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Explained: मलक्का स्ट्रेट पर भारत को बड़ी कामयाबी! जानें कैसे चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति का जवाब बनेगा सबांग पोर्ट?

सबांग पोर्ट का विकास भारत और इंडोनेशिया के बीच कई सालों से चल रही समुद्री साझेदारी का हिस्सा है। यह प्रोजेक्ट ऐसे स्थान पर स्थित है, जहां से दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में शामिल मलक्का जलडमरूमध्य की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है...

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📍नई दिल्ली/जकार्ता | 7 Jul, 2026, 4:58 PM

India-Indonesia Sabang Port Project: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान दोनों देशों ने रक्षा, समुद्री सुरक्षा, ब्लू इकोनॉमी, बंदरगाह विकास और कनेक्टिविटी से जुड़े कई अहम फैसलों पर सहमति जताई। इन्हीं में सबसे महत्वपूर्ण समझौतों में से एक इंडोनेशिया के सबांग पोर्ट के संयुक्त विकास का है। इस प्रोजेक्ट से भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी और इंडो-पैसिफिक रणनीति को मजबूती मिलेगी।

सूत्रों के अनुसार, सबांग पोर्ट का विकास भारत और इंडोनेशिया के बीच कई सालों से चल रही समुद्री साझेदारी का हिस्सा है। यह प्रोजेक्ट ऐसे स्थान पर स्थित है, जहां से दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में शामिल मलक्का जलडमरूमध्य की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है। यही वजह है कि इस प्रोजेक्ट को आर्थिक और रणनीतिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

India-Indonesia Sabang Port Project: आखिर कहां है सबांग पोर्ट?

सबांग पोर्ट इंडोनेशिया के अचे प्रांत में स्थित वेह द्वीप पर बना हुआ है। यह द्वीप सुमात्रा के सबसे उत्तरी हिस्से में है। भौगोलिक दृष्टि से इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी प्रवेश द्वार के बिल्कुल पास स्थित है। यह स्ट्रेट मलेशिया और इंडोनेशिया के बीच स्थित है। इसकी लंबाई लगभग 800 किलोमीटर है। वहीं, कुछ जगहों पर चौड़ाई मात्र 2.8 किलोमीटर तक सिकुड़ जाती है।

मलक्का जलडमरूमध्य हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर और प्रशांत महासागर से जोड़ता है। दुनिया के अधिकांश मालवाहक जहाज, तेल टैंकर और कंटेनर शिप इसी समुद्री मार्ग का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए इस क्षेत्र को वैश्विक समुद्री व्यापार की सबसे महत्वपूर्ण लाइफलाइन माना जाता है।

मलक्का जलडमरूमध्य इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

दुनिया के समुद्री व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। हर साल हजारों जहाज इस मार्ग का इस्तेमाल करते हैं। मध्य-पूर्व से निकलने वाला कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और एशियाई देशों के बीच होने वाला व्यापार इसी रास्ते से आगे बढ़ता है।

वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग एक चौथाई हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और कई अन्य एशियाई देशों की ऊर्जा आपूर्ति भी काफी हद तक इसी समुद्री रास्ते पर निर्भर है।

यही कारण है कि मलक्का जलडमरूमध्य को दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण मैरिटाइम चोकपॉइंट्स में गिना जाता है। यदि किसी कारण से इस मार्ग पर यातायात प्रभावित होता है तो उसका असर वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर भी पड़ सकता है।

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भारत के लिए क्यों खास है सबांग?

सबांग पोर्ट की सबसे बड़ी रणनीतिक विशेषता इसकी भारत से निकटता है। यह बंदरगाह भारत के ग्रेट निकोबार द्वीप से लगभग 160 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

भारत इस समय ग्रेट निकोबार में एक बड़े ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट, बिजली प्रोजेक्ट और अन्य समुद्री बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास कर रहा है। ऐसे में सबांग और ग्रेट निकोबार एक-दूसरे के पूरक समुद्री केंद्र बन सकते हैं।

सूत्रों का कहना है कि दोनों स्थानों की भौगोलिक स्थिति भारत को मलक्का जलडमरूमध्य के दोनों ओर बेहतर समुद्री पहुंच उपलब्ध करा सकती है। इससे समुद्री निगरानी, जहाजों की आवाजाही और लॉजिस्टिक सपोर्ट की क्षमता मजबूत हो सकती है।

केवल बंदरगाह नहीं, समुद्री नेटवर्क का हिस्सा

विशेषज्ञों के अनुसार, सबांग प्रोजेक्ट को केवल एक बंदरगाह के रूप में नहीं देखा जा रहा है। इसका उद्देश्य पूरे क्षेत्र में समुद्री कनेक्टिविटी को मजबूत करना है।

भारत और इंडोनेशिया पहले से अंडमान-निकोबार और अचे क्षेत्र के बीच व्यापार, पर्यटन और समुद्री संपर्क बढ़ाने पर काम कर रहे हैं। इसी दिशा में सबांग पोर्ट को एक बड़े समुद्री नेटवर्क के रूप में विकसित करने की योजना बनाई गई है।

इस नेटवर्क में कंटेनर परिवहन, जहाजों को ईंधन उपलब्ध कराना, मरम्मत सुविधाएं, समुद्री लॉजिस्टिक्स, मत्स्य क्षेत्र और पर्यटन जैसे कई क्षेत्र शामिल हो सकते हैं। (India-Indonesia Sabang Port Project)

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से क्या होगा फायदा?

भारत का ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट देश की सबसे बड़ी समुद्री आधारभूत प्रोजेक्टओं में शामिल है। इसके तहत अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट, ऊर्जा संयंत्र और आधुनिक टाउनशिप विकसित की जा रही है।

अभी भारत के काफी कंटेनर कोलंबो, सिंगापुर और पोर्ट क्लांग जैसे विदेशी बंदरगाहों के माध्यम से ट्रांसशिपमेंट किए जाते हैं। ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का उद्देश्य इस निर्भरता को कम करना है।

यदि ग्रेट निकोबार और सबांग दोनों समुद्री केंद्र एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करते हैं, तो पूरे अंडमान सागर क्षेत्र में समुद्री गतिविधियां बढ़ सकती हैं। इससे व्यापारिक जहाजों को अतिरिक्त सेवाएं भी उपलब्ध हो सकेंगी।

चीन के लिए क्यों महत्वपूर्ण है मलक्का मार्ग?

चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा समुद्री रास्ते से पूरा करता है। चीन के आयातित कच्चे तेल का अधिकांश भाग मलक्का जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है।

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चीन के रणनीतिक विशेषज्ञ लंबे समय से इसे “मलक्का डिलेमा” कहते रहे हैं। इसका मतलब यह है कि यदि किसी संकट के समय इस समुद्री मार्ग पर बाधा आती है तो चीन की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।

इसी कारण चीन ने “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” रणनीति के तहत पिछले कई सालों में हिंद महासागर क्षेत्र में विभिन्न बंदरगाहों और समुद्री प्रोजेक्टओं में निवेश किया है। पाकिस्तान के ग्वादर, श्रीलंका के हम्बनटोटा और म्यांमार के क्योकफ्यू जैसे बंदरगाह इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माने जाते हैं।

रक्षा सूत्रों का कहना है कि भारत और इंडोनेशिया का सबांग सहयोग किसी देश के खिलाफ नहीं, बल्कि समुद्री सुरक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया कदम है। हालांकि इसकी रणनीतिक स्थिति इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद महत्वपूर्ण बना देती है।

सबांग पोर्ट का संयुक्त विकास कैसे होगा?

भारत और इंडोनेशिया के बीच जिस सबांग पोर्ट परियोजना पर सहमति बनी है, उसका उद्देश्य केवल बंदरगाह का विस्तार करना नहीं है। रक्षा और समुद्री मामलों से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इसे एक ऐसे आधुनिक समुद्री केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा, जहां व्यापारिक जहाजों के साथ-साथ समुद्री लॉजिस्टिक्स, ईंधन आपूर्ति, जहाजों की मरम्मत और अन्य आवश्यक सेवाएं भी उपलब्ध हों।

इसके तहत बंदरगाह के बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जाएगा। बड़े जहाजों के लिए बर्थिंग सुविधा बेहतर बनाई जाएगी, कंटेनर हैंडलिंग क्षमता बढ़ाई जाएगी और आधुनिक समुद्री उपकरण लगाए जाएंगे। इसके साथ ही समुद्री सुरक्षा से जुड़ी सुविधाओं का भी विस्तार किया जाएगा। (India-Indonesia Sabang Port Project)

क्या होता है ड्यूल-यूज इंफ्रास्ट्रक्चर?

समुद्री विशेषज्ञ अक्सर इस तरह की परियोजनाओं के लिए ड्यूल-यूज इंफ्रास्ट्रक्चर शब्द का इस्तेमाल करते हैं। इसका मतलब ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर से होता है जिसका उपयोग सामान्य व्यापारिक गतिविधियों के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर सरकारी या सुरक्षा एजेंसियां भी कर सकें।

उदाहरण के तौर पर किसी बंदरगाह पर बनाए गए बड़े जेटी, ईंधन भंडारण केंद्र, गोदाम, संचार प्रणाली और मरम्मत सुविधाओं का उपयोग सामान्य कार्गो जहाज भी कर सकते हैं और आवश्यकता पड़ने पर नौसेना या तटरक्षक बल के जहाज भी।

भारतीय नौसेना को कैसे मिलेगा फायदा?

सूत्रों के अनुसार, यदि सबांग पोर्ट पूरी तरह विकसित हो जाता है तो भारतीय नौसेना को हिंद महासागर के पूर्वी हिस्से में बेहतर लॉजिस्टिक सहायता मिल सकती है।

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जब कोई युद्धपोत लंबी दूरी के मिशन पर जाता है, तो उसे समय-समय पर ईंधन, भोजन, पानी, तकनीकी जांच और अन्य आवश्यक सामग्री की जरूरत पड़ती है। यदि आसपास ऐसी सुविधाएं उपलब्ध हों तो जहाजों को अपने मूल बेस पर लौटने की आवश्यकता कम पड़ती है।

इसी तरह समुद्री निगरानी, मानवीय सहायता, आपदा राहत और संयुक्त अभ्यास जैसे अभियानों के दौरान भी बेहतर सहयोग संभव हो सकता है। (India-Indonesia Sabang Port Project)

समुद्री निगरानी कैसे होगी मजबूत?

सबांग पोर्ट की सबसे बड़ी खूबी उसकी लोकेशन है। यहां से मलक्का जलडमरूमध्य के प्रवेश क्षेत्र की समुद्री गतिविधियों पर नजर रखना अपेक्षाकृत आसान माना जाता है।

आज समुद्री निगरानी केवल जहाजों से नहीं होती। इसके लिए तटीय रडार, सैटेलाइट, ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (एआईएस), समुद्री संचार नेटवर्क और विभिन्न देशों के बीच साझा की जाने वाली सूचनाओं का भी उपयोग किया जाता है।

यदि किसी जहाज की गतिविधि सामान्य पैटर्न से अलग दिखाई देती है तो उसकी जानकारी संबंधित एजेंसियों तक पहुंचाई जा सकती है।

इसी प्रकार समुद्री डकैती, हथियारों की तस्करी, मानव तस्करी, अवैध मछली पकड़ने और संदिग्ध जहाजों की पहचान करने में भी ऐसे नेटवर्क मदद करते हैं। (India-Indonesia Sabang Port Project)

एक-दूसरे के पूरक कैसे बन सकते हैं ग्रेट निकोबार और सबांग?

विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रेट निकोबार और सबांग की भूमिका अलग-अलग हो सकती है।

ग्रेट निकोबार को बड़े अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट हब के रूप में डेवलप किया जा रहा है, जहां बड़े कंटेनर जहाज अपना माल दूसरे जहाजों में स्थानांतरित कर सकेंगे।

दूसरी ओर, सबांग पोर्ट समुद्री सेवाओं का केंद्र बन सकता है। यहां जहाजों को ईंधन, तकनीकी सहायता, मरम्मत, समुद्री लॉजिस्टिक्स और अन्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं। (India-Indonesia Sabang Port Project)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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