोन नेटवर्क को नए सिरे से व्यवस्थित कर रही है। इनमें अश्नि प्लाटून, शौर्य स्क्वाड्रन, शक्तिमान रेजिमेंट और बाज बटालियन जैसे बैटल ऑफ ऑर्डर शामिल हैं।

Indian Army Drone Command Structure: भारतीय सेना ने को क्यों पड़ी जरूरत

पहले ड्रोन का इस्तेमाल केवल दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने तक सीमित था, लेकिन अब यही ड्रोन सीधे हमला करने, आर्टिलरी की फायरिंग को गाइड करने, इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस जुटाने और दुश्मन की सप्लाई लाइन पर हमला करने में यूज हो रहे हैं।

यूक्रेन युद्ध में छोटे एफपीवी ड्रोन ने महंगे टैंक, आर्मर्ड व्हीकल्स और कमांड पोस्ट तक को निशाना बनाया। इसी युद्ध ने दुनिया की सेनाओं को यह समझाया कि ड्रोन को अलग हथियार नहीं बल्कि पूरी मिलिट्री स्ट्रक्चर का हिस्सा बनाना होगा।

सूत्रों का कहना है कि पहले अधिकांश ड्रोन हेडक्वॉर्टर या स्पेशल सर्विलांस यूनिट्स के पास रहते थे। किसी बटालियन को ड्रोन की जरूरत पड़ती थी तो उसे दूसरे स्तर से सहायता लेनी पड़ती थी। लेकिन नए मॉडल में यह व्यवस्था बदल गई है। अब हर स्तर के कमांडर के पास उसी के मिशन के अनुरूप ड्रोन उपलब्ध रहेंगे। इससे सूचना मिलने और कार्रवाई शुरू होने के बीच का समय काफी कम हो जाएगा।

चार स्तर पर तैयार किया गया नया ड्रोन स्ट्रक्चर

भारतीय सेना ने भी इसी अनुभव को ध्यान में रखते हुए ड्रोन को केवल कुछ विशेष यूनिट्स तक सीमित रखने के बजाय इन्फेंट्री, आर्मर्ड, आर्टिलरी और आर्मी एविएशन कॉर्प्स तक पहुंचाने की योजना बनाई।

यह पूरा स्ट्रक्चर चार अलग-अलग स्तरों पर काम करता है। पहला स्तर इन्फेंट्री यानी पैदल सेना के लिए है। दूसरा आर्मर्ड फॉर्मेशन यानी टैंक रेजिमेंट्स के लिए, तीसरा आर्टिलरी के लिए और चौथा आर्मी एविएशन कॉर्प्स के तहत पूरे थिएटर स्तर पर काम करने वाली केंद्रीय ड्रोन यूनिट्स के लिए तैयार किया गया है।

इस सिस्टम का मकसद यह है कि हर स्तर पर मौजूद कमांडर को उसकी जरूरत के अनुसार ड्रोन उपलब्ध रहें और किसी भी मिशन के लिए अलग से संसाधन मांगने की जरूरत न पड़े। (Indian Army Drone Command Structure)

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अश्नि प्लाटून बनी इन्फेंट्री की नई आंख

सूत्रों के मुताबिक इन्फेंट्री बटालियनों में अश्नि प्लाटून नाम की विशेष ड्रोन टीम बनाई गई है। इन प्लाटून का काम सबसे आगे तैनात सैनिकों को रियल टाइम जानकारी देना और जरूरत पड़ने पर तुरंत सटीक हमला करना है।

भारतीय सेना की लगभग 380 से 385 इन्फेंट्री बटालियनों में ऐसी प्लाटून बनाई जा चुकी हैं। हर प्लाटून में लगभग 20 से 25 विशेष रूप से प्रशिक्षित सैनिक शामिल होते हैं।

इन सैनिकों को केवल ड्रोन उड़ाने की ट्रेनिंग नहीं दी जाती, बल्कि ड्रोन की मरम्मत, बैटरी प्रबंधन, मिशन प्लानिंग और फील्ड में तकनीकी सहायता की भी जिम्मेदारी दी जाती है।

सूत्रों के अनुसार अश्नि प्लाटून किसी अलग ब्रिगेड या डिवीजन का हिस्सा नहीं होती, बल्कि सीधे इन्फेंट्री बटालियन कमांडर के नियंत्रण में रहती है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि ड्रोन से मिलने वाली जानकारी तुरंत कमांडर तक पहुंच जाती है।

Indian Army Drone Command Structure
(Image for reference Purpose only. AI-Generated Image)

एफपीवी ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन का इस्तेमाल

सूत्रों के मुताबिक अश्नि प्लाटून के पास कई प्रकार के ड्रोन उपलब्ध रहते हैं। इनमें सर्विलांस ड्रोन, एफपीवी ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन शामिल हैं।

एफपीवी यानी फर्स्ट पर्सन व्यू ड्रोन ऑपरेटर को ड्रोन के कैमरे से लाइव विजुअल दिखाते हैं। इससे सैनिक दुश्मन की स्थिति को बेहद करीब से देख सकते हैं। अगर टारगेट की पुष्टि हो जाए तो यही ड्रोन सटीक हमला भी कर सकते हैं। लॉइटरिंग म्यूनिशन अलग तरीके से काम करते हैं। ये पहले तय क्षेत्र में कुछ समय तक उड़ते रहते हैं और टारगेट मिलने पर उसी पर हमला करते हैं। इससे तेजी से बदलती युद्ध स्थिति में भी सटीक कार्रवाई संभव होती है।

सूत्रों के अनुसार प्रत्येक अश्नि प्लाटून के पास सर्विलांस और अटैक कैटेगरी के कई ड्रोन उपलब्ध रहते हैं, जिससे बटालियन स्तर पर ही निगरानी और प्रिसीजन स्ट्राइक की क्षमता डेवलप हो जाती है।

‘ईगल ऑन द आर्म’ कॉन्सैप्ट पर आधारित है मॉडल

अश्नि प्लाटून का मूल विचार “ईगल ऑन द आर्म” कॉन्सैप्ट पर आधारित है। इसका अर्थ यह है कि इन्फेंट्री कमांडर के पास स्वयं ड्रोन की क्षमता मौजूद हो और उसे अलग से किसी अन्य यूनिट पर निर्भर न रहना पड़े। इससे किसी भी ऑपरेशन में जानकारी जुटाने और कार्रवाई करने के बीच लगने वाला समय काफी कम हो जाता है।

यदि किसी पहाड़ी क्षेत्र, जंगल, शहरी इलाके या सीमा पर दुश्मन की हलचल दिखाई देती है तो बटालियन स्तर पर ही तुरंत फैसला लिया जा सकता है। इस प्रक्रिया में अलग-अलग मुख्यालय से अनुमति लेने में समय नहीं लगता। (Indian Army Drone Command Structure)

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शौर्य स्क्वाड्रन से टैंकों को मिल रही नई ताकत

आर्मर्ड फॉर्मेशन के लिए शौर्य स्क्वाड्रन बनाए जा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक इन स्क्वाड्रन को टी-90 भीष्म, टी-72 अजेय और अर्जुन एमके-1ए जैसे मुख्य युद्धक टैंकों के साथ जोड़ा जा रहा है।

इनका उद्देश्य टैंक कमांडर को बैटल फील्ड में फॉरवर्ड एरिया की जानकारी देना है। इस नए मॉडल में टैंक केवल अपनी तोप और सेंसर पर निर्भर नहीं रहेंगे। टैंक के आगे बढ़ने से पहले ड्रोन लगातार आगे उड़कर दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखेंगे। युद्ध में सबसे बड़ा खतरा टैंक के सामने मौजूद दुश्मन नहीं बल्कि छिपे हुए एंटी-टैंक हथियार होते हैं। एफपीवी ड्रोन, एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल और टॉप-अटैक हथियार टैंकों को काफी नुकसान पहुंचा सकते हैं। जरूरत पड़ने पर अटैक ड्रोन या लॉइटरिंग म्यूनिशन से टारगेट पर कार्रवाई भी की जा सकती है।

सूत्रों के मुताबिक प्रत्येक शौर्य स्क्वाड्रन में भी लगभग 20 से 25 प्रशिक्षित सैनिक शामिल है, जो सर्विलांस, एफपीवी, अटैक और स्वार्म ड्रोन को ऑपरेट करते हैं।

ड्रोन से मिली तस्वीरें सीधे टैंक कमांडर तक पहुंचेंगी। इससे टारगेट की पहचान कर फायरिंग का फैसला अधिक सटीक तरीके से लिया जा सकता है। वहीं, इन यूनिट्स की ट्रेनिंग बाबिना फील्ड फायरिंग रेंज सहित कई सैन्य क्षेत्रों में की जा चुकी है।

शक्तिमान रेजिमेंट से बदलेगी आर्टिलरी की भूमिका

आर्टिलरी के लिए शक्तिमान रेजिमेंट तैयार की जा रही हैं। इनका मुख्य काम लंबी दूरी तक सटीक हमला करना है।
ये रेजिमेंट केवल तोपों की फायरिंग तक सीमित नहीं रहेंगी। इनके पास लॉन्ग रेंज लॉइटरिंग म्यूनिशन, अटैक ड्रोन और अन्य आधुनिक मानव रहित सिस्टम होंगे। ड्रोन पहले लक्ष्य की पहचान करेंगे। उसके बाद जरूरत के अनुसार या तो खुद हमला करेंगे या आर्टिलरी यूनिट को सटीक निर्देश देंगे।

पारंपरिक आर्टिलरी में पहले टारगेट की जानकारी अलग स्रोतों से आती थी। अब ड्रोन सीधे लक्ष्य की लाइव तस्वीर भेज सकते हैं। यदि पहला गोला टारगेट से थोड़ा दूर गिरता है तो ड्रोन तुरंत नई जानकारी भेज सकता है। इसके बाद अगली फायरिंग पहले से अधिक सटीक हो सकती है।

इसी प्रक्रिया को आधुनिक सैन्य भाषा में सेंसर-टू-शूटर लूप कहा जाता है। इससे प्रतिक्रिया का समय काफी कम हो जाता है।

ड्रोन और आर्टिलरी मिलकर बना सकते हैं ‘किल वेब’

भविष्य का युद्ध केवल ‘किल चेन’ तक सीमित नहीं रहेगा। बल्कि अब सेनाएं ‘किल वेब’ के कॉन्सैप्ट पर काम कर रही हैं। इसमें ड्रोन, आर्टिलरी, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, सैटेलाइट और कमांड सेंटर एक साथ जुड़े रहते हैं। शक्तिमान रेजिमेंट केवल ड्रोन नहीं उड़ाएंगी बल्कि इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और काउंटर ड्रोन सिस्टम के साथ भी कॉर्डिनेशन करेंगी।

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यदि दुश्मन इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग या अन्य इलेक्ट्रॉनिक तरीका अपनाता है तो उसी के मुताबिक ऑपरेशन की योजना तैयार की जा सकेगी। (Indian Army Drone Command Structure)

बाज बटालियन करेंगी पूरे थिएटर की निगरानी

ड्रोन कमांड स्ट्रक्चर का सबसे ऊपरी स्तर बाज बटालियन हैं। जिन्हें हाल ही में तैयार किया गया है। ये यूनिट्स आर्मी एविएशन कॉर्प्स के तहत काम करेंगी और पूरे थिएटर स्तर पर लंबी दूरी के ड्रोन ऑपरेशन संभालेंगी।

इनके पास मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस, हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस और अन्य बड़े मानव रहित प्लेटफॉर्म संचालित करने की क्षमता होगी। इनका इस्तेमाल लंबी दूरी की निगरानी, इंटेलिजेंस जुटाने, गहरे इलाकों की निगरानी और स्पेशल मिशनों में किया जा सकता है। यह पूरे भारतीय सेना के लिए ड्रोन कमांड सेंटर की तरह काम कर सकती हैं।

सूत्रों के मुताबिक, बाज बटालियन केवल ड्रोन उड़ाने तक सीमित नहीं रहेंगी। यहीं पर बड़े ड्रोन की तकनीकी देखभाल, सॉफ्टवेयर अपडेट, मिशन प्लानिंग, पायलट ट्रेनिंग, डेटा एनालिसिस और नई रणनीतियों पर भी काम किया जाएगा। यानी यह पूरी सेना के लिए सेंट्रलाइज्ड ड्रोन हब की तरह काम करेंगी।

कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम भी बदलेगा

सूत्रों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में ड्रोन तभी असरदार होंगे जब उनका कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम मजबूत हो। इसके लिए सुरक्षित डेटा लिंक, एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित डेटा प्रोसेसिंग और रियल टाइम वीडियो शेयरिंग की जरूरत होगी। ड्रोन से मिलने वाली जानकारी कुछ ही सेकंड में बटालियन, ब्रिगेड, डिवीजन और थिएटर कमांड तक पहुंच सकेगी। यही नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर की सबसे बड़ी खूबी है। (Indian Army Drone Command Structure)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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