📍नई दिल्ली | 8 Jul, 2026, 6:37 PM
Carl Gustaf M4 Rocket Launcher: भारतीय सेना अपनी इन्फैंट्री युनिट्स की मारक क्षमता बढ़ाने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठा रही है। भारतीय सेना जल्द ही कार्ल गुस्ताफ मार्क-4 मल्टी-रोल शोल्डर-फायर्ड वेपन खरीदने की तैयारी कर रही है। सेना ने हल्के वजन वाले रॉकेट लॉन्चरों की 450 यूनिट खरीदने के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी की है। इस खरीद में केवल लॉन्चर ही नहीं, बल्कि इनके साथ जरूरी एक्सेसरीज, स्पेयर पार्ट्स, टेक्निकल डॉक्युमेंट्स और सपोर्ट सिस्टम भी शामिल होंगे।
धरअसल सेना को अलग-अलग तरह के युद्ध क्षेत्रों में तेजी से कार्रवाई करनी होती है। खासतौर पर पहाड़ी इलाकों, जंगलों, सीमावर्ती क्षेत्रों और शहरी युद्ध में हल्के लेकिन शक्तिशाली हथियारों की जरूरत लगातार बढ़ रही है। कार्ल गुस्ताफ मार्क-4 सेना की इसी जरूरत को पूरा करेगी।
Carl Gustaf M4 Rocket Launcher: क्या है कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV?
कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV दुनिया की सबसे आधुनिक 84 मिलीमीटर रिकॉयलेस राइफल सिस्टम में से एक है। इसे स्वीडन की रक्षा कंपनी साब ने डेवलप किया है। यह ऐसा हथियार है जिसे एक सैनिक आसानी से अपने कंधे पर लेकर युद्ध क्षेत्र में पहुंच सकता है और जरूरत पड़ने पर दुश्मन के बख्तरबंद वाहन, बंकर, इमारत, फायरिंग पोजीशन या अन्य सैन्य ठिकानों पर हमला कर सकता है।
इसकी सबसे बड़ी ताकत इसका हल्का वजन और मल्टीपर्पज इस्तेमाल है। एक ही लॉन्चर से अलग-अलग प्रकार के गोला-बारूद दागे जा सकते हैं। इसी के चलते इसे केवल एंटी-टैंक वेपन नहीं, बल्कि मल्टी-रोल वेपन सिस्टम भी माना जाता है। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)
पहले से कहीं हल्का और आधुनिक
कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV वर्जन पहले के मॉडल की तुलना में काफी हल्का बनाया गया है। इसका वजन साइटिंग सिस्टम और बाइपॉड को छोड़कर 6.6 से 7 किलोग्राम है, जबकि पुराने मॉडल इससे काफी भारी थे। वजन कम होने के कारण सैनिक इसे लंबे समय तक अपने साथ लेकर चल सकते हैं।
इसकी कुल लंबाई लगभग 95 सेंटीमीटर है। यानी यह एक मीटर से भी छोटा है। छोटे आकार के कारण इसे तंग गलियों, पहाड़ी रास्तों, घने जंगलों और इमारतों के भीतर भी आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है।
मार्क-IV को हल्का बनाने के लिए इसमें आधुनिक सामग्री का उपयोग किया गया है। इसके बाहरी हिस्से में कार्बन फाइबर और अंदर टाइटेनियम लाइनर लगाया गया है। इससे हथियार का वजन कम हुआ है, लेकिन मजबूती पर कोई असर नहीं पड़ा।
इसके पीछे का वेंटुरी सेक्शन भी नए तरीके से डिजाइन किया गया है, जिससे इसकी लंबाई और वजन दोनों कम हुए हैं। यही कारण है कि यह मॉडल पहले की तुलना में ज्यादा संतुलित माना जाता है। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)
बैरल लाइफ 15 साल
आरएफपी के मुताबिक, भारतीय सेना के लिए खरीदा जाने वाला कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV एक 84 मिलीमीटर कैलिबर का हल्के वजन वाला रिकॉयलेस रॉकेट लॉन्चर होगा। यह सिंगल-शॉट फायरिंग सिस्टम पर काम करेगा, यानी एक बार में एक ही रॉकेट दागा जाएगा और उसके बाद अगला राउंड लोड किया जाएगा।
आरएफपी में स्पष्ट किया गया है कि इस लॉन्चर की बैरल लाइफ कम से कम 1,500 राउंड या 15 साल होनी चाहिए। यानी निर्धारित रखरखाव के साथ इसे लंबे समय तक सेवा में इस्तेमाल किया जा सके।
एक ही लॉन्चर से कई तरह के टारगेट्स पर हमला
सेना ने यह भी शर्त रखी है कि नए लॉन्चर की सटीकता (एक्यूरेसी) मौजूदा 84 मिलीमीटर कार्ल गुस्ताफ मार्क-III के बराबर या उससे बेहतर होनी चाहिए, ताकि टारगेट पर पहले जैसी या उससे अधिक प्रभावी फायरिंग की जा सके।
लॉन्चर को इस तरह डिजाइन किया जाना चाहिए कि वह भारतीय सेना के पास पहले से मौजूद 84 मिलीमीटर के सभी गोला-बारूद को दाग सके। इसके साथ ही भविष्य में डेवलप होने वाले नए गोला-बारूद के साथ भी यह पूरी तरह काम कर सके।
कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह केवल एक तरह का रॉकेट लॉन्चर नहीं है, बल्कि एक ऐसा हथियार है जो अलग-अलग मिशनों के लिए अलग-अलग प्रकार के गोला-बारूद का इस्तेमाल कर सकता है। यही वजह है कि दुनिया की कई सेनाएं इसे अपनी इन्फैंट्री यूनिट्स का महत्वपूर्ण हथियार मानती हैं।
कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV के लिए 84 मिलीमीटर कैलिबर के कई प्रकार के गोले उपलब्ध हैं। मिशन के अनुसार सैनिक अलग-अलग राउंड का चयन कर सकते हैं।
यदि सामने दुश्मन का बख्तरबंद वाहन या टैंक हो, तो हाई एक्सप्लोसिव एंटी-टैंक (हीट) राउंड का उपयोग किया जाता है। इसकी विशेष डिजाइन धातु की मोटी परत को भेदकर अंदर विस्फोट करती है।
अगर टारगेट किसी इमारत, बंकर या दीवार के पीछे छिपा हो, तो हाई एक्सप्लोसिव ड्यूल पर्पज (एचईडीपी) राउंड इस्तेमाल किया जाता है। यह पहली बाधा को तोड़ कर और फिर अंदर विस्फोट करता है।
इसी तरह सैनिकों के समूह के खिलाफ हाई एक्सप्लोसिव (एचई) राउंड का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा धुआं फैलाने वाले स्मोक राउंड और रात के समय रोशनी करने वाले इल्यूमिनेशन राउंड भी उपलब्ध हैं। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)
माइनस 20 डिग्री से लेकर प्लस 50 डिग्री सेल्सियस तक करे काम
भारतीय सेना ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह हथियार भारत के धूलभरे, गर्म और अधिक नमी वाले इलाकों में बिना किसी रुकावट के काम करने में सक्षम होना चाहिए। यानी रेगिस्तान, जंगल, पहाड़ी और तटीय क्षेत्रों जैसी सभी परिस्थितियों में इसकी कार्यक्षमता प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
विश्वसनीयता के मामले में भी नया लॉन्चर कार्ल गुस्ताफ मार्क-III के बराबर या उससे बेहतर प्रदर्शन करने वाला होना चाहिए। साथ ही इसकी मेंटेनेंस आसान होनी चाहिए, ताकि सैनिक बिना किसी विशेष औजार के इसे खोलकर साफ कर सकें, नियमित जांच कर सकें और जरूरत पड़ने पर इसके पुर्जों को आसानी से बदल या मरम्मत कर सकें।
इसके अलावा सेना ने यह भी शर्त रखी है कि माइनस 20 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में भी लॉन्चर की क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए। यानी यह हथियार लद्दाख की कड़ाके की ठंड से लेकर राजस्थान के रेगिस्तान जैसी भीषण गर्मी तक हर मौसम में समान रूप से प्रभावी ढंग से काम करने में सक्षम होना चाहिए। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)
कैसे करता है काम?
कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV एक सिंगल-शॉट ब्रीच-लोडिंग रिकॉयलेस सिस्टम है। हर बार फायरिंग के बाद पीछे से नया गोला-बारूद डाला जाता है और फिर अगला शॉट तैयार होता है।
सामान्य तौर पर इसे दो सैनिक चलाते हैं। एक सैनिक लॉन्चर संभालता है जबकि दूसरा गोला-बारूद लोड करता है। हालांकि जरूरत पड़ने पर एक सैनिक भी इसे अकेले चला सकता है, लेकिन उस हालात में फायरिंग की स्पीड कम हो जाती है। कार्ल गुस्ताफ लगभग एक मिनट में छह राउंड तक दाग सकता है। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)
निशाना लगाने के लिए आधुनिक सिस्टम
मार्क-IV में अलग-अलग प्रकार की साइट लगाई जा सकती हैं। इसमें साधारण आयरन साइट, रेड डॉट साइट, टेलीस्कोपिक साइट और आधुनिक डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम का इस्तेमाल किया जा सकता है।
आरएफपी के अनुसार लॉन्चर में एफसीडी-558 फायर कंट्रोल डिवाइस और रेड डॉट साइट लगाने की सुविधा होनी चाहिए। इससे गनर टारगेट पर तेजी और अधिक सटीकता के साथ निशाना लगा सकेगा।
इसके ऊपर पिकाटिनी रेल दी गई है, जिस पर जरूरत के अनुसार अतिरिक्त उपकरण लगाए जा सकते हैं। इससे अलग-अलग मिशनों के अनुसार हथियार को आसानी से तैयार किया जा सकता है। आधुनिक डिजिटल साइट लगाने पर टारगेट की दूरी, ऊंचाई और अन्य जरूरी जानकारी देखकर ज्यादा सटीक निशाना लगाया जा सकता है। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)
सैनिकों की सुरक्षा का भी ध्यान
मार्क-IV में कई ऐसे फीचर जोड़े गए हैं, जो सैनिकों की सुरक्षा बढ़ाते हैं। इसमें ट्रैवल सेफ्टी कैच दिया गया है, जिससे जरूरत पड़ने पर हथियार को लोडेड स्थिति में भी सुरक्षित रखा जा सकता है।
इसके अलावा इसमें एडजस्ट होने वाला शोल्डर रेस्ट और आगे पकड़ने के लिए बेहतर ग्रिप दी गई है। इससे लंबे समय तक हथियार इस्तेमाल करने में भी सैनिक को कम थकान होती है। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)
बैरल की स्थिति खुद बताएगा सिस्टम
इस हथियार में डिजिटल शॉट काउंटर भी लगाया गया है। यह रिकॉर्ड रखता है कि लॉन्चर से अब तक कितने राउंड दागे जा चुके हैं। इससे तकनीकी टीम को यह पता चलता रहता है कि बैरल की कितनी लाइफ बची है और कब उसकी जांच या बदलाव की जरूरत पड़ेगी। कंपनी के अनुसार इसकी बैरल लाइफ एक हजार से अधिक फुल कैलिबर राउंड तक हो सकती है।
कितनी दूर तक कर सकता है हमला
मार्क-IV की मारक क्षमता इस्तेमाल किए जाने वाले गोले पर निर्भर करती है। आरएफपी के मुताबिक, इसकी मारक क्षमता की बात करें तो हाई एक्सप्लोसिव एंटी-टैंक (HEAT) गोले के साथ इसकी प्रभावी रेंज कम से कम 350 मीटर होनी चाहिए। वहीं हाई एक्सप्लोसिव (HE) गोले के साथ यह कम से कम 800 मीटर तक सटीक हमला करने में सक्षम होना चाहिए।
चलते हुए बख्तरबंद वाहन के खिलाफ इसकी प्रभावी दूरी लगभग 350 से 400 मीटर मानी जाती है। यदि टारगेट स्थिर हो, तो यह दूरी लगभग 500 मीटर तक हो सकती है।
हाई एक्सप्लोसिव और स्मोक राउंड के साथ यह लगभग एक किलोमीटर तक प्रभावी फायर कर सकता है। आधुनिक गाइडेड गोला-बारूद के साथ इसकी दूरी इससे भी अधिक हो सकती है। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)
भारत में ही बनेगा कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV
सूत्रों के मुताबिक, भारत में इस हथियार का निर्माण हरियाणा के झज्जर स्थित मेट सिटी में स्थापित साब की नई फैक्टरी में किया जाएगा। यह स्वीडन के बाहर कार्ल गुस्ताफ मार्क-IV की पहली प्रोडक्शन युनिट है। इसे स्थापित करने की घोषणा वर्ष 2022 में की गई थी।
डिफेंस सेक्टर में पहला 100 प्रतिशत एफडीआई प्रोजेक्ट
साल 2023 में भारत सरकार ने साब को इस परियोजना के लिए 100 प्रतिशत विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) की मंजूरी दी। इसके बाद कंपनी ने साब एफएफवीओ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के नाम से अपनी भारतीय युनिट बनाई, जो पूरी तरह साब के स्वामित्व वाली कंपनी है।
रक्षा क्षेत्र में इसे एक महत्वपूर्ण कदम माना गया क्योंकि इससे आधुनिक रक्षा उपकरणों का उत्पादन भारत में शुरू होने का रास्ता खुला।
मार्च 2024 में झज्जर स्थित संयंत्र का निर्माण कार्य आधिकारिक रूप से शुरू हुआ। फैक्टरी में केवल लॉन्चर ही नहीं, बल्कि कई महत्वपूर्ण पुर्जों का भी निर्माण किया जाएगा। इनमें कार्बन फाइबर ट्यूब, आधुनिक साइटिंग सिस्टम और अन्य अपग्रेडेड कंपोनेंट शामिल हैं।
सूत्रों का कहना है कि यहां बने कुछ कंपोनेंट दुनिया के दूसरे देशों में उपयोग होने वाले कार्ल गुस्ताफ सिस्टम के लिए भी भेजे जा सकते हैं।
वहीं, भारत में उत्पादन शुरू होने से सेना को हथियारों की आपूर्ति के लिए विदेश पर पहले जैसी निर्भरता नहीं रहेगी। स्पेयर पार्ट्स, मरम्मत और तकनीकी सहायता भी कम समय में उपलब्ध कराई जा सकेगी। इससे लॉजिस्टिक व्यवस्था बेहतर होगी और रखरखाव का समय कम लगेगा। (Carl Gustaf M4 Rocket Launcher)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।



