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समंदर में अब चलते जहाज से नहीं चूकेगा निशाना! भारतीय नौसेना इग्ला-वर्बा मिसाइलों से दुश्मन के ड्रोन-हेलीकॉप्टर करेगी ढेर

नेवी को शुरुआत में कम से कम 40 लॉन्चर सिस्टम चाहिए। लेकिन इससे पहले इंडस्ट्री पाटर्नर को एक प्रोटोटाइप बनाकर उसकी क्षमता दिखानी होगी। उसके सफल ट्रायल के बाद ही बड़े पैमाने पर खरीद की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी...

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📍नई दिल्ली | 7 Jul, 2026, 12:21 PM

Indian Navy Stabilized Launcher: भारतीय नौसेना अपने वॉरशिप्स की नजदीकी हवाई सुरक्षा को और मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठा रही है। रक्षा मंत्रालय ने मेक-2 मॉडल के तहत मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम (मैनपैड्स) के लिए स्वदेशी स्टेबलाइज्ड लॉन्चर सिस्टम डेवलप करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस प्रोजेक्ट के तहत ऐसा लॉन्चर तैयार किया जाएगा, जिसे नौसेना के वॉरशिप्स पर लगाया जा सके और उससे रूसी मूल की इग्ला-एस और वर्बा मिसाइलों को रिमोट तरीके से दागा जा सके।

यह सिस्टम भारतीय नौसेना की नई क्षमता के रूप में शामिल होगा। इसका उद्देश्य वॉरशिप्स को कम ऊंचाई पर आने वाले हेलीकॉप्टर, ड्रोन, फाइटर एयरक्राफ्ट और एंटी-शिप मिसाइल जैसे हवाई खतरों से बेहतर सुरक्षा देना है। नेवी को शुरुआत में कम से कम 40 लॉन्चर सिस्टम चाहिए। लेकिन इससे पहले इंडस्ट्री पाटर्नर को एक प्रोटोटाइप बनाकर उसकी क्षमता दिखानी होगी। उसके सफल ट्रायल के बाद ही बड़े पैमाने पर खरीद की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

Indian Navy Stabilized Launcher: समुद्र में कंधे से मिसाइल दागना क्यों होता है मुश्किल

फिलहाल भारतीय नौसेना के पास इग्ला कैटेगरी की मिसाइलें मौजूद हैं। इन्हें सामान्य रूप से सैनिक अपने कंधे पर रखकर दागते हैं। जमीन पर तो आसानी से मिसाइल दागी जा सकती है, लेकिन जब बात समंदर की आती है तो हालात बिल्कुल अलग होते हैं।

समुद्र में जहाज लगातार लहरों की वजह से ऊपर-नीचे और दाएं-बाएं हिलते रहते हैं। इसे नौसैनिक भाषा में रोल, पिच और यॉ कहा जाता है। ऐसी स्थिति में ऑपरेटर के लिए मिसाइल को टारगेट पर निशान लगाना आसान नहीं होता। यदि टारगेट तेज रफ्तार से उड़ रहा हो तो निशाना चूकने की संभावना और बढ़ जाती है।

सूत्रों का कहना है कि इसी चुनौती को देखते हुए भारतीय नौसेना को ऐसे लॉन्चर की जरूरत महसूस हुई, जो जहाज के हिलने का असर खुद संभाल सके और मिसाइल को सही दिशा में लॉन्च करने में मदद करे।

क्या होगा स्टेबलाइज्ड लॉन्चर सिस्टम

नौसेना को जो लॉन्चर चाहिए, वह पूरी तरह से जाइरो-स्टेबलाइज्ड होगा। लॉन्चर के अंदर ऐसे सेंसर और मोटर लगे होंगे, जो जहाज के हर झटके और हर मूवमेंट को तुरंत पहचान लेंगे।

अगर जहाज किसी लहर की वजह से दाईं तरफ झुकता है तो लॉन्चर उसी समय अपने आप विपरीत दिशा में संतुलन बना लेगा। इसी तरह जहाज ऊपर-नीचे या आगे-पीछे हिलेगा तो लॉन्चर भी लगातार अपनी स्थिति को ठीक करता रहेगा। इसका फायदा यह होगा कि मिसाइल का सीकर टारगेट पर लगातार लॉक बनाए रख सकेगा।

यह सिस्टम पूरी तरह रिमोट कंट्रोल से ऑपरेट होगा। ऑपरेटर को मिसाइल कंधे पर रखने की जरूरत नहीं होगी। वह सुरक्षित जगह पर बैठकर लॉन्चर को कंट्रोल करेगा और जरूरत पड़ने पर एक मिसाइल या एक साथ कई मिसाइलें दाग सकेगा। (Indian Navy Stabilized Launcher)

Indian Navy Stabilized Launcher
(Image for reference Purpose only. AI-Generated Image)

इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल फायर कंट्रोल सिस्टम होगा सबसे अहम हिस्सा

लॉन्चर में इंटीग्रेटेड इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल फायर कंट्रोल सिस्टम (ईओएफसीएस) लगाया जाएगा। यही पूरे सिस्टम का “दिमाग” होगा।

इसका काम केवल टारगेट दिखाना नहीं होगा, बल्कि टारगेट को ढूंढना, उसकी पहचान करना, लगातार ट्रैक करना और मिसाइल दागने के लिए सही फायर कंट्रोल सॉल्यूशन तैयार करना भी होगा।

जब कोई ड्रोन, हेलीकॉप्टर या कम ऊंचाई पर उड़ने वाली मिसाइल जहाज की ओर बढ़ेगी, तो सबसे पहले यही सिस्टम उसे खोजेगा। इसके बाद उसकी दिशा, गति और दूरी का लगातार आकलन करेगा। जब सिस्टम को लगेगा कि मिसाइल दागने का सही समय है, तब ऑपरेटर को फायरिंग की अनुमति देगा। (Indian Navy Stabilized Launcher)

इग्ला और वर्बा दोनों मिसाइलों से होगा ऑपरेशन

रक्षा मंत्रालय ने तकनीकी जरूरतों में स्पष्ट किया है कि लॉन्चर को इस तरह से बनाया जाए कि वह इग्ला-एस और वर्बा जैसी बहुत कम दूरी की एरियल डिफेंस मिसाइलों के साथ काम कर सके।

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इन मिसाइलों का इस्तेमाल कम ऊंचाई पर उड़ने वाले टारगेट्स को नष्ट करने के लिए किया जाता है। इनमें हेलीकॉप्टर, ड्रोन, कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमान और एंटी-शिप मिसाइल जैसे खतरे शामिल हैं।

वहीं, लॉन्चर को इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि वह दो या चार मिसाइलों के कॉन्फिगरेशन में उपलब्ध हो सके। यानी लॉन्चर को दो अलग-अलग कॉन्फिगरेशन में डेवलप किया जाएगा। इसमें एक साथ दो या चार इग्ला मिसाइलें लगाई जा सकेंगी। इसका मतलब यह है कि ऑपरेशन की जरूरत के अनुसार युद्धपोत पर अलग-अलग क्षमता वाले लॉन्चर लगाए जा सकेंगे।

इस सिस्टम में दो तरह की फायरिंग क्षमता होगी। पहली सिंगल लॉन्च होगी, जिसमें केवल एक मिसाइल दागी जाएगी।

दूसरी साल्वो लॉन्च होगी। इसमें ऑपरेटर बहुत कम समय के अंतराल में एक के बाद एक कई मिसाइलें दाग सकेगा। यदि सामने एक से ज्यादा हवाई खतरे हों या किसी तेजी से बढ़ते टारगेट को रोकने के लिए दो मिसाइलें एक साथ दागनी हों, तो साल्वो मोड इस्तेमाल किया जा सकेगा।

डे और नाइट दोनों समय करेगा काम

नया लॉन्चर केवल दिन में ही नहीं बल्कि रात में भी समान क्षमता से काम करेगा। इसके लिए इसमें डे-नाइट इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल फायर कंट्रोल सिस्टम लगाया जाएगा।

इस सिस्टम में आधुनिक कैमरे, थर्मल इमेजिंग और टारगेट पर नजर रखने वाली तकनीक शामिल होगी। इससे ऑपरेटर अंधेरे, धुंध या खराब मौसम में भी टारगेट की पहचान कर सकेगा।

सूत्रों के अनुसार यही सिस्टम टारगेट को खोजेगा, उसकी लगातार ट्रैकिंग करेगा और मिसाइल दागने के लिए जरूरी फायर कंट्रोल सॉल्यूशन भी तैयार करेगा। (Indian Navy Stabilized Launcher)

छोटा साइज, ताकि हर तरह के वॉरशिप पर लगाया जा सके

मंत्रालय चाहता है कि लॉन्चर का साइज ज्यादा बड़ा न हो। इसलिए इसकी डिजाइन कॉम्पैक्ट रखी जाएगी। सूत्रों के मुताबिक लॉन्चर का कुल वजन लगभग 800 किलोग्राम से कम रखा जाएगा। इसमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सिस्टम भी शामिल होगा।

छोटा साइज होने का फायदा यह होगा कि इसे बड़े डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट के अलावा छोटे कॉर्वेट और दूसरे नौसैनिक प्लेटफॉर्म पर भी आसानी से लगाया जा सकेगा।

रक्षा मंत्रालय ने साफ कहा है कि लॉन्चर में इतनी स्टैबिलिटी होनी चाहिए कि इग्ला, वर्बा और भविष्य के VSHORDS जैसी मिसाइलों का सीकर आसानी से टारगेट पर लॉक कर सके।

मिसाइल का सीकर टारगेट की गर्मी या इंफ्रारेड सिग्नेचर को पहचानता है। यदि लॉन्चर लगातार हिलता रहे तो सीकर टारगेट खो सकता है। स्टेबलाइजेशन सिस्टम इसी समस्या को कम करेगा। (Indian Navy Stabilized Launcher)

जहाज के हिसाब से बदले जा सकेंगे फायरिंग एंगल

हर युद्धपोत की बनावट अलग होती है। इसलिए रक्षा मंत्रालय ने यह भी शर्त रखी है कि लॉन्चर के फायरिंग एंगल को जहाज के डिजाइन के अनुसार बदला जा सके।

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इसके लिए लॉन्चर में मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल स्टॉपर्स लगाए जाएंगे। इनकी मदद से फायरिंग का क्षेत्र सीमित किया जा सकेगा, ताकि मिसाइल गलती से जहाज के किसी हिस्से की ओर न जाए।

साथ ही एक अलग रिमोट सेफ्टी स्विच भी होगा। जरूरत पड़ने पर इससे लॉन्चर को तुरंत सक्रिय या निष्क्रिय किया जा सकेगा।

रिमोट कंट्रोल से होगा पूरा ऑपरेशन

इस सिस्टम के साथ एक मल्टी-फंक्शन डिस्प्ले यूनिट भी दी जाएगी। इसमें एलईडी स्क्रीन और सॉफ्ट-टच या पुश बटन होंगे। इसी कंट्रोल यूनिट से ऑपरेटर लॉन्चर को चालू करेगा, सिस्टम की जांच करेगा, कैलिब्रेशन करेगा, टारगेट चुनेगा और मिसाइल दागेगा।

इस सिस्टम में एक इंटरनल रिकॉर्डिंग यूनिट भी होगी, जो हर ऑपरेशन का पूरा रिकॉर्ड अपने आप सुरक्षित रखेगी। इसमें टारगेट की जानकारी, फायरिंग कमांड, सिस्टम की स्थिति और अन्य तकनीकी डेटा दर्ज होगा। इससे बाद में ऑपरेशन का विश्लेषण और तकनीकी जांच करना आसान होगा।

भारत में ही डिजाइन और विकास पर रहेगा पूरा जोर

इस प्रोजेक्ट के तहत देश के भीतर ही उसकी पूरी तकनीक डेवलप की जाएगी। इसलिए कंपनियों से पूछा गया है कि सिस्टम का डिजाइन और डेवलपमेंट भारत में ही किया जाएगा या नहीं।

यदि किसी विदेशी कंपनी के साथ तकनीकी साझेदारी, जॉइंट वेंचर या समझौता है, तो उसकी पूरी जानकारी देनी होगी। साथ ही यह भी बताना होगा कि कौन-कौन सी तकनीक विदेश से आएगी और भविष्य में उसे पूरी तरह स्वदेशी बनाने की क्या योजना होगी।

रक्षा मंत्रालय यह भी जानना चाहता है कि प्रोटोटाइप तैयार होने के बाद उसकी डिजाइन और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स किसके पास रहेंगे और जरूरत पड़ने पर किसी सरकारी रक्षा कंपनी को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर किया जा सकेगा या नहीं।

बता दें कि यह प्रोजेक्ट डिफेंस एक्विजिशन प्रोसिजर-2020 की मेक-2 कैटेगरी के तहत लाया गया है। इस मॉडल में उद्योग अपनी तकनीक के आधार पर प्रोटोटाइप विकसित करता है। सफल परीक्षण के बाद ही रक्षा मंत्रालय बड़े स्तर पर खरीद का निर्णय लेता है। (Indian Navy Stabilized Launcher)

कितने प्रतिशत होगा स्वदेशी कंटेंट

इस परियोजना में आत्मनिर्भरता सबसे अहम शर्तों में शामिल है। इसलिए कंपनियों को यह भी बताना होगा कि प्रोटोटाइप तैयार करते समय और बड़े स्तर पर उत्पादन शुरू होने के बाद सिस्टम में स्वदेशी हिस्सेदारी कितनी होगी।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक हर प्रमुख कंपोनेंट की सूची भी देनी होगी। कौन-सा हिस्सा कंपनी खुद बनाएगी, कौन-सा भारत की दूसरी कंपनी से लिया जाएगा और कौन-सा विदेश से आएगा, इसकी पूरी जानकारी देनी होगी।

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यदि कोई महत्वपूर्ण पार्ट आयातित है, तो उसके लिए लंबी अवधि की सप्लाई और भविष्य में स्वदेशी उत्पादन की योजना भी बतानी होगी।

रक्षा मंत्रालय ने कंपनियों से प्रोटोटाइप तैयार करने की समयसीमा भी मांगी है। इसमें डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग, इंटीग्रेशन, क्वॉलिटी टेस्टिंग और टेक्निकल इवैल्युशन का पूरा कार्यक्रम शामिल होगा।

इसके बाद यदि सिस्टम सफल रहता है, तो बड़े स्तर पर उत्पादन शुरू करने में कितना समय लगेगा, इसकी भी जानकारी देनी होगी। कंपनियों को यह भी बताना होगा कि वे हर महीने या हर साल कितने लॉन्चर तैयार कर सकती हैं और जरूरत बढ़ने पर उत्पादन क्षमता कैसे बढ़ाएंगी। (Indian Navy Stabilized Launcher)

कई चरणों में होगी टेस्टिंग

सूत्रों का कहना है कि सबसे पहले इसके शोर ट्रायल किए जाएंगे। इनमें जमीन पर सिस्टम के सभी मैकेनिकल, इलेक्ट्रॉनिक और फायर कंट्रोल सिस्टम की जांच की जाएगी। इसके बाद लॉन्चर को जहाज पर लगाकर शिपबोर्न ट्रायल किए जाएंगे। इन परीक्षणों में एक्चुअल मिसाइल फायरिंग भी शामिल होगी।

इसके अलावा इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंटरफेरेंस, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कंपैटिबिलिटी, लेजर रेंज फाइंडर, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सिस्टम, शॉक और वाइब्रेशन जैसे कई परीक्षण भी होंगे। इनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समुद्र में भी सिस्टम बिना किसी रुकावट के काम करे।

रक्षा मंत्रालय ने कंपनियों से यह भी पूछा है कि क्या वे भारतीय नौसेना की सुविधाओं या भारतीय समुद्री क्षेत्र में नो कॉस्ट, नो कमिटमेंट आधार पर फील्ड इवैल्यूएशन ट्रायल करने के लिए तैयार हैं। (Indian Navy Stabilized Launcher)

लॉन्चर खुद करेगा अपनी तकनीकी जांच

इस सिस्टम में बिल्ट-इन टेस्ट सुविधा भी होगी। यानी लॉन्चर समय-समय पर अपनी तकनीकी स्थिति की खुद जांच करेगा।

यदि किसी सेंसर, मोटर, कंट्रोल यूनिट या दूसरे हिस्से में कोई खराबी आती है, तो सिस्टम ऑपरेटर को तुरंत जानकारी देगा। इससे तकनीकी समस्या का पता लगाने में कम समय लगेगा और मरम्मत भी जल्दी हो सकेगी।

साथ ही लॉन्चर में लगी इंटरनल रिकॉर्डिंग यूनिट हर गतिविधि का पूरा रिकॉर्ड रखेगी। टारगेट की पहचान, ट्रैकिंग, फायरिंग कमांड और सिस्टम की स्थिति से जुड़ा डेटा सुरक्षित रहेगा, जिससे बाद में उसका विश्लेषण किया जा सकेगा।

रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि उचित रखरखाव के साथ इस सिस्टम की सर्विस लाइफ 10 साल से अधिक होनी चाहिए।

कंपनियों को बताना होगा कि मरम्मत की प्रक्रिया कैसी होगी, कितने विशेष उपकरणों की जरूरत पड़ेगी और क्या भारतीय नौसेना को मौके पर ही तकनीकी सहायता दी जाएगी।

इसके अलावा स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता, ऑन-साइट वारंटी, लाइफ-साइकिल सपोर्ट और पूरे सिस्टम के रखरखाव का विस्तृत प्रस्ताव भी देना होगा। (Indian Navy Stabilized Launcher)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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