📍नई दिल्ली/लेह | 14 Jul, 2026, 12:11 PM
Ladakh 7 Hill Councils: लद्दाख में हाल ही में बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया गया है। केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद अब लद्दाख के सभी सात जिलों में ऑटोमॉमस हिल काउंसिल बनाई जाएंगी। अभी तक केवल लेह और कारगिल में ही हिल काउंसिल थीं, लेकिन अब शाम, नुब्रा, चांगथांग, जांस्कर और द्रास जैसे नए जिलों को भी वही अधिकार मिलेंगे। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है, जब पूर्वी लद्दाख में 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत और चीन दोनों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर सैनिकों की तैनाती, मिलिट्री स्ट्रक्चर और बुनियादी सुविधाओं को तेजी से मजबूत किया है
अधिकारियों के मुताबिक, इस फैसले का मकसद प्रशासन को लोगों के और करीब ले जाना है, ताकि हर जिला अपनी जरूरत के हिसाब से विकास योजनाएं बना सके और तेजी से फैसले लिए जा सकें। यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है, जब लद्दाख में नए जिले बनाए जाने के बाद प्रशासनिक ढांचे को मजबूत किया जा रहा है।
Ladakh 7 Hill Councils: लद्दाख में कई सालों से चल रही थी तैयारी
लद्दाख को वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग कर केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था। इसके बाद प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने की प्रक्रिया शुरू हुई। अगस्त 2024 में गृह मंत्रालय ने पांच नए जिले बनाने को मंजूरी दी थी। इसके बाद सीमा निर्धारण, जिला मुख्यालय तय करने और प्रशासनिक व्यवस्था तैयार करने के लिए एक समिति बनाई गई।
समिति ने कई दौर की बैठकों और स्थानीय स्तर पर विचार-विमर्श के बाद अपनी रिपोर्ट उपराज्यपाल को सौंपी। रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद अप्रैल 2026 में नए जिलों की अधिसूचना जारी की गई। अब उसी प्रक्रिया के अगले चरण के रूप में सातों जिलों में हिल काउंसिल बनाने की तैयारी शुरू कर दी गई है। (Ladakh 7 Hill Councils)
हिल काउंसिल का क्या है रोल?
हिल काउंसिल एक स्थानीय निर्वाचित निकाय होती है, जिसे जिले के विकास और कई प्रशासनिक मामलों में अधिकार दिए जाते हैं। लद्दाख ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल एक्ट के तहत इसका गठन किया जाता है।
इसका उद्देश्य यह है कि दूर-दराज और कठिन इलाकों से जुड़े फैसले स्थानीय स्तर पर ही लिए जाएं, ताकि लोगों को हर काम के लिए लेह या दूसरे बड़े प्रशासनिक केंद्रों पर निर्भर न रहना पड़े।
लद्दाख में लंबे समय तक केवल दो जिले थे, लेह और कारगिल। इन्हीं दोनों जिलों में हिल काउंसिल काम कर रही थीं। लेह हिल काउंसिल की स्थापना 1995 में, जबकि कारगिल हिल काउंसिल की स्थापना 2003 में हुई थी।
इसके बाद अप्रैल 2026 में लद्दाख में पांच नए जिले बनाए गए। इनमें शाम, नुब्रा, चांगथांग, जांस्कर और द्रास शामिल हैं। अब इन सभी जिलों में भी पूर्ण अधिकार वाली हिल काउंसिल बनाई जाएगी।
नई काउंसिलों को मिलेंगे कौन-कौन से अधिकार?
लद्दाख के मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा ने सोमवार को लेह में प्रेस वार्ता के दौरान बताया कि लद्दाख ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल एक्ट की धारा 3(1) में पहले से ही हर जिले के लिए हिल काउंसिल बनाने का प्रावधान मौजूद है। अब सरकार इसकी अधिसूचना जारी कर सातों जिलों में यह व्यवस्था लागू करेगी।
नए फैसले के बाद बाकी पांच जिलों को भी वही अधिकार मिलेंगे जो पहले से लेह और कारगिल की काउंसिलों के पास हैं। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि किसी भी जिले को सीमित अधिकार नहीं दिए जाएंगे।
अधिकारियों के मुताबिक सभी सात हिल काउंसिलों को समान अधिकार दिए जाएंगे। उन्हें जिले के विकास की योजना बनाने, स्थानीय स्तर पर परियोजनाओं को मंजूरी देने और कई प्रशासनिक फैसले लेने का अधिकार होगा।
काउंसिलों के पास भूमि आवंटन और भूमि प्रबंधन से जुड़े अधिकार भी होंगे। इसके अलावा जिला कैडर की नौकरियों में भर्ती और पदोन्नति से जुड़े फैसलों में भी उनकी भूमिका रहेगी।
सूत्रों के मुताबिक इसका उद्देश्य स्थानीय युवाओं को रोजगार के अधिक अवसर उपलब्ध कराना और जिला प्रशासन में स्थानीय भागीदारी बढ़ाना है। इससे प्रत्येक जिले की प्रशासनिक जरूरतों के अनुसार कर्मचारियों की नियुक्ति करना भी आसान होगा।
हर काउंसिल का अपना अलग फंड होगा और उसे कुछ स्थानीय कर तथा शुल्क लगाने का अधिकार भी मिलेगा। इससे प्रत्येक जिले के पास अपने विकास कार्यों के लिए अलग वित्तीय व्यवस्था होगी। (Ladakh 7 Hill Councils)
नए जिलों के लिए यह फैसला क्यों है जरूरी
अब तक कई योजनाएं लेह या कारगिल से तैयार होकर दूसरे इलाकों तक पहुंचती थीं। नई व्यवस्था में प्रत्येक जिला अपनी जरूरत के अनुसार विकास योजना तैयार करेगा। स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यटन, ग्रामीण सड़कें, स्थानीय बुनियादी ढांचा और सामाजिक कल्याण योजनाओं से जुड़े फैसले जिला स्तर पर लिए जाएंगे।
अधिकारियों का कहना है कि लद्दाख का भौगोलिक स्वरूप देश के अन्य हिस्सों से बिल्कुल अलग है। यहां ऊंचे पहाड़, लंबे समय तक बर्फबारी, सीमित आबादी और दूर-दराज के गांव हैं। ऐसे में हर जिले की जरूरत भी अलग है।
लद्दाख का क्षेत्रफल बहुत बड़ा होने से आबादी बेहद कम है। यहां कई गांव ऐसे हैं जो एक-दूसरे से काफी दूर हैं और सर्दियों में महीनों तक बर्फ से कट जाते हैं।
ऐसी स्थिति में दो जिलों से पूरे लद्दाख का प्रशासन चलाना मुश्किल माना जा रहा था। नए जिले बनने के बाद अब हर जिले को अपनी अलग प्रशासनिक व्यवस्था और निर्वाचित हिल काउंसिल मिलेगी। इससे स्थानीय जरूरतों के अनुसार फैसले लेना आसान होगा।
नई व्यवस्था में किसी जिले में पर्यटन पर अधिक ध्यान दिया जा सकता है तो किसी जिले में स्वास्थ्य सेवाओं या स्कूलों पर। हिल काउंसिल स्थानीय जरूरतों के अनुसार सड़क, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन और सामाजिक कल्याण योजनाओं को आगे बढ़ा सकेगी। इससे फैसले लेने की प्रक्रिया पहले की तुलना में तेज होने की उम्मीद है।
अनुच्छेद 371 को लेकर भी चल रही है चर्चा
मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा ने बताया कि लद्दाख के लिए विशेष संवैधानिक व्यवस्था को लेकर भी अलग से विचार-विमर्श जारी है। इसके तहत केंद्र शासित प्रदेश स्तर पर एक ऐसे निकाय की संभावना पर चर्चा हो रही है, जिसके पास विधायी, प्रशासनिक, वित्तीय और कार्यकारी अधिकार हो सकते हैं।
लद्दाख प्रशासन ने यह भी बताया है कि केंद्र सरकार के साथ विशेष संवैधानिक व्यवस्था को लेकर बातचीत जारी है। इसके तहत केंद्र शासित प्रदेश स्तर पर एक अलग निकाय बनाने पर विचार किया जा रहा है, जिसके पास विधायी, प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार हो सकते हैं।
अधिकारियों के मुताबिक फिलहाल सातों जिलों में हिल काउंसिल का गठन इस पूरी प्रक्रिया का पहला महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम माना जा रहा है। (Ladakh 7 Hill Councils)
चांगथांग जिले पर सबसे ज्यादा नजर क्यों?
नई हिल काउंसिल में सबसे ज्यादा चर्चा चांगथांग जिले की हो रही है। इसका मुख्यालय न्योमा बनाया गया है। यह इलाका वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के बेहद करीब है और इसमें चुशूल, डेमचोक, कोयुल, न्योमा और अन्य कई महत्वपूर्ण गांव शामिल हैं।
राजस्व रिकॉर्ड में इन गांवों को स्पष्ट रूप से दर्ज किए जाने और अलग जिला प्रशासन बनने से सरकारी योजनाओं, राजस्व व्यवस्था और स्थानीय प्रशासन को मजबूत आधार मिलेगा।
वहीं, न्योमा पहले से ही रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है। यहां भारतीय वायुसेना का हाई एल्टीट्यूड एडवांस लैंडिंग ग्राउंड तैयार किया जा रहा है। दूसरी ओर सेना की कई महत्वपूर्ण तैनातियां भी इसी इलाके के आसपास हैं।
ऐसे में जिला मुख्यालय भी न्योमा में बनने से नागरिक प्रशासन और सरकारी सेवाओं की मौजूदगी और मजबूत होगी। इससे विकास योजनाओं और प्रशासनिक फैसलों को स्थानीय स्तर पर लागू करना आसान होगा। (Ladakh 7 Hill Councils)
सीमा पर प्रशासनिक व्यवस्था क्यों होती है महत्वपूर्ण?
सीमावर्ती इलाकों में केवल सेना की मौजूदगी ही काफी नहीं होती। वहां मजबूत नागरिक प्रशासन, नियमित सरकारी सेवाएं और स्थानीय आबादी की भागीदारी भी उतनी ही जरूरी होती है।
चांगथांग जैसे इलाके में नया जिला बनने के बाद सरकारी कार्यालय, राजस्व व्यवस्था, विकास योजनाएं और स्थानीय प्रशासन पहले की तुलना में ज्यादा व्यवस्थित तरीके से काम कर सकेंगे। इससे लोगों को छोटी-छोटी प्रशासनिक जरूरतों के लिए लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ेगी।
सूत्रों ने बताया कि लद्दाख के नए जिलों के गठन के साथ राजस्व रिकॉर्ड को भी नए सिरे से व्यवस्थित किया जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार प्रत्येक गांव की स्पष्ट प्रशासनिक पहचान तय की जा रही है।
सीमावर्ती इलाकों में सही भूमि रिकॉर्ड, गांवों की आधिकारिक सूची और प्रशासनिक सीमाएं सरकारी कामकाज का अहम हिस्सा होती हैं। इससे विकास योजनाओं, सड़क, बिजली, पानी और अन्य सरकारी परियोजनाओं को लागू करने में आसानी होती है।
पश्मीना अर्थव्यवस्था को मिल सकता है नया आधार
चांगथांग दुनिया की सबसे अच्छी पश्मीना ऊन के लिए जाना जाता है। यहां रहने वाले चांगपा समुदाय की आजीविका मुख्य रूप से पश्मीना बकरियों पर निर्भर है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थानीय स्तर पर ऊन की प्रोसेसिंग, ब्रांडिंग और मार्केटिंग की व्यवस्था मजबूत हो, तो केवल कच्ची ऊन बेचने की बजाय तैयार उत्पादों से स्थानीय लोगों की आय बढ़ सकती है।
नई जिला व्यवस्था में स्थानीय विकास योजनाएं बनने से इस क्षेत्र के पारंपरिक व्यवसायों को भी प्राथमिकता मिलने की संभावना है। (Ladakh 7 Hill Councils)
याक डेयरी भी बन सकती है स्थानीय आय का बड़ा स्रोत
इसके अलावा चांगथांग और आसपास के ऊंचाई वाले इलाकों में याक पालन लंबे समय से होता रहा है। यहां बनने वाला याक चीज (चुरपे) और अन्य डेयरी उत्पाद धीरे-धीरे पहचान बना रहे हैं। यदि स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग, गुणवत्ता प्रमाणन और विपणन की व्यवस्था विकसित की जाए तो याक डेयरी उत्पाद स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
वहीं, चांगथांग, नुब्रा, हानले, पांगोंग त्सो, त्सो मोरीरी और जांस्कर जैसे इलाके पहले से ही देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। नई जिला व्यवस्था के बाद प्रत्येक जिला अपनी पर्यटन योजनाएं खुद तैयार कर सकेगा। स्थानीय प्रशासन सड़क, होम-स्टे, पर्यटन सुविधाओं और स्थानीय रोजगार से जुड़ी योजनाओं पर अपने स्तर पर काम कर सकेगा। (Ladakh 7 Hill Councils)
पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए भी उठाए बड़े कदम
लद्दाख में प्रशासनिक बदलाव के साथ-साथ पर्यटन क्षेत्र को मजबूत करने के लिए भी हाल के महीनों में कई अहम फैसले लिए गए हैं। इनका उद्देश्य पर्यटन को संगठित ढंग से विकसित करना, स्थानीय लोगों की आय बढ़ाना और निवेश को बढ़ावा देना है।
जून 2026 में उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने लद्दाख टूरिज्म डेवलपमेंट सोसाइटी (LTDS) के गठन को मंजूरी दी थी। यह एक स्वायत्त संस्था होगी, जो पर्यटन और संस्कृति विभाग के साथ मिलकर काम करेगी। इसका उद्देश्य लद्दाख को केवल मौसमी पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि सालभर आकर्षण का केंद्र बनाने की दिशा में योजनाएं तैयार करना है।
यह संस्था एडवेंचर टूरिज्म, इको-टूरिज्म, एस्ट्रो-टूरिज्म, वाइल्डलाइफ टूरिज्म और कम्युनिटी आधारित पर्यटन को बढ़ावा देने पर काम करेगी। साथ ही पर्यटन से जुड़े बुनियादी ढांचे का विकास, स्थानीय युवाओं के लिए प्रशिक्षण, सुरक्षा मानकों को बेहतर बनाना और लद्दाख की वैश्विक ब्रांडिंग भी इसकी जिम्मेदारी होगी।
इससे पहले मई 2026 में लेफ्टिनेंट गवर्नर ने एक और महत्वपूर्ण घोषणा की थी। जिसके तहत पर्यटन विभाग में पंजीकृत होटल और गेस्ट हाउस को ‘इंडस्ट्री’ का दर्जा देने का भी फैसला किया गया। इस फैसले के बाद इन प्रतिष्ठानों को औद्योगिक श्रेणी के अनुसार कई सुविधाएं मिल सकेंगी। इनमें बिजली और पानी की रियायती दरें, आसान बैंक ऋण और अन्य औद्योगिक प्रोत्साहन शामिल हैं। प्रशासन का मानना है कि इससे होटल उद्योग की लागत कम होगी और नए निवेश को बढ़ावा मिलेगा।
सूत्रों का कहना है कि पर्यटन लद्दाख की अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख आधार है। ऐसे में पर्यटन को संस्थागत रूप से मजबूत करने और होटल उद्योग को राहत देने वाले ये फैसले स्थानीय रोजगार, होम-स्टे, हस्तशिल्प, परिवहन और अन्य पर्यटन आधारित व्यवसायों को भी मजबूती दे सकते हैं।
चीन को काउंटर करने की रणनीतिक तैयारी
चीन अपनी “सलामी स्लाइसिंग” रणनीति के तहत किसी बड़े सैन्य संघर्ष की बजाय छोटे-छोटे कदम उठाकर किसी इलाके पर धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत करता है। चीन कई बार सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़क, पुल, गांव, सैन्य चौकी या अन्य ढांचे बनाकर अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश करता है। दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में भी चीन पर ऐसी रणनीति अपनाने के आरोप लगते रहे हैं।
लद्दाख भारत का सबसे संवेदनशील सीमावर्ती इलाका है, जिसकी सीमा चीन के कब्जे वाले तिब्बत से लगती है। मई 2020 में पूर्वी लद्दाख में शुरू हुए सीमा विवाद और गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद से दोनों देशों ने एलएसी पर सैनिकों, हथियारों और बुनियादी ढांचे को लगातार मजबूत किया है। चीन ने अपनी तरफ अक्साई चिन और तिब्बत क्षेत्र में सड़कें, पुल, रेल लाइनें, नए गांव, एयरबेस और सैन्य ढांचे का तेजी से विस्तार किया है। जवाब में भारत ने भी दारबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी (डीएस-डीबीओ) सड़क, न्योमा एयरफील्ड का विस्तार, सीमावर्ती सड़कों, सुरंगों और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर तेजी से काम किया है।
वहीं, चीन तिब्बत में विकास और प्रशासन से जुड़े ज्यादातर फैसले केंद्र स्तर पर लेता है। जबकि भारत लद्दाख में स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दे रहा है। सातों जिलों में हिल काउंसिल बनने के बाद कई अहम फैसले स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से लिए जा सकेंगे। साथ ही, सीमावर्ती इलाकों में मजबूत स्थानीय प्रशासन और लोगों की सक्रिय भागीदारी को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। (Ladakh 7 Hill Councils)
Author
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।



