📍नई दिल्ली | 22 Apr, 2026, 11:15 AM
NFU for Armed Forces: भारतीय सेनाओं के मिड-लेवल अधिकारियों को सिविलियन अधिकारियों के बराबर वेतन और स्टेटस देने की मांग को सरकार की एक इंटर-मिनिस्टेरियल हाई-लेवल कमेटी ने खारिज कर दिया है। यह मामला लंबे समय से चर्चा में था और अब इस पर सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई होनी है। रक्षा मंत्रालय ने अदालत में एक अतिरिक्त एफिडेविट दाखिल कर कमेटी की रिपोर्ट का हवाला दिया है।
NFU for Armed Forces: क्या है एनएफयू और क्यों उठी मांग
एनएफयू यानी नॉन-फंक्शनल अपग्रेडेशन एक ऐसी व्यवस्था है, जो सिविलियन ब्यूरोक्रेसी और पुलिस अधिकारियों को मिलती है। इसमें एक तय समय तक सेवा देने के बाद, भले ही प्रमोशन न मिले, अधिकारी को अपने बैच के आधार पर उच्च वेतनमान मिल जाता है।
सेनाओं में यह सुविधा लागू नहीं है। सेना, नौसेना और वायुसेना के कई अधिकारी लंबे समय से यह मांग कर रहे थे कि उन्हें भी एनएफयू का लाभ दिया जाए, क्योंकि प्रमोशन के मौके सीमित होते हैं और कई अधिकारी एक ही रैंक पर लंबे समय तक काम करते हैं।
कमेटी ने क्यों किया इनकार
जनवरी 2026 में बनाई गई इस हाई-लेवल कमेटी ने इस मुद्दे की विस्तृत समीक्षा की। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि एनएफयू को लागू करना आसान नहीं है। इसमें कई तरह की मुश्किलें हैं, जिनमें कानूनी और प्रशासनिक समस्याएं शामिल हैं।
कमेटी के मुताबिक, अगर सशस्त्र बलों में एनएफयू लागू किया जाता है, तो इसका असर पेंशन सिस्टम पर भी पड़ेगा। वेतन बढ़ने से पुराने रिटायर्ड अधिकारियों की पेंशन को भी दोबारा तय करना होगा। इससे वन रैंक वन पेंशन यानी ओआरओपी सिस्टम में भी बदलाव करना पड़ेगा, जो बेहद मुश्किल होगा। (NFU for Armed Forces)
Please see the Conclusion and the Recommendations of the so called High Level Committee on grant of NFU to Armed Forces…. https://t.co/iBsPy7Kb5c pic.twitter.com/Gn0n8k5F6h
— Colonel Mukul (@Warrior_Mukul) April 21, 2026
आर्थिक बोझ भी बड़ी वजह
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि इस फैसले का वित्तीय असर काफी ज्यादा होगा। अब तक ओआरओपी के तीन संशोधनों पर करीब 22,000 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। अगर एनएफयू लागू किया जाता है, तो सिर्फ 7वें वेतन आयोग की अवधि में ही 12,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का अतिरिक्त खर्च आ सकता है।
इसके अलावा पेंशन में बदलाव के कारण और भी आर्थिक बोझ बढ़ने की संभावना जताई गई है। कमेटी का मानना है कि इतने बड़े खर्च को देखते हुए इस फैसले को सावधानी से लेना जरूरी है।
सेवा शर्तों में अंतर का हवाला
कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा कि सिविल सर्विस और सशस्त्र बलों की सेवा शर्तें अलग-अलग हैं। दोनों के काम करने का तरीका, जिम्मेदारियां और परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। इसलिए दोनों के बीच पूरी तरह समानता स्थापित करना संभव नहीं है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि सशस्त्र बलों को पहले से ही कई विशेष लाभ मिलते हैं। इनमें ओआरओपी, मिलिट्री सर्विस पे और अन्य भत्ते शामिल हैं, जो उनकी कठिन कार्य परिस्थितियों को ध्यान में रखकर दिए जाते हैं। (NFU for Armed Forces)
सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित
इस पूरे मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही है। इससे पहले 2016 में आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल ने सशस्त्र बलों के पक्ष में फैसला दिया था और एनएफयू लागू करने की बात कही थी। सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसके बाद से मामला लंबित है।
दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने रक्षा मंत्रालय को इस मुद्दे की दोबारा समीक्षा करने को कहा था। उसी के बाद यह नई कमेटी बनाई गई और अब उसकी रिपोर्ट अदालत में पेश की गई है।
अधिकारियों को भी दिया गया पक्ष रखने का मौका
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, कमेटी ने इस मुद्दे पर कई दौर की चर्चा की और उन अधिकारियों को भी अपनी बात रखने का मौका दिया, जिन्होंने एनएफयू की मांग को लेकर अदालत का रुख किया था। उनके तर्कों को सुनने के बाद ही कमेटी ने अपनी सिफारिश तैयार की। (NFU for Armed Forces)
8वें वेतन आयोग को भेजने का सुझाव
कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया है कि इस पूरे मामले को 8वें सेंट्रल पे कमीशन के पास भेजा जाए। इससे पहले भी वेतन से जुड़े कई बड़े फैसले पे कमीशन के जरिए लिए जाते रहे हैं।
इस तरह फिलहाल सशस्त्र बलों के अधिकारियों को एनएफयू देने की मांग पर रोक लग गई है और अब इस पर अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट और भविष्य में पे कमीशन की सिफारिशों के आधार पर होगा। (NFU for Armed Forces)
वेटरंस ने उठाए सवाल
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में पैरवी कर रही रिटायर्ड कर्नल मुकुल ने कहा कि एनएफयू न देने का फैसला सशस्त्र बलों के साथ गलत व्यवहार जैसा है। उनके मुताबिक सरकार ने जो अतिरिक्त एफिडेविट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया, उसमें साफ कहा गया कि ज्यादा आर्थिक बोझ के कारण एनएफयू नहीं दिया जा सकता। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यह एफिडेविट जनवरी में तैयार था, लेकिन तीन महीने बाद जमा किया गया। उनके अनुसार ऐसा जानबूझकर किया गया हो सकता है, ताकि सुनवाई के समय या हालात को ध्यान में रखकर फायदा लिया जा सके। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर लड़ाई आगे भी जारी रहेगी। (NFU for Armed Forces)
वहीं रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल सुशील सिंह श्योराण ने कहा कि अब इस मामले पर सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट पर है, जहां आगे क्या फैसला आता है, यह अहम रहेगा।
एनएफयू को लेकर विवाद इस समय बड़ा मुद्दा बना हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि सरकार, वायुसेना और नौसेना इस व्यवस्था के पक्ष में हैं, लेकिन सेना के अंदर खासकर ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारी इसके खिलाफ हैं। उनका तर्क है कि इससे सिस्टम पर असर पड़ सकता है।
कुछ पूर्व अधिकारियों का यह भी कहना है कि सेना में संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर अलग तरह की व्यवस्था होती है। कई बार पद और जिम्मेदारी के आधार पर अधिकारियों को अतिरिक्त अधिकार मिलते हैं, जिन्हें ‘प्रिविलेज’ कहा जाता है। इनके इस्तेमाल को लेकर भी बहस होती रही है। उनका मानना है कि इसी वजह से कुछ वरिष्ठ अधिकारी एनएफयू को लेकर सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। (NFU for Armed Forces)

