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जब CDS ‘कर्नल’ बनकर पहुंचे अपनी यूनिट, गोरखा जवानों के साथ निभाई ये खास परंपरा

भारतीय सेना में कर्नल ऑफ द रेजिमेंट का पद बेहद सम्मानित माना जाता है। कर्नल को रेजिमेंट की परंपराओं, इतिहास, सैनिकों की भावना और पूर्व सैनिकों की भलाई का संरक्षक माना जाता है...

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📍नई दिल्ली/लखनऊ | 22 May, 2026, 7:59 PM

CDS Anil Chauhan Gorkha Rifles: चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानी सीडीएस जनरल अनिल चौहान हाल ही में लखनऊ स्थित 11 गोरखा राइफल्स रेजिमेंटल सेंटर पहुंचे। देश के सबसे वरिष्ठ सैन्य अधिकारी होने के बावजूद जनरल अनिल चौहान ने अपनी यूनिट के बीच कर्नल की रैंक इंसिग्निया पहनी हुई थी। कई लोगों को यह बात हैरान करने वाली लगी, लेकिन भारतीय सेना की रेजिमेंटल परंपरा में इसका खास महत्व है।

जनरल अनिल चौहान अपनी पैरेंट यूनिट 6/11 गोरखा राइफल्स और रेजिमेंटल सेंटर के दौरे पर पहुंचे थे। सैनिकों और पूर्व सैनिकों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। सेना के अधिकारियों के मुताबिक यह सिर्फ एक औपचारिक दौरा नहीं था, बल्कि अपने ही रेजिमेंटल परिवार में लौटने जैसा पल था।

CDS Anil Chauhan Gorkha Rifles: क्यों पहनी कर्नल की रैंक

जनरल अनिल चौहान भारतीय सेना में चार-स्टार रैंक वाले अधिकारी हैं और सीडीएस के पद पर तैनात हैं। इसके बावजूद उन्होंने कर्नल की रैंक इसलिए पहनी, क्योंकि उन्हें 11 गोरखा राइफल्स और सिक्किम स्काउट्स का ऑनरेरी कर्नल ऑफ द रेजिमेंट नियुक्त किया गया है।

भारतीय सेना में कर्नल ऑफ द रेजिमेंट का पद बेहद सम्मानित माना जाता है। यह अधिकारी रेजिमेंट की परंपराओं, इतिहास, सैनिकों की भावना और पूर्व सैनिकों की भलाई का संरक्षक माना जाता है। जब ऐसा अधिकारी अपनी रेजिमेंट के कार्यक्रमों या यूनिट विजिट में शामिल होता है, तो वह उसी रेजिमेंटल पद की रैंक पहनता है।

सेना के सूत्रों का कहना है कि यह परंपरा ब्रिटिश इंडियन आर्मी के समय से चली आ रही है। इसका मकसद वरिष्ठ अधिकारी और सैनिकों के बीच दूरी कम करना होता है। सैनिकों को यह एहसास होता है कि उनके सबसे बड़े अधिकारी भी उसी रेजिमेंटल परिवार का हिस्सा हैं।

सैनिकों के लिए खास था यह पल

11 गोरखा राइफल्स के जवानों के लिए यह दौरा बेहद भावनात्मक रहा। एक पूर्व सैनिक ने कहा कि उनके लिए जनरल चौहान केवल देश के सीडीएस नहीं हैं, बल्कि अपनी यूनिट के पुराने साथी हैं।

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सेना के अधिकारियों के मुताबिक जब कोई वरिष्ठ अधिकारी रेजिमेंटल परंपरा निभाते हुए कर्नल की रैंक पहनकर यूनिट में आता है, तो जवान उससे ज्यादा सहज महसूस करते हैं। वे खुलकर बातचीत कर पाते हैं और अपने अनुभव साझा कर सकते हैं।

इसी वजह से भारतीय सेना में रेजिमेंटल सिस्टम को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। सेना में अलग-अलग रेजिमेंट्स की अपनी पहचान, इतिहास और परंपराएं होती हैं। सैनिक खुद को सिर्फ सेना का हिस्सा नहीं, बल्कि अपनी रेजिमेंटल फैमिली का सदस्य मानते हैं।

11 गोरखा राइफल्स से पुराना रिश्ता

जनरल अनिल चौहान का पूरा सैन्य करियर 11 गोरखा राइफल्स से जुड़ा रहा है। उनका जन्म उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल क्षेत्र में हुआ था। उन्होंने 1981 में इंडियन मिलिट्री एकेडमी देहरादून से पास आउट होकर 6/11 गोरखा राइफल्स में कमीशन लिया था।

इसके बाद उन्होंने सेना में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। उन्होंने जम्मू-कश्मीर, एलओसी, सियाचिन और उत्तर-पूर्व में कई ऑपरेशंस में हिस्सा लिया। काउंटर इंसर्जेंसी और हाई-ऑल्टीट्यूड ऑपरेशंस में उन्हें लंबा अनुभव हासिल है।

जनरल चौहान ने ऑपरेशन मेघदूत, ऑपरेशन रक्षक समेत कई सैन्य अभियानों में काम किया। अप्रैल 2026 में उन्होंने वेस्टर्न कमांड की कमान संभाली थी। बाद में उन्हें देश का चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ नियुक्त किया गया।

11 गोरखा राइफल्स की बहादुरी का इतिहास

11 गोरखा राइफल्स भारतीय सेना की सबसे सम्मानित इन्फैंट्री रेजिमेंट्स में गिनी जाती है। इसकी स्थापना 1 जनवरी 1948 को हुई थी। यह स्वतंत्र भारत में बनी पहली गोरखा रेजिमेंट मानी जाती है।

इस रेजिमेंट के सैनिक मुख्य रूप से नेपाल और भारतीय हिमालयी क्षेत्रों की गोरखा समुदायों से आते हैं। गोरखा सैनिकों की बहादुरी दुनिया भर में प्रसिद्ध मानी जाती है।

11 गोरखा राइफल्स ने 1948 के जम्मू-कश्मीर ऑपरेशन, 1965 और 1971 के युद्ध, कारगिल संघर्ष और कई काउंटर इंसर्जेंसी अभियानों में हिस्सा लिया है।

कारगिल युद्ध के दौरान 1/11 गोरखा राइफल्स को “ब्रेवेस्ट ऑफ द ब्रेव” का सम्मान मिला था। इसी रेजिमेंट के कैप्टन मनोज कुमार पांडे को परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

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रेजिमेंट को कई अशोक चक्र, महावीर चक्र और अन्य वीरता पुरस्कार भी मिल चुके हैं। आज इसका रेजिमेंटल सेंटर लखनऊ में स्थित है, जहां जवानों की भर्ती और ट्रेनिंग होती है।

रेजिमेंटल परंपरा क्यों मानी जाती है अहम

भारतीय सेना में रेजिमेंटल सिस्टम केवल परंपरा नहीं, बल्कि सैनिकों की मनोवैज्ञानिक ताकत का हिस्सा माना जाता है। सेना के इतिहासकारों के मुताबिक युद्ध के दौरान सैनिक सबसे ज्यादा अपनी यूनिट और साथियों के लिए लड़ता है।

इसी वजह से सेना में रेजिमेंटल गौरव यानी रेजिमेंटल प्राइड को बहुत महत्व दिया जाता है। वरिष्ठ अधिकारी जब अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं तो जवानों का मनोबल भी मजबूत होता है।

सूत्रों का कहना है कि आज भारतीय सेना तेजी से आधुनिक तकनीकों और जॉइंट कमांड सिस्टम की ओर बढ़ रही है, लेकिन इसके बावजूद रेजिमेंटल परंपराएं आज भी उतनी ही मजबूत हैं।

8वीं गोरखा राइफल्स के कर्नल ऑफ द रेजिमेंट थे फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ

फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का नाम भारतीय सेना के सबसे महान सैन्य अधिकारियों में लिया जाता है। हालांकि उन्हें लोग सबसे ज्यादा 8वीं गोरखा राइफल्स से जोड़कर जानते हैं, लेकिन शुरुआत में उन्हें 1934 में 12h फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट की चौथी बटालियन में कमीशन मिला था। इसी यूनिट में उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बहादुरी दिखाई थी और उन्हें मिलिट्री क्रॉस से सम्मानित किया गया था।

1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद उनकी मूल रेजिमेंट पाकिस्तान चली गई। इसके बाद सैम मानेकशॉ को भारतीय सेना की 8वीं गोरखा राइफल्स में ट्रांसफर कर दिया गया। यहीं से उनका गोरखा सैनिकों के साथ गहरा रिश्ता बना।

उन्होंने लंबे समय तक 8वीं गोरखा राइफल्स के साथ सेवा की और बाद में उन्हें इस रेजिमेंट का “कर्नल ऑफ द रेजिमेंट” भी बनाया गया। गोरखा सैनिक उन्हें बेहद सम्मान देते थे और प्यार से “सैम बहादुर” कहकर बुलाते थे।

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सैम मानेकशॉ का गोरखा सैनिकों के बारे में कहा गया एक बयान आज भी बहुत मशहूर है। उन्होंने कहा था:

“If a man says he is not afraid of dying, he is either lying or is a Gorkha.”

यानी अगर कोई कहता है कि उसे मौत से डर नहीं लगता, तो या तो वह झूठ बोल रहा है या फिर वह गोरखा है।

आज भी 8वीं गोरखा राइफल्स, जिसे “शाइनी एट” भी कहा जाता है, सैम मानेकशॉ को अपनी सबसे बड़ी पहचान मानती है। भारतीय सेना में उनका नाम गोरखा परंपरा, बहादुरी और नेतृत्व का प्रतीक माना जाता है।

गोरखा सैनिकों की अलग पहचान

गोरखा सैनिकों की पहचान उनकी बहादुरी, अनुशासन और युद्ध कौशल से जुड़ी रही है। “जय महाकाली, आयो गोरखाली” का युद्धघोष पूरी दुनिया में जाना जाता है।

सियाचिन जैसे बर्फीले इलाकों से लेकर घने जंगलों तक गोरखा यूनिट्स ने कई बार अपनी क्षमता साबित की है। भारतीय सेना में गोरखा रेजिमेंट्स को सबसे भरोसेमंद और लड़ाकू यूनिट्स में गिना जाता है।

जनरल अनिल चौहान का अपनी यूनिट में कर्नल की रैंक पहनकर पहुंचना इसी गहरी रेजिमेंटल संस्कृति का हिस्सा है। सैनिकों के बीच यह संदेश गया कि चाहे कोई अधिकारी कितना भी बड़ा पद हासिल कर ले, उसकी पहचान अपनी यूनिट और अपने सैनिकों से जुड़ी रहती है।

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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