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Explainer: ऑपरेशन सिंदूर के हीरो लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई NSA अजीत डोभाल के साथ करेंगे काम, जानें आखिर क्या करता है NSCS का मिलिट्री एडवाइजर?

लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई की नियुक्ति कई वजहों से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सबसे पहले, वह पहले ऐसे इन-सर्विस तीन-स्टार अधिकारी हैं जिन्हें मिलिट्री एडवाइजर बनाया गया है...

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📍नई दिल्ली | 12 Jun, 2026, 8:36 PM

Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser: जब देश की सुरक्षा से जुड़े बड़े फैसलों की बात होती है तो लोगों के दिमाग में प्रधानमंत्री कार्यालय, रक्षा मंत्रालय, सेना मुख्यालय, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार या फिर तीनों सेनाओं के प्रमुखों का नाम आता है। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसी संस्था भी है जो अक्सर सुर्खियों से दूर रहती है, जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी लगभग हर बड़ी रणनीति, हर महत्वपूर्ण समीक्षा और हर संवेदनशील फैसले में उसकी अहम भूमिका होती है। यह संस्था है राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय यानी एनएससीएस।

पिछले कुछ सालों में एनएससीएस का महत्व लगातार बढ़ा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यहां काम कर चुके कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी बाद में देश के सबसे बड़े रक्षा पदों तक पहुंचे हैं। हाल ही में लेफ्टिनेंट जनरल एनएस राजा सुब्रमणि को चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानी सीडीएस बनाया गया। उससे पहले जनरल अनिल चौहान भी इसी संस्था में मिलिट्री एडवाइजर रह चुके थे और बाद में सीडीएस बने। वहीं, देश के पहले अब ऑपरेशन सिंदूर के दौरान डीजीएमओ के रूप में राष्ट्रीय पहचान बनाने वाले लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई को एनएससीएस का नया मिलिट्री एडवाइजर नियुक्त किया गया है।

यही वजह है कि अब एनएससीएस को केवल एक सचिवालय नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा नेतृत्व तैयार करने वाली संस्था के तौर पर देखा जाने लगा है।

Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser: कैसे हुई एनएससीएस की शुरुआत?

भारत में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों के लिए एक इंटीग्रेशन सिस्टम बनाने की चर्चा 1990 के दशक में तेज हुई थी। मई 1998 में भारत के परमाणु परीक्षण और फिर 1999 के कारगिल युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया कि देश को एक ऐसी संस्था की जरूरत है जो केवल सैन्य मामलों तक सीमित न हो बल्कि विदेश नीति, खुफिया जानकारी, आर्थिक सुरक्षा, तकनीकी विकास और सैन्य रणनीति को एक मंच पर जोड़ सके।

इसी सोच के तहत 19 नवंबर 1998 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (एनएससी) की स्थापना की। इसके साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय (एनएससीएस) को भी बनाया गया ताकि परिषद के कामकाज को संस्थागत रूप दिया जा सके।

उस समय भारत के पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा थे। शुरुआती सालों में एनएससीएस मुख्य रूप से विश्लेषण और सलाह देने वाली संस्था थी। इसका काम विभिन्न मंत्रालयों और एजेंसियों से जानकारी जुटाना, रिपोर्ट तैयार करना और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद को इनपुट देना था। (Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser)

2018 में कैसे बदली एनएससीएस की ताकत?

राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों को करीब से देखने वाले सूत्र बताते हैं कि एनएससीएस के इतिहास में सबसे बड़ा बदलाव 2018 में आया। उस साल एनएससीएस को औपचारिक रूप से अलोकेशन ऑफ बिजनेस रूल्स (AoB) और ट्रांजैक्शन ऑफ बिजनेस रूल्स (ToB) में शामिल किया गया। ये वही नियम हैं जिनके आधार पर भारत सरकार के मंत्रालयों और विभागों के अधिकार, जिम्मेदारियां और निर्णय प्रक्रिया तय होती है।

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इस बदलाव से पहले एनएससीएस मुख्य रूप से सलाह देता था। लेकिन 2018 के बाद यह केवल सलाहकार संस्था नहीं रहा, बल्कि सरकारी निर्णय प्रक्रिया का सक्रिय हिस्सा बन गया। संविधान के आर्टिकल 77(3) के तहत अब यह विभिन्न मंत्रालयों के बीच कॉर्डिनेट कर सकता है, सुरक्षा मामलों से जुड़ी फाइलों पर काम कर सकता है और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसलों को आगे बढ़ाने में भूमिका निभा सकता है।

यही वजह है कि आज इसे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था का “नर्व सेंटर” कहा जाता है।

एनएसए के साथ कैसे काम करता है एनएससीएस?

एनएससीएस सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार यानी एनएसए के अधीन काम करता है। वर्तमान में यह जिम्मेदारी अजीत डोभाल के पास है।

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार प्रधानमंत्री और सरकार को सुरक्षा संबंधी सलाह देते हैं। लेकिन इतने बड़े सिक्योरिटी इंफ्रास्ट्रक्चर को अकेले संभालना संभव नहीं होता। ऐसे में एनएससीएस एक स्थायी संस्थागत ढांचे के तौर पर काम करता है।

यहीं पर सुरक्षा विशेषज्ञ, सैन्य अधिकारी, खुफिया अधिकारी, तकनीकी विशेषज्ञ और नीति विश्लेषक मिलकर विभिन्न विषयों पर काम करते हैं। चीन की गतिविधियां हों, पाकिस्तान से जुड़ी चुनौतियां हों, साइबर सुरक्षा का खतरा हो, अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा हो या समुद्री सुरक्षा का प्रश्न, इन सभी विषयों पर एनएससीएस लगातार अध्ययन और विश्लेषण करता है।

कैसा है एनएससीएस का स्ट्रक्चर?

एनएससीएस अकेली संस्था नहीं है बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद प्रणाली का हिस्सा है।

इसके ऊपर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद होती है। इसके अलावा स्ट्रैटेजिक पॉलिसी ग्रुप और नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजरी बोर्ड जैसी संस्थाएं भी मौजूद हैं।

स्ट्रैटेजिक पॉलिसी ग्रुप में कैबिनेट सचिव, रक्षा सचिव, गृह सचिव, विदेश सचिव, वित्त सचिव, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, तीनों सेनाओं के प्रमुख और कई अन्य वरिष्ठ अधिकारी शामिल होते हैं।

वहीं नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजरी बोर्ड में सेवानिवृत्त राजनयिक, सैन्य अधिकारी, शिक्षाविद और रणनीतिक विशेषज्ञ शामिल होते हैं। इन सभी के बीच कॉर्डिनेशन करने का काम एनएससीएस करता है। (Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser)

कौन होता है मिलिट्री एडवाइजर?

एनएससीएस के भीतर सबसे महत्वपूर्ण पदों में से एक है मिलिट्री एडवाइजर यानी एमए। यह अधिकारी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को सैन्य मामलों पर सलाह देता है। वह सेना, नौसेना और वायुसेना की ऑपरेशनल जरूरतों, सैन्य क्षमताओं और सुरक्षा चुनौतियों के बारे में टॉप लेवल पर जानकारी उपलब्ध कराता है। मिलिट्री एडवाइजर एनएससीएस और भारतीय सेनाओं के बीच सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होता है।

एमए का सबसे बड़ा काम राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को सीमा सुरक्षा, सैन्य तैयारियों, युद्धक क्षमताओं, रक्षा रणनीति और उभरते खतरों पर सलाह देना है। वह एनएससीएस के मिलिट्री विंग का नेतृत्व करता है और लोंग-टर्म डिफेंस प्लांस, थिएटर कमांड्स, जॉइंट मिलिटरी ऑपरेशंस और तीनों सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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यह अधिकारी केवल सैन्य सलाहकार नहीं होता, बल्कि रक्षा मंत्रालय, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, तीनों सेना प्रमुखों और विभिन्न खुफिया एजेंसियों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में काम करता है। सैन्य खुफिया एजेंसियों से प्राप्त जानकारी का विश्लेषण कर उसे राष्ट्रीय सुरक्षा नीति से जोड़ना भी उसकी जिम्मेदारी का हिस्सा है।

यह पद इसलिए भी चर्चा में रहता है क्योंकि हाल के सालों में यहां काम कर चुके अधिकारी देश के सर्वोच्च सैन्य पदों तक पहुंचे हैं। जनरल अनिल चौहान और जनरल एन.एस. राजा सुब्रमणि दोनों पहले एनएससीएस में मिलिट्री एडवाइजर रहे और बाद में सीडीएस बने। (Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser)

अब तक कौन-कौन रहे हैं मिलिट्री एडवाइजर?

बहुत से लोग मानते हैं कि मिलिट्री एडवाइजर का पद 2018 में शुरू हुआ, लेकिन ऐसा नहीं है।

इस पद पर सबसे पहले लेफ्टिनेंट जनरल प्रकाश मेनन नियुक्त हुए थे। वह 2011 में सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद 2012 में एनएससीएस में मिलिट्री एडवाइजर बने। उन्होंने लगभग 2014 तक यह जिम्मेदारी निभाई। बाद में 2015 से 2017 तक वह एनएससीएस में ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी के तौर पर भी रहे।

इसके बाद लेफ्टिनेंट जनरल विनोद खंडारे ने यह जिम्मेदारी संभाली। वह मोदी सरकार के दौर में इस पद पर आने वाले पहले प्रमुख सैन्य सलाहकारों में गिने जाते हैं।

उनके बाद लेफ्टिनेंट जनरल अनिल चौहान इस पद पर आए। एनएससीएस में काम करने के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक मुद्दों पर अनुभव हासिल किया और बाद में सितंबर 2022 में भारत के दूसरे चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बने।

इसके बाद एयर मार्शल संदीप सिंह को मिलिट्री एडवाइजर बनाया गया। वह भारतीय वायुसेना से इस पद पर पहुंचने वाले पहले अधिकारी थे।

उनके बाद लेफ्टिनेंट जनरल एन.एस. राजा सुब्रमणि ने यह जिम्मेदारी संभाली। मई 2026 में उन्हें देश का नया चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ नियुक्त किया गया।

वहीं, अब लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई इस पद पर आ रहे हैं। (Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser)

क्यों खास है लेफ्टिनेंट जनरल घई की नियुक्ति?

लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई की नियुक्ति कई वजहों से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सबसे पहले, वह पहले ऐसे इन-सर्विस तीन-स्टार अधिकारी हैं जिन्हें मिलिट्री एडवाइजर बनाया गया है। उनसे पहले इस पद पर आने वाले अधिकांश अधिकारी रिटायर होने के बाद एनएससीएस पहुंचे थे।

दूसरा, उनके पास अभी लगभग डेढ़ साल से अधिक की सेवा बची हुई है। उनका कार्यकाल दिसंबर 2027 तक है।
तीसरा, वह ऑपरेशन सिंदूर के दौरान डीजीएमओ थे और पाकिस्तान के खिलाफ भारत की सैन्य कार्रवाई से जुड़े प्रमुख अधिकारियों में शामिल रहे।

मध्यप्रदेश में जन्मे लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने अपने सैन्य करियर में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली हैं। उनके पिता भी सेना में वरिष्ठ अधिकारी रहे थे। दिसंबर 1989 में उन्हें कुमाऊं रेजिमेंट में कमीशन मिला।

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कुमाऊं रेजिमेंट भारतीय सेना की सबसे प्रतिष्ठित इन्फेंट्री रेजिमेंट्स में से एक है, जो अपनी बहादुरी और अनुशासन के लिए जानी जाती है। वे इस रेजिमेंट के कर्नल भी हैं।

उन्होंने वेस्टर्न सेक्टर में एक इन्फैंट्री बटालियन की कमान संभाली। इसके बाद मध्य क्षेत्र में स्वतंत्र ब्रिगेड का नेतृत्व किया। वह अरुणाचल प्रदेश में 56 इन्फैंट्री डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग भी रहे।

बाद में उन्हें श्रीनगर स्थित 15 कोर की कमान सौंपी गई। यह वही कोर है जो जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों और नियंत्रण रेखा की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

इसके बाद वह डीजीएमओ बने और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अहम भूमिका निभाई। इस भूमिका के लिए उन्हें 2025 में स्वतंत्रता दिवस पर सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल से सम्मनित किया गया। इसके बाद जून 2025 में उन्हें सेना मुख्यालय में उप सेनाध्यक्ष (रणनीति) नियुक्त किए गए। (Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser)

सीडीएस बनने की क्या है शर्त?

भारत में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ देश की तीनों सेनाओं थलसेना, नौसेना और वायुसेना के बीच तालमेल स्थापित करने वाला सबसे वरिष्ठ सैन्य पद है। दिसंबर 2019 में इस पद का गठन किया गया था और जनवरी 2020 में जनरल बिपिन रावत पहले सीडीएस बने थे।

सीडीएस बनने के लिए किसी अधिकारी का चार-स्टार रैंक का अधिकारी होना जरूरी नहीं है। सरकार के 2022 के संशोधित नियमों के अनुसार लेफ्टिनेंट जनरल, एयर मार्शल या वाइस एडमिरल रैंक के सेवारत अथवा सेवानिवृत्त अधिकारी भी सीडीएस नियुक्त किए जा सकते हैं। हालांकि अधिकारी की आयु नियुक्ति के समय 62 वर्ष से कम होनी चाहिए।

सीडीएस के चयन के लिए केवल वरिष्ठता ही एकमात्र मानदंड नहीं होती। सरकार अधिकारी के पूरे सैन्य अनुभव, नेतृत्व क्षमता, संयुक्त सैन्य अभियानों की समझ, रणनीतिक सोच, राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों की जानकारी और तीनों सेनाओं के साथ काम करने के अनुभव को भी देखती है। यही वजह है कि कई बार सबसे वरिष्ठ अधिकारी की बजाय उस अधिकारी को चुना जाता है जिसे सरकार भविष्य की सैन्य चुनौतियों के लिए अधिक उपयुक्त मानती है।

सीडीएस के लिए आमतौर पर ऐसे अधिकारी को प्राथमिकता मिलती है जिसने कोर, कमांड या समकक्ष स्तर पर नेतृत्व किया हो और राष्ट्रीय स्तर पर रणनीतिक निर्णयों का अनुभव रखा हो। थिएटर कमांड, जॉइंटनेस, सैन्य आधुनिकीकरण और रक्षा सुधारों की समझ भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। (Lt Gen Rajiv Ghai NSCS Military Adviser)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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