📍नई दिल्ली/धर्मशाला | 26 May, 2026, 10:48 PM
Dalai Lama Reincarnation: तिब्बत और दलाई लामा को लेकर एक बार फिर चीन भारत को गीदड़ भभकी दी है। चीन ने भारत से कहा है कि वह “तिब्बती स्वतंत्रता” से जुड़ी गतिविधियों को मंच न दे और दलाई लामा के पुनर्जन्म की प्रक्रिया में किसी तरह का हस्तक्षेप न करे।
यह बयान ऐसे समय आया है जब धर्मशाला में सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन यानी सीटीए के राजनीतिक प्रमुख पेनपा त्सेरिंग के शपथ ग्रहण समारोह की तैयारी चल रही है। इस समारोह में 14वें दलाई लामा की मौजूदगी भी तय मानी जा रही है।
Dalai Lama Reincarnation: क्या कहा चीन ने
भारत में चीनी दूतावास की प्रवक्ता यू जिंग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बयान जारी किया। उन्होंने कहा कि दलाई लामा के पुनर्जन्म की प्रक्रिया सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं और ऐतिहासिक नियमों के अनुसार होती है और इसके लिए चीन की केंद्रीय सरकार की मंजूरी जरूरी होती है।
यू जिंग ने कहा कि 14वें दलाई लामा की पहचान भी इसी प्रक्रिया के जरिए हुई थी। उन्होंने यह भी कहा कि दलाई लामा के पुनर्जन्म का मामला चीन का “आंतरिक विषय” है और इसमें किसी बाहरी दखल की जरूरत नहीं है।
चीनी प्रवक्ता ने भारत से उम्मीद जताई कि वह तिब्बत से जुड़े मामलों पर अपने पुराने वादों का सम्मान करेगा और “तिब्बती स्वतंत्रता” से जुड़ी गतिविधियों को मंच नहीं देगा।
उन्होंने कहा कि ऐसा करने से भारत और चीन के बीच स्थिर और सकारात्मक संबंध बनाए रखने में मदद मिलेगी।
धर्मशाला में क्यों बढ़ी हलचल
यह बयान उस समय सामने आया जब धर्मशाला में सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन यानी निर्वासित तिब्बती प्रशासन के नए कार्यकाल का शपथ ग्रहण समारोह होने वाला है।
पेनपा त्सेरिंग दोबारा सिक्योंग यानी राजनीतिक प्रमुख के तौर पर पद संभालने जा रहे हैं। सिक्योंग को निर्वासित तिब्बती प्रशासन का राजनीतिक प्रमुख माना जाता है।
धर्मशाला पिछले कई दशकों से दलाई लामा और तिब्बती निर्वासित समुदाय का मुख्य केंद्र बना हुआ है। यहीं से तिब्बती प्रशासन अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक कार्यक्रम चलाता है।
अमेरिकी दूतावास के दो अधिकारी होंगे शामिल
27 मई को धर्मशाला में होने वाले पेनपा त्सेरिंग के शपथ ग्रहण समारोह में भारत के दो सांसद शामिल होंगे।
इनमें भाजपा सांसद निशिकांत दुबे भी शामिल हैं, जो झारखंड के गोड्डा लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं। उनके साथ भाजपा के ही तापिर गाओ भी समारोह में मौजूद रहेंगे। तापिर गाओ अरुणाचल पूर्व लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं। जानकारी के मुताबिक इस कार्यक्रम में अमेरिकी दूतावास के दो अधिकारी भी शामिल होंगे।
चीन क्यों करता है विरोध
चीन सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन को मान्यता नहीं देता। बीजिंग का कहना है कि यह संस्था किसी संप्रभु देश द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है और इसका नेतृत्व तिब्बती लोगों का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार नहीं रखता।
चीन लंबे समय से दलाई लामा को “अलगाववादी” बताता रहा है। वहीं तिब्बती समुदाय का कहना है कि उनका संघर्ष सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान बचाने के लिए है।
क्या कहना है दलाई लामा का
14वें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो पहले ही साफ कर चुके हैं कि उनके पुनर्जन्म की पहचान का अधिकार केवल गदेन फोद्रांग ट्रस्ट के पास होगा। यह ट्रस्ट दलाई लामा के कार्यालय से जुड़ा है।
दलाई लामा ने पिछले वर्षों में कहा था कि चीन को इस प्रक्रिया में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी कहा था कि भविष्य का दलाई लामा किसी स्वतंत्र देश में जन्म ले सकता है।
उनके कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया था कि राजनीतिक उद्देश्य से चुने गए किसी उम्मीदवार को मान्यता नहीं दी जानी चाहिए।
कौन हैं पेनपा त्सेरिंग
पेनपा त्सेरिंग का जन्म कर्नाटक के बायलाकुप्पे तिब्बती शिविर में हुआ था। उन्होंने लंबे समय तक निर्वासित तिब्बती संसद में काम किया है।
वह पहले संसद के स्पीकर भी रह चुके हैं। 2021 में उन्हें सिक्योंग चुना गया था और अब वे फिर से इस पद पर आ रहे हैं।
तिब्बती समुदाय के बीच उन्हें एक अनुभवी और शांत स्वभाव के नेता के रूप में देखा जाता है।
पुनर्जन्म को लेकर क्या है विवाद
तिब्बती बौद्ध धर्म में दलाई लामा को आध्यात्मिक गुरु माना जाता है। दलाई लामा की मृत्यु के बाद उनके अगले अवतार की खोज धार्मिक प्रक्रिया के जरिए की जाती है।
इसमें बौद्ध भिक्षु, धार्मिक संकेत, ज्योतिषीय गणनाएं और कई पारंपरिक प्रक्रियाएं शामिल होती हैं।
लेकिन चीन का कहना है कि अंतिम मंजूरी बीजिंग सरकार की होगी। चीन “गोल्डन अर्न” नाम की पुरानी प्रक्रिया का हवाला देता है, जिसका इस्तेमाल किंग राजवंश के दौर में किया जाता था।
तिब्बती निर्वासित समुदाय का आरोप है कि चीन इस धार्मिक प्रक्रिया को राजनीतिक नियंत्रण में लेना चाहता है।
भारत के लिए क्यों संवेदनशील है मुद्दा
भारत 1959 से दलाई लामा और हजारों तिब्बती शरणार्थियों को शरण देता आ रहा है। दलाई लामा चीन से निकलकर भारत आए थे, जिसके बाद धर्मशाला में निर्वासित तिब्बती प्रशासन की स्थापना हुई।
आज भारत में एक लाख से ज्यादा तिब्बती रहते हैं। हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख में तिब्बती समुदाय की बड़ी आबादी मौजूद है।
भारत आधिकारिक तौर पर “वन चाइना पॉलिसी” का सम्मान करता है, लेकिन दलाई लामा को धार्मिक नेता के तौर पर रहने की अनुमति देता है। इसी वजह से तिब्बत का मुद्दा हमेशा भारत और चीन के संबंधों में संवेदनशील बना रहता है।
अमेरिका का भी आया नाम
हाल के दिनों में अमेरिका ने भी तिब्बती नेतृत्व को कुछ कार्यक्रमों में आमंत्रित किया था। रिपोर्ट्स के अनुसार पेनपा त्सेरिंग को नई दिल्ली में अमेरिका के 250वें स्वतंत्रता दिवस समारोह से जुड़े कार्यक्रम में बुलाया गया था।
चीन अक्सर ऐसे कार्यक्रमों पर आपत्ति जताता रहा है। बीजिंग का कहना है कि दूसरे देशों को तिब्बत से जुड़े राजनीतिक मामलों में शामिल नहीं होना चाहिए।
तिब्बत का भारत-चीन संबंधों पर असर
तिब्बत का मुद्दा दशकों से भारत और चीन के रिश्तों का संवेदनशील हिस्सा रहा है। 1962 के युद्ध के बाद यह और ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया।
सीमा विवाद, लद्दाख तनाव और अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन की आपत्तियों के बीच तिब्बत का सवाल अक्सर सामने आता है।
रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि दलाई लामा केवल धार्मिक नेता नहीं, बल्कि हिमालयी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का भी बड़ा चेहरा हैं।
लद्दाख, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और हिमाचल प्रदेश जैसे इलाकों में तिब्बती बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव है।
चीन की बढ़ती चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन को सबसे ज्यादा चिंता अगले दलाई लामा की पहचान को लेकर है। अगर निर्वासित तिब्बती समुदाय और चीन अलग-अलग उम्मीदवार घोषित करते हैं, तो स्थिति और जटिल हो सकती है।
इसी वजह से बीजिंग पहले से ही इस मुद्दे पर अपना दावा मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
चीन तिब्बत में धार्मिक संस्थाओं और मठों पर नियंत्रण भी लगातार बढ़ा रहा है। वहां भाषा, शिक्षा और धार्मिक गतिविधियों पर भी निगरानी बढ़ाई गई है।
भारत ने अभी क्या कहा
भारत सरकार की ओर से इस नए बयान पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन भारत पहले भी कह चुका है कि वह दलाई लामा को एक सम्मानित धार्मिक नेता मानता है और उन्हें धार्मिक गतिविधियों की स्वतंत्रता प्राप्त है।
धर्मशाला में होने वाले कार्यक्रम पर भी फिलहाल भारत सरकार की ओर से कोई टिप्पणी नहीं की गई है। रक्षा और विदेश नीति से जुड़े जानकारों का कहना है कि भारत इस मुद्दे पर संतुलित रुख बनाए रखने की कोशिश करता है, ताकि चीन के साथ तनाव और न बढ़े।

