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राहुल गांधी के सवालों पर रक्षा मंत्रालय ने बताया INS Baaz की जगह गैलेथिया बे में क्यों बनाया जाएगा 13,000 करोड़ रुपये का नया एयरपोर्ट?

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 5 जून को एक वीडियो मैसेज में सरकार पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था कि अगर ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट वास्तव में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए है, तो सरकार को सबसे पहले आईएनएस बाज का विस्तार करना चाहिए...

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📍नई दिल्ली | 8 Jun, 2026, 8:21 PM

Great Nicobar Airport Project: अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में प्रस्तावित ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। एक तरफ विपक्ष इस प्रोजेक्ट को पर्यावरण और आदिवासी समुदायों के लिए खतरा बता रहा है, वहीं केंद्र सरकार और रक्षा मंत्रालय का कहना है कि यह प्रोजेक्ट भारत की समुद्री सुरक्षा, सामरिक मौजूदगी और आर्थिक हितों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

इसी बहस के बीच एक बड़ा सवाल सामने आया है कि जब भारतीय नौसेना का आईएनएस बाज एयरबेस पहले से मौजूद है तो फिर सरकार ग्रेट निकोबार में नया ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट क्यों बना रही है। रक्षा मंत्रालय ने अब इस पर विस्तार से अपना पक्ष रखा है और बताया है कि आखिर क्यों आईएनएस बाज के विस्तार की योजना को छोड़कर गैलेथिया बे के पास नया एयरपोर्ट बनाने का फैसला लिया गया।

Great Nicobar Airport Project: क्या है पूरा मामला?

ग्रेट निकोबार द्वीप में केंद्र सरकार चार बड़े प्रोजेक्ट डेवलपकरना चाहती है। इनमें इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट और नौसैनिक एयर स्टेशन, नया टाउनशिप तथा पावर प्लांट शामिल हैं।

इस पूरी प्रोजेक्ट का उद्देश्य भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में एक मजबूत रणनीतिक और आर्थिक केंद्र के रूप में डेवलप करना है। सरकार का मानना है कि ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति भारत को एक बड़ा सामरिक लाभ देती है।

हाल ही में रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने साफ कर दिया कि नया एयरपोर्ट गैलेथिया बे के पास चिंगेन क्षेत्र में बनाया जाएगा और आईएनएस बाज के रनवे को बड़ा करने का विचार छोड़ दिया गया है।

राहुल गांधी ने उठाए थे सवाल

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 5 जून को एक वीडियो मैसेज में सरकार पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था कि अगर ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट वास्तव में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए है, तो सरकार को सबसे पहले आईएनएस बाज का विस्तार करना चाहिए।

राहुल गांधी ने कहा था कि नौसेना पिछले कई सालों से आईएनएस बाज के विस्तार की मांग कर रही है। उनके अनुसार यदि सरकार रक्षा जरूरतों को प्राथमिकता देना चाहती है, तो मौजूदा सैन्य ठिकाने को डेवलप करना ज्यादा आसान और पर्यावरण के लिए कम नुकसानदायक विकल्प हो सकता है।

उन्होंने आरोप लगाया था कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को डिफेंस प्रोजेक्ट के रूप में पेश किया जा रहा है जबकि असल उद्देश्य कुछ और है। उनके बयान के बाद यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया। (Great Nicobar Airport Project)

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रक्षा मंत्रालय ने क्या जवाब दिया?

रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ सूत्रों का कहना है कि ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट का फैसला किसी राजनीतिक वजह से नहीं बल्कि विस्तृत तकनीकी और सामरिक आकलन के आधार पर लिया गया है।

सूत्रों के मुताबिक पांच अलग-अलग स्थानों का मूल्यांकन किया गया था। इनमें आईएनएस बाज का मौजूदा एयरबेस भी शामिल था। सभी स्थानों की भौगोलिक स्थिति, विमान संचालन की सुरक्षा, आदिवासी आबादी पर प्रभाव, पर्यावरणीय असर और भविष्य में विस्तार की संभावनाओं का अध्ययन किया गया।

इन सभी पहलुओं को देखने के बाद गैलेथिया बे को सबसे उपयुक्त स्थान माना गया। (Great Nicobar Airport Project)

आखिर आईएनएस बाज में क्या दिक्कत थी?

आईएनएस बाज ग्रेट निकोबार के कैंपबेल बे क्षेत्र में स्थित है। यह भारत का सबसे दक्षिणी सैन्य एयरबेस माना जाता है।

फिलहाल यहां लगभग 4,500 फीट लंबा रनवे है, जो छोटे और मध्यम आकार के विमानों के लिए पर्याप्त है। लेकिन बड़े सैन्य और नागरिक विमानों के संचालन के लिए इसे काफी बढ़ाना पड़ता।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार रनवे विस्तार में कई गंभीर चुनौतियां थीं।

एयरबेस के उत्तरी हिस्से में 80 मीटर से अधिक ऊंची पहाड़ी मौजूद हैं। बड़े विमानों के सुरक्षित ऑपरेशन के लिए इस पहाड़ी को बड़े पैमाने पर काटना पड़ता।

इसके अलावा तटीय क्षेत्र उथला है। ऐसे में समुद्र की ड्रेजिंग करनी पड़ती और बड़े स्तर पर भूमि पुनर्निर्माण का काम करना पड़ता।

गांवों और आबादी पर भी पड़ता असर

मंत्रालय का कहना है कि यदि आईएनएस बाज का विस्तार किया जाता तो रनवे आसपास की बस्तियों के बीच से गुजर सकता था। इससे स्थानीय आबादी दो हिस्सों में बंट सकती थी और लोगों को स्थानांतरित करने की जरूरत भी पड़ सकती थी।

साथ ही एयरबेस के आसपास पहले से मौजूद नौसेना के कई स्ट्रक्चर भी प्रभावित होते। अंतरराष्ट्रीय स्तर के एयरपोर्ट के लिए जरूरी सुविधाओं के लिए पर्याप्त जगह उपलब्ध नहीं थी।

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यही वजह थी कि विस्तार की योजना व्यवहारिक नहीं मानी गई। (Great Nicobar Airport Project)

पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाने का दावा

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर सबसे ज्यादा सवाल पर्यावरण को लेकर उठाए जा रहे हैं। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों कादावा है कि आईएनएस बाज का विस्तार करने से पक्षियों, समुद्री जीवों और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र को कहीं अधिक नुकसान पहुंचता।

इसके मुकाबले गैलेथिया बे में नया एयरपोर्ट बनाना अपेक्षाकृत बेहतर विकल्प माना गया।

मंत्रालय का कहना है कि पर्यावरण प्रभाव आकलन पूरी तरह निर्धारित नियमों के तहत किया गया। इस प्रक्रिया में कई प्रतिष्ठित संस्थानों की मदद ली गई।

इनमें भारतीय प्राणी सर्वेक्षण, वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और सलीम अली सेंटर फॉर ऑर्निथोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री जैसी संस्थाएं शामिल थीं। (Great Nicobar Airport Project)

क्यों महत्वपूर्ण है ग्रेट निकोबार?

ग्रेट निकोबार की सबसे बड़ी ताकत उसकी भौगोलिक स्थिति है। यह इलाका मलक्का जलडमरूमध्य के बेहद करीब स्थित है। मलक्का दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में शामिल है।

दुनिया के बड़े हिस्से का तेल और कंटेनर यातायात इसी मार्ग से गुजरता है। चीन के लिए भी यह मार्ग बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि उसके ऊर्जा आयात का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आता है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस इलाके में मजबूत सैन्य और लॉजिस्टिक ढांचा भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में अतिरिक्त सामरिक बढ़त देता है। (Great Nicobar Airport Project)

नया एयरपोर्ट कितना बड़ा होगा?

सरकार के अनुसार यह संयुक्त उपयोग वाला एयरपोर्ट होगा। इसका इस्तेमाल नागरिक उड्डयन मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय दोनों करेंगे। इस प्रोजेक्ट पर लगभग 13,000 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।

एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने शुरुआती चरण में इसे वर्ष 2040 तक 13.5 लाख यात्रियों की वार्षिक क्षमता वाला एयरपोर्ट बनाने की योजना तैयार की है। इसके साथ नौसेना को भी लंबी दूरी के विमान, निगरानी विमान और अन्य सैन्य संसाधन तैनात करने की अतिरिक्त सुविधा मिलेगी। (Great Nicobar Airport Project)

क्या खत्म होगी आईएनएस बाज की भूमिका

रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि आईएनएस बाज को बंद नहीं किया जा रहा है। यह एयरबेस पहले की तरह काम करता रहेगा और भारतीय नौसेना की फॉरवर्ड आउटपोस्ट बना रहेगा।

नया एयरपोर्ट आईएनएस बाज का विकल्प नहीं बल्कि पूरक सुविधा होगा। दोनों मिलकर इस क्षेत्र में भारत की समुद्री और हवाई निगरानी क्षमता को मजबूत करेंगे।

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आदिवासी समुदायों को लेकर क्या कहा गया?

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के विरोध में आदिवासी अधिकारों का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया है। मंत्रालय का कहना है कि किसी भी आदिवासी समुदाय को शारीरिक रूप से विस्थापित करने की योजना नहीं है।

सरकारी दस्तावेजों के अनुसार आदिवासी रिजर्व क्षेत्र में जितनी भूमि अधिसूचना से बाहर की गई है, उससे अधिक भूमि नए रिजर्व क्षेत्र के रूप में जोड़ी गई है।

प्रोजेक्ट से जुड़ी प्रक्रियाओं में स्थानीय निकोबारी परिषद, आदिवासी कल्याण विभाग और अन्य संबंधित संस्थाओं से परामर्श किया गया। (Great Nicobar Airport Project)

रोजगार और आर्थिक गतिविधियों पर जोर

सरकार का दावा है कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट केवल रक्षा से जुड़ा कार्यक्रम नहीं है बल्कि यह एक बड़े आर्थिक विकास मॉडल का हिस्सा भी है।

अधिकारियों के अनुसार प्रोजेक्ट के विभिन्न चरणों में एक लाख से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार अवसर पैदा हो सकते हैं।

इसके साथ पर्यटन, लॉजिस्टिक्स, समुद्री व्यापार, परिवहन और अन्य सेवाओं से जुड़े क्षेत्रों में भी गतिविधियां बढ़ने की उम्मीद जताई गई है। (Great Nicobar Airport Project)

क्यों महत्वपूर्ण माना जा रहा है यह फैसला?

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर राजनीतिक और पर्यावरणीय बहस जारी है, लेकिन रक्षा मंत्रालय का कहना है कि गैलेथिया बे में नया एयरपोर्ट बनाने का फैसला विस्तृत तकनीकी अध्ययन और सामरिक जरूरतों को ध्यान में रखकर लिया गया है।

मंत्रालय का तर्क है कि आईएनएस बाज का विस्तार कई भौगोलिक और परिचालन बाधाओं से घिरा था, जबकि नया ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट भविष्य की जरूरतों के अनुरूप अधिक उपयुक्त पाया गया। इसी वजह से अब सरकार ग्रेट निकोबार में नए एयरपोर्ट, बंदरगाह, टाउनशिप और ऊर्जा प्रोजेक्ट के साथ आगे बढ़ रही है। (Great Nicobar Airport Project)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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