📍नई दिल्ली | 27 Apr, 2026, 1:02 PM
China Atlas Drone Swarm System: चीन की सेना ने एक नया ड्रोन सिस्टम पेश किया है, जिसे “एटलस ड्रोन स्वॉर्म सिस्टम” (Atelasi)कहा जा रहा है। पीएलए ने हाल ही में इस सिस्टम को शोकेस किया है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह सिस्टम आधुनिक युद्ध के तरीके को बदलने वाला माना जा रहा है, क्योंकि इसमें एक साथ बड़ी संख्या में ड्रोन उड़ाने और उन्हें एक ही ऑपरेटर से कंट्रोल करने की क्षमता है।
क्या है China Atlas Drone Swarm System?
एटलस ड्रोन स्वॉर्म सिस्टम को आसान भाषा में समझें तो यह एक ऐसा मोबाइल प्लेटफॉर्म है, जो ट्रक पर लगाया जाता है और उससे एक साथ कई ड्रोन लॉन्च किए जा सकते हैं। यह सिस्टम एक तरह का “मिनी बैटलफील्ड नेटवर्क” की तरह काम करता है, जिसमें ड्रोन सिर्फ उड़ते नहीं हैं, बल्कि आपस में जुड़े रहते हैं और मिलकर मिशन को पूरा करते हैं। एटलस ड्रोन स्वॉर्म सिस्टम को एक तरह से चलती-फिरती मिनी बैटलफील्ड नेटवर्क यूनिट कहा जा सकता है।
यह एक ट्रक पर लगाया गया सिस्टम है, जिससे एक साथ बड़ी संख्या में ड्रोन लॉन्च किए जा सकते हैं। इस सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें एक साथ करीब 96 छोटे और मध्यम आकार के हाई-स्पीड ड्रोन लॉन्च किए जा सकते हैं। इन ड्रोन को लॉन्च करने में ज्यादा समय नहीं लगता। हर ड्रोन के बीच लॉन्च का समय तीन सेकंड से भी कम होता है, यानी लगभग 300 सेकंड यानी पांच मिनट के अंदर पूरा झुंड आसमान में पहुंच सकता है। इतनी तेज और बड़े पैमाने पर लॉन्चिंग किसी भी एयर डिफेंस सिस्टम के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।
समझने के लिए एक उदाहरण लें तो हाल के पश्चिम एशिया युद्ध में सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयरबेस पर तैनात अमेरिका का एडवांस्ड ई-3 सेंट्री AWACS विमान सिर्फ 29 ड्रोन और कुछ बैलिस्टिक मिसाइलों के हमले में नष्ट हो गया था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि बड़े पैमाने पर ड्रोन हमले कितने प्रभावी हो सकते हैं।
यह सिस्टम इतना कॉम्पैक्ट है कि इसे आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है, छुपाया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत ऑपरेशन में लाया जा सकता है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत मानी जा रही है। (China Atlas Drone Swarm System)
एक ही ऑपरेटर करेगा कंट्रोल
इस सिस्टम में सबसे अलग बात यह है कि इतने सारे ड्रोन को सिर्फ एक ही इंसान कंट्रोल कर सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि वह हर ड्रोन को अलग-अलग चला रहा है, बल्कि सिस्टम में लगे एल्गोरिदम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से ड्रोन खुद भी फैसले ले सकते हैं।
ये ड्रोन अपने मिशन के दौरान लक्ष्य को पहचान सकते हैं, जरूरत पड़ने पर रास्ता बदल सकते हैं और दुश्मन की गतिविधियों के हिसाब से अपनी रणनीति बदल सकते हैं। यही वजह है कि इसे “इंटेलिजेंट स्वॉर्म” कहा जा रहा है।
क्या-क्या कर सकते हैं ये ड्रोन
एटलस सिस्टम के ड्रोन सिर्फ हमला करने के लिए नहीं हैं। ये कई तरह के काम कर सकते हैं। जैसे इलाके की निगरानी करना, दुश्मन की लोकेशन का पता लगाना, आपस में कम्युनिकेशन बनाए रखना और दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को कन्फ्यूज करना।
जब इतने सारे ड्रोन एक साथ उड़ते हैं, तो वे एक तरह का “डिफेंसिव स्ट्रक्चर” भी बना सकते हैं। इसका मतलब है कि कुछ ड्रोन आगे जाकर हमला करते हैं, कुछ पीछे रहकर जानकारी जुटाते हैं, जबकि कुछ दुश्मन के सिस्टम को कन्फ्यूज करने का काम करते हैं।
किसने बनाया यह सिस्टम
इस सिस्टम को चाइना इलेक्ट्रॉनिक्स टेक्नोलॉजी ग्रुप कॉरपोरेशन यानी सीईटीसी ने तैयार किया है। यह चीन की सरकारी कंपनी है, जो डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स और टेलीकम्युनिकेशन के क्षेत्र में काम करती है।
सीईटीसी पहले भी कई बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर चुकी है। इसमें मिसाइल गाइडेंस सिस्टम, सैटेलाइट टेक्नोलॉजी और अन्य डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स शामिल हैं। इस कंपनी का सीधा संबंध चीन की सेना से है और यह सिविल-मिलिट्री इंटीग्रेशन मॉडल के तहत काम करती है। (China Atlas Drone Swarm System)
“इंटेलिजेंट वॉरफेयर” चीन की रणनीति
चीन की सेना पिछले कई सालों से “इंटेलिजेंटाइजेशन वॉरफेयर” यानी बुद्धिमान युद्ध की दिशा में काम कर रही है। चीन के सैन्य दस्तावेजों में यह साफ कहा गया है कि भविष्य के युद्ध “अनमैन्ड” यानी बिना इंसानी सैनिकों के और “इंटेलिजेंट” यानी मशीनों और एल्गोरिदम पर आधारित होंगे। इसी रणनीति के तहत ड्रोन और स्वॉर्म टेक्नोलॉजी पर तेजी से काम किया जा रहा है।
पिछले कुछ सालों में चीन ने दुनिया के अलग-अलग युद्धों से सीख ली है। इसमें रूस-यूक्रेन युद्ध, इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष और अन्य सैन्य अभियानों के अनुभव शामिल हैं। इन युद्धों में ड्रोन के बढ़ते इस्तेमाल ने यह दिखाया है कि छोटे, सस्ते और बड़ी संख्या में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन भी बड़े हथियारों को चुनौती दे सकते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए एटलस जैसे सिस्टम तैयार किए गए हैं।
जानकारी के अनुसार, चीन के पास पहले से ही हजारों ड्रोन मौजूद हैं, जो अलग-अलग श्रेणियों में आते हैं। इनमें छोटे ड्रोन, मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस ड्रोन, हाई एल्टीट्यूड ड्रोन और स्टेल्थ ड्रोन शामिल हैं। इनका इस्तेमाल चीन अपने विभिन्न सैन्य क्षेत्रों में कर रहा है, जिनमें ताइवान स्ट्रेट, साउथ चाइना सी और भारत के साथ लगने वाली लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी के इलाके भी शामिल हैं। (China Atlas Drone Swarm System)
कैसे काम करता है यह स्वॉर्म सिस्टम
एटलस सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत इसका नेटवर्क आधारित ऑपरेशन है। इसमें सभी ड्रोन आपस में जुड़े रहते हैं और लगातार डेटा शेयर करते हैं। अगर किसी एक ड्रोन को नुकसान पहुंचता है या वह नष्ट हो जाता है, तो बाकी ड्रोन तुरंत अपनी रणनीति बदल लेते हैं। वे नए तरीके से टारगेट को पहचानते हैं और मिशन को जारी रखते हैं। इस तरह यह सिस्टम किसी एक यूनिट पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि पूरी टीम की तरह काम करता है।
इस सिस्टम में “किल चेन” यानी लक्ष्य पहचानने से लेकर हमला करने तक की पूरी प्रक्रिया ऑटोमेटेड हो सकती है। इसका मतलब है कि ड्रोन खुद ही टारगेट को ढूंढ सकते हैं, उसे पहचान सकते हैं और उस पर हमला कर सकते हैं।
हालांकि दुनिया के कई देशों ने भी ड्रोन स्वॉर्म सिस्टम डेवलप किए हैं। अमेरिका ने “पर्डिक्स” और “ऑफसेट” जैसे प्रोजेक्ट्स पर काम किया है, जो 100 से ज्यादा माइक्रो ड्रोन और करीब 250 अनमैन्ड सिस्टम लॉन्च कर सकते हैं। चीन का “मदरशिप” ड्रोन भी 100 से 150 ड्रोन छोड़ने की क्षमता रखता है। लेकिन एटलस सिस्टम की खासियत सिर्फ इसकी संख्या नहीं है, बल्कि उनकी इंटेलिजेंस और आपसी तालमेल है।
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे सिस्टम एयर डिफेंस के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं। जब एक साथ इतने सारे ड्रोन हमला करते हैं, तो उन्हें रोकना मुश्किल हो जाता है। इससे एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बढ़ता है और संसाधनों का तेजी से इस्तेमाल होता है। (China Atlas Drone Swarm System)
भारत के लिए क्यों है बड़ी चुनौती
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के ड्रोन स्वॉर्म सिस्टम एयर डिफेंस के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं। जब एक साथ इतने सारे ड्रोन हमला करते हैं, तो उन्हें रोकना आसान नहीं होता। इससे एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बढ़ता है और रिसोर्सेज का तेजी से इस्तेमाल होता है।
चीन इस सिस्टम को खासतौर पर सीमावर्ती इलाकों में इस्तेमाल कर सकता है। तिब्बत क्षेत्र में चीन ने सड़क और रेल नेटवर्क को काफी मजबूत किया है, जिससे ऐसे सिस्टम को जल्दी तैनात किया जा सकता है।
अगर इस तरह के ड्रोन स्वॉर्म का इस्तेमाल किया जाता है, तो यह आगे की चौकियों तक जाने वाले रास्तों और सप्लाई लाइनों को निशाना बना सकता है। इससे सेना के लॉजिस्टिक्स और मूवमेंट पर असर पड़ सकता है। (China Atlas Drone Swarm System)
जामिंग से बचने की क्षमता
आमतौर पर ड्रोन को रोकने के लिए जामिंग तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें उनके कम्युनिकेशन सिस्टम को बाधित किया जाता है। लेकिन स्वॉर्म सिस्टम में यह काम आसान नहीं होता।
एटलस सिस्टम के ड्रोन आपस में लगातार जानकारी साझा करते रहते हैं और अगर एक लिंक टूटता है, तो वे दूसरा रास्ता चुन लेते हैं। इस वजह से इन्हें पूरी तरह जाम करना मुश्किल हो जाता है।
चीन की सेना ने इस सिस्टम के कई परीक्षण किए हैं। मार्च महीने में इसका एक बड़ा डेमो भी किया गया, जिसमें इसकी लॉन्च क्षमता, कंट्रोल सिस्टम और ड्रोन के बीच तालमेल को दिखाया गया। इस डेमो के बाद से यह सिस्टम वैश्विक स्तर पर चर्चा में आ गया है और इसे आधुनिक युद्ध के नए ट्रेंड के रूप में देखा जा रहा है। (China Atlas Drone Swarm System)

