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परमाणु हमले में भी काम करेगा भारत का फ्यूचरिस्टिक टैंक! FRCV में होगी बेहद खास ‘न्यूक्लियर शील्ड’

भारतीय सेना चाहती है कि उसका भविष्य का मुख्य युद्धक टैंक ऐसे माहौल में भी काम करता रहे, जहां सामान्य मिलिट्री प्लेटफॉर्म काम करने में असमर्थ हो जाएं...

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📍नई दिल्ली | 8 Jun, 2026, 11:58 AM

FRCV CBRN Protection System: भारतीय सेना के लिए अगली पीढ़ी का अत्याधुनिक टैंक तैयार करने की दिशा में तैयारियां तेज हो गई हैं। सेना के महत्वाकांक्षी फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल (एफआरसीवी) प्रोग्राम के तहत अब ऐसे सिस्टम डेवलप किए जा रहे हैं जो टैंक को सिर्फ दुश्मन की गोलाबारी से ही नहीं, बल्कि रासायनिक, जैविक, रेडियोधर्मी और परमाणु हमलों से भी बचाएंगे। सेना के एफआरसीवी प्रोग्राम के तहत बनाए जा रहे नए मेन बैटल टैंक के लिए एक अत्याधुनिक सीबीआरएन प्रोटेक्शन सिस्टम तैयार किया जाएगा। जो भविष्य के बैटलफील्ड में टैंक और उसके क्रू को सबसे खतरनाक खतरों से बचाने का काम करेगा।

क्या है FRCV CBRN Protection System?

आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड (एवीएनएल) ने एक महत्वपूर्ण एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट जारी किया है। जिसमें भारतीय सेना के प्रस्तावित प्रोजेक्ट रणजीत के तहत बन रहे फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल (एफआरसीवी) के लिए अत्याधुनिक सीबीआरएन प्रोटेक्शन सिस्टम बनाया जाएगा।

सीबीआरएन का मतलब है केमिकल, बायोलॉजिकल, रेडियोलॉजिकल और न्यूक्लियर। युद्ध के दौरान दुश्मन जहरीली गैसों, जैविक एजेंट्स, रेडियोधर्मी पदार्थों या परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कर सकता है। ऐसे हालात में सबसे बड़ी चुनौती सैनिकों की सुरक्षा होती है। यदि कोई टैंक इन खतरों से सुरक्षित नहीं है, तो उसके अंदर मौजूद चालक दल कुछ ही मिनटों में इससे प्रभावित हो सकता है। जहरीली गैसें सांस के जरिए शरीर में पहुंच सकती हैं, रेडियोधर्मी कण लंबे समय तक नुकसान पहुंचा सकते हैं और जैविक एजेंट गंभीर बीमारियां फैला सकते हैं।

भारतीय सेना चाहती है कि उसका भविष्य का मुख्य युद्धक टैंक ऐसे माहौल में भी काम करता रहे, जहां सामान्य मिलिट्री प्लेटफॉर्म काम करने में असमर्थ हो जाएं।

क्या होगा एफआरसीवी?

एफआरसीवी यानी फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल भारतीय सेना का अगली पीढ़ी का मुख्य युद्धक टैंक होगा। यह वही टैंक है जिसे भविष्य में टी-72 अजेया बेड़े का उत्तराधिकारी माना जा रहा है। लगभग 55 टन वजन वाले इस टैंक में आधुनिक कवच, एडवांस सेंसर, डिजिटल नेटवर्किंग, बेहतर मारक क्षमता और हाई मोबिलिटी जैसी खूबियां होंगी।

एफआरसीवी प्रोजेक्ट भारतीय सेना के सबसे बड़े आर्मर्ड मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम्स में शामिल है। सेना आने वाले सालों में सैकड़ों पुराने टी-72 टैंकों को बदलना चाहती है। ऐसे में इस नए प्लेटफॉर्म की सुरक्षा क्षमता भी विश्वस्तरीय रखने पर जोर दिया जा रहा है।

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परमाणु विस्फोट के बाद भी काम करेगा सिस्टम

एवीएनएल की तरफ से जारी तकनीकी जरूरतों के मुताबिक यह सिस्टम दो प्रमुख मोड में काम करेग।

पहला एंटी-एटॉमिक मोड होगा। यदि किसी क्षेत्र में परमाणु विस्फोट होता है और उससे पैदा होने वाला प्रारंभिक रेडिएशन टैंक के सेंसर पकड़ लेते हैं, तो यह सिस्टम अपने आप एक्टिव हो जाएगा।

दूसरा मोड सीबीआर और फॉलआउट मोड होगा। इसमें जहरीली गैस, रेडियोधर्मी प्रदूषण या अन्य खतरनाक तत्वों की पहचान होते ही प्रोटेक्शन सिस्टम टैंक के अंदर का वातावरण सुरक्षित करना शुरू कर देगा।

इस पूरी प्रक्रिया में चालक दल को किसी प्रकार की मैन्युअल कार्रवाई करने की जरूरत नहीं होगी। सिस्टम ऑटोमैटिकली ही खतरे को पहचानकर रेस्पॉन्स देगा। (FRCV CBRN Protection System)

कौन-कौन सी जहरीली गैसों का पता लगाएगा सिस्टम?

एवीएनएल ने स्पष्ट किया है कि यह सिस्टम कई प्रकार के रासायनिक युद्धक एजेंटों की पहचान करने में सक्षम होना चाहिए।

इनमें सारिन, सोमन, टैबुन और वीएक्स जैसे घातक नर्व एजेंट शामिल हैं। ये एजेंट मानव तंत्रिका तंत्र को कुछ ही मिनटों में निष्क्रिय कर सकते हैं।

इसके अलावा सल्फर मस्टर्ड और लुईसाइट जैसे ब्लिस्टर एजेंट भी पहचानने की क्षमता जरूरी होगी। ये त्वचा और रेस्पिरेटरी सिस्टम को गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं।

हाइड्रोजन साइनाइड जैसे ब्लड एजेंट और फॉस्जीन जैसी चोकिंग गैसों का पता लगाना भी इस सिस्टम की जिम्मेदारी होगी।

सूत्रों के मुताबिक यह क्षमता मॉडर्न बेटलफील्ड में बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि कई कैमिकल एजेंट रंग और गंध रहित होते हैं। (FRCV CBRN Protection System)

फॉल्स अलार्म से बचाने की भी तैयारी

युद्धक्षेत्र में अक्सर धुआं, ईंधन की गंध और इंजन से निकलने वाली गैसें मौजूद रहती हैं। यदि प्रोटेक्शन सिस्टम हर बार इन्हें खतरा मानकर अलार्म बजाने लगे तो सैनिकों के लिए काम करना मुश्किल हो जाएगा।

इसी वजह से एवीएनएल ने शर्त रखी है कि डीजल, पेट्रोल, केरोसिन, वाहन के धुएं, जलते टायरों के धुएं और डी-कंटैमिनेशन केमिकल्स के चलते सिस्टम झूठा अलार्म नहीं देगा। इससे वास्तविक खतरे की स्थिति में ही चेतावनी जारी होगी। (FRCV CBRN Protection System)

गैसों से कैसे सुरक्षित रहेगा टैंक के अंदर का सिस्टम?

इस सिस्टम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उसका फिल्ट्रेशन और ओवरप्रेशर सिस्टम होगा। जब कोई रासायनिक या जैविक खतरा सामने आएगा तो विशेष फिल्टर हवा को साफ करेंगे। इन फिल्टरों में एचईपीए तकनीक और एक्टिवेटेड कार्बन आधारित फिल्ट्रेशन का उपयोग किया जाएगा।

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इसके साथ ब्लोअर सिस्टम टैंक के अंदर सकारात्मक दबाव बनाए रखेगा। इसका फायदा यह होगा कि बाहर की दूषित हवा अंदर प्रवेश नहीं कर पाएगी।

सरल शब्दों में कहें तो टैंक के भीतर एक सुरक्षित ‘बंद वातावरण’ तैयार हो जाएगा, जहां चालक दल बिना गैस मास्क पहने भी काम कर सकेगा। (FRCV CBRN Protection System)

छह घंटे तक दूषित इलाके में ऑपरेशन

यह सिस्टम कम से कम छह घंटे तक लगातार काम करने में सक्षम होना चाहिए। यदि कोई क्षेत्र रासायनिक, जैविक या रेडियोधर्मी प्रदूषण से प्रभावित है, तब भी एफआरसीवी टैंक वहां लंबे समय तक ऑपरेशन कर सकेगा।

साथ ही यह सिस्टम दस सेकंड से कम समय में रेस्पॉन्स देने में सक्षम होगा। (FRCV CBRN Protection System)

रेडिएशन का तुरंत पता लगाएंगे सेंसर

नई सिस्टम में रेडिएशन सेंसर भी लगाए जाएंगे। ये सेंसर बहुत कम स्तर से लेकर अत्यधिक खतरनाक स्तर तक के रेडिएशन को पहचान सकेंगे। जैसे ही रेडिएशन तय सीमा से ऊपर जाएगा, चालक दल को तुरंत चेतावनी मिल जाएगी।

सिस्टम की रेस्पॉन्स टाइम भी बेहद कम रखा गया है ताकि सैनिकों को खतरे की सूचना तुरंत मिल सके।

इसके साथ ऑडियो और विजुअल अलर्ट की व्यवस्था होगी। यानी चालक दल को आवाज और डिस्प्ले दोनों माध्यमों से खतरे की जानकारी मिलेगी।

एफआरसीवी के लिए प्रस्तावित सीबीआरएन सिस्टम केवल सेंसर और फिल्टर तक सीमित नहीं होगा। इसमें बिल्ट-इन टेस्ट इक्विपमेंट भी होगा जो लगातार सिस्टम की स्थिति पर नजर रखेगा। यदि किसी हिस्से में खराबी आती है तो उसका पता तुरंत चल जाएगा।

सिस्टम पिछले 100 घटनाक्रमों का रिकॉर्ड भी सुरक्षित रख सकेगा। जरूरत पड़ने पर यह डेटा विश्लेषण के लिए निकाला जा सकेगा। रिमोट हेल्थ मॉनिटरिंग, फॉल्ट लॉगिंग और डिजिटल डायग्नोस्टिक्स जैसी सुविधाएं भी इसमें शामिल होंगी। (FRCV CBRN Protection System)

रेगिस्तान से लेकर हाई एल्टीट्यूड तक काम करेगा

भारतीय सेना की जरूरतों को देखते हुए इस सिस्टम को बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करने लायक बनाया जा रहा है। इसे माइनस 20 डिग्री सेल्सियस से लेकर प्लस 55 डिग्री सेल्सियस तापमान तक प्रभावी रहना होगा।
यानी लद्दाख की कड़ाके की ठंड हो या राजस्थान का तपता रेगिस्तान, दोनों जगह यह समान रूप से काम करेगा।
इसके अलावा पांच मीटर से अधिक गहरे पानी में टैंक की फोर्डिंग क्षमता भी प्रभावित नहीं होनी चाहिए।

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इस प्रोजेक्ट की एक और खास बात इसका स्वदेशीकरण है।

एवीएनएल ने इसे बाय इंडियन-आईडीडीएम कैटेगरी के तहत जारी किया है। जिसका मतलब है कि डिजाइन और विकास का बड़ा हिस्सा भारत में होना चाहिए। प्रोटोटाइप स्तर पर 50 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री अनिवार्य होगी, जबकि सीरियल प्रोडक्शन के अंतिम चरण में यह आंकड़ा 70 प्रतिशत से अधिक होना चाहिए। इससे देश के रक्षा उद्योग को बढ़ावा मिलेगा और भविष्य में विदेशी निर्भरता कम होगी।

590 टैंकों के लिए बन सकता है सिस्टम

एवीएनएल ने कहा है कि शुरुआती चरण में तीन प्रोटोटाइप डेवलप किए जाएंगे। इसके बाद एफआरसीवी प्रोजेक्ट आगे बढ़ने पर लगभग 590 सीबीआरएन सिस्टम की जरूरत पड़ सकती है। कंपनियों को डिजाइन, डेवलपमेंट, ट्रायल, इंटीग्रेशन और तकनीकी दस्तावेज तैयार करने होंगे। बाद में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर भी एवीएनएल को किया जाएगा। (FRCV CBRN Protection System)

सेना की नई जरूरतों के मुताबिक तैयार हो रहा सुरक्षा कवच

सूत्रों का कहना है कि बैटलफील्ड लगातार बदल रहा है और नए खतरे सामने आ रहे हैं। इसी वजह से एफआरसीवी के लिए डेवलप किया जा रहा सीबीआरएन सिस्टम टैंक के चालक दल, उसके इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और पूरे प्लेटफॉर्म को ऐसे खतरों से सुरक्षित रखने के लिए डिजाइन किया जा रहा है। यह सिस्टम खतरे की पहचान, चेतावनी, फिल्ट्रेशन, प्रेशर कंट्रोल और डिजिटल सर्विलांस जैसे कई काम एक साथ करेगी। यही वजह है कि भारतीय सेना के भविष्य के मुख्य युद्धक टैंक के लिए इस प्रोजेक्ट को सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी कार्यक्रमों में से एक माना जा रहा है। (FRCV CBRN Protection System)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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