📍नई दिल्ली/जकार्ता | 7 Jul, 2026, 6:40 PM
India-Indonesia BrahMos Missile Deal: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान भारत और इंडोनेशिया के बीच रक्षा सहयोग को नई दिशा मिली है। दोनों देशों ने ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम, अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल, समुद्री सुरक्षा, रक्षा तकनीक, सैन्य प्रशिक्षण, संयुक्त अभ्यास और रक्षा उद्योग से जुड़े कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है। सूत्रों के मुताबिक, इन्हीं समझौतों के तहत भारत इंडोनेशिया को करीब 20 करोड़ अमेरिकी डॉलर (लगभग 1,900 करोड़ रुपये) मूल्य की दो ब्रह्मोस मिसाइल बैटरियां देगा। इस प्रस्ताव को भारत और इंडोनेशिया के बीच अब तक के सबसे बड़े रक्षा सहयोगों में से एक माना जा रहा है।
बता दें कि रक्षा समाचार ने दो दिन पहले ही बताया था कि “एक नहीं, अब अतिरिक्त ब्रह्मोस मिसाइल बैटरियां चाहता है जकार्ता।”
India-Indonesia BrahMos Missile Deal: क्या होती है ब्रह्मोस बैटरी?
आमतौर पर लोग समझते हैं कि किसी देश को केवल मिसाइलें बेची जाती हैं, लेकिन वास्तविकता इससे अलग होती है। किसी भी आधुनिक मिसाइल सिस्टम में केवल मिसाइल नहीं, बल्कि पूरा ऑपरेशनल नेटवर्क शामिल होता है। इसी नेटवर्क को मिसाइल बैटरी कहा जाता है।
एक ब्रह्मोस बैटरी में सामान्य तौर पर चार मोबाइल लॉन्चर शामिल होते हैं। प्रत्येक लॉन्चर पर कई मिसाइलें तैनात की जा सकती हैं। इसके अलावा बैटरी में लगभग 12 तैयार मिसाइलें, कमांड पोस्ट, मोबाइल कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम, कम्यूनिकेशन इक्विपमेंट्स, पावर सप्लाई व्हीकल्स, री-लोडिंग व्हीकल्स, टेक्निकल सपोर्ट व्हीकल, और मेंटेनेंस से जुड़े कई उपकरण शामिल होते हैं।
यानी किसी बैटरी को तैनात करने के बाद वह अपने स्तर पर टारगेट की पहचान करने, मिसाइल लॉन्च करने और ऑपरेशन संचालित करने में सक्षम होती है।
तटीय सुरक्षा के लिए कैसे काम करती है ब्रह्मोस बैटरी?
सूत्रों के मुताबिक, इंडोनेशिया को मिलने वाली ब्रह्मोस बैटरियां मुख्य रूप से कोस्टल डिफेंस यानी तटीय सुरक्षा के लिए इस्तेमाल की जाएंगी।
यदि किसी दुश्मन का युद्धपोत, एंफीबियस हमला करने वाला जहाज या अन्य बड़ा समुद्री प्लेटफॉर्म इंडोनेशिया के समुद्री क्षेत्र की ओर बढ़ता है, तो तटीय रडार और सर्विलांस सिस्टम पहले उसकी पहचान करेंगे। इसके बाद कमांड सेंटर टारगेट की दूरी, दिशा और गति का विश्लेषण करेगा।
जब टारगेट की पुष्टि हो जाती है, तब ब्रह्मोस मिसाइल मोबाइल लॉन्चर से दागी जाती है। मिसाइल लॉन्च होने के बाद बेहद तेज गति से समुद्र की सतह के करीब उड़ते हुए टारगेट की ओर बढ़ती है और निर्धारित बिंदु पर सटीक हमला करती है।
दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में शामिल
ब्रह्मोस को दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिना जाता है। यह लगभग मैक 2.8 से 3 की गति से उड़ सकती है। इसका मतलब है कि इसकी रफ्तार लगभग 3,400 से 3,700 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच सकती है। इतनी अधिक गति के कारण दुश्मन के जहाजों या एयर डिफेंस सिस्टम के पास प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत कम समय बचता है।
अधिकांश सबसोनिक क्रूज मिसाइलें ब्रह्मोस की तुलना में काफी धीमी होती हैं। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। (India-Indonesia BrahMos Missile Deal)
कितनी है ब्रह्मोस की रेंज?
वर्तमान में ब्रह्मोस के अलग-अलग वर्जन अलग-अलग दूरी तक हमला कर सकते हैं। जमीन से जमीन पर हमला करने वाले वर्जन की मारक क्षमता लगभग 500 किलोमीटर तक पहुंच चुकी है। वहीं जहाज से दागे जाने वाले वर्जन की प्रभावी रेंज लगभग 400 किलोमीटर तक है।
सूत्रों के अनुसार, ब्रह्मोस के पुराने संस्करण की रेंज लगभग 290 किलोमीटर थी। बाद में तकनीकी सुधारों के जरिए इसकी मारक क्षमता बढ़ाई गई।
ब्रह्मोस को इतनी सटीक मिसाइल क्यों माना जाता है?
ब्रह्मोस की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्रिसीजन स्ट्राइक क्षमता है। मिसाइल लॉन्च होने के बाद पहले चरण में इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम की मदद से उड़ान भरती है। इसके बाद जीपीएस, ग्लोनास और अन्य नेविगेशन तकनीकों की सहायता से अपनी दिशा बनाए रखती है।
अंतिम चरण में इसका एक्टिव रडार सीकर अपने टारगेट की पहचान करता है और बेहद कम ऊंचाई पर उड़ते हुए सीधे टारगेट पर हमला करता है।
समुद्र की सतह के बेहद करीब उड़ने की इस तकनीक को सी-स्किमिंग प्रोफाइल कहा जाता है। इससे दुश्मन के रडार को मिसाइल का पता काफी देर से चलता है। (India-Indonesia BrahMos Missile Deal)
मिसाइल को रोकना क्यों मुश्किल?
किसी भी मिसाइल को रोकने के लिए एयर डिफेंस सिस्टम के पास पर्याप्त समय होना चाहिए। ब्रह्मोस बहुत तेज रफ्तार से उड़ती है और आखिरी चरण में ऊंचाई कम कर लेती है। साथ ही यह उड़ान के दौरान दिशा भी बदल सकती है। इस कारण दुश्मन के डिफेंस सिस्टम के लिए इसकी सही दिशा का अनुमान लगाना कठिन हो जाता है।
इसी वजह से इसे आधुनिक नौसैनिक युद्ध में बेहद प्रभावी हथियार माना जाता है।
🚨 BREAKING | Big India–Indonesia Defence & Strategic Boost Expected
Ahead of PM Narendra Modi’s meeting with Indonesian President Prabowo Subianto, several major outcomes are expected, according to sources:🔹 Indonesia likely to expand its BrahMos missile inventory, with India… https://t.co/fuZSSNjSHh pic.twitter.com/Qe6nREHzHD
— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) July 7, 2026
किन प्लेटफॉर्म से दागी जा सकती है ब्रह्मोस?
ब्रह्मोस की सबसे बड़ी विशेषता इसकी बहुउद्देश्यीय क्षमता है। इसे जमीन से मोबाइल लॉन्चर के जरिए दागा जा सकता है। भारतीय नौसेना के कई युद्धपोत भी इससे लैस हैं। भारतीय वायुसेना के सु-30 एमकेआई लड़ाकू विमान से भी इसका एयर-लॉन्च वर्जन का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया जा रहा है।
इसके अलावा पनडुब्बी से दागे जाने वाले संस्करण पर भी लंबे समय से काम किया जा रहा है। यही वजह है कि ब्रह्मोस को मल्टी-प्लेटफॉर्म सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल कहा जाता है। (India-Indonesia BrahMos Missile Deal)
इंडोनेशिया को ब्रह्मोस की जरूरत क्यों पड़ रही है?
इंडोनेशिया दुनिया के सबसे बड़े द्वीपीय देशों में शामिल है। उसके पास करीब 17 हजार द्वीप हैं और उसकी समुद्री सीमा हजारों किलोमीटर तक फैली हुई है। ऐसे में इतनी बड़ी समुद्री सीमा की सुरक्षा करना किसी भी देश के लिए बड़ी चुनौती होती है।
इंडोनेशिया अपनी तटीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए लंबे समय से आधुनिक मिसाइल सिस्टम की तलाश में था। खासकर दक्षिण चीन सागर और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियों को देखते हुए इंडोनेशिया ऐसी मिसाइल चाहता था, जो दुश्मन के युद्धपोतों को काफी दूरी से ही रोक सके। ब्रह्मोस उसकी इसी जरूरत को पूरा करता है। इसकी लंबी मारक क्षमता, तेज रफ्तार और सटीक निशाना इसे तटीय रक्षा के लिए उपयुक्त बनाते हैं।
ऑपरेशन सिंदूर में किया साबित
ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस की क्षमता ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। भारतीय सशस्त्र बलों ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इस मिसाइल का इस्तेमाल तय किए गए टारगेट्स पर सटीक हमला करने के लिए किया था।
सूत्रों के मुताबिक, इस ऑपरेशन के बाद कई देशों ने ब्रह्मोस की वास्तविक ऑपरेशनल क्षमता में रुचि दिखाई। किसी भी वेपन सिस्टम के लिए वास्तविक परिस्थितियों में प्रदर्शन सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है। इसी कारण अब कई मित्र देशों ने भारत के साथ ब्रह्मोस खरीदने को लेकर बातचीत तेज कर दी है।
फिलीपींस के बाद इंडोनेशिया दूसरा बड़ा ग्राहक
भारत ने पहली बार वर्ष 2022 में फिलीपींस के साथ ब्रह्मोस निर्यात का बड़ा समझौता किया था। उस सौदे के तहत फिलीपींस ने अपनी तटीय सुरक्षा के लिए तीन ब्रह्मोस बैटरियां खरीदी थीं।
सूत्रों के अनुसार, वियतनाम के साथ भी मिसाइल निर्यात को लेकर समझौता हो चुका है। इसके अलावा इंडोनेशिया के साथ दो बैटरियों का प्रस्ताव अंतिम चरण में पहुंच गया है। इसके अलावा पश्चिम एशिया, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई अन्य देश भी इस मिसाइल में रुचि दिखा रहे हैं। (India-Indonesia BrahMos Missile Deal)
डीआरडीओ और ब्रह्मोस एयरोस्पेस की क्या है भूमिका?
ब्रह्मोस मिसाइल का विकास भारत के डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) और रूस की एनपीओ मशीनोस्ट्रोयेनिया के संयुक्त सहयोग से किया गया है।
इसके प्रोडक्शन और डिस्ट्रिब्यूशन की जिम्मेदारी ब्रह्मोस एयरोस्पेस प्राइवेट लिमिटेड के पास है।
भारत में मिसाइल के कई महत्वपूर्ण हिस्सों का निर्माण अब स्वदेशी उद्योग कर रहा है। समय के साथ इसमें स्वदेशी तकनीक और भारतीय कंपोनेंट्स की हिस्सेदारी लगातार बढ़ाई गई है।
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यही कारण है कि अब ब्रह्मोस भारत के रक्षा निर्यात का सबसे महत्वपूर्ण उत्पाद बन चुका है। (India-Indonesia BrahMos Missile Deal)
क्या है ब्रह्मोस-एनजी?
ब्रह्मोस के मौजूदा वर्जन के साथ-साथ भारत इसका नया ब्रह्मोस-एनजी (नेक्स्ट जेनरेशन) वर्जन भी विकसित कर रहा है। इसे इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि इसे ज्यादा प्रकार के लड़ाकू विमानों, युद्धपोतों और पनडुब्बियों से आसानी से दागा जा सके। इसका आकार मौजूदा ब्रह्मोस मिसाइल से छोटा और वजन लगभग आधा होगा, जिससे इसे ले जाना और ऑपरेट करना आसान होगा।
ब्रह्मोस-एनजी का वजन करीब 1.5 टन होगा, जबकि मौजूदा ब्रह्मोस मिसाइल का वजन लगभग 3 टन है। इसकी लंबाई करीब 6 मीटर और व्यास लगभग 50 सेंटीमीटर होगा। यह लगभग मैक 3.5 यानी ध्वनि की गति से साढ़े तीन गुना अधिक रफ्तार से उड़ सकेगी। इसकी मारक क्षमता लगभग 290 किलोमीटर होगी। साथ ही इसमें आधुनिक एईएसए आधारित सीकर और कम रडार क्रॉस सेक्शन (आरसीएस) जैसी तकनीकें होंगी, जिससे दुश्मन के रडार के लिए इसे पहचानना पहले की तुलना में अधिक कठिन होगा।
फिलहाल भारतीय वायुसेना का सु-30 लड़ाकू विमान भारी वजन के कारण एक समय में केवल एक ब्रह्मोस-ए मिसाइल लेकर उड़ सकता है। लेकिन ब्रह्मोस-एनजी के हल्का होने के कारण यही विमान एक साथ तीन ब्रह्मोस-एनजी मिसाइलें ले जा सकेगा। सूत्रों का कहना है कि भविष्य में इसमें पांच मिसाइलें ले जाने की क्षमता भी विकसित की जा सकती है।
एक साथ अधिक मिसाइलें ले जाने की क्षमता मिलने से सु-30 एक ही मिशन में कई अलग-अलग टारगेट्स पर हमला कर सकेगा। इसमें दुश्मन के युद्धपोत, एयरबेस, रडार स्टेशन, मिसाइल लॉन्च साइट और अन्य महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने शामिल हो सकते हैं। ब्रह्मोस-एनजी को सु-30 के एलसीए तेजस, मिग-29के जैसे लड़ाकू विमानों के साथ भी जोड़ने की योजना है। (India-Indonesia BrahMos Missile Deal)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।



