📍नई दिल्ली/अहिल्यानगर | 25 Apr, 2026, 8:16 PM
AAP vs WhAP vs Stryker: डीआरडीओ ने दो नए एडवांस्ड आर्मर्ड प्लेटफॉर्म पेश किए हैं। इनमें एक ट्रैक्ड यानी चेन वाला व्हीकल है और दूसरा व्हील्ड यानी पहियों पर चलने वाला 8×8 प्लेटफॉर्म है। इन दोनों को महाराष्ट्र के अहिल्यानगर में स्थित व्हीकल्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (VRDE) में लॉन्च किया गया। वहीं, इसके एडवांस्ड आर्मर्ड प्लेटफार्म (AAP) का व्हील्ड वर्जन को पुराने व्हील्ड आर्मर्ड प्लेटफॉर्म (WhAP) का आधुनिक विकल्प माना जा रहा है। साथ ही, नया AAP अमेरिका के स्ट्राइकर को कड़ी टक्कर दे रहा है।
AAP vs WhAP vs Stryker: पूरी तरह देश में डिजाइन और डेवलप
ये दोनों आर्मर्ड प्लेटफॉर्म पूरी तरह भारत में डिजाइन और डेवलप किए गए हैं। इन्हें आधुनिक युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। आज के समय में सेना को ऐसे वाहनों की जरूरत होती है जो तेज हों, ज्यादा सुरक्षित हों और अलग-अलग तरह के मिशन में इस्तेमाल किए जा सकें।
इसी को ध्यान में रखते हुए डीआरडीओ ने ट्रैक्ड और व्हील्ड दोनों तरह के वर्जन बनाए हैं, ताकि अलग-अलग इलाकों में इन्हें इस्तेमाल किया जा सके। (AAP vs WhAP vs Stryker)
30 मिमी क्रूलेस टरेट सबसे बड़ी खूबी
इन प्लेटफॉर्म्स की सबसे बड़ी खासियत इन पर लगा 30 मिमी का क्रूलेस टरेट है। इसका मतलब है कि इस टरेट में कोई क्रू बैठता नहीं है, बल्कि इसे रिमोट कंट्रोल या ऑटोमेटेड सिस्टम से चलाया जाता है।
इस टरेट में 30 मिमी की मुख्य तोप लगी है, साथ में 7.62 मिमी पीकेटी मशीन गन भी है। इसके अलावा यह एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल यानी एटीजीएम भी लॉन्च कर सकता है।
यह वाहन दुश्मन के टैंक, बंकर और लो-फ्लाइंग टारगेट्स पर हमला कर सकता है। टरेट का डिजाइन ऐसा है कि इसे अलग-अलग भूमिकाओं के लिए बदला भी जा सकता है। (AAP vs WhAP vs Stryker)

खराब रास्तों पर चल सकता है
इन दोनों प्लेटफॉर्म्स में हाई पावर इंजन और ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन दिया गया है। इससे ये तेजी से चलते हैं और मुश्किल रास्तों पर भी आसानी से आगे बढ़ते हैं।
इनका पावर टू वेट रेशियो बेहतर रखा गया है, यानी कम वजन में ज्यादा ताकत मिलती है। इससे यह वाहन ऊंची चढ़ाई, कीचड़, रेत और पत्थरीले इलाकों में भी आसानी से आगे बढ़ सकता है।
ट्रैक्ड वर्जन खास तौर पर पहाड़ और जंगल जैसे कठिन इलाकों के लिए उपयोगी है, जबकि व्हील्ड वर्जन सड़क और खुले मैदान में तेजी से चल सकता है।
एम्फीबियस क्षमता
इन प्लेटफॉर्म्स में एम्फीबियस क्षमता भी दी गई है, यानी यह पानी में भी चल सकते हैं। इसमें हाइड्रो जेट्स लगाए गए हैं, जिनकी मदद से यह नदी या तालाब जैसे पानी के रास्तों को पार कर सकते हैं।
सुरक्षा के लिए मजबूत प्रोटेक्शन
इन वाहनों में सुरक्षा पर खास ध्यान दिया गया है। इन्हें STANAG लेवल 4 और लेवल 5 प्रोटेक्शन के हिसाब से डिजाइन किया गया है, जो नाटो का एक स्टैंडर्ड है।
इस पर भारी गोलीबारी और ब्लास्ट का भी कोई असर नहीं पड़ता। इसके अलावा इसमें मॉड्यूलर ब्लास्ट और बैलिस्टिक प्रोटेक्शन दिया गया है, जिसे जरूरत के हिसाब से बढ़ाया या घटाया जा सकता है। इससे वाहन के अंदर बैठे सैनिक सुरक्षित रहते हैं।
इन प्लेटफॉर्म्स में करीब 65 प्रतिशत तक स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इसे आगे बढ़ाकर 90 प्रतिशत तक ले जाने की योजना है।
इन प्लेटफॉर्म्स के निर्माण में प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों की भी अहम भूमिका रही है। टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड और भारत फोर्ज लिमिटेड ने इसमें सहयोग किया है। इसके अलावा कई छोटे और मझोले उद्योगों ने भी इस प्रोजेक्ट में हिस्सा लिया है। इससे देश का डिफेंस इंडस्ट्री इकोसिस्टम और मजबूत हुआ है। (AAP vs WhAP vs Stryker)
ट्रैक्ड और व्हील्ड वर्जन में क्या है अंतर
भारत का भूगोल काफी अलग-अलग तरह का है, जिसमें पहाड़, रेगिस्तान, जंगल और मैदान शामिल हैं। इसी वजह से सेना को अलग-अलग तरह के वाहनों की जरूरत होती है। एक पहियों पर चलता है (व्हील्ड 8×8) और दूसरा चेन या ट्रैक पर (ट्रैक्ड)। सेना दोनों का इस्तेमाल अलग-अलग परिस्थितियों में करती है, क्योंकि दोनों की ताकत अलग है।
स्पीड की बात करें तो व्हील्ड प्लेटफॉर्म सड़क पर काफी तेज चलता है। इसकी रफ्तार आम तौर पर 80 से 100 किलोमीटर प्रति घंटा तक हो सकती है। इसलिए यह लंबी दूरी जल्दी तय कर सकता है। वहीं ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म की स्पीड कम होती है, लगभग 50 से 70 किलोमीटर प्रति घंटा, लेकिन इसकी असली ताकत स्पीड नहीं बल्कि कठिन इलाकों में चलने की क्षमता है।
जबकि ट्रैक्ड वाहन मिट्टी, बर्फ, पहाड़ और जंगल जैसे इलाकों में आसानी से चलता है, क्योंकि उसके ट्रैक जमीन को पकड़कर आगे बढ़ते हैं। वहीं व्हील्ड वाहन ऐसे इलाकों में चल तो सकता है, लेकिन उसकी क्षमता सीमित होती है। यही वजह है कि पहाड़ी या दलदली इलाकों में ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है।
वहीं, मेंटेनेंस के मामले में व्हील्ड प्लेटफॉर्म ज्यादा आसान होता है। इसके पार्ट्स जल्दी बदल जाते हैं और खर्च भी कम आता है। ट्रैक्ड वाहन में चेन सिस्टम होता है, जिसकी देखभाल ज्यादा करनी पड़ती है और खर्च भी ज्यादा होता है। इसलिए लंबे समय तक ऑपरेशन के लिए व्हील्ड प्लेटफॉर्म लॉजिस्टिक के लिहाज से आसान रहता है।
आवाज और स्टील्थ यानी छिपकर चलने की क्षमता भी अहम होती है। व्हील्ड वाहन कम आवाज करता है, जिससे दुश्मन को इसकी मौजूदगी का पता लगाना मुश्किल होता है। ट्रैक्ड वाहन ज्यादा आवाज करता है, क्योंकि उसके ट्रैक जमीन से रगड़ खाते हुए चलते हैं। इस वजह से सरप्राइज मूवमेंट में व्हील्ड प्लेटफॉर्म को फायदा मिलता है।
वजन और ट्रांसपोर्ट के मामले में भी अंतर है। व्हील्ड प्लेटफॉर्म आमतौर पर हल्का होता है, करीब 24 से 26 टन के आसपास, इसलिए इसे पुलों से पार कराना और लंबी दूरी तक ले जाना आसान होता है। ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म ज्यादा भारी होता है और इसके लिए मजबूत पुल या खास ट्रांसपोर्ट की जरूरत पड़ती है।
फायरिंग के दौरान स्थिरता की बात करें तो यहां ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म आगे रहता है। इसकी ग्रिप मजबूत होती है, जिससे चलते समय भी गन ज्यादा सटीक फायर कर सकती है। व्हील्ड प्लेटफॉर्म में भी अच्छी स्टैबिलिटी होती है, लेकिन ट्रैक्ड जितनी नहीं। इसलिए भारी कॉम्बैट में ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म को बेहतर गन प्लेटफॉर्म माना जाता है। (AAP vs WhAP vs Stryker)
इस्तेमाल की बात करें तो व्हील्ड प्लेटफॉर्म मैदान, रेगिस्तान, शहर और हाईवे जैसे इलाकों के लिए बेहतर है। यह काउंटर-इंसर्जेंसी ऑपरेशन में भी काम आता है, जहां तेजी से मूव करना जरूरी होता है। दूसरी तरफ ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म पहाड़, जंगल और भारी लड़ाई वाले इलाकों के लिए बनाया जाता है, जहां जमीन कठिन होती है और ज्यादा ग्रिप की जरूरत होती है।
भारतीय सेना को दोनों तरह के प्लेटफॉर्म इसलिए चाहिए क्योंकि देश का भूगोल बहुत अलग-अलग तरह का है। पंजाब और राजस्थान जैसे मैदान और रेगिस्तान वाले इलाकों में व्हील्ड प्लेटफॉर्म तेजी से काम करता है। वहीं लद्दाख, हिमालय और उत्तर-पूर्व के इलाकों में ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म ज्यादा भरोसेमंद रहता है, क्योंकि वहां बर्फ, कीचड़ और ढलान ज्यादा होती है।
इन प्लेटफॉर्म्स को इस तरह डिजाइन किया गया है कि इन्हें अलग-अलग कामों के लिए इस्तेमाल किया जा सके।
इनका इस्तेमाल इंफैंट्री कॉम्बैट, टोही मिशन, कमांड पोस्ट और एंटी टैंक ऑपरेशन जैसे कई रोल में किया जा सकता है। इससे एक ही प्लेटफॉर्म को अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से इस्तेमाल करना आसान हो जाता है। (AAP vs WhAP vs Stryker)
DRDO unveils next-gen Armoured Platforms 🇮🇳🔥
Defence Research and Development Organisation has unveiled Advanced Armoured Platforms (Tracked & Wheeled) at Ahilyanagar, Maharashtra—designed to meet evolving battlefield requirements. The platforms were launched by Samir V Kamat.… pic.twitter.com/zECq1K6omz— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) April 25, 2026
WhAP और नए AAP में क्या है अंतर
WhAP पहला मजबूत बेस था, और AAP उसी का अगला, ज्यादा एडवांस्ड वर्जन है। WhAP 8×8 दरअसल डीआरडीओ और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स का बनाया हुआ एक पहियों वाला आर्मर्ड वाहन था। इसे इंफैंट्री को सुरक्षित तरीके से ले जाने और जरूरत पड़ने पर लड़ाई में इस्तेमाल करने के लिए डिजाइन किया गया था। इसमें सैनिक अंदर बैठकर मूव करते थे और ऊपर लगे टरेट से फायरिंग होती थी। पुराने WhAP में आमतौर पर मैन्ड टरेट लगाया जाता था, यानी टरेट के अंदर भी सैनिक बैठता था, या फिर कुछ मामलों में रिमोट कंट्रोल्ड वेपन सिस्टम लगाया जाता था।
तकनीकी तौर पर WhAP करीब 24 टन वजन का होता है और इसमें लगभग 600 हॉर्सपावर का इंजन लगाया जाता है। यह पानी में भी चल सकता है, यानी इसमें एम्फीबियस क्षमता होती है। सुरक्षा के लिए इसमें STANAG लेवल 3 से 4 तक का प्रोटेक्शन दिया गया था, जो गोलियों और छोटे ब्लास्ट से बचाव करता है। इस प्लेटफॉर्म को मोरक्को जैसे देशों को एक्सपोर्ट भी किया गया और भारत में कुछ सुरक्षा बलों ने भी इसका इस्तेमाल किया। (AAP vs WhAP vs Stryker)
वहीं, नए Advanced Armoured Platform यानी AAP की बत करें, तो यह उसी WhAP का अगला और ज्यादा आधुनिक रूप है। सबसे बड़ा बदलाव इसके टरेट में है। नए AAP में 30 मिमी का क्रूलेस टरेट लगाया गया है। क्रूलेस का मतलब है कि टरेट के अंदर कोई सैनिक नहीं बैठता, बल्कि इसे पूरी तरह रिमोट से ऑपरेट किया जाता है। इससे सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि सैनिक वाहन के अंदर सुरक्षित रहते हैं और उन्हें सीधे खतरे का सामना नहीं करना पड़ता।
इस टरेट में 30 मिमी की मुख्य तोप के साथ 7.62 मिमी की मशीन गन भी लगी होती है। इसके अलावा इसमें एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल यानी ATGM लॉन्च करने की क्षमता भी होती है। सुरक्षा के मामले में भी नया AAP काफी आगे है। इसमें STANAG लेवल 4 और 5 तक का प्रोटेक्शन दिया गया है, जो पहले के मुकाबले ज्यादा मजबूत है। इसमें मॉड्यूलर आर्मर लगाया गया है, यानी जरूरत के हिसाब से सुरक्षा को बढ़ाया या घटाया जा सकता है। इससे यह अलग-अलग ऑपरेशन के हिसाब से खुद को ढाल सकता है।
डिजाइन की बात करें तो AAP पूरी तरह मॉड्यूलर है। एक ही प्लेटफॉर्म को अलग-अलग रोल के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। जैसे इसे इंफैंट्री कॉम्बैट व्हीकल, आर्मर्ड पर्सनल कैरियर, कमांड पोस्ट, रेकी व्हीकल या मोर्टार कैरियर में बदला जा सकता है।
मोबिलिटी यानी चलने-फिरने की क्षमता भी बेहतर की गई है। इसमें हाई पावर इंजन और बेहतर पावर-टू-वेट रेशियो दिया गया है, जिससे यह तेज रफ्तार से चल सकता है और मुश्किल रास्तों को पार कर सकता है। पानी में चलने के लिए इसमें बेहतर हाइड्रो जेट सिस्टम लगाया गया है, जिससे इसकी एम्फीबियस क्षमता पहले से ज्यादा प्रभावी हो गई है।
इसके अलावा इसमें रन-फ्लैट टायर्स भी होते हैं, यानी अगर टायर को नुकसान भी हो जाए, तब भी वाहन कुछ दूरी तक चलता रह सकता है। साथ ही इसमें एडवांस्ड सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम लगाए गए हैं, जो युद्ध के दौरान बेहतर जानकारी और कंट्रोल देते हैं।
वहीं ट्रैक्ड AAP एक बिल्कुल अलग और नया प्लेटफॉर्म है। इसे ट्रैक्ड इंफैंट्री कॉम्बैट व्हीकल के तौर पर डेवलप किया गया है, जो भविष्य में पुराने बीएमपी-2 जैसे वाहनों की जगह ले सकता है। (AAP vs WhAP vs Stryker)
स्ट्राइकर और 8×8 AAP में क्या है अंतर
स्ट्राइकर और भारत का नया एडवांस्ड आर्मर्ड प्लेटफार्म (AAP) दोनों ही 8×8 व्हील्ड आर्मर्ड व्हीकल हैं, लेकिन इनका डिजाइन और इस्तेमाल अलग जरूरतों को ध्यान में रखकर किया गया है। स्ट्राइकर अमेरिकी सेना के लिए बना एक हल्का और भरोसेमंद प्लेटफॉर्म है, जबकि AAP भारत की परिस्थितियों—जैसे ऊंचाई, नदियां और अलग-अलग इलाकों—को ध्यान में रखकर तैयार किया गया नया और ज्यादा एडवांस्ड सिस्टम है।
वजन की बात करें तो स्ट्राइकर का वजन 16.5 से 19 टन के बीच है। वहीं AAP का वजन ज्यादा है, लगभग 24 से 26 टन। हल्का होने की वजह से स्ट्राइकर को एयरक्राफ्ट (जैसे सी-130) से आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है। लेकिन ज्यादा वजन होने के बावजूद AAP में ताकत ज्यादा मिलती है।
इंजन पावर की बात करें, तो स्ट्राइकर में लगभग 350 हॉर्सपावर का इंजन होता है, जबकि AAP में करीब 600 हॉर्सपावर का इंजन लगाया गया है। AAP कठिन इलाकों जैसे पहाड़ या ऊंचाई वाले क्षेत्र में बेहतर काम कर सकता है। इसका पावर-टू-वेट रेशियो भी ज्यादा है, जो लगभग 24-25 एचपी/टन के आसपास माना जाता है, जबकि स्ट्राइकर में यह करीब 17-18 एचपी/टन है।
स्पीड दोनों की लगभग बराबर है। सड़क पर दोनों 90 से 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकते हैं। लेकिन असली फर्क पानी में देखने को मिलता है। स्ट्राइकर पूरी तरह एम्फीबियस नहीं है, सिर्फ सीमित पानी (फोर्डिंग) पार कर सकता है। दूसरी तरफ AAP में हाइड्रो जेट्स लगे होते हैं, जिससे यह पानी में 8 से 10 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकता है।
प्रोटेक्शन की बात करें, तो स्ट्राइकर में STANAG लेवल 3 से 4 तक की सुरक्षा मिलती है और इसमें IED ब्लास्ट से बचने के लिए डबल वी-हुल डिजाइन दिया गया है। वहीं AAP में STANAG लेवल 4 से 5 तक का प्रोटेक्शन मिलता है, जो ज्यादा मजबूत है। इसके साथ मॉड्यूलर आर्मर भी है। (AAP vs WhAP vs Stryker)
अब फायरपावर की बात करें तो AAP यहां ज्यादा एडवांस्ड है। इसमें 30 मिमी का क्रूलेस टरेट है। इसके साथ 7.62 मिमी मशीन गन और एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल यानी ATGM भी एक ही टरेट में इंटीग्रेटेड होती है।
स्ट्राइकर में 2.7 मिमी मशीन गन या 40 मिमी ग्रेनेड लॉन्चर लगा होता है। कुछ वर्जन में 30 मिमी गन भी होती है, लेकिन ATGM अलग सिस्टम के जरिए लगाया जाता है, जैसे TOW मिसाइल वाला अलग वेरिएंट या Javelin मिसाइल के साथ रिमोट वेपन स्टेशन। यानी AAP में फायरपावर ज्यादा इंटीग्रेटेड है।
दोनों वाहनों में 2 क्रू मेंबर और 9-10 सैनिक बैठ सकते हैं। मॉड्यूलर डिजाइन के मामले में भी दोनों मजबूत हैं। स्ट्राइकर के कई वेरिएंट हैं, जैसे एम्बुलेंस, कमांड, रिकॉन। वहीं, AAP को भी अलग-अलग रोल जैसे इंफैंट्री कॉम्बैट, कमांड पोस्ट या मोर्टार कैरियर के लिए बदला जा सकता है। (AAP vs WhAP vs Stryker)




