📍नई दिल्ली | 28 Feb, 2026, 1:21 PM
VSHORADS vs Stinger vs Igla: ओडिशा के चांदीपुर तट के पास इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज में हाल ही में डीआरडीओ ने बहुत कम दूरी की वायु रक्षा प्रणाली (VSHORADS) के तीन लगातार सफल फ्लाइट ट्रायल किए। यह परीक्षण “यूजर वैलिडेशन ट्रायल” के तौर पर किए गए, जिसमें फील्ड ऑपरेटर्स ने खुद टारगेट को पहचान कर मिसाइल दागी।
यह सिस्टम खास तौर पर कम ऊंचाई पर उड़ने वाले खतरों जैसे ड्रोन, हेलीकॉप्टर और दुश्मन के विमान को नष्ट करने के लिए बनाया गया है। इसे पैदल सैनिक अपने कंधे या पोर्टेबल लॉन्चर से दाग सकते हैं। इस तरह के सिस्टम को मैनपैड्स यानी मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम कहा जाता है।
VSHORADS vs Stinger vs Igla: तीनों ट्रायल में हर टारगेट हुआ तबाह
डीआरडीओ के अनुसार तीनों परीक्षणों के दौरान मिसाइल ने हाई-स्पीड हवाई टारगेट्स को सफलतापूर्वक इंटरसेप्ट किया और नष्ट कर दिया। ये टारगेट दुश्मन के एयरक्राफ्ट जैसे हालात को ध्यान में रखकर तैयार किए गए थे। अलग-अलग ऊंचाई, दूरी और स्पीड पर उड़ते लक्ष्यों को मिसाइल ने सटीक तरीके से मार गिराया।
इन परीक्षणों के दौरान टेलीमेट्री, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल ट्रैकिंग सिस्टम और रडार जैसे आधुनिक उपकरणों से डेटा रिकॉर्ड किया गया। इस डेटा से यह पुष्टि हुई कि सिस्टम हर तरह के खतरे के खिलाफ प्रभावी है। इन ट्रायल्स में तीनों सेनाओं के प्रतिनिधि और डीआरडीओ के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे। (VSHORADS vs Stinger vs Igla)
कैसे काम करता है यह सिस्टम
VSHORADS एक चौथी पीढ़ी का एडवांस्ड एयर डिफेंस सिस्टम है। इसमें ड्यूल वेवबैंड इमेजिंग इंफ्रारेड सीकर लगा है, जो बहुत छोटे और कम हीट सिग्नेचर वाले टारगेट्स को भी पहचान सकता है। इसका मतलब है कि यह ड्रोन जैसे छोटे लक्ष्यों को भी आसानी से ट्रैक कर सकता है।
इस मिसाइल में ड्यूल-थ्रस्ट सॉलिड रॉकेट मोटर लगी है, जो शुरुआत में तेज स्पीड देती है और फिर लगातार उड़ान बनाए रखती है। इसकी अधिकतम रेंज करीब 6 किलोमीटर तक है और यह लगभग 3.5 किलोमीटर की ऊंचाई तक टारगेट को मार सकता है। इसकी स्पीड करीब मैक 1.5 तक पहुंच जाती है।
इसमें मिनिएचराइज्ड रिएक्शन कंट्रोल सिस्टम भी है, जिससे यह हवा में तेजी से दिशा बदल सकती है। यह फीचर इसे ज्यादा मैन्यूवेरेबल बनाता है, यानी यह टारगेट को बेहतर तरीके से फॉलो कर सकती है।
#AKASH Surface-to-Air Missile successfully intercepts an aerial target at #VayuShakti2026 — a strong display of India’s indigenous air defence capability in live action. #Akash #IndianAirForce #IAF #AirDefence #AatmanirbharBharat #DefenceForces @IAF_MCC pic.twitter.com/X4rZbrV1jX
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) February 27, 2026
पुराने सिस्टम की जगह लेगा नया VSHORADS
भारतीय सेनाओं में अभी तक इग्ला जैसे पुराने MANPADS सिस्टम इस्तेमाल किए जाते हैं। VSHORADS को इन्हीं पुराने सिस्टम की जगह लेने के लिए विकसित किया गया है। यह तकनीक के मामले में ज्यादा एडवांस्ड है और आधुनिक युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया है।
खास बात यह है कि यह सिस्टम पूरी तरह स्वदेशी है। इसे डीआरडीओ के रिसर्च सेंटर इमारत (RCI) ने अन्य लैब्स और इंडस्ट्री पार्टनर्स के साथ मिलकर विकसित किया है। इससे भारत की विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम होगी। (VSHORADS vs Stinger vs Igla)
डेवलपमेंट और ट्रायल्स का सफर
इस सिस्टम का विकास पिछले कुछ वर्षों से लगातार जारी है। 2022 में इसका पहला सफल टेस्ट हुआ था। इसके बाद 2023, 2024 और 2025 में कई सफल ट्रायल किए गए। हर बार सिस्टम में सुधार किया गया और इसे अंतिम डिप्लॉयमेंट कॉन्फ़िगरेशन तक पहुंचाया गया।
फरवरी 2026 के ये ट्रायल इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा माने जा रहे हैं, क्योंकि इसमें फील्ड ऑपरेटर्स ने खुद सिस्टम का इस्तेमाल किया। इसका मतलब है कि अब यह सिस्टम असल ऑपरेशन के लिए तैयार हो रहा है।
आधुनिक युद्ध में क्यों है जरूरी
आज के समय में युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है। ड्रोन और लो-एल्टीट्यूड अटैक का खतरा बढ़ गया है। छोटे ड्रोन भी बड़े नुकसान पहुंचा सकते हैं। ऐसे में VSHORADS जैसे सिस्टम बेहद जरूरी हो जाते हैं, जो तुरंत प्रतिक्रिया देकर खतरे को खत्म कर सकें।
यह सिस्टम मल्टी-लेयर्ड एयर डिफेंस का हिस्सा होगा, यानी बड़े मिसाइल सिस्टम के साथ मिलकर काम करेगा। इससे देश की सुरक्षा और मजबूत होगी। (VSHORADS vs Stinger vs Igla)
VSHORADS vs Stinger: कैसे भारतीय सिस्टम दे रहा है कड़ी टक्कर
भारत का स्वदेशी VSHORADS और अमेरिका का FIM-92 Stinger, दोनों ही MANPADS (मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम) हैं, लेकिन दोनों की डिजाइन फिलॉसफी और इस्तेमाल का तरीका अलग है। आसान भाषा में समझें तो VSHORADS नई पीढ़ी का “स्मार्ट शिकारी” है, जबकि स्टिंगर तेज और हल्का हथियार है जो लंबे समय से युद्ध में साबित हो चुका है।
टेक्नोलॉजी में आगे: VSHORADS में है ये फीचर
VSHORADS की सबसे बड़ी ताकत उसका इमेजिंग इंफ्रारेड (IIR) सीकर है। यह सिर्फ गर्मी नहीं, बल्कि टारगेट की पूरी इमेज को पहचानता है। इसका फायदा यह है कि दुश्मन अगर फ्लेयर्स (डिकॉय) छोड़ता है, तो भी मिसाइल असली टारगेट को पहचान सकती है।
वहीं स्टिंगर में पारंपरिक इंफ्रारेड/अल्ट्रावायलेट ड्यूल-बैंड सीकर सीकर होता है, जिसे अपग्रेड किया गया है, लेकिन वह पूरी तरह इमेजिंग बेस्ड नहीं है। इन्फ्रारेड बैंड में टारगेट के इंजन की गर्मी को ट्रैक करता है। अल्ट्रावायलेट बैंड में यह टारगेट (एयरक्राफ्ट) यूवी “शैडो” (छाया) बनाता है, क्योंकि आसमान में सूरज की यूवी लाइट स्कैटर होती है और एयरक्राफ्ट उसमें ब्लॉक करता है। यानी टारगेट यूवी में “डार्क स्पॉट” या “शैडो” की तरह दिखता है। इसी वजह से आधुनिक ड्रोन या कम हीट वाले टारगेट के खिलाफ VSHORADS ज्यादा प्रभावी माना जा रहा है।
भारत का सिस्टम ज्यादा प्रासंगिक
VSHORADS की रेंज लगभग 6–7 किलोमीटर तक बताई जाती है, जबकि स्टिंगर की सामान्य रेंज करीब 4.8 किलोमीटर है। आज के युद्ध में ड्रोन, लो-फ्लाइंग मिसाइल और हेलीकॉप्टर बड़े खतरे हैं। VSHORADS को खास तौर पर इन्हीं टारगेट्स को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है। इसका IIR सीकर इसे छोटे और कम दिखने वाले टारगेट्स के खिलाफ ज्यादा असरदार बनाता है।
मैन्यूवरेबिलिटी का खास फीचर
VSHORADS में मिनी रिएक्शन कंट्रोल सिस्टम (RCS) दिया गया है, जिससे यह हवा में तेजी से दिशा बदल सकता है। इसका मतलब है कि अगर टारगेट अचानक मूव करे, तो मिसाइल भी उसी हिसाब से तुरंत एडजस्ट हो जाती है। हालांकि स्टिंगर भी मैन्यूवरेबल है, लेकिन उसमें RCS जैसा एडवांस्ड सिस्टम नहीं है। इसलिए हाई-मैन्यूवरिंग टारगेट्स के खिलाफ VSHORADS को बढ़त मिलती है। (VSHORADS vs Stinger vs Igla)
पोर्टेबिलिटी में स्टिंगर आगे
स्टिंगर का सबसे बड़ा फायदा है उसका हल्का होना। इसका वजन करीब 15–16 किलो होता है और इसे एक सैनिक आसानी से कंधे पर रखकर चला सकता है। वहीं VSHORADS का पूरा सिस्टम करीब 40 किलो तक पहुंच सकता है (लॉन्चर सहित), इसलिए इसे ऑपरेट करना थोड़ा भारी और मुश्किल हो सकता है। हालांकि भविष्य में इसका शोल्डर-फायर्ड वर्जन भी आने की बात कही जाती है।
स्पीड vs स्मार्टनेस
स्टिंगर की स्पीड मैक 2+ तक जाती है, जो VSHORADS (लगभग Mach 1.5) से ज्यादा है। इसका मतलब है कि स्टिंगर टारगेट तक जल्दी पहुंच सकता है। लेकिन VSHORADS “स्मार्ट ट्रैकिंग” पर ज्यादा फोकस करता है। यानी यह जरूरी नहीं कि सबसे तेज हो, लेकिन यह टारगेट को ज्यादा सटीक तरीके से पकड़ता है। (VSHORADS vs Stinger vs Igla)
भारत के लिए सबसे बड़ा गेम-चेंजर
सबसे बड़ा फर्क यहीं आता है। VSHORADS पूरी तरह स्वदेशी (इंडिजिनस) है। इसका मतलब है कि भारत इसे अपने हिसाब से अपग्रेड कर सकता है, बड़े पैमाने पर बना सकता है और किसी विदेशी देश पर निर्भर नहीं रहेगा।
वहीं Stinger पूरी तरह आयातित सिस्टम है, जिसमें टेक्नोलॉजी ट्रांसफर नहीं मिलता। इसलिए इसकी संख्या सीमित रहती है और हर अपग्रेड के लिए बाहरी निर्भरता रहती है। (VSHORADS vs Stinger vs Igla)
Igla-S Vs VSHORADS: क्या स्वदेशी सिस्टम बनेगा सेना का ‘भरोसा’
भारतीय सेना के पास इग्ला-एस सिस्टम है, जो रूस से खरीदा हुआ है। भारतीय सेना इस पर काफी भरोसा करती है। इग्ला-एस और VSHORADS दोनों ही शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम हैं, जिन्हें कम ऊंचाई पर उड़ने वाले खतरों जैसे हेलीकॉप्टर, ड्रोन, फाइटर जेट और क्रूज मिसाइल को मार गिराने के लिए बनाया गया है। लेकिन इन दोनों के बीच सबसे बड़ा फर्क उनकी टेक्नोलॉजी और समय के हिसाब से उनकी क्षमता में है। (VSHORADS vs Stinger vs Igla)
टेक्नोलॉजी और गाइडेंस सिस्टम
Igla-S में ड्यूल-बैंड इंफ्रारेड (IR) सीकर का इस्तेमाल होता है, जो इंजन की गर्मी के आधार पर टारगेट को ट्रैक करता है। यह फ्लेयर्स जैसे डिकॉय से कुछ हद तक बच सकता है, लेकिन इसकी क्षमता सीमित होती है। वहीं VSHORADS में इमेजिंग इंफ्रारेड (IIR) सीकर दिया गया है, जो टारगेट की पूरी इमेज पहचानता है। इसका फायदा यह है कि यह ड्रोन, लो-सिग्नेचर एयरक्राफ्ट और फ्लेयर्स जैसे धोखे को बेहतर तरीके से पहचान कर असली टारगेट को हिट कर सकता है।
रेंज, स्पीड और ऊंचाई
दोनों सिस्टम की रेंज लगभग समान है और करीब 6 किलोमीटर तक के टारगेट को मार सकते हैं। ऊंचाई की सीमा भी लगभग 3.5 किलोमीटर तक है। हालांकि स्पीड के मामले में इग्ला-एस थोड़ा आगे है, जो लगभग मैक 1.9 तक जा सकता है, जबकि VSHORADS की स्पीड करीब मैक 1.5 है। लेकिन VSHORADS अपनी एडवांस गाइडेंस और मैन्यूवरेबिलिटी से इस कमी को काफी हद तक कवर करता है। (VSHORADS vs Stinger vs Igla)
वजन और पोर्टेबिलिटी
इग्ला का सबसे बड़ा फायदा इसका हल्का होना है। इसका कुल वजन करीब 17–19 किलो है और इसे सैनिक सीधे कंधे पर रखकर चला सकता है। इसके मुकाबले VSHORADS का वजन ज्यादा है, करीब 40 किलो के आसपास, और अभी इसे ट्राइपॉड के साथ इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए पोर्टेबिलिटी के मामले में इग्ला-एस ज्यादा आसान और तेज इस्तेमाल वाला सिस्टम है।
अगर पोर्टेबिलिटी और तुरंत इस्तेमाल की बात करें तो इग्ला अभी भी आगे है, क्योंकि यह हल्का और आसान है। लेकिन टेक्नोलॉजी, सटीकता और आधुनिक खतरों जैसे ड्रोन और लो-सिग्नेचर टारगेट्स से निपटने में SHORADS ज्यादा सक्षम है। यही वजह है कि इसे भविष्य का एयर डिफेंस सिस्टम माना जा रहा है। (VSHORADS vs Stinger vs Igla)

