📍नई दिल्ली | 28 Apr, 2026, 1:18 PM
NFU for Armed Forces: देश के हजारों सैन्य वेटरंस इन दिनों एक अहम फैसले का इंतजार कर रहे हैं। मामला है एनएफयू (नॉन-फंक्शनल अपग्रेडेशन) का, जो लंबे समय से अदालत और सरकार के बीच फंसा हुआ है। सेना के पूर्व अधिकारी चाहते हैं कि उन्हें भी वही सुविधा मिले, जो सिविल सर्विसेज के अधिकारियों को मिलती है। लेकिन अब तक इस पर अंतिम फैसला नहीं हो पाया है।
NFU for Armed Forces: क्या है पूरा मामला
एनएफयू को लेकर विवाद कोई नया नहीं है। साल 2017 से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इससे पहले 2016 में आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल (एएफटी) ने सरकार को निर्देश दिया था कि सेना के अधिकारियों को भी एनएफयू का लाभ दिया जाए। ट्रिब्यूनल ने साफ कहा था कि सेना को इससे बाहर रखना “अनुचित और बिना ठोस वजह” के है।
इसके बावजूद यह फैसला लागू नहीं हुआ और मामला आगे बढ़कर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। पिछले नौ सालों में इस पर कई बार सुनवाई तय हुई, लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से टलती रही। अब वेटरंस को कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतजार है।
सरकारी स्तर पर हुई चर्चा के अनुसार, एक इंटर-मिनिस्ट्रीयल कमेटी ने सेना के अधिकारियों को एनएफयू देने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। कमेटी ने इसके पीछे कई वजहें बताईं हैं। इसमें कहा गया कि इसे लागू करना आसान नहीं होगा, इसमें कानूनी मुश्किलें हैं और इससे सरकार पर हर साल लगभग 800 से 1800 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त भार पड़ सकता है।
एनएफयू आखिर होता क्या है
एनएफयू एक तरह का पे और स्टेटस बेनिफिट है। इसका मतलब यह है कि अगर किसी अधिकारी को प्रमोशन नहीं मिलता, तब भी उसे समय के साथ उच्च वेतन स्तर मिल जाता है।
इसे आसान भाषा में ऐसे समझें कि अगर एक ही बैच के दो अधिकारी हैं और उनमें से एक को प्रमोशन मिल जाता है, तो दूसरे अधिकारी को भी कुछ समय बाद उसी लेवल का वेतन मिल जाता है, भले ही उसे प्रमोशन न मिला हो। इसका उद्देश्य यह है कि एक ही बैच के अधिकारियों के बीच वेतन में ज्यादा अंतर न हो।
यह व्यवस्था छठे वेतन आयोग के बाद 2006 में लागू की गई थी। शुरुआत में यह सुविधा सिर्फ आईएएस और आईएफएस अधिकारियों को मिली थी, लेकिन बाद में इसे अन्य ग्रुप ‘ए’ सर्विसेज और सीएपीएफ तक बढ़ा दिया गया।
लेकिन सेना को क्यों रखा गया बाहर
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सिविल सर्विसेज को यह सुविधा मिल रही है, तो सेना को इससे बाहर क्यों रखा गया। सरकार का कहना है कि सेना का स्ट्रक्चर और काम करने का तरीका अलग है।
सेना में प्रमोशन पूरी तरह रैंक बेस्ड सिस्टम पर होता है। यहां हर स्तर पर सीमित पद होते हैं और प्रमोशन के लिए सख्त चयन प्रक्रिया होती है। अगर किसी अधिकारी को तय संख्या में मौके मिलने के बाद भी प्रमोशन नहीं मिलता, तो वह उसी रैंक पर रिटायर हो जाता है।
इसके उलट सिविल सर्विसेज में प्रमोशन का तरीका अलग है, जहां सीनियरिटी और फिटनेस के आधार पर आगे बढ़ने के ज्यादा मौके होते हैं।
सरकार का यह भी मानना है कि अगर जूनियर रैंक के अधिकारी को एनएफयू के जरिए सीनियर रैंक जैसा वेतन दिया गया, तो इससे सेना के चेन ऑफ कमांड सिस्टम पर असर पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट में कमेटी ने दी रिपोर्ट
हाल ही में एक हाई लेवल कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंपी है। इस कमेटी ने साफ तौर पर कहा है कि सेना को एनएफयू देना सही नहीं होगा।
रिपोर्ट के अनुसार सेना के सर्विस कंडीशंस सिविल कर्मचारियों से अलग हैं। सेना के जवानों और अधिकारियों को पहले से ही कई खास सुविधाएं जैसे ओआरओपी (वन रैंक वन पेंशन) और एमएसपी (मिलिट्री सर्विस पे) मिलती हैं।
कमेटी ने यह भी कहा कि अगर एनएफयू लागू किया जाता है, तो इससे सरकार पर भारी आर्थिक बोझ पड़ेगा। अनुमान के मुताबिक इस पर सालाना हजारों करोड़ रुपये का खर्च आ सकता है। साथ ही इससे पेंशन सिस्टम में भी बड़े बदलाव करने पड़ेंगे।
वेटरंस क्यों कर रहे हैं विरोध
दूसरी तरफ, मिलिट्री वेटरंस इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि यह मामला सिर्फ पैसों का नहीं है, बल्कि मुद्दा बराबरी के दर्जे का है।
इस फैसले के बाद कई सैन्य वेटरंस ने नाराजगी जताई है। रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडे और लेफ्टिनेंट जनरल विनोद भाटिया (रिटायर्ड) ने इसे एक बड़ा मौका गंवाना बताया। उनका कहना है कि यह सालों से चली आ रही असमानता को खत्म करने का सही समय था। उनके मुताबिक एनएफयू कोई विशेष सुविधा नहीं, बल्कि सेना के अधिकारियों के लिए बराबरी का अधिकार है, खासकर तब जब वे कठिन और जोखिम भरे माहौल में काम करते हैं और फिर भी करियर में रुकावट का सामना करते हैं।
पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश (रिटायर्ड) ने भी इस मुद्दे पर साफ राय दी। उन्होंने कहा कि या तो एनएफयू सभी सेवाओं के लिए खत्म कर दिया जाए, या फिर सेना समेत सभी को दिया जाए।
इसी तरह लेफ्टिनेंट कर्नल आर के भारद्वाज (रिटायर्ड) ने एक खुले पत्र में कहा कि सेना और पूर्व सैनिक इस फैसले से बहुत निराश हैं। उन्होंने लिखा कि जहां बाकी सभी सिविल सर्विसेज और सीएपीएफ को एनएफयू का फायदा मिल रहा है, वहीं सेना को इससे बाहर रखना गलत है। उनका कहना है कि इससे सैनिकों के मनोबल पर असर पड़ रहा है और उनके साथ भेदभाव का हो रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में याचिकाकर्ता रिटायर्ड कर्नल मुकुल देव का कहना है कि सिविल सर्विसेज के सभी अधिकारी एनएफयू का लाभ ले रहे हैं, लेकिन सेना को इससे बाहर रखा गया है। उनके मुताबिक यह एक तरह का भेदभाव है।
वेटरंस का यह भी तर्क है कि सेना में प्रमोशन के मौके बहुत सीमित होते हैं। कई अधिकारी 50-54 साल की उम्र में रिटायर हो जाते हैं, जबकि सिविल सर्विसेज में रिटायरमेंट उम्र 60 साल है। इस वजह से उन्हें करियर में आगे बढ़ने और ज्यादा कमाने के कम मौके मिलते हैं।
सरकार अक्सर यह तर्क देती है कि सेना को एमएसपी और अन्य भत्ते मिलते हैं, इसलिए एनएफयू की जरूरत नहीं है। लेकिन वेटरंस इस बात से सहमत नहीं हैं।
उनका कहना है कि एमएसपी कोई अतिरिक्त फायदा नहीं है, बल्कि पहले से मिल रहे कई भत्तों को मिलाकर बनाया गया है। इसलिए इसे एनएफयू के बराबर नहीं माना जा सकता।
मौजूदा समय में कमीशंड अधिकारियों (लेफ्टिनेंट से ब्रिगेडियर) को हर महीने करीब 15,500 रुपये एमएसपी मिलता है, जबकि जूनियर कमीशंड ऑफिसर्स (जेसीओ) को करीब 5,200 रुपये मिलते हैं।
सेना में कैसे मिलता है प्रमोशन
सेना में करियर ग्रोथ स्ट्रक्चर काफी सीमित है, जिसे पिरामिड जैसा माना जाता है। शुरुआत में सभी अधिकारियों को समय के साथ प्रमोशन मिलता है, लेकिन ऊपरी रैंक पर पहुंचते-पहुंचते मौके बहुत कम हो जाते हैं।
लेफ्टिनेंट, कैप्टन और मेजर रैंक तक लगभग सभी अधिकारियों को प्रमोशन मिल जाता है। लेफ्टिनेंट कर्नल तक भी यह प्रक्रिया टाइम स्केल पर होती है। लेकिन इसके बाद स्थिति बदल जाती है।
कर्नल रैंक पर सिर्फ लगभग 14 फीसदी अधिकारी ही पहुंच पाते हैं। ब्रिगेडियर बनने वालों की संख्या और भी कम होकर करीब 2.79 फीसदी रह जाती है। मेजर जनरल तक पहुंचने वालों की संख्या सीमित रहती है और लेफ्टिनेंट जनरल (हाईएस्ट लेवल) तक सिर्फ लगभग 1 फीसदी से भी कम अधिकारी पहुंच पाते हैं।
इसका मतलब यह है कि ज्यादातर अधिकारी लंबे समय तक सेवा करने के बावजूद पे लेवल 12 या 13 पर ही रुक जाते हैं। प्रमोशन के सीमित अवसरों की वजह से करियर में ठहराव आता है, जिसका असर मनोबल पर पड़ता है।
कमेटी की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सेना और सिविल सर्विसेज के प्रमोशन सिस्टम में मूलभूत अंतर है। सेना में कर्नल और उससे ऊपर के पदों के लिए चयन बोर्ड होते हैं और सीमित मौके मिलते हैं।
अगर अधिकारी इन मौकों में चयनित नहीं होता, तो वह आगे प्रमोशन के लिए योग्य नहीं रहता। वहीं सिविल सर्विसेज में प्रमोशन के अवसर लगातार बने रहते हैं।
इसी वजह से सरकार का मानना है कि एनएफयू को सेना पर लागू करना आसान नहीं है, क्योंकि दोनों सिस्टम का स्ट्रक्चर अलग है।
क्यों लंबी खिंच रही है कानूनी लड़ाई, देखें टाइमलाइन
दिसंबर 2016 में दिल्ली की आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने एक अहम फैसला दिया। यह मामला कर्नल मुकुल देव बनाम भारत सरकार का था। ट्रिब्यूनल ने कहा कि सेना को एनएफयू न देना गलत है और सरकार को इसे लागू करना चाहिए। ट्रिब्यूनल ने इसे “अनुचित और बिना सही वजह” का फैसला बताया।
इसके बाद सरकार ने इस आदेश को नहीं माना और 2019 में सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी। तब से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। दिलचस्प बात यह है कि इसी तरह का मामला सीएपीएफ (केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल) का भी था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में उन्हें एनएफयू का फायदा दे दिया था। लेकिन सेना के मामले में अभी तक फैसला नहीं आया है।
दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को दोबारा देखने के लिए रक्षा मंत्रालय को एक हाई-लेवल कमेटी बनाने को कहा। इस कमेटी के चेयरमैन फाइनेंशियल एडवाइजर (डिफेंस सर्विसेज) थे। जनवरी 2026 में इस कमेटी ने सेना के प्रतिनिधियों की बात भी सुनी और पूरे मामले का अध्ययन किया।
2026 में कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा कि सेना को एनएफयू नहीं दिया जाना चाहिए। इसके पीछे कई कारण बताए गए।
साथ ही कमेटी ने एक और चिंता जताई कि अगर जूनियर रैंक के अधिकारी को एनएफयू के जरिए सीनियर जैसा वेतन मिलने लगे, तो इससे चेन ऑफ कमांड पर असर पड़ सकता है। कमेटी ने सुझाव दिया कि इस मुद्दे को आगे 8वें वेतन आयोग में देखा जा सकता है।
अप्रैल 2026 में रक्षा मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में एक एफिडेविट दाखिल किया। इसमें कमेटी की रिपोर्ट पेश की गई और साफ कहा गया कि सेना को एनएफयू देना उचित नहीं है।
अप्रैल 2026 तक यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इस दौरान कई बार सुनवाई की तारीख तय हुई, लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से सुनवाई टल गई।
अब तक इस केस में 75 से ज्यादा बार सुनवाई टली है। 22 अप्रैल 2026 को भी यह मामला सूची में था, लेकिन समय की कमी और जस्टिस जेके माहेश्वरी के रिटायरमेंट के कारण सुनवाई नहीं हो सकी।
मुख्य याचिकाकर्ता कर्नल मुकुल देव (रिटायर्ड) के अनुसार, पिछले 9 साल में इस मामले को सुनने के लिए 5 अलग-अलग बेंच बन चुकी हैं, लेकिन अब तक कोई अंतिम फैसला नहीं आया है।
अब सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट पर हैं, जहां इस मामले में अंतिम फैसला होना बाकी है। वेटरंस उम्मीद कर रहे हैं कि उन्हें सिविल सर्विसेज के बराबर दर्जा मिलेगा, जबकि सरकार अपने रुख पर कायम है।
कितना पड़ेगा आर्थिक बोझ
सीजीडीए (CGDA) के इनपुट के अनुसार, अगर सेना को एनएफयू दिया जाता है, तो इसका वित्तीय असर काफी बड़ा होगा। सिर्फ आर्मी के लगभग 26,182 अधिकारियों पर इसका सालाना खर्च करीब 555.24 करोड़ रुपये आंका गया है। इसी आधार पर नेवी के लगभग 4,945 अधिकारियों पर करीब 106.59 करोड़ और एयरफोर्स के करीब 6,571 अधिकारियों पर लगभग 142.22 करोड़ रुपये का खर्च आएगा।
इस तरह तीनों सेनाओं के लिए कुल मिलाकर सालाना खर्च करीब 804.05 करोड़ रुपये बैठता है।
अगर इसमें पेंशन का असर जोड़ा जाए, तो यह खर्च बढ़कर करीब 1200 करोड़ रुपये प्रति वर्ष तक पहुंच सकता है।
इसके अलावा, ओआरओपी के तहत पेंशन को दोबारा तय करना पड़ेगा, जिससे खर्च और बढ़ सकता है।
सातवें वेतन आयोग के पूरे 10 साल के दौर में यह खर्च 12,000 करोड़ रुपये से ज्यादा होने का अनुमान है। इसमें ब्याज और अन्य संभावित खर्च शामिल नहीं हैं, जिससे कुल राशि और बढ़ सकती है। सरकार का कहना है कि इतने बड़े वित्तीय बोझ और प्रशासनिक मुश्किलों को देखते हुए एनएफयू लागू करना आसान नहीं है। (Military Veterans Await Supreme Court Verdict on NFU, Demand for Equal Status with Civil Services)


