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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: शॉर्ट सर्विस कमीशन महिला अफसरों को मिलेगा हक, परमानेंट कमीशन न देने को बताया गलत

कोर्ट ने कहा है कि वायुसेना का शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) अधिकारियों को परमानेंट कमीशन (पीसी) न देने का फैसला कई मामलों में गलत तरीके से किया गया...

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📍नई दिल्ली | 24 Mar, 2026, 11:39 AM

IAF Supreme Court: भारतीय वायु सेना से जुड़े एक बड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि सेना में महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) अधिकारियों को भी परमानेंट कमीशन (पीसी) पाने का पूरा अधिकार है। कोर्ट ने माना कि अब तक उन्हें पीसी न देना सही नहीं था और इसमें कई तरह की भेदभाव वाली खामियां थीं।

यह मामला उन महिला अधिकारियों से जुड़ा है जिन्हें शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) के तहत सेवा के बाद परमानेंट कमीशन (PC) नहीं दिया गया था। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के बाद प्रभावित अधिकारियों को पेंशन और अन्य सुविधाएं देने का आदेश दिया है।

इस फैसले का सबसे बड़ा असर महिला अधिकारियों पर पड़ा है। लंबे समय से महिलाएं सेना में समान अधिकारों की मांग कर रही थीं। (IAF Supreme Court)

IAF Supreme Court: क्या है पूरा मामला

भारतीय वायुसेना में दो तरह की सर्विस होती है। एक होती है शॉर्ट सर्विस कमीशन, जिसे एसएससी कहा जाता है। इसमें अधिकारी एक तय समय, आमतौर पर 10 से 14 साल तक सेवा करते हैं। इसके बाद या तो उन्हें परमानेंट कमीशन दिया जाता है या फिर सेवा से बाहर होना पड़ता है।

दूसरी तरफ परमानेंट कमीशन यानी पीसी होता है, जिसमें अधिकारी लंबी अवधि तक सेवा कर सकते हैं और उन्हें पेंशन, प्रमोशन और अन्य सुविधाएं मिलती हैं।

समस्या तब शुरू हुई जब कई एसएससी अधिकारियों ने शिकायत की कि उन्हें परमानेंट कमीशन देने की प्रक्रिया में सही मौका नहीं दिया गया और उनके साथ न्याय नहीं हुआ। (IAF Supreme Court)

अधिकारियों की शिकायत क्या थी

कई अधिकारियों, खासकर महिला अधिकारियों ने कहा कि यह प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष नहीं थी। उनका कहना था कि उन्हें खुद को साबित करने का सही मौका नहीं मिला।

कुछ मामलों में यह भी सामने आया कि अलग-अलग बैच के अधिकारियों के लिए अलग-अलग मानदंड अपनाए गए। यानी एक बैच में ज्यादा अंक वालों का चयन हुआ, जबकि दूसरे बैच में कम अंक वालों को भी मौका मिल गया।

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इसके अलावा कुछ महिला अधिकारियों ने यह भी कहा कि मैटरनिटी लीव के कारण उनकी एसीआर पर असर पड़ा, जिससे उनके चयन की संभावना कम हो गई। (IAF Supreme Court)

क्या कहा कोर्ट ने

कोर्ट ने अपने विशेष अधिकार, यानी आर्टिकल 142 का इस्तेमाल करते हुए कहा कि शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) महिला अधिकारियों के साथ सिस्टम के स्तर पर भेदभाव हुआ है। साथ ही यह भी कहा कि हर साल केवल 250 महिला अधिकारियों को ही पीसी देने की सीमा तय करना मनमाना फैसला था और इसे सही नहीं माना जा सकता।

यह फैसला आर्मी, नेवी और एयर फोर्स तीनों पर लागू होगा। कोर्ट ने साफ किया कि महिलाओं को मूल्यांकन, करियर के मौके और पेंशन जैसे मामलों में बराबरी मिलनी चाहिए।

कोर्ट ने यह भी समझाया कि एसएससी सिस्टम में अधिकारी 10 साल के लिए भर्ती होते हैं, जिसे बढ़ाकर 14 साल तक किया जा सकता है। इसके बाद अगर उन्हें परमानेंट कमीशन नहीं मिलता, तो उन्हें सेवा छोड़नी पड़ती है। ऐसे में उन्हें पेंशन और आगे बढ़ने के मौके भी सीमित मिलते हैं। वहीं, पीसी मिलने पर अधिकारी रिटायरमेंट तक सेवा कर सकते हैं, प्रमोशन पा सकते हैं और पेंशन के हकदार बनते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि महिला अधिकारियों के मूल्यांकन का तरीका ही गलत था। उनकी एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट (एसीआर) इस सोच के साथ लिखी जाती थी कि उन्हें पीसी नहीं मिलेगा। इससे उनकी मेरिट यानी योग्यता पर असर पड़ता था।

हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ किया कि 2019, 2020 और 2021 में जो चयन बोर्ड के जरिए पीसी दिया जा चुका है, उसमें कोई बदलाव नहीं होगा। कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शन के मानदंड को सही तरीके से और निष्पक्ष तरीके से लागू नहीं किया गया।

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कोर्ट ने यह भी माना कि अधिकारियों को खुद को साबित करने का पूरा मौका नहीं मिला, जो कि उनके अधिकारों के खिलाफ है। इसे संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन माना गया। (IAF Supreme Court)

क्या थी 2019 की पॉलिसी 

साल 2019 में वायु सेना ने एक नई ह्यूमन रिसोर्स पॉलिसी लागू की थी। इसके तहत एसएससी अधिकारियों को पीसी पाने के लिए तीन मौके दिए गए थे। यह मौके उनकी सेवा के 11वें, 12वें और 13वें साल में मिलते थे।

इस प्रक्रिया में अधिकारियों के प्रदर्शन को कई आधारों पर परखा जाता था। जैसे उनकी एसीआर यानी एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट, सीजीपीए और एक न्यूनतम प्रदर्शन मानक, जिसे एमपीसी कहा जाता है।

सरकार का कहना था कि यह पूरी प्रक्रिया मेरिट के आधार पर थी और इसमें कोई भेदभाव नहीं था। (IAF Supreme Court)

कोर्ट ने क्या राहत दी

कोर्ट ने यह भी कहा कि महिलाओं को अक्सर ऐसे कोर्स और अहम पोस्टिंग नहीं दी जाती थी, जो उनके करियर को आगे बढ़ाने में मदद करती हैं। बाद में जब पीसी के लिए उनका मूल्यांकन किया जाता था, तो उनके पास कम मौके होने की वजह से उन्हें कमजोर माना जाता था।

मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि अब यह नहीं माना जा सकता कि परमानेंट कमीशन सिर्फ पुरुषों के लिए ही रहेगा। महिलाओं को इससे बाहर रखना साफ तौर पर भेदभाव है।

पुराने मामलों में न्याय देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा आदेश दिया। जिन महिला अधिकारियों को पीसी मिलना चाहिए था, उन्हें ऐसा माना जाएगा जैसे उन्होंने 20 साल की सेवा पूरी कर ली हो। इसके आधार पर उन्हें पेंशन और बाकी सभी सुविधाएं दी जाएंगी। यह लाभ उन अधिकारियों को भी मिलेगा, जिन्हें पहले चयन प्रक्रिया में अयोग्य घोषित कर दिया गया था।

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इसमें पेंशन के साथ-साथ मेडिकल सुविधा, ग्रेच्युटी और अन्य लाभ भी शामिल हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि इन अधिकारियों की सेवा को ऐसे माना जाए जैसे उन्होंने लंबी अवधि तक सेवा की हो।

हालांकि कोर्ट ने उन्हें दोबारा सेवा में लेने का आदेश नहीं दिया, लेकिन आर्थिक सुरक्षा देने पर जोर दिया।

नेवी-एयरफोर्स पर क्या कहा कोर्ट ने

नेवी के मामले में कोर्ट ने कहा कि वहां सीटों का सिस्टम ठीक है, लेकिन चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी रही है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि 2009 के बाद शामिल हुई महिला अधिकारियों को मेडिकल फिटनेस के आधार पर पीसी दिया जाए।

एयर फोर्स के मामले में कोर्ट ने कहा कि जिन अधिकारियों को करियर में आगे बढ़ने का सही मौका ही नहीं मिला, उनके खिलाफ यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने कम सेवा की है। हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि उन्हें दोबारा सेवा में लेना सही नहीं होगा, लेकिन इससे उनकी पेंशन नहीं रोकी जा सकती।

अंत में कोर्ट ने तीनों सेनाओं को निर्देश दिया कि वे अपने मूल्यांकन सिस्टम की पूरी समीक्षा करें, ताकि भविष्य में किसी भी महिला अधिकारी के साथ भेदभाव न हो और सभी को निष्पक्ष मौका मिल सके। (IAF Supreme Court)

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