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T-72 और T-90 टैंकों के दौर में आज भी भारतीय सेना के साथ है 1971 का हीरो T-55, आखिर क्यों खास है यह पुराना टैंक?

भारतीय सेना की तस्वीर में दिखे T-55 टैंक ने कई सवाल खड़े कर दिए। जानिए 1971 युद्ध के इस दिग्गज टैंक की कहानी, प्रोजेक्ट गुलमोहर, अपग्रेड, रिटायरमेंट और आज सेना में इसकी असली भूमिका क्या है...

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📍नई दिल्ली | 7 Jun, 2026, 6:54 PM

T-55 Tank Indian Army: हाल ही में भारतीय सेना की वज्र कोर ने एक तस्वीर जारी की। तस्वीर में सैनिकों के पीछे तीन टैंक दिखाई दे रहे हैं। पहली नजर में यह आम मिलिट्री फोटोग्राफ लग सकता है, लेकिन खास बात यह है कि दशकों पुराने टी-55 टैंक आज भी सेना के साथ क्यों नजर आ रहे हैं।

भारतीय सेना ने सालों पहले टी-55 को अपनी फॉरवर्ड कॉम्बैट रोल से हटा दिया था। इसके बाद टी-72 अजेय और टी-90 भीष्म जैसे आधुनिक टैंकों ने उनकी जगह ले ली। इसके बावजूद कुछ स्थानों पर टी-55 आज भी दिखाई देते हैं।

T-55 Tank Indian Army: पुराना सोवियत डिजाइन

तस्वीर में पीछे दिखाई दे रहे टैंकों की गोलाकार टरेट, पांच बड़े रोड व्हील, लंबी मुख्य तोप और पुराना सोवियत डिजाइन साफ संकेत देता है कि ये टी-55 टैंक हैं।

टी-72 और टी-90 की तुलना में टी-55 का डिजाइन काफी अलग दिखाई देता है। इसका वजन मात्र 36 टन था और इसकी टरेट ज्यादा गोल होती है और इसमें मॉडर्न एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर या एडवांस सेंसर सिस्टम नजर नहीं आते। यही वजह है कि इन टैंकों की पहचान आसानी से हो जाती है।

भारत ने लगभग रूस, चेकोस्लोवाकिया और पोलैंड से लगभग 1800 टी-54/टी-55 खरीदे थे, जिन्हें साल 1964 से लेकर 1971 तक कई चरणों में खरीदा गया था। (T-55 Tank Indian Army)

टी-55 ने 1971 की जंग में दिखाया था जलवा

टी-55 टैंक कोल्ड वॉर के दौर का सबसे सफल टैंक माना जाता है। 1950-60 के दशक में सोवियत संघ ने इसे बनाया था और दुनिया के कई देशों ने इसका इस्तेमाल किया।

भारत ने भी बड़ी संख्या में टी-55 टैंक खरीदे थे। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान इन टैंकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उस युद्ध में भारतीय टी-55 ने पाकिस्तानी टैंकों एम-24 शाफी, चीनी टी-59 एम-47/एम-48 पैटन को भारी नुकसान पहुंचाया था। गरिबपुर, नैनाकोट, बसंतर जैसे युद्धों में टी-55 ने दुश्मन की लाइनों को तोड़ा था और 58 से ज्यादा पाकिस्तानी टैंक नष्ट किए थे।

ये टैंक भारतीय सेना के मुख्य युद्ध टैंक थे और पश्चिमी मोर्चे (पंजाब-राजस्थान) पर निर्णायक भूमिका निभाई। खास बात यह थी कि इन टैंकों में इंफ्रारेड नाइट विजन लगा था, जिसका पाकिस्तान के पास कोई जवाब नहीं था, जिसके चलते रात के युद्ध में कई पाकिस्तानी टैंक “सिटिंग डक्स” की तरह नष्ट हुए।

खास बात यह थी कि चीन ने टी-55 का चीनी वर्जन टी-59 तैयार किया था। जो दिखने में टी-55 जैसा था। भारतीय सेना के लिए उन्हें पहचानना बड़ा चैलेंज था। जिसके लिए भारतीय सेना ने अपने टैंकों पर फेक बोर इवैक्यूएटर लगाए थे ताकि पाकिस्तानी टी-59 से अलग पहचाना जा सके।

उस समय टी-55 भारतीय आर्मर कोर की रीढ़ माना जाता था। उस दौर में इसकी मारक क्षमता, विश्वसनीयता और आसान रखरखाव ने इसे सेना के लिए बेहद उपयोगी बना दिया था। (T-55 Tank Indian Army)

एके-47 की तरह था टी-55

अक्सर इसकी तुलना एके-47 राइफल से की जाती है, क्योंकि यह कठिन मौसम, रेगिस्तान और धूल भरे इलाकों में भी आसानी से काम करता था। रखरखाव की जरूरत कम होने के कारण भारतीय सेना ने इसे चार दशकों से अधिक समय तक सेवा में रखा।

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टी-55 की एक और बड़ी विशेषता इसकी मोबिलिटी थी। इसमें 580 हॉर्सपावर का वी-55 इंजन लगाया गया था, जिसकी मदद से यह सड़क पर लगभग 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार हासिल कर सकता था। स्नॉर्कल सिस्टम की मदद से यह गहरे पानी वाले हिस्सों को भी पार कर सकता था। राजस्थान और पंजाब के रेतीले क्षेत्रों में इसकी प्रदर्शन क्षमता ने इसे भारतीय सेना के लिए एक भरोसेमंद प्लेटफॉर्म बना दिया।

टी-55 की पहचान उसकी 100 मिमी डी-10टी राइफल्ड गन से भी जुड़ी रही है। यह उस दौर के लिए बेहद प्रभावी हथियार माना जाता था। टैंक में 43 राउंड तक गोला-बारूद ले जाने की क्षमता थी और इसका फायरिंग रेट भी अच्छा थी। प्रोजेक्ट गुलमोहर के तहत इसी प्लेटफॉर्म पर 105 मिमी एल-7ए1 गन लगाई गई, जिससे इसकी मारक क्षमता और बढ़ गई।

मूल टी-55 टैंक की प्रभावी मारक दूरी लगभग 1,500 मीटर मानी जाती थी, जबकि अधिकतम टारगेटेड दूरी 2 से 2.5 किलोमीटर तक पहुंच सकती थी। वहीं, गुलमोहर अपग्रेड के बाद नई 105 मिमी गन और आधुनिक फायर कंट्रोल सिस्टम के कारण इसकी प्रभावी दूरी 2 से 3 किलोमीटर तक पहुंच गई।

टी-55 का एक बड़ा फायद इसका छोटाा साइज था। लगभग 2.4 मीटर ऊंचाई और 36 टन वजन वाले इस टैंक का सिल्हूट अपेक्षाकृत छोटा था। युद्धक्षेत्र में इसका मतलब यह था कि दुश्मन के लिए इसे पहचानना और निशाना बनाना कठिन हो जाता था। कम ऊंचाई के कारण यह प्राकृतिक आवरण का बेहतर उपयोग कर सकता था।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि टी-55 दुनिया के शुरुआती टैंकों में शामिल था, जिसमें परमाणु, जैविक और रासायनिक हमलों से सुरक्षा देने वाली एनबीसी सिस्टम लगाया गया था। यही वजह थी कि कठिन युद्ध परिस्थितियों में भी चालक दल की सुरक्षा बेहतर बनी रहती थी। (T-55 Tank Indian Army)

T-55 Tank Indian Army
T-55 Tank

समय के साथ क्यों कम हो गई उपयोगिता?

तकनीक के तेजी से विकास के साथ टैंकों की भूमिका भी बदलती गई। नए बैटलफील्ड में बेहतर सुरक्षा, अधिक मारक क्षमता, डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम और आधुनिक सेंसर की जरूरत बढ़ गई। आधुनिक युद्ध में एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल, थर्मल साइट्स, लंबी रेंज जैसे फीचर नहीं थे। जिसके चलते यह पूरी तरह आउटक्लास हो चुका था।

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टी-55 की मूल 100 मिमी तोप और पुरानी फायर कंट्रोल तकनीक आधुनिक टैंकों की तुलना में कमजोर पड़ने लगी। इसके अलावा इसकी सुरक्षा भी नए एंटी-टैंक हथियारों के सामने सीमित मानी जाने लगी।

इसी वजह से भारतीय सेना ने धीरे-धीरे टी-72 अजेय और बाद में टी-90 भीष्म टैंकों को अपनाया। (T-55 Tank Indian Army)

प्रोजेक्ट गुलमोहर से मिली नई जिंदगी

टी-55 को पूरी तरह हटाने से पहले भारतीय सेना ने उसे आधुनिक बनाने का फैसला किया। इसी उद्देश्य से प्रोजेक्ट गुलमोहर शुरू किया गया। इसमें पौलेंड से तकनीकी मदद ली गई। पुणे के खडकी स्थित 512 आर्मी बेस वर्कशॉप में इस ओवरहॉल को अंजाम दिया गया।

प्रोजेक्ट गुलमोहर 1987 में लॉन्च किया गया। इसका मकसद टी-55 टैंकों की सेवा अवधि 15-20 साल बढ़ाना और उनकी युद्धक क्षमता में सुधार करना था। क्योंकि नए टैंक खरीदना महंगा था, जिनकी कीमत लगभग 1800 करोड़ रुपये थी, जबकि अपग्रेड करना सस्ता और प्रभावी था।

इस प्रोजेक्ट पर कुल लगभग 232 करोड़ रुपये खर्च किए गए। दिलचस्प बात यह रही कि प्रति टैंक ओवरहॉल की लागत लगभग 10 लाख रुपये के आसपास रही, जो नए टैंक खरीदने की तुलना में काफी कम थी। शुरुआत में करीब 800 टैंकों के आधुनिकीकरण का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन परियोजना की सफलता के बाद यह संख्या बढ़ती चली गई। वर्ष 1998 तक 900 से अधिक टी-55 टैंकों का ओवरहॉल और अपग्रेड पूरा किया जा चुका था। इसके बाद 2001 तक यह आंकड़ा 1,000 से भी अधिक टैंकों तक पहुंच गया।

इस प्रोजेक्ट के तहत टैंकों को पूरी तरह खोलकर दोबारा तैयार किया गया। कई महत्वपूर्ण हिस्सों को बदला गया और नई तकनीक जोड़ी गई।

गुलमोहर कार्यक्रम के दौरान सबसे बड़ा बदलाव मुख्य हथियार में किया गया। पुराने 100 मिमी गन सिस्टम की जगह अधिक प्रभावी 105 मिमी गन लगाई गई।

इसके साथ आधुनिक फायर कंट्रोल सिस्टम, डिजिटल बैलिस्टिक कंप्यूटर और बेहतर टारगेट साधने वाले उपकरण भी लगाए गए।

कुछ टैंकों में नाइट विजन और थर्मल इमेजिंग जैसी सुविधाएं भी जोड़ी गईं ताकि रात में भी उनका इस्तेमाल किया जा सके। साथ ही, इंजन, ट्रांसमिशन और अन्य मैकेनिकल सिस्टम की भी व्यापक मरम्मत की गई। (T-55 Tank Indian Army)

सेना ने कब हटाया टी-55 को?

हालांकि समय के साथ सेना का ध्यान अधिक आधुनिक टी-72 और टी-90 टैंकों की ओर बढ़ने लगा। साल 2001 में भारतीय सेना ने फैसला किया कि आने वाले सालों में टी-55 बेड़े को चरणबद्ध तरीके से हटाकर उसकी जगह टी-72एम1 अजेया टैंकों को दिया जाएगा। इसके बावजूद प्रोजेक्ट गुलमोहर के तहत ओवरहॉल और रखरखाव का काम जारी रहा और 2008 में अंतिम टी-55 टैंक का ओवरहॉल पूरा किया गया।

इसके बाद अगले कुछ वर्षों में टी-55 की सक्रिय तैनाती समाप्त हो गई। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार साल 2006 में भारतीय सेना के पास लगभग 715 अपग्रेडेड टी-55 टैंक सर्विस में थे, जबकि 67 टैंक रिजर्व स्टोरेज में रखे गए थे। संख्या कम होने की वजह यह थी कि प्रोजेक्ट के दौरान 900 से अधिक टैंकों का आधुनिकीकरण जरूर किया गया था, लेकिन कई पुराने और तकनीकी रूप से खराब हो चुके टैंक समय के साथ सेवा से बाहर कर दिए गए थे।

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टी-55 को सक्रिय युद्धक भूमिका से हटाने की प्रक्रिया 24 फरवरी 2009 से शुरू हुई। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से इन्हें यूनिटों से बाहर किया गया और मई 2011 तक टी-55 पूरी तरह सक्रिय सैन्य सेवा से हट चुका था।

2011 तक अधिकांश टी-55 टैंक रेगुलर आर्मर्र युनिट से बाहर हो चुके थे। (T-55 Tank Indian Army)

आज ये टैंक कहां हो रहे हैं इस्तेमाल?

हालांकि टी-55 अब फ्रंट लाइन का मुख्य बैटल टैंक नहीं हैं, लेकिन पूरी तरह गायब भी नहीं हुए हैं। कितने टैंक अभी मौजूद हैं इनकी कोई आधिकारिक लिस्ट उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन माना जा रहा है, जो टैंक रिजर्व रखे गए थे, ये उनमें से ही कुछ टैंक हैं।

सूत्रों ने बताया कि इनका इस्तेमाल कई तरह की सैन्य गतिविधियों में किया जाता है। कुछ टैंक ट्रेनिंग सेंटर्स में सैनिकों को बख्तरबंद युद्ध की बुनियादी जानकारी देने के लिए रखे गए हैं।

सूत्रों ने बताया कि 2024 में पैंथर डिवीजन (वेस्टर्न कमांड) के इंटीग्रेटेड कॉम्बैट ट्रेनिंग एक्सरसाइज में टी-55 इस्तेमाल हुए थे। वहीं, कुछ टैंक अभी भी ट्रेनिंग, ड्राइवर ट्रेनिंग या सपोर्ट वाहन के रूप में रखे गए हैं।

सूत्रों ने बताया कि कुछ जगहों पर इन्हें स्टैटिक डिफेंस स्ट्रक्चर या एक्सरसाइज के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सीमा क्षेत्रों में सुरक्षा जरूरतों को देखते हुए 2017 के बाद एलओसी के कुछ संवेदनशील इलाकों में टी-55 टैंकों को स्टैटिक डिफेंस प्लेटफॉर्म के रूप में भी इस्तेमाल किया गया। इन टैंकों को बंकर और पिलबॉक्स जैसे स्ट्रक्चर में बदल दिया गया, ताकि उनकी 105 मिमी गन का इस्तेमाल फायर सपोर्ट देने के लिए किया जा सके। कई टैंक तकनीकी प्रशिक्षण और रखरखाव से जुड़े पाठ्यक्रमों में भी इस्तेमाल किए जाते हैं। वहीं, कुछ टी-55 संग्रहालयों और सैन्य स्मारकों का हिस्सा भी बन चुके हैं। (T-55 Tank Indian Army)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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