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पहलगाम हमले के बाद कैसे कश्मीर में स्नो लेपर्ड्स और ‘सांप खाने वाले’ बने आतंकियों का काल, जंगलों में ढूंढ-ढूंढ कर बना रहे शिकार!

मार्खोर शब्द फारसी भाषा से आया है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है: "मार" का अर्थ सांप और "खोर" का मतलब है खाने वाला या मारने वाला। इसलिए इसका शाब्दिक अर्थ है "सांप खाने वाला" या "सांप मारने वाला"...

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📍श्रीनगर/नई दिल्ली | 21 Apr, 2026, 12:45 PM

A year after Pahalgam attack: पहलगाम आतंकी हमले को एक साल पूरा होने के साथ जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। सुरक्षा एजेंसियों के भीतर इसे “हार्ड रीसेट” कहा जा रहा है। सुरक्षा बल अब सिर्फ जवाब देने के बजाय पहले से कार्रवाई करने और दुश्मन को ढूंढकर खत्म करने की रणनीति अपना रहे हैं।

इस बदलाव के तहत सेना, जम्मू-कश्मीर पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियों ने अपने ऑपरेशन का तरीका बदला है। खासतौर पर जंगलों और पहाड़ी इलाकों में कार्रवाई पहले से ज्यादा तेज और लगातार की जा रही है।

A year after Pahalgam attack: जंगलों में तेज हुए सर्च ऑपरेशन

पहले ज्यादातर ऑपरेशन शहरों या आबादी वाले इलाकों में होते थे। वहां किसी घर या बिल्डिंग को घेरकर आतंकियों को खत्म करना अपेक्षाकृत आसान माना जाता था। लेकिन अब हालात बदल गए हैं।

सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, आतंकी अब घने जंगलों और ऊंचे पहाड़ी इलाकों में छिपने लगे हैं। ऐसे इलाकों में ऑपरेशन करना ज्यादा मुश्किल होता है, क्योंकि वहां रास्ते कम होते हैं, मौसम खराब रहता है और हर मूवमेंट पर नजर रखना आसान नहीं होता।

इसी वजह से सेना ने इन इलाकों में लगातार कॉम्बिंग ऑपरेशन बढ़ा दिए हैं। जवान कई-कई दिनों तक जंगलों में रहकर सर्च ऑपरेशन चला रहे हैं, ताकि आतंकियों को छिपने का मौका न मिले। (A year after Pahalgam attack)

पुलिस ने बनाई नई एलीट यूनिट्स

सूत्रों के मुताबिक पहलगाम हमले के बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस ने भी अपने स्ट्रक्चर में बड़ा बदलाव किया है। पुलिस के स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप यानी एसओजी के तहत दो नई एलीट यूनिट्स बनाई गई हैं, जिनके नाम “स्नो लेपर्ड्स” और “मार्खोर” रखे गए हैं। ये दोनों यूनिटें जम्मू क्षेत्र (पुंछ, राजौरी, उधमपुर, किश्तवाड़, कठुआ आदि) में बढ़ती आतंकी गतिविधियों के जवाब में बनाई गई हैं। इनकी वजह से ऊपरी इलाकों में आतंक-संबंधित घटनाओं में काफी कमी आई है।

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स्नो लेपर्ड्स यूनिट को ऊंचाई वाले और बर्फीले इलाकों में ऑपरेशन के लिए तैयार किया गया है। वहीं मार्खोर यूनिट को घने जंगलों में लड़ाई के लिए ट्रेनिंग दी गई है।

इन दोनों यूनिट्स को खास ट्रेनिंग दी गई है, जिसमें हाई एल्टीट्यूड वारफेयर, जंगल में मूवमेंट, सटीक निशाना और तेजी से प्रतिक्रिया जैसे कौशल शामिल हैं। ये यूनिट्स हमेशा तैयार स्थिति में रहती हैं और जरूरत पड़ते ही ऑपरेशन के लिए भेजी जाती हैं।

मार्खोर यूनिट को खासतौर पर जंगलों (फॉरेस्ट बेल्ट्स) और पहाड़ी इलाकों में आतंकवादियों का पीछा करने, घुसपैठ रोकने और काउंटर-टेरर ऑपरेशंस के लिए बनाया गया है। आतंकवादी अब जंगलों और पहाड़ों में छिपने की कोशिश करते हैं, इसलिए मार्खोर यूनिट को विशेष रूप से इन इलाकों में दबदबा बनाने के लिए ट्रेन किया गया है।

मार्खोर नाम एक ताकतवर, सर्पिले सींग वाली जंगली बकरी के नाम रखा गया है। यह हिमालय, कराकोरम और मध्य एशिया के पहाड़ी इलाकों (जैसे पाकिस्तान, भारत, अफगानिस्तान, ताजिकिस्तान आदि) में पाई जाती है। यह कठिन पहाड़ी और जंगली इलाकों में बहुत चुस्ती-फुर्ती से घूमती है। यूनिट के जवान भी उसी तरह जंगलों और पहाड़ों में कुशलता से ऑपरेशन करते हैं।

मार्खोर शब्द फारसी भाषा से आया है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है: “मार” का अर्थ सांप और “खोर” का मतलब है खाने वाला या मारने वाला। इसलिए इसका शाब्दिक अर्थ है “सांप खाने वाला” या “सांप मारने वाला”। (A year after Pahalgam attack)

सेना ने भी बदला अपना तैनाती का पैटर्न

भारतीय सेना ने भी अपने ऑपरेशन के तरीके में बदलाव किया है। खासतौर पर पहाड़ी इलाकों में एलीट पैराट्रूपर यूनिट्स को तैनात किया गया है। ये यूनिट्स कठिन इलाकों में तेजी से मूव करने और सटीक ऑपरेशन करने के लिए जानी जाती हैं।

इन्हीं एलीट यूनिट्स में से एक ने पिछले साल जुलाई में ऑपरेशन महादेव के तहत पहलगाम हमले के जिम्मेदार आतंकियों को ढूंढकर खत्म किया था। यह ऑपरेशन श्रीनगर के पास दाचीगाम जंगल क्षेत्र में हुआ था, जहां लंबे समय तक पीछा करने के बाद आतंकियों को घेरा गया। (A year after Pahalgam attack)

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पीर पंजाल के दोनों तरफ बड़े ऑपरेशन

दिसंबर में सेना ने पीर पंजाल पहाड़ियों के दोनों तरफ बड़ा ऑपरेशन चलाया। यह इलाका कश्मीर घाटी को पुंछ-राजौरी और किश्तवाड़-डोडा से जोड़ता है। इस ऑपरेशन का मकसद उन आतंकी समूहों को खत्म करना था, जो इन इलाकों को अपने ठिकाने के रूप में इस्तेमाल कर रहे थे। लंबे समय तक चले अभियान में जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े सैफुल्लाह ग्रुप को खत्म किया गया।

इसके साथ ही कई ठिकानों को नष्ट किया गया, जिससे आतंकियों को अपनी जगह बदलनी पड़ी। सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि इससे उनके नेटवर्क को बड़ा नुकसान हुआ। (A year after Pahalgam attack)

रणनीति में आया बड़ा बदलाव

सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार सबसे बड़ा बदलाव रणनीति में आया है। पहले सुरक्षा बल इंतजार करते थे कि आतंकी हमला करें और फिर जवाब दिया जाए।

अब हालात पलट गए हैं। अब सुरक्षा बल खुद आगे बढ़कर आतंकियों की तलाश कर रहे हैं। उन्हें पहले ही पकड़ने या खत्म करने की कोशिश की जा रही है। इस बदलाव के बाद आतंकियों पर लगातार दबाव बना हुआ है। उन्हें एक जगह टिककर रहने या योजना बनाने का समय नहीं मिल रहा। (A year after Pahalgam attack)

बेहतर हुआ एजेंसियों के बीच तालमेल

जम्मू-कश्मीर में अलग-अलग सुरक्षा एजेंसियां काम करती हैं, जैसे सेना, पुलिस, सीआरपीएफ और खुफिया एजेंसियां। पहले इनके बीच तालमेल बिठाना एक चुनौती मानी जाती थी। अब इस पर खास ध्यान दिया गया है। जॉइंट कंट्रोल सेंटर के जरिए सभी एजेंसियां मिलकर काम कर रही हैं। हर हफ्ते बैठक होती है, जिसमें ऑपरेशन और इंटेलिजेंस की जानकारी साझा की जाती है। इससे यह सुनिश्चित किया जाता है कि हर एजेंसी एक ही दिशा में काम करे और कोई भी जानकारी छूटे नहीं।

आतंकियों के ठिकाने बदले, रणनीति भी बदली

पिछले कुछ वर्षों में आतंकियों के काम करने का तरीका भी बदला है। पहले वे शहरों और कस्बों में ज्यादा सक्रिय रहते थे। अब उन्होंने पहाड़ों और जंगलों का रुख किया है। खासतौर पर पीर पंजाल के आसपास के इलाके, जहां अलग-अलग जिलों की सीमा मिलती है, उनके लिए सुरक्षित ठिकाने बन गए थे। इन इलाकों में कंट्रोल रख पाना थोड़ा मुश्किल होता है, जिसका फायदा उठाकर आतंकी छिपते रहे है। अब सुरक्षा एजेंसियों ने इन इलाकों पर खास ध्यान देना शुरू किया है।

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एनआईए ने की 1,113 लोगों से पूछताछ

पहलगाम हमले की जांच अभी भी जारी है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए इस मामले की जांच कर रही है। एनआईए के मुताबिक, पहलगाम हमले की साजिश साजिद जट्ट नाम के आतंकी और लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) तथा उसके सहयोगी संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) ने मिलकर बनाई थी। हमले से जुड़ी हर गतिविधि, जैसे आतंकियों की आवाजाही, हथियारों की ड्रोन के जरिए सप्लाई और पर्यटकों को निशाना बनाना, इन सबको पाकिस्तान में बैठे साजिद जट्ट कंट्रोल कर रहा था।

जांच के दौरान एनआईए ने बड़े स्तर पर पूछताछ की। कुल 1,113 लोगों से जानकारी जुटाई गई। इनमें 543 ढोक (ऊंचाई वाले इलाकों में रहने वाले लोग), 117 घोड़े चलाने वाले पोनीवाले, 67 पशुपालक, 52 स्थानीय खाने-पीने के दुकानदार, 19 दुकानदार, 42 फोटोग्राफर, 36 टिकट काउंटर और जिपलाइन पर काम करने वाले लोग, 31 शॉल बेचने वाले, 25 टैक्सी ड्राइवर और 23 अन्य संदिग्ध शामिल थे।

जांच के दौरान कई इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और सबूत मिले हैं, जिनमें एक गोप्रो कैमरा भी शामिल है। इससे आतंकियों की मूवमेंट और हमले से पहले की तैयारी को समझने में मदद मिली है। इसके अलावा कुछ डिवाइस चीन में बने पाए गए, जिनकी सप्लाई चेन की जानकारी के लिए वहां की अदालत से मदद मांगी गई है। (A year after Pahalgam attack)

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